Rebirth की सच्ची कहानी, वैज्ञानिक भी हैरान रह गए?
पुनर्जन्म की एक हैरान कर देने वाली सच्ची घटना: सुमित्रा और शिवा त्रिपाठी का रहस्य
उत्तर प्रदेश के इटावा जिले का एक छोटा सा गाँव ‘शरीफपुरा’। यूँ तो यहाँ का जीवन बहुत ही शांत और साधारण था, लेकिन वर्ष 1985 में यहाँ एक ऐसी अविश्वसनीय और अलौकिक घटना घटी, जिसने न केवल भारत बल्कि दुनिया भर के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और डॉक्टरों को हैरान कर दिया। यह घटना पुनर्जन्म (Rebirth) की एक ऐसी प्रामाणिक गाथा बनी, जिसे बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मान्यता मिली।
1. सुमित्रा का शुरुआती जीवन और अकेलापन
इटावा के पास जन्मी सुमित्रा का जीवन बचपन से ही दुखों और अकेलेपन से भरा रहा। जब वह केवल 11 वर्ष की थी, तब उसकी माँ का देहांत हो गया। उसके पिता अहमदाबाद की एक टेक्सटाइल मिल में नौकरी करते थे, जिसके कारण सुमित्रा को रिश्तेदारों के आस-पास रहना पड़ा। वह बचपन से ही बहुत शांत, शर्मीली और अनपढ़ लड़की थी, जो किसी से ज्यादा घुलती-मिलती नहीं थी।
उम्र बढ़ने पर सुमित्रा का विवाह शरीफपुरा गाँव के रहने वाले जगदीश सिंह से कर दिया गया। जगदीश भी काम के सिलसिले में अक्सर दिल्ली में रहते थे। ससुराल आने के बाद भी सुमित्रा का अकेलापन कम नहीं हुआ। वह दिन भर घर के कामकाज निपटाती और शांत रहती।
दिसंबर 1984 में सुमित्रा ने एक बेटे को जन्म दिया। बच्चे के आने से सुमित्रा के बेरंग जीवन में थोड़ी खुशियाँ आईं। वह अपने मासूम बच्चे से बेहद प्यार करती थी। वह जब भी कुएं पर पानी भरने जाती या खेत जाती, बच्चे को कपड़े से अपनी कमर पर बांधकर रखती थी।
2. कुएं पर घटी पहली खौफनाक घटना
एक दिन दोपहर के समय सुमित्रा अपने बच्चे को कमर पर बांधकर कुएं से मटके में पानी लेने गई। पानी भरकर जब वह लौट रही थी, तो रास्ते में अचानक वह एकदम शांत होकर खड़ी हो गई।
उसकी आँखें ऊपर की तरफ खिंच गईं और पुतलियां पूरी तरह पलट गईं, जिससे आँखें एकदम सफेद दिखने लगीं। वह हवा में एक हाथ उठाकर ज़ोर-ज़ोर से साँसें लेने लगी और उसके दाँत आपस में किटकिटाने लगे। बच्चे पर उसकी पकड़ और कस गई, जिससे बच्चा डरकर चीख-चीखकर रोने लगा।
आस-पास के लोग यह देखकर स्तब्ध रह गए। लगभग 5 मिनट तक सुमित्रा उसी डरावनी अवस्था में रही और फिर अचानक सामान्य हो गई। जब ग्रामीणों ने उससे पूछा, तो उसे उन 5 मिनटों में क्या हुआ, कुछ भी याद नहीं था।
3. खुद की मृ/त्यु की अजीब भविष्यवाणी
कुछ दिनों बाद एक रात जब सुमित्रा कमरे में सोई हुई थी, तभी अचानक उसके कमरे से ज़ोर-ज़ोर से दाँत किटकिटाने और साँसें खींचने की आवाज़ें आने लगीं। जब उसकी सास ने कमरे में जाकर देखा तो सुमित्रा दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाए विचित्र हरकतें कर रही थी।
सास के शोर मचाने पर ससुर और पति दौड़कर आए। उसी अचेत अवस्था में सुमित्रा ने एक खौफनाक भविष्यवाणी की:
“मैं आज से ठीक तीन दिन बाद म/र जाऊँगी!”
