पति के प्रदेश गए लगभग 3 साल हो गए थे पत्नी घर पर रहती थी फिर ! – News

पति के प्रदेश गए लगभग 3 साल हो गए थे पत्नी घर पर रहती थी फिर !

पति के प्रदेश गए लगभग 3 साल हो गए थे पत्नी घर पर रहती थी फिर !

पति के परदेश गए लगभग 3 साल हो गए थे, फिर घर पर हुआ बड़ा धमाका!

भाग 1: बरमपुर गाँव, विमला की तन्हाई और ससुर सीताराम का मान-सम्मान

यह कहानी उत्तर भारत के एक शांत और सुंदर गाँव बरमपुर की है। इसी गाँव में विमला नाम की एक बेहद खूबसूरत, संस्कारी और नौजवान महिला अपने वृद्ध ससुर सीताराम के साथ रहती थी। विमला के पति को रोज़गार की तलाश में परदेश गए लगभग 3 साल का लंबा समय बीत चुका था।

शुरुआती कुछ महीनों के बाद से ही विमला का पति न तो घर लौटकर आया था और न ही विमला से फोन पर कोई ख़ास बातचीत करता था। जब भी विमला फोन करके अपनी तन्हाई या घर-गृहस्थी की समस्याओं का ज़िक्र करती, उसका पति उल्टे उसी पर बिफर पड़ता और डांट-डपटकर फोन काट देता। पति के इस कठोर व्यवहार से डरकर विमला ने उसे फोन करना ही छोड़ दिया था।

दूसरी ओर, उसके ससुर सीताराम गाँव के एक प्रतिष्ठित और लोकप्रिय बुजुर्ग थे। वह गाँव के पूर्व मुखिया पद का चुनाव भी लड़ चुके थे और गाँव वाले किसी भी समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले सीताराम के पास ही आते थे। सीताराम भी अपनी बहू का पूरा ध्यान रखते थे। उन्होंने भी कई बार अपने बेटे को फोन करके कहा था— “बेटा, तुझे परदेश गए तीन साल हो गए हैं। बहू घर पर अकेली रहती है, उसकी तबीयत भी ढीली रहती है, तू घर वापस लौट आ।” लेकिन बेटा हमेशा कोई न कोई बहाना बनाकर बात टाल देता था।

दिन में तो विमला घर के कामकाजों और ससुर की सेवा में व्यस्त रहती, लेकिन रा/त्रि के सन्नाटे में जब वह अपने कमरे में बिस्तर पर जाती, तो उसका मन बहुत व्याकुल हो उठता था। एक जवान शादीशुदा स्त्री होने के नाते उसके मन में अपने प/ति के साथ रहने और श/ा/री/रि/क व भावात्मक सु/ख पाने की स्वाभाविक तड़प होती थी, जिसे वह किसी से कह नहीं पाती थी।

भाग 2: गाँव के युवक की झूठी बात और टूटा हुआ भरोसा

समय पंख लगाकर उड़ रहा था। एक दिन बरमपुर गाँव में शहर से एक युवक वापस आया, जो विमला के पति के साथ ही उसी शहर और कंपनी में काम करता था।

दोपहर के समय जब विमला की नज़र उस युवक पर पड़ी, तो उसने उत्सुकतावश उसे अपने घर के आँगन में बुलाया और अपने पति का हाल-चाल पूछा— “भैया, आप तो वहीं काम करते हैं जहाँ मेरे पति रहते हैं? वे घर कब तक आएँगे? कोई ख़बर है उनकी?”

उस युवक ने इधर-उधर देखा और सहानुभूति जताने के नाटक के साथ बोला— “अरे विमला भाभी! आप किस मुग़ालते में जी रही हैं? आपका पति अब कभी गाँव वापस नहीं आने वाला। उसने तो शहर में ही एक दूसरी महिला से शादी कर ली है और उसके साथ अपना नया घर बसा लिया है!”

यह सुनते ही विमला के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसके आँखों के सामने अँधेरा छा गया। जिस पति के इंतज़ार में उसने 3 साल एक-एक पल तड़पकर काटे थे, उसी ने उसे इस तरह धो/खा दे दिया था! विमला रोते-रोते बदहवास हो गई।

भाग 3: ससुर की सलाह और विमला का अटूट निर्णय

शाम को जब ससुर सीताराम गाँव के चौपाल से लौटकर घर आए, तो उन्होंने घर में सन्नाटा देखा। रात को जब विमला भोजन की थाली लेकर ससुर के कमरे में पहुँची, तो उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।

सीताराम ने चिंतित होकर पूछा— “क्या हुआ बहू? तुम इतना रो क्यों रही हो? क्या बात है?”

