विदेश जाते ही माँ का नंबर ब्लैकलिस्ट किया करोड़ों की लॉटरी की खबर मिली तो बेटे
विदेश जाते ही माँ का नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट किया: 1 करोड़ की लॉ/ट/री का झू/ठ और बेटे की अक्ल ठिकाने!
अध्याय 1: बैंक कर्मचारी और 65 साल की बुजुर्ग माँ की मुलाकात
सूरज ढलने की ओर था जब एक निजी बैंक में नए-नए भर्ती हुए युवा कर्मचारी अनिकेत को शहर की एक पुरानी बस्ती में भेजा गया। अनिकेत का काम बैंक की बकाया किस्तों की वसूली (Recovery) करना था। हाथ में फाइलों का बंडल लिए जब वह दिए गए पते ‘मकान नंबर 42’ के सामने पहुँचा, तो घर की जर्जर हालत देखकर ठिठक गया।
अनिकेत ने भारी मन से लोहे का पुराना दरवाजा खटखटाया। कुछ ही क्षणों में अंदर से हल्की आहट हुई और एक 65 वर्ष की बुजुर्ग महिला ने दरवाजा खोला। सफेद बाल, झुर्रियों से भरा चेहरा और आँखों में एक अजीब सा डर। अनिकेत को यह अंदाजा बिल्कुल नहीं था कि 6 लाख रुपये के डिफ़ॉल्ट लो/न (Loan) की रिकवरी के लिए उसे इतनी उम्रदराज महिला के सामने खड़ा होना पड़ेगा।
अम्मा ने नम आँखों से पूछा, “हाँ बेटा, कौन हो तुम? किससे मिलना है?”
अनिकेत ने सम्मानपूर्वक सिर झुकाते हुए कहा, “अम्मा, मैं बैंक से आया हूँ। आपका नाम सुरभि जी है न?”
सुरभि अम्मा ने घबराकर बाहर गली की तरफ देखा और जल्दी से बोलीं, “अरे बेटा! बाहर क्यों खड़े हो? अंदर आ जाओ।”
अनिकेत घर के छोटे से बैठक में जाकर बैठ गया। सुरभि अम्मा काँपते हाथों से पानी का गिलास ले आईं और बोलीं, “बेटा, तुम्हारे लिए थोड़ी चाय बना लाती हूँ।”
अनिकेत ने नम्रता से मना करते हुए कहा, “नहीं अम्मा, चाय की कोई जरूरत नहीं है। मैं तो बस बैंक की बकाया किस्तों के सिलसिले में आया हूँ। काफी समय से बैंक का लो/न जमा नहीं हुआ है। आप बार-बार तारीख टाल देती हैं। अगर इस बार किस्त नहीं भरी गई, तो मजबूरी में बैंक को यह मकान नी/ला/म (Auction) करना पड़ेगा।”
‘नी/ला/मी’ शब्द सुनते ही 65 साल की बुजुर्ग माँ का दिल दहल गया। उन्होंने अपनी गर्दन घुमाकर अपने छोटे से घर की चारों दीवारों को देखा, जहाँ उनके जीवन भर की यादें बसी थीं।
अम्मा ने रोते हुए हाथ जोड़ लिए, “नहीं बेटा! ऐसा मत करना। इस घर को नी/ला/म मत होने देना। मैं जैसे-तैसे करके किस्तें भर दूंगी। मुझे बस थोड़ा सा समय दे दो।”
अध्याय 2: माँ के त्या/ग और बेटे के वि/दे/श जाने की गाथा
अनिकेत दिल का बुरा नहीं था। बुजुर्गों के प्रति उसके मन में गहरा आदर था। घर का सन्नाटा देखकर उसने पूछा, “अम्मा, क्या आप इस बड़े से घर में बिल्कुल अकेली रहती हैं?”
