लालची माँ ने 5 लाख में बेटी का सौदा किया, फिर जो हुआ…
लालची माँ ने 5 लाख में बेटी का सौदा किया, फिर जो हुआ…
“मां… मुझे छोड़ दीजिए। मैं आपके पैर पड़ती हूं। मैं जिंदगी भर आपके कपड़े धो दूंगी, बर्तन मांज दूंगी, खेत में काम करूंगी। जो कहेंगी, करूंगी… लेकिन इस शादी के लिए मत कहिए।”
बांसुरी रोते हुए अपनी मां श्यामल किशोरी के पैरों में गिर पड़ी।
श्यामल किशोरी ने उसे बेरहमी से पीछे धकेल दिया।
“चुपचाप तैयार हो जा। मेहमान दरवाजे पर खड़े हैं।”
“मां… उनकी उम्र पचास साल है। मेरे पिता की उम्र के हैं। आप मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती हैं?”
श्यामल किशोरी की आंखों में बेटी के लिए कोई ममता नहीं थी।
“अठारह साल पाला-पोसा है तुझे। आज मेरी बात मानने का वक्त आया है तो पैर पकड़ रही है?”
बांसुरी की आंखों से आंसू बहते रहे।
“मैं न्याय के लिए आवाज उठाऊंगी। यह अन्याय है। मैं इसे कभी स्वीकार नहीं करूंगी।”
श्यामल किशोरी हंस पड़ी।
“कानून? किसके पास जाएगी तू? इस इलाके का बड़ा साहब भी बलभद्र के फार्म से हर रविवार मुफ्त का मुर्गा ले जाता है। पुलिस, पंचायत, नेता… सब उसकी जेब में हैं।”
फिर उसने मेज पर रखे पांच लाख रुपये की तरफ देखा।
“तेरी कीमत पांच लाख लगी है। और मुझे ये पैसे चाहिए।”
बांसुरी का दिल जैसे टूट गया।
उसी पल उसने आसमान की तरफ देखकर कहा—
“हे भगवान… अगर तू सच में है, तो आज मुझे बचा ले।”
लेकिन बांसुरी को नहीं पता था कि उसकी यह पुकार कहीं बहुत दूर किसी ऐसे इंसान तक पहुंच चुकी थी, जो उसकी जिंदगी बदलने वाला था।

दो महीने पहले…
शहर के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में से एक था राउत ग्रुप।
उसका मालिक था निर्भय राउत।
कम उम्र में उसने अपनी मेहनत से एक छोटी कंपनी को देश के बड़े कारोबारी समूहों में बदल दिया था।
लेकिन निर्भय की एक खासियत थी।
वह पैसे से ज्यादा अपने सिद्धांतों को महत्व देता था।
एक रात उसके ऑफिस में बोर्ड मीटिंग चल रही थी।
उसने फाइल बंद करते हुए कहा—
“हरिहर, कल की मीटिंग रद्द कर दो। सिकंद ग्रुप के साथ अब कोई सौदा नहीं होगा।”
हरिहर चौंक गया।
“सर, दुर्जन सिकंद इसे अपनी बेइज्जती समझेंगे।”
निर्भय ने शांत स्वर में कहा—
“जो आदमी अपने मजदूरों की तनख्वाह काटकर अपनी गाड़ियां बदलता है, उसके साथ मेरा नाम नहीं जुड़ सकता।”
लेकिन उसी रात उसके खिलाफ साजिश शुरू हो चुकी थी।
कुछ देर बाद एक आदमी ने उसके पानी में नशीली दवा मिला दी।
निर्भय को अचानक चक्कर आने लगा।
उसने सामने खड़े आदमी की तरफ देखा।
“तुमने… मेरे साथ धोखा किया है।”
वह आदमी मुस्कुराया।
“कल सुबह अखबार में खबर छपेगी कि राउत ग्रुप में बड़ा बदलाव हो गया है। और उसके बाद आपकी कंपनी के ज्यादातर शेयर मेरे नाम होंगे।”
निर्भय लड़खड़ाया।
“तुम्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।”
वह आदमी हंसा।
“कीमत तो आप चुका चुके हैं, साहब।”
निर्भय किसी तरह वहां से निकल गया।
उस रात उसे सिर्फ एक बात पता थी—
अगर वह शहर में रुका, तो शायद अगली सुबह नहीं देख पाएगा।
एक सुनसान सड़क और एक अनजान लड़की
कई घंटे बाद निर्भय एक छोटे से गांव के बाहर सड़क किनारे बेहोश पड़ा था।
सुबह खेतों की तरफ जा रही एक लड़की की नजर उस पर पड़ी।
उसका नाम था—
बांसुरी।
वह करीब 22 साल की थी।
उसने निर्भय के कपड़े देखे।
महंगे जूते।
महंगी घड़ी।
लेकिन शरीर पर चोटों के निशान।
बांसुरी घबरा गई।
“हे भगवान… यह आदमी कौन है?”