विमला ने सिसकते हुए कहा— “पिताजी, आपके बेटे ने परदेश में दूसरी शादी कर ली है। गाँव का लड़का बता रहा था कि वे अब कभी इस घर में वापस नहीं आएँगे।”

यह बात सुनते ही सीताराम का दिल बैठ गया। वे अपने ही बेटे की इस नाफ़रमानी और धो/खे पर स्तब्ध रह गए। उस रात दुःखी होकर सीताराम ने अन्न का एक दाना भी नहीं खाया और बिना भोजन किए ही सो गए।

अगली सुबह सीताराम विमला के पास आए और सहृदयता से बोले— “देख बहू, तू अभी बहुत सुंदर और नौजवान है। मेरी उमर तो ढल चुकी है और मेरे आवारा बेटे ने अपना जीवन चुन लिया है। तू क्यों उसके पीछे अपनी पूरी ज़िंदगी बर्बाद करेगी? मेरी मान तो तू किसी अच्छे इंसान से अपनी दूसरी शादी कर ले और अपना नया संसार बसा ले।”

विमला ने सिर उठाकर दृढ़ता से कहा— “नहीं पिताजी! मैं ऐसा पाप कभी नहीं कर सकती। जीवन में विवाह एक ही बार होता है। और इस बात की क्या गारंटी है कि दूसरा पुरुष भी वैसा ही न निकले? मैं अपने जीते जी किसी दूसरे पुरुष का हाथ नहीं थामूँगी। मैं इसी घर में रहकर आपकी सेवा करूँगी और अपना जीवन बिता दूँगी।”

अपनी बहू का इतना पवित्र और निष्ठावान विचार सुनकर सीताराम का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्हें अपनी बहू पर अपार फ़क्र हुआ।

भाग 4: छत पर हादसा, बदली सोच और मन की व्याकुलता

उसी दिन दोपहर के समय विमला कपड़े धोकर सुखाने के लिए घर की पक्की छत पर गई। तेज़ धूप और मन के भारीपन के कारण कपड़े फैलाते समय अचानक विमला का पैर फिसल गया। वह छत की मुंडेर की तरफ गिरने ही वाली थी कि ठीक उसी समय पीछे से आए ससुर सीताराम ने फुर्ती से आगे बढ़कर विमला को अपनी बाँहों में थाम लिया।

सीताराम के मज़बूत और चौड़े सीने का सहारा मिलते ही विमला नीचे गिरने से बच गई। कुछ क्षणों तक दोनों एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे। विमला ने महसूस किया कि उसके ससुर ढलती उम्र में भी काफ़ी सेहतमंद, मज़बूत और आकर्षक व्यक्तित्व वाले हैं।

उस हादसे के बाद विमला के मन में अपने ससुर के प्रति एक अजीब सी आत्मीयता और आकर्षण पैदा हो गया। उसके मन में विचार आया कि जब उसका पति उसे त्याग चुका है, तो वह क्यों अपनी श/ा/री/रि/क और मानसिक ज़रूरतों के लिए तड़पती रहे? उसके अपने ही घर में एक ऐसा इंसान है जो उसका रक्षक और शुभचिंतक है।

भाग 5: रात का सन्नाटा और मर्यादा का बहना

रात के समय जब भोजन समाप्त हुआ, तो विमला अपने ससुर सीताराम के कमरे में गई। सीताराम बिस्तर पर लेटे हुए थे। विमला ने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद किया और ससुर के पास बिस्तर की पाटी पर बैठ गई।

विमला ने धीमी और कांपती आवाज़ में कहा— “पिताजी, आज मेरा मन बहुत ज़्यादा व्याकुल है। पिछले तीन सालों से मैं अकेलेपन की आग में जल रही हूँ। आपके बेटे ने तो मुझे छोड़ दिया, लेकिन मैं भी एक स्त्री हूँ और मेरी भी कुछ श/ा/री/रि/क इ/च्छा/एँ हैं। आज आप मेरी यह मन्नत पूरी कर दीजिए।”

सीताराम घबराकर उठ बैठे और बोले— “यह तुम क्या कह रही हो बहू? हमारा रिश्ता ससुर और बहू का है। समाज में लोग मुझे कितना मान-सम्मान देते हैं, यदि किसी को इस अ/ं/त/रं/ग स/म्बंध की भनक भी लग गई, तो मेरी बरसों की बनाई इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी।”

विमला ने ससुर का हाथ थामते हुए कहा— “पिताजी, आप पूरे गाँव की चिंता करते हैं, पर मेरी तन्हाई नहीं देखते? यह बात हमारे घर के भीतर ही रहेगी। यहाँ हमारे सिवा कोई तीसरा नहीं है। जब आपका बेटा ही मुझे छोड़ चुका है, तो हम एक-दूसरे का सहारा क्यों नहीं बन सकते?”

