19 सितंबर को बूढी महिला के साथ – News

19 सितंबर को बूढी महिला के साथ

19 सितंबर को बूढी महिला के साथ

19 सितंबर: जानकी की अनोखी कहानी और एक भयानक क/ा/ं/ड

नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आप सभी लोगों का एक नई कहानी के अंदर। आज की इस घटना के माध्यम से मैं आप सभी लोगों को एक ऐसा म/मा/ला और क/ा/ं/ड बताने जा रहा हूँ, जिसे सुनने के बाद आप सभी हैरान रह जाएंगे।

यह कहानी एक खूबसूरत अधेड़ उम्र की बूढ़ी महिला और एक नौजवान लड़के के बीच घटी घटना की है। एक दिन शाम के वक्त वह महिला बाजार से अपने घर लौट रही थी, लेकिन रास्ते में उसका पैर फिसल गया और वह गिर पड़ी। तभी वहां से गुजर रहे एक नौजवान लड़के ने उसकी मदद की, उसे घर पहुँचाया और फिर चाय-पानी के बहाने दोनों के बीच एक अनूठी जान-पहचान बनी। लेकिन इसके बाद उन दोनों के बीच एक ऐसा ग/ल/त म/ा/म/ला और क/ा/ं/ड हुआ, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते।

आइए जानते हैं इस पूरी घटना को विस्तार से…

गाँव का माहौल और जानकी का अकेलापन

इस कहानी की शुरुआत होती है एक छोटे से शांत गाँव से। उस गाँव में जानकी नाम की एक अधेड़ उम्र की बहुत ही सुंदर महिला रहा करती थी। जानकी के पति का देहांत काफी समय पहले ही हो चुका था। उनके चले जाने के बाद जानकी एकदम अकेली पड़ गई थी। न तो उसका कोई बेटा था और न ही कोई बेटी।

अपना गुजारा चलाने के लिए जानकी ने घर पर लगभग चार भेड़ें और तीन बकरियाँ पाल रखी थीं। वह रोज सुबह उन्हें चराने के लिए खेतों में ले जाया करती थी और इन्हीं पशुओं के दूध व बिक्री से उसका जीवन-यापन चलता था।

पति के गुजर जाने के बाद जानकी के दिल में एक गहरा अकेलापन बस गया था। उसके पड़ोस में ही उसकी उम्र का एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था। जब भी वह जानकी को देखता, तो उसकी नी/य/त खराब हो जाती थी और वह उसे घूरता रहता था। जानकी सब समझती थी कि उस बूढ़े की मनशा ठीक नहीं है। पुराने ज़माने के लोग इशारों-इशारों में ही नी/य/त ताड़ लेते हैं। इसलिए जानकी हमेशा उस बूढ़े से दूरी बनाकर रखती थी।

जानकी जानती थी कि वह बूढ़ा उसके लायक नहीं है। लेकिन रात के सन्नाटे में जब जानकी अपने छोटे से घर में अकेली होती, तो उसे अपने पति की याद सताती थी। कभी-कभी उसका मन इतना व्याकुल हो जाता कि अपनी भा/व/ना/ओ/ं और म/न की शा/ं/ति के लिए उसे स्वयं ही ह/ा/थ का इ/स्ते/मा/ल करना पड़ता था। इसके बाद वह चुपचाप सो जाती और किसी को कानों-कान खबर नहीं होती थी।

लेकिन वह पड़ोसी बूढ़ा अक्सर रात के समय जानकी के घर के दरवाजे के पास आकर छिपकर ज/ा/सू/सी करता था और अंदर की आहट लेने की कोशिश करता था। जानकी का घर ज्यादा बड़ा नहीं था—केवल दो छोटे-छोटे कमरे थे। उस बूढ़े का घर सामने ही 20-30 मीटर की दूरी पर था, इसलिए वह रात में चुपके से आकर दरवाजे की झिर्रियों से दे/ख/ने की कोशिश करता था।

