कथा सुनने मंदिर में अकेली पूजा करने गई थी और पुजारियों ने कर दिया करनामा/
कथा सुनने मंदिर में अकेली पूजा करने गई थी और पुजारियों ने कर दिया करनामा / अ/प/रा*ध और दुष्कर्म की भयानक गाथा
प्रस्तावना:
आज की हमारी इस दर्दनाक और खौफ़नाक घटना की शुरुआत होती है भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के अमेठी जिले से। अमेठी जिले के अंतर्गत ‘बरना टीकर’ नाम का एक गाँव पड़ता है। इसी बरना टीकर गाँव में रहने वाला एक सीधा-साधा व्यक्ति है—सतबीर सिंह।
१. अपाहिज सतबीर और एक संस्कारी परिवार
सतबीर सिंह एक दुर्भाग्यशाली और अपाहिज व्यक्ति था। लगभग एक साल पहले एक भीषण सड़क हादसे में उसने अपनी दोनों टाँगें गँवा दी थीं। टाँगें कट जाने के कारण सतबीर अपने घर में चारपाई पर ही रहने के लिए मजबूर हो गया था। वह किसी भी प्रकार का काम-धंधा करने में पूरी तरह असमर्थ था।
सतबीर के परिवार में उसकी धर्मपत्नी रीना देवी थी। रीना देवी दिन-रात घर के कामकाज में व्यस्त रहती थी और अपने बीमार व लाचार पति की सच्चे दिल से सेवा करती थी। रीना एक बेहद संस्कारी, धार्मिक और सरल स्वभाव की महिला थी।
इसी परिवार में सतबीर की एक विधवा भाभी भी रहती थी, जिसका नाम बबीता देवी था। बबीता का एक १० साल का बेटा था, जिसका नाम सोनू था। बबीता देवी देखने में अत्यंत रूपवती, सुंदर और युवा महिला थी। जब भी बबीता गाँव की गली-मोहल्ले से गुजरती, तो गाँव के लोगों की नज़रें उसकी सुंदरता पर टिक जाया करती थीं।
यहाँ तक तो सतबीर के परिवार में सब कुछ जैसे-तैसे चल रहा था। लेकिन आगे चलकर इस परिवार की दोनों बहुओं—रीना और बबीता—के साथ ऐसी भयावह घटनाएँ घटने वाली थीं, जिसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी।
२. उजाड़ मंदिर और सरपंच की कुदृष्टि
समय बीतता गया। एक दिन सुबह के लगभग ८:३० बजे रीना देवी और बबीता देवी अपने घर के काम-काज निपटा रही थीं। तभी उनकी एक पड़ोसन, कविता देवी, उनके घर आई। कविता ने देखा कि सतबीर चारपाई पर लेटा हुआ है और उसकी हालत कुछ ठीक नहीं है।
कविता ने रीना से कहा, “रीना, तुम तो बड़ी धार्मिक और संस्कारी महिला हो। घर में तो तुम पूजा करती ही हो, लेकिन तुम्हें और बबीता को रोज़ गाँव के मंदिर में भी पूजा-अर्चना के लिए जाना चाहिए। भगवान के आशीर्वाद से सतबीर की सेहत में सुधार हो सकता है।”
रीना देवी ने उत्तर दिया, “ठीक है चाची, हम कल सुबह से ही मंदिर जाना शुरू कर देंगे।”
अगले दिन सुबह ५:०० बजे रीना और बबीता पूजा की थाली लेकर गाँव के बाहर स्थित मंदिर पहुँचीं। परंतु मंदिर पहुँचकर उन्होंने देखा कि वहाँ कोई पुजारी नहीं था। चारों तरफ गंदगी फैली हुई थी, आवारा पशु और कुत्ते मंदिर परिसर में गंदगी फैला रहे थे।
पूजा समाप्त करने के बाद बबीता ने कहा, “रीना, मंदिर की देखरेख के लिए एक पुजारी का होना बहुत ज़रूरी है।”
रीना ने सुझाव दिया, “चलो, हम गाँव के सरपंच सूरजपाल सिंह के पास चलते हैं। वही इस मंदिर में किसी पुजारी की व्यवस्था करवा सकते हैं।”
दोनों महिलाएँ सरपंच सूरजपाल के घर पहुँचीं। परंतु सूरजपाल सरपंच एक बेहद चरित्रहीन, कामुक और लालची इंसान था। ३ साल पहले उसकी पत्नी का देहांत हो चुका था, जिसके बाद वह पराई औरतों पर गंदी नज़र रखने लगा था। उसने पैसों और पावर के दम पर गाँव की कई असहाय महिलाओं के साथ अ/नै/तिक सं/बंध बना रखे थे।
