ससुर के साथ मिलकर कर दिया करनामा/ससुर की हुई मौ*त/
ससुर के साथ मिलकर कर दिया करनामा / ससुर की हुई मौ*त
प्रस्तावना:
आज की हमारी इस घटना की शुरुआत होती है भारत के राजस्थान राज्य के उदयपुर जिले से। उदयपुर जिले के अंतर्गत ‘बेडला’ नाम का एक प्रसिद्ध गाँव पड़ता है। इसी बेडला गाँव में रहने वाला मुख्य पात्र है—वेद प्रकाश।
१. जमींदार वेद प्रकाश और उसका परिवार
वेद प्रकाश इस पूरे गाँव का सबसे बड़ा जमींदार माना जाता था। उसके पास अपनी कुल २८ एकड़ उपजाऊ ज़मीन थी। धन, संपत्ति और सामाजिक प्रभाव की वजह से वेद प्रकाश के पास पैसा और पावर दोनों की कोई कमी नहीं थी। परंतु वेद प्रकाश अपने इस धन और बल का हमेशा गलत इस्तेमाल किया करता था।
इन्हीं दुर्गुणों के कारण गाँव के अंदर वेद प्रकाश की ज़रा सी भी इज़्ज़त नहीं थी। गाँव वाले उसका आदर नहीं करते थे, क्योंकि उसका चाल-चलन और चरित्र अत्यधिक खराब था। वेद प्रकाश ने अपने घर के बाहर एक बहुत ही आलीशान और सुसज्जित बैठक बना रखी थी। वह प्रतिदिन रात के समय भारी मात्रा में श/राब पिया करता था। श/राब के न/शे में धुत होने के बाद वह अपनी इस आलीशान बैठक में गाँव की निर्धन व असहाय परिवारों की सुंदर महिलाओं को बुला लिया करता था और उनके साथ अपनी रातें गुज़ारकर अपना बि/स्तर ग/र्म किया करता था। वेद प्रकाश की जीवनशैली का बस यही एक मुख्य काम बन चुका था।
वेद प्रकाश के परिवार में उसका एक बेटा था, जिसका नाम अजय था। इसके अलावा उसकी एक बहू भी थी, जिसका नाम पिंकी देवी था। पिंकी देवी दिन-रात अपने घर के सारे कामकाज में व्यस्त रहती थी। पिंकी देखने में अत्यंत सुंदर, रूपवती और युवा महिला थी। परंतु उसका पति अजय एक न/शे/ड़ी किस्म का व्यक्ति था, जो हर समय तरह-तरह के न/शे में डूबा रहता था। श/रा*ब का अति न/शा करने के बाद अजय अपनी पत्नी पिंकी के साथ छोटी-छोटी बातों पर लड़ाई-झगड़ा और मारपीट किया करता था। पिंकी अपने पति के इस व्यवहार से बहुत दुखी और परेशान आ चुकी थी।
यहाँ तक तो वेद प्रकाश के परिवार में सब कुछ जैसे-तैसे चल रहा था। लेकिन आगे चलकर वेद प्रकाश दो ऐसी बड़ी घटनाओं को अंजाम देने वाला था, जिसकी गूँज पूरे जिले में सुनाई देने वाली थी।
२. लालच, कर्ज़ और अनैतिक इच्छाएँ
कुछ समय बीत जाने के बाद एक दिन सुबह के लगभग ११:०० बजे का समय था। पिंकी देवी हमेशा की तरह अपने घर के काम-काज निपटा रही थी। उसी समय पिंकी का ससुर वेद प्रकाश खेत से थका-हारा अपने घर लौटता है। घर में प्रवेश करते ही वेद प्रकाश देखता है कि बहू पिंकी के अलावा घर में कोई और मौजूद नहीं है।
पिंकी के रूप, सौंदर्य और उसकी जवानी को देखकर ससुर वेद प्रकाश की नीयत अचानक खराब हो जाती है। वह अपनी बहू को अ/नौ/चि*त नज़रों से देखते हुए कड़क आवाज़ में कहता है, “पिंकी! जल्दी से मेरे लिए खाना लेकर आओ।”
पिंकी बिना कोई देर किए तुरंत रसोई से खाना तैयार करके अपने ससुर के सामने परोस देती है। लेकिन वेद प्रकाश खाना खाने के बजाय पिंकी के शरीर को ऊपर से नीचे तक घूरता रहता है। उसी समय पिंकी अपने ससुर से कहती है, “पिताजी, मुझे आज ३,००० रुपये की सख्त ज़रूरत है। मुझे अपने लिए कुछ कपड़े खरीदने हैं और अजय के लिए भी कपड़े लेने हैं, उनके कपड़े काफी पुराने हो चुके हैं।”
यह सुनते ही वेद प्रकाश तुरंत रुखाई से जवाब देता है, “तुम दोनों के लिए मेरे पास एक भी रुपया नहीं है। अगर मेरे पास पैसे होते भी, तब भी मैं तुम्हें एक फूटी कौड़ी नहीं देता!”