सुरभि अम्मा ने एक लंबी सांस ली और बोलीं, “हाँ बेटा, अब तो अकेली ही रहती हूँ।”
अनिकेत ने बैंक की फाइल देखते हुए पूछा, “अम्मा, अगर आपको बुरा न लगे तो एक बात पूछूँ? आपने बैंक से 8 लाख रुपये का लो/न लिया था, जिसमें से 2 लाख रुपये तो जमा हो चुके हैं लेकिन 6 लाख रुपये अभी बाकी हैं। आपने इतना बड़ा लो/न किस काम के लिए लिया था?”
यह सवाल सुनते ही अम्मा की आँखों से आँ/सू बहने लगे। अतीत की यादें उनके सामने तैरने लगीं।
अम्मा ने बताया, “बेटा, यह घर मेरे स्वर्गीय पति की आखिरी निशानी है। जब मेरा बेटा उमेश 5 साल का था, तभी उसके पिता इस दुनिया को छोड़कर चले गए। मैंने दूसरों के घरों में बर्तन माँजे, झाड़ू-पोंछा किया और दिन-रात मेहनत करके अपने बेटे को पढ़ाया-लिखाया।”
“जब मेरा बेटा 25 साल का हुआ, तो उसने देखा कि यहाँ उसे मनचाही नौकरी नहीं मिल रही है। एक दिन उसने मुझसे कहा, ‘माँ, मैं वि/दे/श (Abroad) जाना चाहता हूँ। वहाँ बहुत पैसा है, हमारी सारी गरीबी मिट जाएगी।’ मैंने उससे कहा कि बेटा वि/दे/श जाने के लिए लाखों रुपये चाहिए, हमारे पास इतने पैसे कहाँ?”
अम्मा आगे बोलीं, “बेटा उदास हो गया। लेकिन माँ का दिल अपने बच्चे का दु/ख नहीं देख सकता था। मैंने हिम्मत जुटाई और बैंक जाकर अपने इस इकलौते मकान के का/ग/ज़ गिरवी रखकर 8 लाख रुपये का लो/न ले लिया। वह सारे पैसे मैंने अपने बेटे उमेश को दे दिए ताकि वह वि/दे/श जाकर अपने सपने पूरे कर सके।”
अनिकेत ध्यान से सुन रहा था। अम्मा ने रुकते हुए कहा, “आज उसे वि/दे/श गए 3 साल बीत चुके हैं। शुरुआत में तो वह हर महीने पैसे भी भेजता था और फोन पर बात भी करता था। लेकिन पिछले 6 महीनों से न तो उसका कोई फोन आया है और न ही उसने कोई पैसा भेजा है। मैं दिन-रात उसका नंबर मिलाती हूँ, लेकिन फोन लगता ही नहीं। मुझे चिंता होती है कि मेरा बेटा किस हाल में होगा, कहीं बीमार तो नहीं पड़ गया…”
अध्याय 3: ब्लै/क/लिं/स्ट का कड़वा सच और अनिकेत की चतुर योजना
अनिकेत बैंक में काम करते हुए दुनिया के रंग देख चुका था। उसे तुरंत भांप आ गया कि मामला क्या है।
अनिकेत ने कहा, “अम्मा, क्या आप मुझे अपने बेटे का फोन नंबर देंगी? मैं अभी अपने फोन से लगाकर देखता हूँ।”
अम्मा ने अपनी छोटी सी डायरी से नंबर निकालकर दिया। अनिकेत ने सुरभि अम्मा के फोन से कॉल मिलाया। फोन पर केवल एक बार घंटी बजती और कॉल तुरंत कट जाती। अनिकेत ने दो-तीन बार कोशिश की, परिणाम वही रहा।
अनिकेत ने गंभीर होकर कहा, “अम्मा, सच तो यह है कि आपके बेटे को कुछ नहीं हुआ है। उसने आपका फोन नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट (Blacklist) में डाल दिया है ताकि आप उससे पैसे न मांग सकें।”
अम्मा को इस बात पर बिल्कुल यकीन नहीं हुआ। उन्होंने गुस्से और दु/ख में कहा, “तुम पागल तो नहीं हो गए हो? वह मेरा सगा बेटा है! वह अपनी जन्म देने वाली माँ का नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट में क्यों डालेगा?”