जैसे ही रीना और बबीता उसके सामने पहुँचीं, सरपंच सूरजपाल की गंदी नज़रें उन दोनों महिलाओं के सौंदर्य पर टिक गईं। उसने मन ही मन ठान लिया कि किसी भी कीमत पर इन दोनों को हासिल करना है।
जब बबीता ने मंदिर में पुजारी की व्यवस्था करने की बात कही, तो सरपंच ने मुस्कुराते हुए कहा, “बबीता जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। मैं आज ही मंदिर के लिए एक पुजारी का प्रबंध करवा देता हूँ।”
दोनों महिलाएँ निश्चिंत होकर अपने घर लौट आईं, लेकिन सरपंच की नापाक नीयत उन पर टिक चुकी थी।
३. ढोंगी बाबा की एंट्री और खौफ़नाक सौदा
दो दिन बाद, सुबह लगभग १०:०० बजे, सरपंच सूरजपाल के घर किशन दत्त नाम का एक ढोंगी बाबा आया।
सरपंच ने किशन दत्त को देखते ही कहा, “बाबा, हमारे गाँव के मंदिर में कोई पुजारी नहीं है। तुम उस मंदिर में रहना शुरू कर दो, पूजा-पाठ करो और सफाई रखो।”
किशन दत्त खुश हो गया, लेकिन दबंग सरपंच ने उसके सामने दो कड़े सौदे रखे: १. मंदिर में आने वाले हर चंदे और दान का आधा हिस्सा सरपंच का होगा। २. मंदिर में पूजा करने आने वाली जिस सुंदर महिला पर सरपंच की नज़र पड़ेगी, उसे बहला-फुसलाकर या साज़िश से सरपंच के बि/स्त*र तक पहुँचाना होगा।
लालच में अंधे होकर किशन दत्त ने दोनों शर्तें स्वीकार कर लीं। वह मंदिर का नया पुजारी बन बैठा। गाँव वाले उसकी असलियत से अनजान थे और उसका आदर करने लगे।
४. १० जुलाई २०२६: चंदे के बहाने साज़िश की शुरुआत
१० जुलाई २०२६ की सुबह ८:०० बजे सरपंच सूरजपाल ने मंदिर आकर पुजारी किशन दत्त से कहा कि वह मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए गाँव में घर-घर जाकर चंदा एकत्र करे।
किशन दत्त चंदा माँगते-माँगते सतबीर सिंह के घर पहुँचा। दरवाज़ा बबीता देवी ने खोला। पुजारी ने जब बबीता के अप्रतिम सौंदर्य को देखा, तो उसकी नीयत भी डगमगा गई। तभी घर के अंदर से रीना देवी भी बाहर आई। एक ही घर में दो-दो सुंदर महिलाओं को देखकर पुजारी के मन में हवस का शैतान जाग उठा।
पुजारी ने बबीता को चंदे के पैसे देते समय कहा, “माते, मैं मंदिर में शाम ५:०० बजे से ६:०० बजे तक विशेष कथा शुरू कर रहा हूँ। तुम्हारे घर में दरिद्रता और बीमारी का साया है। यदि तुम दोनों रोज़ कथा सुनने आओगी, तो सारे कष्ट दूर हो जाएँगे।”
रीना और बबीता ने रोज़ कथा सुनने आने का वादा किया।
५. बबीता के साथ धोखा और तहखाने का अ/त्या*चार
शाम ४:३० बजे बबीता ने रीना से मंदिर चलने को कहा। परंतु रीना ने कहा, “सतबीर की तबीयत ज़्यादा खराब है, मुझे उन्हें दवाई देनी है। आज तुम अकेली चली जाओ।”
बबीता अकेली ही ५:०० बजे मंदिर पहुँच गई। वहाँ गाँव की अन्य महिलाएँ भी बैठी थीं। १ घंटे की कथा समाप्त होने के बाद जब सभी महिलाएँ जाने लगीं, तो पुजारी किशन दत्त ने बबीता से कहा, “बबीता, तुम थोड़ी देर रुको। घर के संकट काटने के लिए तुम्हें कुछ विशेष मंत्र और उपाय बताने हैं।”
सरल स्वभाव की बबीता रुक गई। जब सारी महिलाएँ चली गईं, तो पुजारी ने मंदिर का मुख्य दरवाज़ा बंद कर दिया। उसने बबीता से कहा कि मंत्र सीखने के लिए मंदिर के गुप्त तहखाने में चलना होगा।
बबीता जैसे ही तहखाने में उतरी, पुजारी किशन दत्त ने अपनी जेब से एक तेज़ धारदार चॉ/कू निकालकर उसकी गर्दन पर अड़ा दिया और धमकी दी, “अगर चीखी तो गला काट दूँगा!”