वह गांव की बुजुर्ग काकी के पास दौड़ी।
“काकी, थोड़ी हल्दी और वो जड़ी-बूटी चाहिए जो आप बुखार में देती हैं।”
काकी ने पूछा—
“क्यों बिटिया? तेरी तबीयत खराब है?”
“मेरे लिए नहीं। रास्ते में एक आदमी बेहोश पड़ा है।”
काकी ने डरते हुए कहा—
“बिटिया, अजनबी आदमी के मामले में मत पड़। कल को कोई इल्जाम लग गया तो?”
बांसुरी ने जवाब दिया—
“काकी, अगर मैं उसकी जगह होती और वो मेरी जगह… तो मैं चाहती कि कोई तो रुकता।”
काकी ने उसकी तरफ देखा।
“तेरा दिल बहुत साफ है बांसुरी। लेकिन दुनिया बहुत कठोर है।”
बांसुरी फिर भी चली गई।
उसने उस अजनबी को पानी पिलाया।
घर से अपनी बची हुई रोटी लाई।
और अगले तीन दिन तक उसकी सेवा करती रही।
तीसरे दिन निर्भय की आंखें खुलीं।
उसने कमजोर आवाज में पूछा—
“तुम… तुमने मुझे बचाया?”
बांसुरी मुस्कुराई।
“मैंने कुछ नहीं किया साहब। ऊपर वाले ने आपको बचाया। मैं तो बस रास्ते में खड़ी थी।”
“तुम्हारा नाम?”
“बांसुरी।”
निर्भय कुछ क्षण उसे देखता रहा।
शहर में हजारों लोग उससे मदद मांगते थे।
लेकिन यह लड़की…
जिसके पास खुद खाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं था…
उसने अपनी रोटी उसके साथ बांट दी थी।
निर्भय ने पूछा—
“तुमने मुझसे कुछ मांगा क्यों नहीं?”
बांसुरी हंस पड़ी।
“रोटी बदले के लिए नहीं दी जाती, साहब।”
निर्भय की आंखें नम हो गईं।
उसने अपनी जेब से एक अंगूठी निकाली।
“इसे रख लो।”
बांसुरी ने सिर हिलाया।
“नहीं साहब, मैं यह नहीं ले सकती।”
“यह कोई कीमत नहीं है। यह मेरे परिवार की पुश्तैनी निशानी है। जिस दिन कोई ऐसा मिले जिस पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सके, उसे दे देना।”
बांसुरी ने अंगूठी ले ली।
निर्भय ने कहा—
“मैं वापस आऊंगा।”
“क्यों?”
“अगर तुम राजी हुईं तो… पूरे रीति-रिवाज से तुम्हें अपनी पत्नी बनाकर ले जाऊंगा।”
बांसुरी घबरा गई।
“साहब, शायद बीमारी की वजह से आप ऐसा कह रहे हैं। शहर पहुंचकर आप सब भूल जाएंगे।”
निर्भय मुस्कुराया।
“राउत अपनी जुबान नहीं भूलते।”
चार दिन बाद…
निर्भय शहर लौट चुका था।
उसने अपनी कंपनी में हुई साजिश का पर्दाफाश कर दिया।
दुर्जन सिकंद के सामने उसने फाइल रखी।
“यह कंपनी के फंड की पूरी रिपोर्ट है।”
सिकंद घबरा गया।
“यह झूठ है!”