अनिकेत ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और उसी नंबर पर कॉल मिलाया। अनिकेत के फोन से घंटी लगातार बजने लगी।
अनिकेत ने कॉल काटकर अम्मा को दिखाया, “देखिए अम्मा! मेरे फोन से घंटी जा रही है, लेकिन आपके फोन से नहीं जा रही। इसका मतलब साफ़ है कि उसने जानबूझकर आपका नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट किया है।”
यह कड़वा सच जानकर 65 साल की माँ का कलेजा फट गया। वह फूट-फूटकर रोने लगीं, “मैंने जिसके लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उसने मुझे इस उम्र में लावारिस छोड़ दिया! अब मैं इस घर को कैसे बचाऊँ?”
अनिकेत थोड़ी देर सोचता रहा। फिर उसके दिमाग में एक ज़बरदस्त विचार आया। उसने कहा, “अम्मा, आपके बेटे की अक्ल ठिकाने लाने का एक रास्ता है। लेकिन इसके लिए आपको मेरे साथ एक झू/ठ (Lie) बोलना होगा।”
अम्मा ने झिझकते हुए कहा, “कैसा झू/ठ बेटा?”
अनिकेत मुस्कुराया, “बस जैसा मैं कहूँ, वैसा आप फोन पर बोलना। आपका लो/न भी चुकता हो जाएगा और आपके बेटे का असली चेहरा भी सामने आ जाएगा।”
अध्याय 4: 1 करोड़ की लॉ/ट/री का झू/ठ और बेटे का ला/ल/च
अनिकेत ने तुरंत अपने मोबाइल से उमेश का नंबर मिलाया। वि/दे/श में बैठे उमेश ने कॉल रिसीव किया।
उमेश: “हैलो, कौन?”
अनिकेत (गंभीर आवाज़ में): “नमस्ते, क्या मैं उमेश जी से बात कर रहा हूँ? आपकी माता जी का नाम सुरभि देवी है?”
उमेश: “हाँ, मैं उमेश बोल रहा हूँ। आप कौन हैं और मेरी माँ का नाम क्यों ले रहे हैं?”
अनिकेत: “श्रीमान, मैं नेशनल लॉ/ट/री कॉर्पोरेशन की हेड ब्रांच से बोल रहा हूँ। आपकी माता जी ने कुछ समय पहले एक लॉ/ट/री का टिकट खरीदा था। आपको बधाई हो, उनकी 1 करोड़ रुपये की लॉ/ट/री लग चुकी है!”
‘1 करोड़ रुपये’ सुनते ही वि/दे/श में बैठे उमेश के कान खड़े हो गए। उसकी आँखों में ला/ल/च (Greed) चमकने लगा।
अनिकेत ने आगे का जाल बुना, “समस्या यह है कि यह 1 करोड़ रुपये का अमाउंट सीधे उनके बैंक अकाउंट में ट्रांसफर होना है। लेकिन हमारी कंपनी का नियम है कि जिस अकाउंट में 1 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए जाते हैं, उसमें कम से कम 8 लाख रुपये का मिनिमम बैलेंस होना चाहिए। हमने आपकी माँ से बात की, लेकिन उनके पास पैसे नहीं हैं। अगर आज शाम तक उनके अकाउंट में 8 लाख रुपये जमा नहीं हुए, तो यह लॉ/ट/री रद्द कर दी जाएगी।”
उमेश घबराकर बोला, “अरे नहीं-नहीं! आप लॉ/ट/री कैंसिल मत करना। मैं अपनी माँ का अकाउंट नंबर जानता हूँ, मैं अभी 8 लाख रुपये उनके अकाउंट में ट्रांसफर कर देता हूँ। आप बस वह 1 करोड़ रुपये ट्रांसफर कर देना।”
अनिकेत ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है, आप अपनी माँ से बात कर लीजिए और पैसे जमा करवा दीजिए।”
फोन कटते ही अनिकेत ने सुरभि अम्मा से कहा, “अम्मा, अब थोड़ी देर में आपके बेटे का फोन आपके पास आएगा। आपको बस इतना कहना है कि ‘हाँ बेटा, लॉ/ट/री वालों का फोन आया था, लेकिन मेरे पास तो 8 लाख रुपये नहीं हैं इसलिए मैंने मना कर दिया।'”
अध्याय 5: लो/न चुकता, बेटे की ब्लै/क/लिं/स्टिं/ग और नया रिश्ता
अनिकेत की बात खत्म भी नहीं हुई थी कि सुरभि अम्मा के फोन की घंटी बज उठी। स्क्रीन पर ‘उमेश’ का नाम चमक रहा था। अम्मा का दिल भारी हो गया कि जो बेटा 6 महीने से फोन नहीं उठा रहा था, पैसों के ला/ल/च में वह तुरंत कॉल कर रहा था।
अम्मा ने काँपते हाथों से फोन उठाया, “हाँ उमेश बेटा…”
उमेश (उतावलेपन में): “माँ! क्या तुम्हारा कोई लॉ/ट/री का टिकट निकला है? किसी कंपनी वाले का फोन आया था क्या?”
