PART 4 4 साल बाद जब दामाद सास को देखने घर आया फिर
4 साल बाद जब दामाद सास के घर आया – भाग 4
नए सदस्य का आगमन और परिवार की खुशियाँ
दिल्ली के घर में अब खुशियों का माहौल था। सुनीता और मोहन के छोटे बेटे के आने से पूरे परिवार में एक नया उत्साह भर गया था। बच्चे का नामकरण संस्कार धूमधाम से किया गया और उसका नाम ‘आरव’ रखा गया। कमला ने अपनी नाती की देखभाल में रात-दिन एक कर दिया था। वह सुबह से शाम तक उसकी सेवा में लगी रहती और ईश्वर का धन्यवाद करती कि उसने उसके परिवार पर छाई पुरानी काली छाया को हमेशा-हमेशा के लिए हटा दिया।
मोहन भी अपनी ज़िम्मेदारियों को बहुत अच्छे से निभा रहा था। उसके और कमला के बीच अब केवल एक पवित्र सास और दामाद का संबंध था, जिसमें अत्यधिक आदर, मर्यादा और सम्मान था। पुराने पा/प और भ/ट/का/व की कोई भी झलक अब उनके व्यवहार में नहीं बची थी।
जब आरव छह महीने का हो गया, तब कमला ने अरवल वापस लौटने की इच्छा जताई। उसने कहा, “बेटी सुनीता, अब तू और मोहन बच्चे को अच्छे से संभाल सकते हो। मुझे अरवल जाकर गाँव के मंदिर की सेवा में फिर से लगना है।”
मोहन और सुनीता ने कमला को रोकने की कोशिश की, लेकिन कमला अपने फैसले पर अटल थी। उसने दिल्ली से विदा ली और अरवल लौट आई।
गाँव से आई मुसीबत और समाज की बुरी नज़र
कमला के अरवल वापस आने के कुछ समय बाद, गाँव में एक नई समस्या खड़ी होने लगी। गाँव का एक चालाक और दुष्ट स्वभाव का आदमी, जिसका नाम रमेश था, काफी समय से कमला की संपत्ति और उसकी अकेली अवस्था पर बुरी नज़र रखे हुए था।
रमेश को सालों पहले की वह बात याद थी जब मोहन एक महीने तक कमला के घर रुका था। उसने गाँव के कुछ लोगों के बीच अफवाहें उड़ाना शुरू कर दिया कि “कमला और उसके दामाद के बीच कुछ अनुचित संबंध थे, इसीलिए दामाद महीने भर यहाँ पड़ा रहा था।”
यह ज़हरीली बात धीरे-धीरे पूरे अरवल गाँव में फैलने लगी। जब कमला गाँव के मंदिर में सेवा करने जाती, तो लोग उसे अजीब नज़रों से देखते और आपस में फुसफुसाते।
एक दिन मंदिर के बाहर रमेश ने कमला को रोक लिया और तंज़ कसते हुए कहा, “क्यों कमला समधिन जी! दामाद जी अब अरवल क्यों नहीं आते? क्या अब पुरानी बातें ख़त्म हो गईं या दिल्ली में नया संबंध बन गया?”
कमला यह सुनकर काँप उठी। उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसके पुराने पा/प का भूत आज भी समाज के रूप में उसका पीछा कर रहा था, भले ही उसने सच्चे दिल से पश्चाताप कर लिया था।
परीक्षा की घड़ी और मोहन का साहसिक कदम
जब यह बात फोन के ज़रिए दिल्ली में मोहन और सुनीता तक पहुँची, तो सुनीता फूट-फूटकर रोने लगी। उसने मोहन से कहा, “मोहन, मेरी माँ ने अपने पा/पों का प्रायश्चित कर लिया है और वह ईश्वर की भक्ति में लीन हैं, फिर भी समाज उन्हें जीने नहीं दे रहा। लोग पुरानी बातों को लेकर उन्हें ताने मार रहे हैं।”
मोहन के मन में अब किसी प्रकार का डर या झिझक नहीं थी। वह अपनी मर्यादा की शक्ति और अपने पश्चाताप के बल पर खड़ा था। उसने सुनीता से कहा, “सुनीता, घबराओ मत। जिस गलती का पश्चाताप इंसान सच्चे दिल से कर लेता है, उसके बाद उसे किसी नीच इंसान के सामने झुकने की ज़रूरत नहीं है। मैं खुद अरवल जाऊँगा और इस बदनामी का सामना करूँगा।”
अगले ही दिन मोहन अकेला अरवल गाँव पहुँचा। गाँव के चौपाल पर रमेश और कुछ अन्य ग्रामीण बैठे हुए थे। मोहन सीधे चौपाल पर गया और सब ग्रामीणों के सामने खड़ा हो गया।
रमेश ने मुस्कुराते हुए कहा, “लो, आ गए दिल्ली वाले दामाद जी! कहो, इस बार सासू माँ का क्या हाल-चाल लेने आए हो?”