एक दिन शाम को करीब 6 बजे जानकी हिम्मत करके उस बूढ़े के घर पहुँची और उसकी पत्नी को सारी बात बता दी। जानकी ने कहा, “तुम्हारा पति ठीक आदमी नहीं है। वह रोज रात को मेरे घर के आसपास घूमता है और मेरे कमरे की ज/ा/सू/सी करता है।” यह सुनकर बूढ़े की पत्नी ने अपने पति को बहुत डांटा और समझाया कि जानकी मेरी सहेली है, उसे परेशान करना बंद करो। इस घटना के बाद उस बूढ़े ने रात में चक्कर लगाना बंद कर दिया।

रास्ते का हादसा और दिलीप का आगमन

कुछ दिनों बाद, शाम के करीब 3 से 4 बजे के बीच जानकी हाथ में एक छोटा झोला लेकर सब्जी खरीदने के लिए मुख्य बाजार गई। बाजार उसके घर से काफी दूरी पर था। सब्जी लेते-लेते उसे काफी देर हो गई और लौटते वक्त शाम का अंधेरा ढलने लगा।

जिस रास्ते से जानकी लौट रही थी, वह बेहद सुनसान था। सड़क कच्ची थी, जगह-जगह खड्डे थे और मोटे-मोटे पत्थर बिखरे हुए थे। अचानक अंधेरे में जानकी का पैर एक बड़े पत्थर से टकराया और वह अनियंत्रित होकर सड़क पर गिर पड़ी।

रास्ता पूरी तरह सन्नाटे में डूबा था और दूर-दूर तक कोई मदद के लिए मौजूद नहीं था। तभी सड़क से एक नौजवान लड़का अपनी मोटरसाइकिल पर गुजर रहा था। उसकी नज़र रास्ते में पड़ी जानकी पर गई। लड़के ने तुरंत अपनी गाड़ी सड़क के किनारे खड़ी की और जानकी के पास पहुँचा।

लड़के ने बड़े आदर से जानकी को उठाया और पूछा, “आंटी जी, आप ठीक तो हैं? आपको कहाँ जाना है?” जानकी ने कराहते हुए अपने घर का पता बताया। रात होने को थी और महिला की असहाय हालत देखकर लड़के को उस पर दया आ गई। उसने कहा, “आप मेरी गाड़ी पर बैठ जाइए, मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूँ।”

जानकी चुपचाप मोटरसाइकिल पर बैठ गई। कुछ ही मिनटों में लड़का उसे उसके घर के दरवाजे तक ले आया।

चाय का निमंत्रण और बढ़ती आत्मीयता

जब लड़के ने जानकी को घर के बाहर उतारा, तो जानकी ने कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा, “बेटा, तुमने मेरी बहुत मदद की है। ऐसे मत जाओ, अंदर आओ और थोड़ा चाय-पानी पीकर जाओ।”

लड़के ने पहले तो संकोच किया और कहा, “आंटी, रात काफी हो चुकी है, मुझे अपने घर पहुँचना चाहिए।” लेकिन जब जानकी ने बार-बार आग्रह किया, तो लड़का मना नहीं कर सका और घर के अंदर चला आया।

घर में आकर जानकी ने उसके लिए चाय बनाई। लड़का चारपाई पर बैठकर आराम से चाय पीने लगा। बातचीत के दौरान जानकी ने उसका नाम पूछा। लड़के ने अपना नाम ‘दिलीप’ बताया। दिलीप की उम्र करीब 23-24 साल थी। वह बगल के गाँव का रहने वाला एक सीधा-साधा नौजवान था।

दिलीप ने बताया, “मेरी माँ का देहांत हो चुका है। घर पर सिर्फ पिताजी हैं जो खेती संभालते हैं। मैं पंजाब में एक लोहे की फैक्ट्री में काम करता हूँ और कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गाँव आया हूँ।”

दिलीप की बातें सुनकर जानकी भावुक हो गई। जाते-जाते दिलीप ने कहा, “आंटी, कभी भी आपको कोई जरूरत या परेशानी हो, तो आप बेझिझक मुझे बुला सकती हैं।” दिलीप के पास एक बड़ा टच-स्क्रीन मोबाइल था। उसने जानकी के मोबाइल में अपना फोन नंबर सेव कर दिया और वहां से चला गया।