निर्भय ने कहा—
“यह खत्म नहीं हुआ। अभी तो शुरू हुआ है।”
लेकिन जीत के बाद भी निर्भय के दिमाग में सिर्फ एक नाम था।
बांसुरी।
उसने अपने सबसे भरोसेमंद आदमी हरिहर को बुलाया।
“एक काम है। शहर से करीब सौ किलोमीटर दूर धूलीगढ़ नाम का गांव है। वहां बांसुरी नाम की लड़की रहती है। उसे ढूंढो।”
हरिहर ने पूछा—
“सर, वह कौन है?”
निर्भय ने अंगूठी की तरफ देखते हुए कहा—
“वह ऐसी इंसान है जिसने मेरी जिंदगी उस वक्त बचाई जब उसे मेरा नाम तक नहीं पता था।”
फिर उसने कहा—
“और सुनो, उस पर कोई दबाव नहीं डालना। अगर वह मुझे स्वीकार नहीं करना चाहती तो उसकी पूरी जिम्मेदारी मेरी होगी।”
हरिहर ने सिर झुका दिया।
लेकिन जब वह धूलीगढ़ पहुंचा तो गांव वालों ने बांसुरी के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।
हरिहर को तुरंत समझ आ गया—
लोग डर रहे थे।
उसने निर्भय को फोन किया।
“सर, यहां कुछ गड़बड़ है। लोग बांसुरी का नाम सुनकर डर जाते हैं।”
निर्भय की आवाज बदल गई।
“अब हम पूछने नहीं जाएंगे, हरिहर। अब जवाब लेने जाएंगे।”
दूसरी तरफ बांसुरी की जिंदगी बिक रही थी
उधर गांव में श्यामल किशोरी ने बांसुरी की शादी तय कर दी थी।
दूल्हा था बलभद्र।
उम्र पचास साल।
गांव का सबसे बड़ा मुर्गी फार्म मालिक।
और उसके बदले श्यामल किशोरी को मिलने थे—
पांच लाख रुपये।
बांसुरी को जब पता चला तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।
“मां, यह शादी नहीं है। यह सौदा है।”
श्यामल किशोरी चिल्लाई—
“शादी उम्र से नहीं, पैसे से चलती है।”
“लेकिन मैं उनसे शादी नहीं करना चाहती!”
“तुझे चाहने की इजाजत किसने दी?”
बांसुरी रोते हुए अपनी बड़ी बहन कुंदलता की तरफ देखने लगी।
“दीदी… आप तो मेरी बहन हैं। कम से कम आप मेरी मदद कीजिए।”
कुंदलता ने नजरें झुका लीं।
“बांसुरी… मैं कुछ नहीं कर सकती।”
बांसुरी टूट गई।
क्योंकि बचपन से उसने एक बात सुनी थी—
“तू और कुंदलता बराबर नहीं हैं।”
लेकिन उसे कभी समझ नहीं आया कि क्यों।
उसे स्कूल भेजना बंद कर दिया गया था।
उसे घर का सारा काम करना पड़ता था।
खाना भी गिनकर मिलता था।
जबकि कुंदलता को अच्छे कपड़े, पढ़ाई और हर सुविधा मिली।
एक रात बांसुरी ने अपनी पड़ोस की बूढ़ी काकी से पूछा—
“काकी, मां हमेशा कहती हैं कि मैं और दीदी बराबर नहीं हैं। क्यों?”
काकी कुछ पल चुप रहीं।
फिर बोलीं—
“बिटिया… एक राज है। लेकिन अभी मत पूछ।”
“कौन सा राज?”
“सुबह तक शायद तुझे खुद जवाब मिल जाए।”
शादी से एक रात पहले
बांसुरी को कमरे में बंद कर दिया गया।
वह रोते हुए दरवाजा पीटती रही।
“मां! दरवाजा खोलिए!”
कोई जवाब नहीं आया।
तभी खिड़की से एक छोटी सी आवाज आई।
“दीदी…”
वह चिन्नू था, गांव का गरीब मजदूर का बेटा।
बांसुरी ने फुसफुसाकर कहा—
“चिन्नू, यह चिट्ठी कस्बे के डाकघर पहुंचा दे।”
“लेकिन किसे?”