डर के मारे बबीता के मुँह से आवाज़ न निकल सकी। पुजारी ने चॉ/कू की नोक पर बबीता के हाथ-पाँव रस्सी से बाँध दिए और मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। इसके बाद उसने तुरंत सरपंच सूरजपाल को फोन करके बुलाया।
सरपंच अपनी मोटरसाइकिल से मंदिर पहुँचा। तहखाने में पहुँचकर उसने असहाय और बंधी हुई बबीता को देखा। उसने पुजारी को बाहर पहरा देने भेज दिया और बबीता की चीखों को अनसुना करते हुए उसके साथ जबरन ज़/ब/र्दस्ती और दु/ष्कर्म किया।
जब सरपंच की हवस पूरी हो गई, तो पुजारी किशन दत्त ने भी तहखाने में जाकर उस लाचार महिला के साथ गं/दा काम किया।
इसके बाद सरपंच ने बबीता के हाथ-पाँव खोले और खौफ़नाक धमकी दी: “अगर इस बारे में किसी को एक शब्द भी बताया, तो तेरे पूरे परिवार और बेटे को मौत के घाट उतार दूँगा!”*
बबीता रोती-बिलखती घर पहुँची। डर के मारे उसने यह खौफ़नाक सच न तो अपने देवर सतबीर को बताया और न ही रीना को। यही उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
६. २५ जुलाई २०२६: रीना का शिकार और दोहरी खामोशी
दिन बीतते गए। २५ जुलाई २०२६ की सुबह १०:०० बजे पुजारी किशन दत्त फिर सतबीर के घर पहुँचा। उसने रीना से कहा, “बबीता तो अब मंदिर नहीं आती, लेकिन तुम्हारे पति की जान खतरे में है। अगर तुम रोज़ कथा सुनने नहीं आओगी तो तुम्हारे पति की मौत हो जाएगी।”*
अपने पति की लंबी उम्र के लिए रीना शाम ५:०० बजे मंदिर जाने के लिए तैयार हो गई। बबीता ने उसे रोकने की कोशिश की और इशारों में सचेत किया, लेकिन रीना समझ न सकी और पूजा की थाली लेकर निकल पड़ी।
रास्ते में सरपंच सूरजपाल उसे अपनी बाइक पर मिला और मंदिर छोड़ दिया।
मंदिर में कथा समाप्त होने के बाद ढोंगी पुजारी ने वही पुरानी साज़िश दोहराई। उसने रीना को पति के इलाज के मंत्र सिखाने के बहाने मंदिर के गुप्त तहखाने में बुला लिया।
तहखाने में पहुँचते ही पुजारी ने चॉ/कू की नोक पर रीना देवी को डराया, उसके हाथ-पाँव बाँधे और मुँह पर पट्टी बाँध दी। फिर सरपंच को कॉल करके बुला लिया।
सरपंच और ढोंगी पुजारी दोनों ने बारी-बारी से लाचार रीना देवी के साथ अ/त्याचार और अ/नै/तिक कृत्य को अंजाम दिया। अंत में रीना को भी परिवार को ख़त्म करने की धमकी दी गई।
रीना भी रोती हुई घर लौटी और खौफ़ के कारण किसी को कुछ नहीं बता सकी। दोनों बहुएँ एक ही छत के नीचे एक ही अ/त्या*चार का शिकार हुई थीं, लेकिन दोनों खामोश थीं।
७. १८ अगस्त २०२६: बबीता का प्रतिशोध और खू*नी अंत
१८ अगस्त २०२६ की सुबह १०:०० बजे सरपंच सूरजपाल ने पुजारी से कहा कि वह आज रात बबीता को किसी भी तरह मंदिर के तहखाने में लेकर आए।
पुजारी किशन दत्त सतबीर के घर पहुँचा। उस समय सतबीर, रीना और १० साल का सोनू अस्पताल गए हुए थे। घर में बबीता अकेली थी।