बकरी की बीमारी और दिलीप का सहयोग

लगभग 5 से 6 दिन बीत गए। एक दिन जानकी की एक बकरी अचानक बहुत गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। गाँव के लोगों ने जानकी से कहा, “तुम्हारी बकरी की हालत बहुत खराब है, इसे तुरंत सरकारी पशु अस्पताल ले जाओ, वरना यह मर जाएगी।”

अकेली जानकी ने गाँव वालों से मदद माँगी, “क्या आप में से कोई इसे अस्पताल तक पहुँचाने में मेरी मदद करेगा?” लेकिन गाँव के लोगों ने कोई न कोई बहाना बना दिया। किसी ने कहा कि उसे घर का काम है, तो किसी ने कहा कि उसे बाहर जाना है। संकट की इस घड़ी में कोई भी आगे नहीं आया।

तभी जानकी को दिलीप की बात याद आई। उसने तुरंत दिलीप के नंबर पर कॉल किया। दिलीप ने फोन उठाते ही पूछा, “आंटी, क्या बात है? आप परेशान लग रही हैं।” जानकी ने कहा, “दिलीप, तुम तुरंत अपनी गाड़ी लेकर मेरे घर आ जाओ।”

दिलीप बिना देर किए मिनटों में जानकी के घर पहुँच गया। जब उसने देखा कि बकरी बीमार है, तो उसने हँसकर कहा, “आंटी, बस इतनी सी बात! आप चिंता मत कीजिए, मैं अभी इसे अस्पताल ले चलता हूँ।”

जानकी अपनी बीमार बकरी को गोद में लेकर दिलीप की मोटरसाइकिल पर पीछे बैठ गई। दोनों अस्पताल पहुँचे, जहाँ डॉक्टर ने बकरी का इलाज किया और दवाइयां दीं। इसके बाद दिलीप सुरक्षित रूप से जानकी और उसकी बकरी को घर वापस छोड़ आया।

जानकी ने भावुक होकर कहा, “दिलीप, तुम बहुत अच्छे इंसान हो। गाँव के किसी व्यक्ति ने मेरी मदद नहीं की, लेकिन तुमने अनजान होकर भी मेरा इतना साथ दिया।” दिलीप ने मुस्कुराते हुए कहा, “आंटी, इसमें धन्यवाद की क्या बात है? इंसानियत के नाते यह तो मेरा फर्ज था।”

नए फोन का तोहफा और देर रात की बातचीत

इस घटना के बाद जानकी के दिल में दिलीप के लिए एक अलग ही खिंचाव पैदा हो गया। वह दिन-रात दिलीप के बारे में ही सोचने लगी। अकेलेपन में उसे दिलीप का चेहरा याद आने लगा।

दिलीप से लगातार संपर्क में रहने के लिए जानकी ने एक बड़ा कदम उठाया। उसने अपनी एक बकरी और अपना पुराना मोबाइल बेच दिया। उन पैसों को इकट्ठा करके वह बाजार गई और दो नए स्मार्टफोन खरीद लाई।

अगले दिन उसने दिलीप को अपने घर बुलाया। जब दिलीप आया, तो जानकी ने उसके सामने नया मोबाइल रखते हुए कहा, “दिलीप, मैंने देखा था कि तुम्हारा फोन थोड़ा टूटा हुआ था। यह नया मोबाइल मैंने तुम्हारे लिए खरीदा है, इसे रख लो।”

दिलीप चौंक गया और मना करने लगा, “नहीं आंटी, मैं इतना महंगा तोहफा आपसे नहीं ले सकता।” लेकिन जानकी के जिद करने और कसम देने पर दिलीप ने वह मोबाइल स्वीकार कर लिया।

अब दोनों के पास नए स्मार्टफोन थे। दोनों के बीच रोज रात को लंबी-लंबी बातें होने लगीं। बातों ही बातों में दिलीप ने एक दिन कहा, “आंटी, पता नहीं क्यों, आपसे बात करके मेरा दिन बहुत अच्छा बीतता है। कभी-कभी आपसे मिलने का बहुत मन करता है।”

जानकी भी दिल ही दिल में यही चाहती थी, लेकिन लोक-लाज के डर से हंसकर बात टाल देती थी।