ससुर के ऐसे कड़वे शब्द सुनकर पिंकी काफी परेशान और उदास हो जाती है। वह चुपचाप ससुर को खाना देकर रसोई के भीतर चली जाती है। वेद प्रकाश बैठकर खाना खा ही रहा होता है कि तभी गाँव की एक पड़ोसन महिला, जिसका नाम रजनी देवी था, उसके घर में प्रवेश करती है।
रजनी देवी जैसे ही घर के अंदर आती है, वेद प्रकाश की नज़रें उसके गोरे और सुंदर बदन पर टिक जाती हैं। रजनी देवी एक ऐसी महिला थी जिसका चाल-चलन गाँव में ठीक नहीं माना जाता था। वह गाँव के अमीर लोगों को अपने प्रेम-जाल में फँसाकर उनके साथ अ/नै/तिक सं/बंध बनाती और उनसे मोटी रकम वसूल कर लिया करती थी। आज भी रजनी देवी वेद प्रकाश पर अपने डोरे डालने के इरादे से आई थी।
वेद प्रकाश भी इस खेल में पीछे रहने वाला नहीं था। उसने रजनी की सुंदरता को देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “रजनी! आओ मेरे पास बैठो, मैं तुम्हें खाना खिलाता हूँ।”
परंतु रजनी देवी बोली, “जमींदार साहब! मैं यहाँ खाना खाने नहीं आई हूँ। मुझे अचानक ५,००० रुपये की सख्त ज़रूरत आ पड़ी है। आप मुझे ५,००० रुपये कर्ज़ के तौर पर दे दीजिए, मैं अगले महीने ब्याज सहित लौटा दूँगी।”
वेद प्रकाश ने हँसते हुए कहा, “रजनी! तुम्हें पैसों की चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर तुम्हें ५,००० रुपये चाहिए तो तुम्हें मेरे साथ कमरे में चलना होगा।”
रजनी भी चालाक थी, वह मुस्कुराकर बोली, “जमींदार साहब, आप जहाँ कहेंगे मैं चलने को तैयार हूँ।”
इसके बाद वेद प्रकाश रजनी देवी को अपने कमरे के अंदर ले जाता है। कमरे में पहुँचते ही वह रजनी से कहता है, “देखो रजनी, मैं रात के समय अपनी अलग बैठक में सोता हूँ। वहाँ रात में कोई नहीं आता। मैं तुम्हें अभी के अभी ५,००० रुपये दे देता हूँ, लेकिन शर्त यह है कि आज रात १०:०० बजे तुम्हें मेरी बैठक में आना होगा और मेरा बि/स्तर ग/र्म करना होगा।”
रजनी मुस्कुराते हुए बोली, “जमींदार साहब, आप बिल्कुल बेफिक्र रहिए। आप मुझे पैसे दीजिए, मैं घर जाती हूँ और रात १०:०० बजे जैसे ही मेरा पति सो जाएगा, मैं छिपते-छिपाते आपकी बैठक में पहुँच जाऊँगी।”
वेद प्रकाश खुश होकर अपनी अलमारी खोलता है और ₹५,००० निकालकर रजनी को थमा देता है। रजनी पैसे लेकर खुशी-खुशी अपने घर लौट जाती है।
३. संदेह और अनैतिकता की ओर कदम
रजनी के जाने के बाद जैसे ही वेद प्रकाश कमरे से बाहर निकलता है, पिंकी देवी उसके पास आती है और सवाल करती है, “पिताजी, जब मैंने आपसे ३,००० रुपये माँगे तो आपने कहा कि आपके पास पैसे नहीं हैं। लेकिन जब इस पड़ोसन रजनी ने माँगे तो आपने तुरंत ५,००० रुपये दे दिए?”