पुजारी ने दरवाज़ा खटखटाया और अंदर घुसकर बबीता को धमकी दी, “आज रात ७:३० बजे तुम्हें मंदिर के तहखाने में आना होगा। सरपंच साहब तुम्हारा इंतज़ार करेंगे। अगर नहीं आई तो तेरे बेटे सोनू की लाश मिलेगी!”*
पुजारी के जाने के बाद बबीता के अंदर डर की जगह प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठी। उसने फैसला कर लिया कि अब और अ/त्या*चार नहीं सहेगी।
रात ८:०० बजे बबीता ने रीना से झूठ बोला कि वह पड़ोस में जा रही है। लेकिन इस बार वह अपने साथ एक तेज़ धारदार चॉ/कू छिपाकर ले गई थी।
जब बबीता मंदिर पहुँची, तो वहाँ सरपंच सूरजपाल और पुजारी किशन दत्त इंतज़ार कर रहे थे। सरपंच उसे खींचकर तहखाने में ले गया और दरवाज़ा बंद कर लिया।
जैसे ही सरपंच सूरजपाल ने बबीता को दबोचकर उसके साथ गलत काम करने की कोशिश की, बबीता ने मौका पाकर अपने कपड़ों में छिपाया हुआ चॉ/कू निकाला और पूरी ताकत से दबंग सरपंच की पीठ में घोंप दिया!
सरपंच दर्द से चीख पड़ा। चीख सुनकर बाहर खड़ा पुजारी किशन दत्त भागकर तहखाने में आया। उसने देखा कि सरपंच की पीठ से र/क्त बह रहा था।
ज़ख्मी सरपंच गुस्से में अंधा हो गया। पागलपन की हालत में उसने तहखाने के कोने में पड़ी एक भारी-भरकम पक्की ईंट उठाई और पूरी ताकत से बबीता देवी के सिर पर वार कर दिया।
ईंट सिर पर लगते ही गहरा घाव हुआ और अत्यधिक र/क्त/स्रा*व के कारण बबीता देवी ने मौके पर ही तड़प-तड़पकर अपना दम तोड़ दिया।
८. निष्कर्ष व कुलदीप राणा का संदेश
दोस्तों! बरना टीकर गाँव में घटी यह घटना समाज के मुँह पर एक ज़ोरदार तमाचा है।
इस पूरी दर्दनाक दास्तान से हमें कुछ अति महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं:
१. अंधविश्वास का अंत तबाही है: धर्म के नाम पर ढोंगी पुजारियों और बाबाओं पर आँख मूँदकर विश्वास करना जीवन का सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। २. चुप रहना अ/प/रा*ध को बढ़ावा देता है: यदि बबीता देवी ने पहली बार अ/त्याचार होने पर ही हिम्मत दिखाकर पुलिस या समाज को बताया होता, तो रीना देवी शिकार होने से बच जाती और बबीता को अपनी जान न गँवानी पड़ती। ३. पापकर्म का अंत भयानक होता है: पावर और पैसे के अहंकार में किया गया दु/ष्कर्म कभी न कभी खू*नी अंजाम तक ज़रूर पहुँचता है।
आप सभी दर्शकों से मेरा सवाल है—क्या बबीता देवी का अपनी रक्षा के लिए चॉ/कू उठाना सही था? और ऐसे ढोंगी पुजारियों व व्यभिचारी सरपंचों को समाज में क्या सजा मिलनी चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में ज़रूर दर्ज करें।
मिलते हैं दोस्तों किसी अगली सत्य घटना और सामाजिक जागरूकता की कहानी के साथ, तब तक के लिए—जय हिंद, वंदे मातरम!