यह सुनकर परिवार वालों के होश उड़ गए। 5 मिनट बाद जब सुमित्रा सामान्य हुई, तो उसे फिर से अपनी कही गई बात का कोई अंदाज़ा नहीं था।
4. 19 जुलाई 1985: भविष्यवाणी का खौफनाक सच
परिवार ने उस तारीख को याद रखा—19 जुलाई 1985। उस दिन परिवार वालों ने सुमित्रा को हर खतरे से दूर रखा। न उसे खाना बनाने दिया गया (ताकि आ/ग से बची रहे), न कुएं पर जाने दिया और न ही सीढ़ियाँ चढ़ने दी गईं।
पूरा दिन बीत गया, दोपहर ढल गई और शाम होने आई। परिवार ने राहत की साँस ली कि शायद अब खतरा टल गया है।
लेकिन तभी शाम के समय सुमित्रा की एक सहेली ने दरवाज़े पर आकर आवाज़ दी। सुमित्रा घर की देहलीज़ पर आकर खड़ी हुई और दोनों बातें करने लगीं। अचानक बातचीत के बीच सुमित्रा शांत हो गई। उसका शरीर करंट लगने की तरह अकड़ गया, आँखें सफेद हो गईं और वह ज़मीन पर गिर पड़ी।
ग्रामीणों ने उसकी नब्ज़ जाँची, पर कोई साँस या धड़कन नहीं चल रही थी। गाँव के स्थानीय वैद्य को बुलाया गया। वैद्य ने सुमित्रा की पूरी जाँच करने के बाद उसे मृत घोषित कर दिया।
5. अंतिम संस्कार की तैयारी और चमत्कार
गाँव में न तो अस्पताल था और न ही श्मशान घाट। पंडित जी ने कहा कि जिस लड़की ने अपनी मृ/त्यु की तारीख खुद बताई थी, उसका अंतिम संस्कार पूरे विधि-विधान से होना चाहिए।
गाँव की महिलाओं ने सुमित्रा के श/व को नहलाया, नए वस्त्र पहनाए और उसका पूरा श्रृंगार किया। अंतिम यात्रा उठाने ही वाली थी कि अचानक सुमित्रा की देह में हलचल हुई। उसने एक लंबी और गहरी साँस ली और उठकर बैठ गई!
वहाँ मौजूद महिलाएँ डर के मारे चिल्लाती हुई बाहर की ओर भागीं। गाँव वाले स्तब्ध रह गए। सुमित्रा ज़िंदा तो हो गई थी, लेकिन जब उसने बोलना शुरू किया, तो सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
6. “मैं सुमित्रा नहीं, शिवा त्रिपाठी हूँ!”
होश में आते ही सुमित्रा ने रोना शुरू कर दिया और चिल्लाने लगी:
“मेरे बच्चे रिंकू और टिंकू कहाँ हैं? मेरा पति और ससुराल वाले कहाँ हैं?”
उसने अपने गोद के मासूम बच्चे को पहचानने से मना कर दिया। जब उसका पति जगदीश पास आया, तो उसने धक्का देकर कहा:
“दूर हटो! मैं सुमित्रा नहीं हूँ। मेरा नाम ‘शिवा त्रिपाठी’ है। मेरी शादी डिबियापुर में हुई थी और मेरे दो बेटे हैं—रिंकू और टिंकू।”
अनपढ़ सुमित्रा का व्यवहार पूरी तरह बदल चुका था। जो लड़की कभी पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी, वह धाराप्रवाह हिंदी बोलने लगी और पत्र (Letter) लिखने लगी। उसने सीधी चप्पलें छोड़कर हील वाली सैंडल पहनना शुरू कर दिया और साड़ी पहनने का तरीका भी बदल लिया।
वह लगातार 3 महीने तक अपने पिता के नाम पत्र लिखती रही और अपने पति जगदीश से कहती रही कि इसे डाकघर में पोस्ट कर दो।
7. पिता सियाराम त्रिपाठी का आगमन और सच का खुलासा
अक्टूबर 1985 में पास के एक कॉलेज के लेक्चरर सियाराम त्रिपाठी को इस अजीब पत्र और घटना के बारे में पता चला। वह पूछताछ करते हुए शरीफपुरा गाँव पहुँचे।
जैसे ही सुमित्रा ने दरवाज़े पर सियाराम त्रिपाठी को देखा, वह दौड़कर आई और उनके गले लगकर रोने लगी: “पिताजी! आप मुझे भूल गए?”