“जिसे भी यह मिले… बस पहुंचा देना।”
वह चिट्ठी असल में निर्भय के नाम थी।
लेकिन चिन्नू रास्ते में पकड़ लिया गया।
गांव के एक आदमी ने उसे धमकाया—
“अगर किसी से कुछ कहा तो तेरे पिता की मजदूरी बंद करवा देंगे।”
बांसुरी की आखिरी उम्मीद भी टूट गई।
उसे लगा शायद कोई नहीं आएगा।
शादी का दिन
सुबह से गांव में हलचल थी।
ढोल बज रहे थे।
मेहमान आ रहे थे।
बांसुरी को लाल लहंगा पहनाया गया।
उसकी आंखें रो-रोकर सूज चुकी थीं।
वह अपनी मां के सामने हाथ जोड़कर बोली—
“मां, मैं आपके पैर पड़ती हूं। मुझे मत बेचिए।”
श्यामल किशोरी ने उसके हाथ झटक दिए।
“चुप!”
तभी बाहर से किसी बच्चे की आवाज आई—
“काका! गांव के बाहर बहुत सारी गाड़ियां आ रही हैं!”
सब लोग बाहर दौड़े।
एक नहीं।
दो नहीं।
बारह काली गाड़ियां।
गांव में ऐसी गाड़ियां किसी ने कभी नहीं देखी थीं।
पहली गाड़ी से हरिहर उतरा।
उसने पूछा—
“यहां बांसुरी नाम की लड़की रहती है?”
श्यामल किशोरी घबरा गई।
“जी… मेरी बेटी है।”
हरिहर ने कहा—
“मैं राउत ग्रुप से हरिहर हूं।”
गांव में फुसफुसाहट शुरू हो गई।
तभी पीछे की गाड़ी का दरवाजा खुला।
निर्भय राउत बाहर आया।
बांसुरी ने उसे देखा।
उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
“साहब…”
निर्भय उसके पास गया।
“मैंने कहा था ना… मैं लौटूंगा। देर हो गई। इसके लिए माफी।”
बांसुरी कांपती आवाज में बोली—
“आप सच में आ गए।”
निर्भय ने कहा—
“इस बार तुम्हें अकेला छोड़ने नहीं आया।”
बलभद्र आगे आया।
“यह मेरी शादी है। आप यहां क्यों आए हैं?”
निर्भय ने उसकी तरफ देखा।
“कौन सी शादी?”
बलभद्र ने कहा—
“जो तय हुई है। पांच लाख रुपये दिए हैं।”
निर्भय का चेहरा कठोर हो गया।
“पैसे देकर किसी इंसान को खरीदा नहीं जाता। यह शादी नहीं, खरीद-फरोख्त है।”
तभी निर्भय ने बांसुरी की तरफ देखा।
“फैसला तुम्हारा होगा। अगर तुम मेरे साथ चलना चाहती हो, मैं तुम्हें अभी यहां से ले जाऊंगा। अगर नहीं, तो भी तुम्हें कोई जबरदस्ती नहीं कर सकता।”
बांसुरी ने अपने दुपट्टे के कोने से वही अंगूठी निकाली।
“मैंने इसे संभालकर रखा था। इस उम्मीद में नहीं कि आप लौटेंगे…”
वह रोते हुए बोली—
“बल्कि इसलिए कि मुझे याद रहे कि दुनिया में अच्छे लोग भी होते हैं।”
तभी आया सबसे बड़ा रहस्य
अचानक पीछे से एक और गाड़ी आकर रुकी।
उससे एक उम्रदराज महिला उतरीं।
उनका नाम था—
अमोघा कौटिल्य।
शहर के बड़े कारोबारी परिवार की मुखिया।
उन्होंने बांसुरी को देखा…
और जैसे पत्थर की मूर्ति बन गईं।
उन्होंने धीरे से पूछा—
“तुम्हारा नाम क्या है?”
“बांसुरी।”
अमोघा की नजर उसकी बाईं कलाई पर पड़ी।
वहां चांद के आकार का एक जन्मचिह्न था।
अमोघा की सांस रुक गई।
“हे भगवान…”
वह बांसुरी के पास दौड़ीं।
“मेरी बच्ची!”
बांसुरी पीछे हट गई।
“आप… कौन हैं?”