अम्मा (योजना के अनुसार): “हाँ बेटा, आया तो था। कह रहे थे कि 1 करोड़ रुपये निकले हैं। लेकिन वो कह रहे थे कि अकाउंट में 8 लाख रुपये होने चाहिए। अब मेरे पास इतने पैसे कहाँ? इसलिए मैंने उन्हें मना कर दिया…”
उमेश चिल्लाया, “माँ! तुम पागल हो क्या? 1 करोड़ रुपये का सवाल है! तुम चिंता मत करो, मैं अभी बैंक से तुम्हारे अकाउंट में 8 लाख रुपये ट्रांसफर कर रहा हूँ। जैसे ही 1 करोड़ रुपये तुम्हारे अकाउंट में आएँ, तुरंत मुझे वि/दे/श भेज देना!”
दस मिनट के भीतर सुरभि अम्मा के मोबाइल पर मैसेज आया— ‘आपके खाते में ₹8,000,000 जमा कर दिए गए हैं।’
अनिकेत ने मैसेज देखा और मुस्कुराकर कहा, “अम्मा, देखा! आपके 8 लाख रुपये वापस आ गए। अब आप कल सुबह मेरे साथ बैंक चलना। आपका बाकी बचा 6 लाख रुपये का लो/न (Loan) चुकता हो जाएगा और आपका घर नी/ला/मी से बच जाएगा। बाकी बचे 2 लाख रुपये आप अपने खर्चे के लिए रख लेना।”
शाम को जब उमेश ने फिर से अपनी माँ को फोन करके पूछा, “माँ, लॉ/ट/री के 1 करोड़ रुपये आए क्या?”
सुरभि अम्मा ने कठोर आवाज़ में कहा, “उमेश! कोई लॉ/ट/री नहीं लगी है। यह वही 8 लाख रुपये हैं जो तूने मुझसे लो/न करवाकर वि/दे/श जाने के लिए लिए थे। तूने पैसों की खातिर अपनी बूढ़ी माँ का नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट में डाल दिया था न? आज मैंने तेरे ला/ल/च का फायदा उठाकर अपने पति के घर का क़/र्ज़ (Debt) चुका दिया है। अब तू कभी मुझे फोन मत करना, आज से मैं तेरा नंबर हमेशा के लिए ब्लै/क/लिं/स्ट करती हूँ!”