वेद प्रकाश बात सँभालते हुए कहता है, “वह महिला मुझसे कर्ज़ ले कर गई है, जो ब्याज समेत वापस करेगी।”
पिंकी सब समझ जाती है और चेतावनी देते हुए कहती है, “उस औरत का चरित्र ठीक नहीं है, आप उससे बचकर रहिए।” लेकिन वेद प्रकाश उसकी बात को अनसुना करके अपनी बैठक की ओर चला जाता है।
बैठक में पहुँचकर वेद प्रकाश अपने नौकर मुकुल को बुलाता है और कहता है, “मुकुल, तुरंत जाकर मेरे लिए श/राब खरीद कर लाओ।”* मुकुल बाइक उठाकर ठेके से श/राब लाता है। इसके बाद वेद प्रकाश और मुकुल दोनों बैठकर शाम तक श/राब पीते हैं।
रात के करीब ९:०० बजे वेद प्रकाश रजनी को फोन करता है और बैठक में आने को कहता है। रजनी कहती है कि पति के सोते ही वह आ जाएगी। रात १०:०० बजे तक रजनी का पति श/रा*ब के न/शे में सो जाता है। रजनी दबे पाँव निकलकर वेद प्रकाश की बैठक में पहुँच जाती है।
बैठक में पहुँचते ही वेद प्रकाश दरवाज़ा बंद करवा देता है और रजनी का हाथ पकड़कर बिस्तर तक ले जाता है। बंद कमरे में दोनों की आपसी रज़ामंदी से अ/नै/तिक सं/बंध कायम होते हैं। अपनी इच्छा पूरी होने के बाद वेद प्रकाश रजनी को कुछ और पैसे देता है और कहता है कि वह रोज़ रात को आया करे। रजनी भी सहमति जताकर अपने घर लौट जाती है। इसके बाद वेद प्रकाश अक्सर रजनी को बुलाकर अपनी रातें रंगीन करने लगा।
४. पारिवारिक कलह और घर का त्याग
समय बीतता गया और १० अगस्त २०२६ की तारीख आ पहुँची। सुबह के १०:०० बजे वेद प्रकाश घर पर खाना खा रहा था। पास ही उसका बेटा अजय बैठा था। न/शा करने के लिए अजय को १,००० रुपये की ज़रूरत थी।
अजय ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मुझे १,००० रुपये दे दीजिए।”
वेद प्रकाश ने साफ़ मना करते हुए कहा, “मेरे पास तुम्हें देने के लिए एक रुपया नहीं है। तुम और तुम्हारी पत्नी हमेशा पैसों पर मँडराते रहते हो, लेकिन कमाने के नाम पर पीछे हट जाते हो।”
इस बात से अजय को बहुत गुस्सा आया, लेकिन वह चुप रहा। तभी पड़ोसन रजनी देवी फिर वहाँ पहुँचती है और वेद प्रकाश से ३,००० रुपये माँगती है। वेद प्रकाश तुरंत अंदर जाकर अपनी अलमारी से ३,००० रुपये लाकर रजनी को दे देता है। रजनी खुश होकर चली जाती है।
यह देखकर अजय का खून खोल उठता है। वह चिल्लाकर कहता है, “पिताजी! आपने उस औरत को तुरंत ३,००० रुपये दे दिए, और मुझे १,००० रुपये भी नहीं दिए?”