सीताराम भी पुरुष थे और अपनी बहू की सुंदरता व लाचारी देखकर उनका संयम टूट गया। उस रात बंद कमरे के भीतर ससुर और बहू के बीच की मर्यादा की दीवार ढह गई। दोनों ने अपनी बरसों पुरानी तन्हाई और श/ा/री/रि/क भूख को शांत किया।

उस रात के बाद यह सिलसिला रोज़ का नियम बन गया। रात का खाना खाने के बाद दोनों एक ही कमरे में अपना समय बिताते और अपनी काम/नाएँ पूरी करते।

भाग 6: खुली खिड़की का राज़ और पति की अचानक वापसी

लेकिन पाप का घड़ा कभी न कभी भरता ही है। एक रात जब सीताराम और विमला अपने कमरे में अ/ं/त/रं/ग पलों में लीन थे, तो कमरे की निचली खिड़की का एक पट हल्का सा खुला रह गया था।

उसी समय गाँव का वही लड़का (जो विमला के पति का जिगरी दोस्त था और जिसने दूसरी शादी की झूठी अफ़वाह फैलाई थी) सड़क से गुज़र रहा था। खिड़की खुली देखकर उसने अंदर झाँका और अपनी आँखों से अपनी भाभी विमला और ससुर सीताराम को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया।

अगली ही सुबह उस दोस्त ने तुरंत शहर में विमला के पति को फोन मिलाया और नमक-मिर्च लगाकर सारी बात बता दी— “अरे भाई! तू वहाँ परदेस में सड़ रहा है और यहाँ तेरी बीवी तेरे ही बाप के साथ रा/स-ली/ला रचा रही है!”

यह बात सुनते ही पति के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वह उसी समय ट्रेन पकड़कर अगले ही दिन सीधे अपने गाँव बरमपुर पहुँच गया।

घर पहुँचते ही उसने अपनी पत्नी विमला और पिता सीताराम को ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाकर एक कमरे में इकट्ठा किया और आगबबूला होकर बोला— “पिताजी! आपको शर्म नहीं आई? मेरे पीठ पीछे आप मेरी ही पत्नी के साथ यह नीच काम कर रहे थे?”

सीताराम ने नज़रें झुकाकर कहा— “बेटा, मुझे तो उस गाँव के लड़के ने बताया था कि तूने शहर में दूसरी शादी कर ली है और अब कभी वापस नहीं आएगा। बहू रो-रोकर मर रही थी, उसका दुःख मुझसे देखा नहीं गया, इसलिए मुझसे यह भूल हो गई।”

फिर पति विमला की तरफ घूमा और बोला— “और तू विमला? तेरा पति ज़िंदा था, फिर भी तूने अपने ही ससुर के साथ स/म्बंध बना लिए?”

भाग 7: जेल का कड़वा सच, दोस्त की चालबाजी और महा-समापन

जब विमला ने रोते हुए उस दोस्त की बताई शादी वाली बात दोहराई, तो पति का सिर चकरा गया। उसने जो सच बताया, उसे सुनकर विमला और सीताराम दोनों सन्न रह गए!

पति ने रोते हुए कहा— “विमला, मैंने कोई दूसरी शादी नहीं की है! मैं तो पिछले तीन सालों से जेल में बंद था! जिस कारखाने में मैं काम करता था, वहाँ एक रात बहुत बड़ी चोरी हुई थी। मालिक ने मुझे झूठे केस में फँसा दिया और मुझे 3 साल की कठोर क़ैद हो गई। मैं अपनी इस बदनामी की बात तुम लोगों को बताकर सदमा नहीं देना चाहता था, इसलिए चुप रहा। पिछले हफ्ते ही मैं जेल से रिहा होकर बाहर आया था!”

यह सुनते ही विमला और सीताराम के होश उड़ गए। विमला ने तड़पकर पूछा— “फिर आपके उस दोस्त ने मुझसे झूठ क्यों बोला कि आपने दूसरी शादी कर ली है?”

पति ने ठंडी साँस भरते हुए कहा— “वह मेरा दोस्त नहीं, बल्कि आस्तीन का साँप था! वह बहुत पहले से ही तुझ पर गंदी नज़र रखता था। वह चाहता था कि किसी तरह मैं और तू अलग हो जाएँ, ताकि वह तेरी तन्हाई का फ़ायदा उठाकर तुझे हासिल कर सके। उसी ने यह सारा षड्यंत्र रचा था!”

यह सच सामने आते ही तीनों को अहसास हुआ कि वे एक दुष्ट इंसान की चालबाज़ी का शिकार बन गए थे।

पति ने ठंडे दिमाग़ से विचार किया। उसे अहसास हुआ कि गलती उसकी भी थी कि उसने 3 साल तक जेल में रहने की बात अपनी पत्नी से छिपाई, जिसके कारण विमला भ्रामक स्थिति और तन्हाई में भटक गई। पिता सीताराम ने भी अपनी भूल स्वीकार करते हुए पाँव पकड़ लिए।

अंततः, पति ने बड़ा दिल दिखाते हुए अपनी पत्नी विमला और अपने वृद्ध पिता सीताराम को माफ़ कर दिया। उन्होंने उस साज़िशकर्ता दोस्त से सारे नाते तोड़ लिए। इसके बाद तीनों एक साथ नए सिरे से मर्यादा और प्रेम के साथ अपने घर में रहने लगे।

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Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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