सत्य की जीत और समाज का मुँह बंद
मोहन ने शांत और गंभीर आवाज़ में कहा, “रमेश जी, और आप सभी गाँव के बड़े-बुजुर्गों ध्यान से सुनिए। इंसान कमज़ोर होता है और उससे जीवन में कई प्रकार के पा/प या गलतियाँ हो सकती हैं। लेकिन जब इंसान अपनी मर्यादा को पहचान कर सही राह पर लौट आता है, तो ईश्वर भी उसे क्षमा कर देता है।”
मोहन ने आगे कहा, “सासू माँ ने अपनी भूल का पश्चाताप किया है और आज वह मेरी माँ के समान पूज्य हैं। यदि किसी ने बिना किसी प्रमाण के मेरी सासू माँ के चरित्र पर उंगली उठाई या कोई झूठी अफ़वाह फैलाने की कोशिश की, तो मैं कानून का सहारा लूँगा और अदालत तक जाऊँगा। जो इंसान किसी स्त्री की लाचारी का मज़ाक उड़ाता है, असली पा/पी वही है।”
मोहन की आँखों में सच्चाई, दृढ़ता और पवित्रता देखकर रमेश का चेहरा फ़ीका पड़ गया। चौपाल पर बैठे गाँव के बुजुर्गों ने मोहन की बातों का समर्थन किया।
एक बुजुर्ग ने कहा, “दामाद जी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। कमला पिछले दो सालों से मंदिर में निस्वार्थ सेवा कर रही हैं। किसी पुरानी अफ़वाह पर किसी स्त्री का चरित्र हनन करना गलत बात है।”
सबके सामने रमेश को अपनी नीच हरकत के लिए माफ़ी माँगनी पड़ी और गाँव में कमला का सम्मान फिर से बहाल हो गया।
निष्कर्ष और अंतिम सीख
कमला ने जब देखा कि उसके दामाद मोहन ने एक ढाल की तरह खड़े होकर समाज की बुरी नज़र से उसकी रक्षा की है, तो उसकी आँखों से आभार के आँसू बह निकले। उसने मोहन से कहा, “दामाद जी, आज आपने साबित कर दिया कि जब इंसान मर्यादा और सच के रास्ते पर चलता है, तो दुनिया की कोई भी ताक़त उसे नीचा नहीं दिखा सकती।”
मोहन ने अपनी सास के पैर छूकर कहा, “सासू माँ, यह मेरी ज़िम्मेदारी थी। हमने अपनी मर्यादा की रक्षा की है और यही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है।”
इसके बाद मोहन दिल्ली लौट आया। अब उनका परिवार पूरी तरह से सुखी, शांत और मर्यादा में बंधा हुआ था।
कहानी की अंतिम सीख: यह कहानी हमें यह बहुत बड़ी शिक्षा देती है कि वास/ना और अनुचित शा/री/रि/क संबंधों का आकर्षण केवल विनाश लाता है, लेकिन जब इंसान अपनी भूलों को स्वीकार कर पवित्रता और मर्यादा का मार्ग चुनता है, तो समाज की बड़ी से बड़ी कड़वाहट भी उसके सामने पराजित हो जाती है। सच्चे रिश्तों की रक्षा हमेशा मर्यादा और नैतिक मूल्यों से ही होती है।