पिता-पुत्र के बीच ज़ोरदार बहस और झगड़ा शुरू हो जाता है। शोर सुनकर पड़ोसी आ जाते हैं और बचाव कराते हैं। गुस्से में आकर अजय कहता है, “आज के बाद मैं इस घर में नहीं रहूँगा! मैं अपनी बड़ी बहन सुमन के घर जा रहा हूँ।”
अजय अपने कुछ कपड़े समेटता है, दोस्त से पैसे उधार लेता है और बहन के घर चला जाता है। अब घर में केवल पिंकी और वेद प्रकाश रह जाते हैं।
५. मर्यादा की सीमाएँ टूट गईं
दिन बीतते हैं और शाम के करीब ६:०० बजे वेद प्रकाश अपने दोस्त मोहन प्रकाश को अपनी बैठक में श/राब पीने के लिए बुलाता है। नौकर मुकुल श/राब लाता है और दोनों देर रात तक पीते हैं। रात ९:३० बजे मोहन अपने घर चला जाता है।
रात १०:३० बजे अत्यधिक न/शे की हालत में वेद प्रकाश अपनी बैठक से निकलकर मुख्य घर में जाता है। घर में अपनी बहू पिंकी को अकेली देखकर वेद प्रकाश की नियत पूरी तरह डगमगा जाती है। वह पिंकी को निहारते हुए कहता है, “पिंकी! मेरे कमरे में खाना लेकर आओ।”
पिंकी जैसे ही कमरे में खाना लेकर पहुँचती है, वेद प्रकाश उससे सीधा प्रस्ताव रखता है, “पिंकी, आज घर में कोई नहीं है। हम दोनों अकेले हैं और किसी को भनक तक नहीं लगेगी। तुम्हें आज मेरा बि/स्तर ग/र्म करना होगा।”
यह सुनकर एक पल के लिए पिंकी चौंक जाती है, लेकिन फिर उसके मन में लालच आ जाता है। उसने सोचा कि यदि वह अपने ससुर को अपने वश में कर लेगी, तो ससुर की पूरी २८ एकड़ ज़मीन और संपत्ति पर उसका कब्ज़ा हो जाएगा।
जब वेद प्रकाश पिंकी का हाथ पकड़ता है, तो पिंकी कोई विरोध नहीं करती। वेद प्रकाश घर का मुख्य दरवाज़ा बंद करता है और पिंकी को बेडरूम में ले जाता है। वह कहता है, “मेरे पास पैसा और पावर दोनों हैं, मैं तुम्हारी हर ज़रूरत पूरी करूँगा।”
पिंकी भी मर्यादा भूलकर कहती है, “यदि ऐसी बात है, तो मैं आपकी हर शर्त मानने को तैयार हूँ।”
उस रात ससुर और बहू दोनों आपसी रज़ामंदी से एक ही बिस्तर पर अ/नै/तिक सं/बंध बनाते हैं। वेद प्रकाश पिंकी को आश्वासन देता है कि अजय वापस न भी आए तो भी वह उसकी श/री/रि*क और आर्थिक दोनों ज़रूरतें पूरी करता रहेगा। पिंकी भी अब अपने पति से बेपरवाह हो जाती है।
६. २५ अगस्त २०२६: वर्षगाँठ और धोखे का बाज़ार
समय बीतता गया और २५ अगस्त २०२६ का दिन आ गया। सुबह ९:०० बजे पिंकी अपने पति अजय को फोन करती है और कहती है, “आज हमारी शादी की सालगिरह है, तुम्हें घर आना चाहिए।”
अजय कहता है, “ठीक है, मैं रात ८:०० बजे तक घर पहुँच जाऊँगा।”
अजय अपनी बहन सुमन से ₹२,००० उधार माँगता है। सुमन अपने भाई को पैसे देते हुए कहती है कि श/राब मत पीना और सीधे घर जाना। अजय बस से गाँव लौटता है, लेकिन रास्ते में श/राब का ठेका देखकर खुद को रोक नहीं पाता। वह श/रा*ब खरीदकर खेतों में बैठकर पीता है और न/शे में धुत होकर घर पहुँचता है।
घर पहुँचते ही पिंकी उसे न/शे में देखकर भड़क जाती है, “ना कोई उपहार लाए और ऊपर से श/राब पीकर आ गए!”*
दोनों में कहासुनी और मारपीट शुरू हो जाती है। तभी वेद प्रकाश बीच-बचाव करता है और अजय को कुछ पैसे देकर फिर से बाहर भेज देता है। अजय पैसे लेकर वापस ठेके पर चला जाता है।
पीछे से वेद प्रकाश पिंकी को दिलासा देता है। पिंकी शिकायत करती है कि ससुर जी ने भी उसे सालगिरह पर कोई उपहार नहीं दिया। वेद प्रकाश वादा करता है, “तुम चिंता मत करो, कल मैं शहर जाकर तुम्हारे लिए सोने के कंगन लाऊँगा।” पिंकी खुश हो जाती है।