अमोघा की आंखों से आंसू बह रहे थे।
“मैं तुम्हारी मां हूं।”
पूरा आंगन शांत हो गया।
बांसुरी ने अविश्वास से उनकी तरफ देखा।
“मेरी मां?”
अमोघा ने कांपती आवाज में कहा—
“बाईस साल पहले मैंने एक बेटी को जन्म दिया था। अस्पताल से मेरी बच्ची चोरी हो गई थी।”
बांसुरी की आंखें फैल गईं।
अमोघा ने आगे कहा—
“हमने उसे खोजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पांच साल तक हर सप्ताह उम्मीद जगी और टूटती रही। फिर मेरे पति इस दुख में दुनिया छोड़ गए।”
उन्होंने अपनी मुट्ठी में एक पुरानी तस्वीर दबा रखी थी।
“लेकिन पिछले महीने अस्पताल की एक बूढ़ी नर्स ने मरने से पहले सच बताया। उसने पैसे लेकर एक औरत को बच्चों के वार्ड में जाने दिया था।”
हरिहर ने फाइल आगे बढ़ाई।
“सर, अस्पताल का पुराना रिकॉर्ड भी मिल गया है।”
अमोघा ने कहा—
“उस नर्स ने उस औरत की एक पहचान बताई थी। उसकी दाहिनी हथेली पर जलने का पुराना निशान था।”
सबकी नजर श्यामल किशोरी पर गई।
उसने तुरंत अपना हाथ पीछे कर लिया।
निर्भय ने कहा—
“हाथ दिखाइए।”
श्यामल किशोरी कांपने लगी।
उसकी हथेली पर वही पुराना निशान था।
बांसुरी पीछे हट गई।
“मां…?”
श्यामल किशोरी रो पड़ी।
“हां… मैं ही थी।”
पूरे आंगन में सन्नाटा छा गया।
उसने कबूल किया—
“हमारी शादी को आठ साल हो चुके थे और हमारी कोई औलाद नहीं थी। लोग मुझे बांझ कहते थे। उस दिन अस्पताल में मैंने तुम्हें देखा… और मेरा दिमाग खराब हो गया।”
बांसुरी की आंखों से आंसू बह रहे थे।
“तो आपने मुझे चुरा लिया?”
“हां।”
“फिर जब आपकी अपनी बेटी हुई…”
श्यामल किशोरी सिर झुका गई।
“तू मुझे बोझ लगने लगी।”
बांसुरी की आवाज टूट गई।
“इसलिए मुझे स्कूल नहीं भेजा?”
कोई जवाब नहीं।
“इसलिए मुझे नौकरानी की तरह रखा?”
खामोशी।
“इसलिए मुझे गिनकर रोटी दी?”
श्यामल किशोरी रोने लगी।
“और आखिर में… पांच लाख रुपये में मेरा सौदा कर दिया?”
अब पूरे गांव को सच समझ आ चुका था।
न्याय
पुलिस को बुलाया गया।
अस्पताल के रिकॉर्ड, नर्स का बयान और श्यामल किशोरी का कबूलनामा जांच के लिए दर्ज किया गया।
बलभद्र पर जबरन शादी और लड़की को बंधक बनाने के आरोप में कार्रवाई शुरू हुई।
श्यामल किशोरी पर बच्चा चोरी, झूठी पहचान और वर्षों तक बांसुरी के साथ की गई प्रताड़ना के मामले दर्ज हुए।
बलभद्र हाथ जोड़कर बोला—
“साहब, पैसे वापस ले लीजिए।”
निर्भय ने कहा—
“कुछ चीजें पैसे से ठीक नहीं होतीं।”
फिर उसने पुलिस की तरफ देखा।
“कानून अपना काम करेगा।”
बांसुरी ने अपनी मां की तरफ देखा।
श्यामल किशोरी रो रही थी।
“मुझे माफ कर दे।”
बांसुरी की आंखों में आंसू थे।
“मैं आपको माफ करने की कोशिश करूंगी। लेकिन मैं उस जिंदगी में वापस नहीं जाऊंगी।”
एक लड़की की जीत
अमोघा ने बांसुरी से पूछा—
“बेटी, अब तुम क्या चाहती हो?”