अम्मा ने फोन काट दिया और उमेश का नंबर ब्लै/क/लिं/स्ट में डाल दिया। अगले दिन अम्मा ने बैंक जाकर अपना लो/न चुकता कर दिया और घर के का/ग/ज़ वापस ले लिए।
लेकिन अम्मा की आँखों में अकेलापन देखकर बैंक कर्मचारी अनिकेत का दिल पिघल गया। अनिकेत ने कहा, “अम्मा, अगर आपको ऐतराज न हो, तो मैं आपके घर का एक कमरा किराये पर ले लेता हूँ। मैं आपको अपनी माँ मानकर यहीं रहूँगा और आपका ध्यान रखूँगा।”
सुरभि अम्मा ने रोते हुए अनिकेत को गले लगा लिया। अनिकेत ने अपना सामान अम्मा के घर में शिफ्ट कर लिया। वह दिन में बैंक की नौकरी करता और शाम को अम्मा के साथ बैठकर बातें करता, उनकी दवाइयों और खाने-पीने का पूरा ध्यान रखता।
अध्याय 6: बेटे-बहू की वापसी, पश्चाताप और सुखद अंत
इस घटना के लगभग 4 महीने बीत चुके थे। एक शाम, जब अनिकेत बैंक में ड्यूटी पर था, सुरभि अम्मा घर में अकेली थीं। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
अम्मा ने दरवाजा खोला तो सामने उमेश और उसके साथ एक विदेशी महिला खड़ी थी। दोनों के हाथों में सामान था और चेहरे पर गहरी उदासी।
सुरभि अम्मा ने कठोर होकर कहा, “अब तुम यहाँ क्यों आए हो उमेश? और यह कौन है?”
उमेश अपनी माँ के पैरों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा, “माँ! मुझे मा/फ़ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।”
उमेश की विदेशी पत्नी (जो थोड़ी-बहुत हिंदी बोल सकती थी) ने आगे बढ़कर अम्मा के पैर छुए और बोली, “अम्मा जी, मुझे मा/फ़ कर दीजिए। जब उमेश ने मुझे पूरी सच्चाई बताई कि उसने पैसों के लिए आपके साथ क्या किया, तो मुझे बहुत दु/ख हुआ। मैंने उमेश से साफ़ कह दिया कि अगर तुम अपनी माँ से जाकर मा/फ़ी नहीं मांगोगे, तो मैं तुम्हें त/ला/क (Divorce) दे दूंगी।”
उमेश ने रोते हुए बताया, “माँ, वि/दे/श में शादी के बाद खर्चे बहुत बढ़ गए थे। मैं तनाव में था, इसलिए मैंने आपका नंबर बंद कर दिया था। लेकिन जब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मेरी पत्नी ने मुझे समझाया, तो मुझे अपनी नीचता पर बेहद शर्मिंदगी हुई। माँ, तुम भले ही यह घर किसी वृ/द्धा/श्र/म को दान कर दो, मुझे इस संपत्ति में से एक भी रुपया नहीं चाहिए। बस मुझे मा/फ़ कर दो!”
उमेश और उसकी पत्नी का सच्चा पश्चाताप देखकर सुरभि अम्मा का माँ का दिल पिघल गया। उन्होंने दोनों को उठाकर गले से लगा लिया।
शाम को जब अनिकेत घर लौटा, तो उसने उमेश को घर में देखा। उमेश ने आगे बढ़कर अनिकेत के हाथ जोड़ लिए और कहा, “अनिकेत भाई, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद! अगर आप वह लॉ/ट/री का नाटक न करते, तो शायद मैं कभी अपनी माँ की कद्र नहीं समझ पाता। आपने मुझे सही इंसान बना दिया।”
अनिकेत ने मुस्कुराते हुए कहा, “उमेश भाई, जिसके पास माँ होती है, उसे उसकी कद्र नहीं होती। मेरे सिर पर माँ का साया नहीं है, इसलिए मैं जानता हूँ कि माँ की क्या अहमियत होती है। अब कभी अपनी माँ को दोबारा मत रुलाना।”
कुछ ही दिनों में कागजी कार्रवाई पूरी हो गई। उमेश और उसकी पत्नी अपनी माँ सुरभि देवी को अपने साथ वि/दे/श ले जाने की तैयारी करने लगे। वहीं, अनिकेत का तबादला (Transfer) दूसरे शहर में हो गया था।
सुरभि अम्मा ने अनिकेत को बेटे की तरह विदाई दी और उसकी तरक्की का आशीर्वाद दिया।
महा-उपसंहार (Moral Conclusion)
यह कहानी हमें सिखाती है कि भौतिक सुख-सुविधाओं और पैसों की अंधी दौड़ में अपनों और विशेषकर जन्म देने वाली माँ के त्या/ग को कभी नहीं भूलना चाहिए। माता-पिता का स्थान दुनिया की किसी भी धन-दौलत से बड़ा होता है।