रात को वेद प्रकाश फिर रजनी को बुलाकर अपनी हवस पूरी करता है।
अगले दिन सुबह ९:०० बजे वेद प्रकाश शहर जाता है, सुनार की दुकान से सोने के कंगन और सुंदर कपड़े खरीदकर घर लौटता है। वह पिंकी को कंगन देते हुए कहता है, “आज रात मैं इन कंगनों की पूरी कीमत वसूल करूँगा।” पिंकी हँसकर सहमत हो जाती है।
७. खूनी तांडव और अंत
रात को वेद प्रकाश नौकर मुकुल से श/राब मँगवाकर बैठक में पीता है। रात १०:०० बजे वह घर के अंदर जाता है। पिंकी अंदर से मुख्य दरवाज़ा बंद कर लेती है। दोनों बेडरूम के अंदर चले जाते हैं और अ/नै/तिक सं/बं*ध में लीन हो जाते हैं।
ठीक उसी समय, अजय श/रा*ब के भीषण न/शे में धुत होकर घर लौटता है। वह दरवाज़ा खटखटाता है, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिलता। कई बार आवाज़ देने पर भी जब दरवाज़ा नहीं खुलता, तो अजय को संदेह होता है।
अजय घर की दीवार फाँदकर अंदर कूद जाता है। जब वह बेडरूम की खिड़की या दरवाज़े से अंदर झाँकता है, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। उसकी अपनी पत्नी पिंकी और उसका ससुर (उसका पिता) दोनों आपत्तिजनक स्थिति में पाए जाते हैं।
यह दृश्य देखते ही अजय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है। वह आपा खो बैठता है और पिता व पत्नी दोनों को गालियाँ देने लगता है। पागलपन की हालत में वह घर में हथियार ढूँढता है और उसके हाथ में एक भारी कु/ल्हा*ड़ी लग जाती है।
अजय कु/ल्हा*ड़ी लेकर सीधे कमरे में घुसता है।
- सबसे पहले वह अपनी पत्नी पिंकी के सिर पर कु/ल्हाड़ी से ३-४ वार करता है। अत्यधिक र/क्त/स्राव के कारण पिंकी की मौके पर ही मौ*त हो जाती है।
- इसके बाद वह अपने पिता वेद प्रकाश पर झपटता है। वेद प्रकाश जान बचाकर भागने की कोशिश करता है, लेकिन अजय उसे दबोच लेता है। अजय कु/ल्हाड़ी से अपने पिता के हाथ-पैर काट डालता है और अंत में धड़ से ग/र्दन अलग करके उसकी ह/त्या* कर देता है।
८. पुलिस की कार्रवाई
चीख-पुकार और हंगामे की आवाज़ सुनकर आसपास के पड़ोसी एकत्र हो जाते हैं। अंदर का भयानक दृश्य देखकर सब सन्न रह जाते हैं। पूरे कमरे में र/क्त बिखरा पड़ा था और दो ला/शैं पड़ी हुई थीं।
न/शे में धुत अजय खुद अपना मोबाइल निकालता है और पुलिस थाने में फोन करके पूरे ह/त्याकांड की सूचना देता है।
एक घंटे के भीतर पुलिस दल घटनास्थल पर पहुँचता है। पुलिस दोनों शवों—वेद प्रकाश और पिंकी देवी—को अपने कब्ज़े में लेती है और ह/त्या* के आरोप में अजय को मौके से ही गिरफ़्तार कर लेती है।
थाने ले जाकर जब पुलिस अजय से कड़ाई से पूछताछ करती है, तो अजय अपने पिता वेद प्रकाश और अपनी पत्नी के अनैतिक संबंधों व उस रात की पूरी खू*नी कहानी बयाँ कर देता है। पुलिस अजय के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते हुए उसे जेल भेज देती है।
निष्कर्ष
दोस्तों! इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अजय ने अपने पिता वेद प्रकाश और अपनी पत्नी के साथ जो कुछ भी किया, क्या वह सही था या गलत? आपकी इस विषय पर क्या राय है, कमेंट बॉक्स में ज़रूर लिखें।
मिलते हैं दोस्तों किसी अगली कहानी व घटनाक्रम के साथ, तब तक के लिए—जय हिंद, वंदे मातरम!