बांसुरी ने कुछ पल सोचा।
“मैं वो चाहती हूं जो मुझे कभी नहीं मिला।”
“क्या?”
“शिक्षा।”
पूरा गांव उसकी तरफ देखने लगा।
“इस गांव की लड़कियों को सातवीं के बाद स्कूल छोड़ना पड़ता है। मैं चाहती हूं कि यहां ऐसा स्कूल बने जहां कोई बेटी सिर्फ गरीब होने की वजह से पढ़ाई न छोड़े।”
अमोघा की आंखों में गर्व था।
“स्कूल बनेगा।”
निर्भय ने कहा—
“और राउत ग्रुप गांव में महिलाओं के लिए रोजगार केंद्र खोलेगा।”
छह महीने बाद धूलीगढ़ बदल चुका था।
वहां एक नया स्कूल खुला।
पहले साल 43 लड़कियों ने दाखिला लिया।
और बांसुरी?
वह खुद भी कॉलेज जाने लगी।
एक दिन एक छोटी बच्ची ने उससे पूछा—
“दीदी, आपकी उम्र इतनी हो गई और आप अभी भी पढ़ती हैं?”
बांसुरी मुस्कुराई।
“पढ़ाई की कोई उम्र नहीं होती। बस हिम्मत की जरूरत होती है।”
दूर खड़ी अमोघा अपनी बेटी को देख रही थीं।
उन्होंने धीरे से कहा—
“बाईस साल मैंने तुम्हें खोजा।”
बांसुरी ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“और मैंने बाईस साल आपको बिना जाने भी आपका इंतजार किया होगा, मां। शायद इसी वजह से हम आखिर मिल गए।”
निर्भय कुछ दूरी पर खड़ा यह सब देख रहा था।
अमोघा ने उससे पूछा—
“तुम्हें पता था कि बांसुरी मेरे परिवार की बेटी है?”
“नहीं।”
“फिर भी तुमने उसकी मदद की?”
निर्भय मुस्कुराया।
“उस वक्त मुझे नहीं पता था कि वह कौन है। उसके पास पैसा नहीं था, पहचान नहीं थी। लेकिन उसने मुझे मेरी सबसे कमजोर हालत में इंसान समझकर मदद की।”
वह बांसुरी की तरफ देखकर बोला—
“जो इंसान आपको आपकी सबसे कमजोर हालत में सम्मान दे, उससे बड़ा रिश्ता क्या होगा?”
बांसुरी मुस्कुरा दी।
एक साल बाद
धूलीगढ़ में स्कूल की सालगिरह थी।
स्कूल की दीवार पर एक बड़ा सा वाक्य लिखा था—
“किसी इंसान की कीमत उसके पैसे से नहीं, उसके कर्मों से होती है।”
बांसुरी मंच पर खड़ी थी।
उसने सामने बैठी लड़कियों से कहा—
“मैंने अपने जीवन में भूख देखी है। अपमान देखा है। मुझे खरीदा जाने वाला सामान समझा गया।”
हॉल में सन्नाटा था।
“लेकिन मैंने एक और चीज देखी है।”
उसने काकी की तरफ देखा।
“मुश्किल समय में एक इंसान का साथ कितना बड़ा हो सकता है।”
फिर उसने निर्भय की तरफ देखा।
“और मैंने सीखा कि अच्छाई का सबसे बड़ा फल हमेशा पैसा नहीं होता। कभी-कभी एक छोटी सी मदद पूरी जिंदगी बदल देती है।”
तालियों की गूंज पूरे हॉल में फैल गई।
वह लड़की जिसे कभी अपने ही घर में नौकरानी समझा गया था…
आज उसी गांव की बेटियों के भविष्य की वजह बन चुकी थी।
और शायद इस कहानी का सबसे बड़ा सबक यही था—
जिस इंसान को दुनिया छोटा समझती है, उसकी कीमत दुनिया नहीं तय करती।
कभी-कभी एक गरीब लड़की की आधी रोटी…
किसी करोड़पति की पूरी दौलत से ज्यादा कीमती साबित होती है।
और कभी-कभी…
जिसे उसके अपने लोग पांच लाख रुपये में बेचने की कोशिश करते हैं…
वही लड़की एक दिन सैकड़ों जिंदगियां बदल देती है।