वह रात और भयानक क/ा/ं/ड

एक रात, खाना खाने के बाद जब जानकी अपने कमरे में लेटी, तो उसका मन बहुत ज्यादा बेचैन हो गया। उसने देर रात दिलीप को फोन लगाया।

जानकी ने कहा, “दिलीप, अगर तुम्हारा मिलने का मन है और तुम मुझसे मिलना चाहते हो, तो तुम अभी मेरे घर आ सकते हो। आज मेरा मन भी बहुत अकेला महसूस कर रहा है।”

यह सुनते ही दिलीप की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। लेकिन रात के वक्त अपनी गाड़ी से जाने पर पिता को शक हो सकता था। इसलिए दिलीप ने अपने एक जिगरी दोस्त को फोन किया और उसकी मोटरसाइकिल माँगी।

जब दिलीप ने अपने दोस्त को पूरी बात बताई, तो उसके दोस्त ने शर्त रखी, “अगर तू वहाँ जा रहा है, तो मुझे भी साथ ले चल। मुझे भी इस अ/त/रं/ग/ता का मौका मिलना चाहिए।” दिलीप मान गया और दोनों दोस्त देर रात मोटरसाइकिल से जानकी के घर पहुँच गए।

जब जानकी ने दरवाजे पर दो लड़कों को देखा, तो वह घबरा गई। उसने कहा, “दिलीप, तुम अपने दोस्त को क्यों लाए? अगर यह गाँव में बता देगा तो मेरी थू-थू हो जाएगी।” दिलीप ने आश्वस्त किया, “आंटी, आप बेफिक्र रहिए। यह मेरे भाई जैसा है, यह किसी से कुछ नहीं कहेगा।”

इसके बाद दोनों लड़के कमरे के अंदर आ गए। जानकी और दिलीप के बीच अ/त/रं/ग स/ं/बं/ध स्थापित होने लगे। दिलीप का दोस्त वहीं बैठकर सब देख रहा था और उसका धैर्य भी जवाब देने लगा था।

जब दिलीप अलग हुआ, तो जानकी की म/ं/जू/री से दिलीप के दोस्त ने भी उसके साथ ग/ल/त स/ं/बं/ध बनाए। लगभग तीन से चार घंटे तक दोनों लड़कों ने जानकी के साथ अनैतिक स/ं/बं/ध बनाए।

भेद का खुलना और अंत

लेकिन वे इस बात से बेखबर थे कि जब वे रात में मोटरसाइकिल से आए थे, तब सामने रहने वाले उसी पड़ोसी बूढ़े की नज़र उन पर पड़ चुकी थी।

बूढ़े को शक हुआ कि देर रात दो लड़के जानकी के घर में क्यों गए। वह चुपके से आया और दरवाजे की दरार से अंदर का नज़ारा देखने लगा। जब उसने देखा कि दोनों लड़के जानकी के साथ अ/त/रं/ग ह/र/क/ते/ं कर रहे हैं, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

बूढ़े के मन में जलन और गुस्सा भर गया। उसने सोचा, “इस औरत ने मुझे तो डांटकर भगा दिया था और अब इन नौजवान लड़कों के साथ यह सब क/ा/ं/ड कर रही है!”

अगली सुबह होते ही उस जलनखोर बूढ़े ने पूरे गाँव में यह खबर आग की तरह फैला दी। उसने गाँव के हर नुक्कड़ पर प्रचार कर दिया कि जानकी रात के अंधेरे में लड़कों को घर बुलाकर ग/ल/त काम करती है।

देखते ही देखते यह बात पूरे गाँव और आसपास के इलाके में फैल गई। जानकी का छिपा हुआ क/ा/ं/ड सभी के सामने आ गया और उसकी भारी बदनामी हुई।

अस्वीकरण (Disclaimer): इस कहानी को प्रस्तुत करने का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना या अश्लीलता फैलाना बिल्कुल नहीं है, बल्कि समाज के छिपे हुए पहलुओं और मानवीय भूलों से अवगत कराना है।

जय हिंद, वंदे मातरम!

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

Related Articles