सियाराम त्रिपाठी हैरान थे। उन्होंने सुमित्रा की परीक्षा लेने के लिए परिवार की पुरानी तस्वीरें दिखाईं और घर के कुछ बेहद गुप्त सवाल पूछे। सुमित्रा ने 90% से अधिक सवालों के बिल्कुल सही जवाब दिए, जिन्हें केवल सियाराम और उनकी म/ृत बेटी शिवा ही जानते थे।
8. शिवा त्रिपाठी की ह/त्या का खौफनाक इतिहास
जब सियाराम त्रिपाठी ने कुछ रिश्तेदारों की तस्वीरें दिखाईं, तो एक तस्वीर देखते ही सुमित्रा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और बोली:
“इसी ने मुझे मा/रा था! इसी ने मेरी ह/त्या की थी!”
वह तस्वीर शिवा की ननद की थी।
शिवा की असल कहानी:
- जन्म व शिक्षा: शिवा त्रिपाठी का जन्म 24 अक्टूबर 1962 को हुआ था। वह अपने ज़माने में बी/ए (B.A.) पास शिक्षित महिला थी।
- विवाह: 18 वर्ष की उम्र में डिबियापुर के छेदीलाल से उसका विवाह हुआ था, जिससे उसके दो बेटे थे—रिंकू और टिंकू।
- पारिवारिक क्ले/श: अधिक पढ़ी-लिखी होने और कम दहेज मिलने के कारण उसके ससुराल वाले उससे नफ़रत करते थे। घर में आए दिन घरेलू हिं/सा और क्ले/श होता था।
- ह/त्या: मई 1985 में ननद के साथ हुए एक विवाद में ननद ने शिवा के सिर पर ईंट मा/रकर उसकी ह/त्या कर दी थी और सा/जि/श के तहत श/व को पास के रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया था। पुलिस केस तो हुआ था, लेकिन सबूतों के अभाव में आरोपी छूट गए थे।
शिवा की मृ/त्यु मई 1985 में हुई थी और जुलाई 1985 में सुमित्रा की तथाकथित मृ/त्यु के बाद उसकी आत्मा ने सुमित्रा के शरीर में प्रवेश कर लिया था।
9. वैज्ञानिकों का शोध और 1989 का ऐतिहासिक फैसला
जब यह घटना अखबारों में छपी, तो यह बात भारत से निकलकर अमेरिका और यूरोप तक पहुँच गई।
नवंबर 1985 से अक्टूबर 1987 के बीच दुनिया भर के जाने-माने वैज्ञानिक, परामनोवैज्ञानिक (Parapsychologists) और शोधकर्ता इटावा के इस छोटे से गाँव में आए। उन्होंने सुमित्रा, सियाराम त्रिपाठी और दोनों परिवारों का गहन परीक्षण किया।
वैज्ञानिकों ने हर एक तथ्य, हस्तलेख (Handwriting), यादों और चिकित्सा रिपोर्ट की बारीकी से जाँच की। अंततः 1989 में शोधकर्ताओं ने सर्वसम्मति से इस केस को “सच्चा पुनर्जन्म” (Authentic Reincarnation Case) घोषित किया और इसे दुनिया के सबसे प्रामाणिक पुनर्जन्म मामलों में दर्ज किया गया।
निष्कर्ष
इटावा की सुमित्रा और शिवा त्रिपाठी की यह सच्ची घटना आज भी विज्ञान के लिए एक अनसुलझा रहस्य है। यह कहानी साबित करती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा और उसकी यादें समय और दूरी की सीमाओं से परे होती हैं।