महिला ने लड़के की मजबूरी देख कर अपने कंपनी में काम दिलाया था।
महिला ने लड़के की मजबूरी देख कर अपने कंपनी में काम दिलाया था।
एक लड़का जो गांव में रहते हुए अपनी तंगी को झेलता हुआ काफी ज्यादा परेशान हो जाता है और फिर एक दिन जाकर वह शहर में कुछ पैसे कमाने की सोचता है।
घर से बैग लेता है और उसमें सूखी रोटी और साथ में एक अचार पैक करता है और फिर निकल पड़ता है उम्मीद लेकर के शहर। दोस्तों वो लड़का शहर तो पहुंच जाता है लेकिन अब उसके सामने एक सबसे बड़ी जटिल समस्या यह थी कि वो काम करे तो क्या करें उसे काम मिले तो क्या मिलेगा और वो रहेगा कहां? उसके पास बहुत सारा समस्याएं थी जिसका कोई निदान नहीं था। अब दो दिन और दो रात कैसे भी जाती है उसे कुछ पता ही नहीं चलता है। जो रोटियां लाया था वो खत्म हो चुकी थी और जितने पैसे लेकर आया था वो सिर्फ और सिर्फ जरूरत भर गई थी। उससे सिर्फ पेट भी भरने लायक उसके पास पैसा नहीं था। बस किसी तरीके से हल्काफुल्का खा के फुटपाथ पर सो जाया करता।
अब दोस्तों एक रात वह सड़क के किनारे फुटपाथ पर बैठा लेटा हुआ था एक घर के सामने और अचानक से बारिश शुरू हो जाती है। अब बारिश इतनी तेज हो रही थी कि उसे बचने का कोई सहारा नहीं मिल रहा था और अब इसके बाद वो इधर-उधर देखने लगता है कि कहीं उसे बैठने की जगह मिल जाए और फिर बैठने और ढूंढने का प्रयास भी करता है लेकिन कहीं जगह नहीं दिखाई देती है। लेकिन अचानक फिर सामने देखता है कि एक घर है जिसमें एक छज्जा टाइप का निकला हुआ है और फिर वहां जाकर के वो उसी के नीचे खड़ा हो जाता है और फिर जो यह बारिश थी वो खूब ही अपनी रफ्तार से बरसे ही जा रही थी और तभी अचानक से क्या होता है कि जो उस घर की मालकिन होती है उसकी नजर उस लड़के के ऊपर चली जाती है। वो देखती है कि एक जो लड़का है वो बारिश से भीग चुका है लगभग आधा से ज्यादा और जो उसका घर का छज्जा उसी के नीचे वह लड़का भी खड़ा था और उसके हाथ में एक छोटा सा बैग भी था। उसे लगा कि कोई होगा बात को वह इग्नोर करके वह अंदर चली जाती है।

अब दोस्तों वह अंदर तो चली जाती है लेकिन फिर उसका दिल नहीं मानता है और फिर से वह बाहर आती है और गेट खोलती है और फिर उस लड़के से पूछती है कि क्या बात है कौन हो तुम और यहां क्या कर रहे हो? अब दोस्तों फिर वो अपना पूरा कहानी दुख दर्द उस औरत को बयां करने लगता है। अब जो यह महिला होती है ये कहानी सुनकर के काफी परेशान हो जाती है। कहती है कि ठीक है घबराने की कोई जरूरत नहीं। मुझसे जो मन पड़ेगा मैं तुम्हारी मदद कर दूंगी। और वो उसे घर के अंदर ले जाती है और फिर घर के अंदर ले जाने के बाद जो कुछ होता है वो आप कल्पना ही नहीं कर सकते। बहुत ही रोचक, बहुत ही इंटरेस्टिंग कहानी। आइए आपको बताते हैं पूरी कहानी को। लेकिन उससे पहले बस आपसे एक ही रिक्वेस्ट है कि वीडियो को एक लाइक कर दीजिएगा। चैनल पर नए हैं तो सब्सक्राइब कर दीजिएगा और एक प्यारा सा कमेंट जरूर कीजिएगा। दोस्तों आपका इतना करना हमें बहुत मोटिवेशन देता है ऐसी अच्छी-अच्छी कहानियां लाने के लिए ताकि आप लोगों को ऐसी कहानियां पसंद आए। रोचक कहानी है। वीडियो को बिल्कुल भी स्किप मत कीजिएगा। अंत तक जरूर देखिएगा। तो आइए दोस्तों कहानी की शुरुआत करते हैं।
नमस्कार दोस्तों स्वागत है आपका हमारे YouTube चैनल में। दोस्तों आज की जो हमारी सच्ची घटना है वो नोएडा शहर की है। दरअसल एक लड़का होता है जो कि मूल रूप से बिहार का रहने वाला था जिसकी उम्र लगभग 21 22 साल के आसपास थी। अभी उसकी कोई ज्यादा उम्र भी नहीं थी। अब दोस्तों वो पढ़ाई लिखाई किसी तरीके से जहां जहां तक उससे हो पाई उसने किया। घर की स्थिति अच्छी नहीं थी। मां-बाप बूढ़े थे। गरीबी का इतना आलम था कि उनके बदन पर ढंग के कपड़े तक नहीं थे। जो कपड़े पहनते भी थे तो ऐसा लगता था जैसे कि बरसों पुराने हो। अगर कभी घर परिवार में कुछ पैसों की जरूरत पड़ जाती तो पैसे ढूंढना इतना आसान नहीं था उस परिवार के लिए। लड़का जो था वह गरीबी और बदहाली देखकर के पूरी तरीके से परेशान हो चुका था और उसकी बूढ़ी मां अक्सर ही बीमार रहर करती थी। पिता के पास छोटी-मोटी खेती थी और खेती से सिर्फ उतना ही हो पाता था कि किसी तरीके से पेट भर जाया करता। दवाओं का खर्च जो था वह पूरी तरीके से अब उनके लिए बोझ बन चुका था। कहीं ना कहीं उनकी आर्थिक स्थिति कहीं बहुत ही ज्यादा खराब हो चुकी थी।
अब जो यह लड़का था अब जब वह अपनी जिंदगी में इस तरीके के तकलीफों को झेल रहा था तो अब उसके लिए झेलना मुश्किल होता जा रहा था। काफी ज्यादा वो लोग कर्ज में भी डूब चुके थे। उनके पास कोई रास्ता ही नहीं बचा था। अब जो उस लड़का के पिता थे वो खेती के भरोसे पर अपनी पत्नी के इलाज के लिए मतलब रहते थे और कितने सारे कर्ज भी उन्होंने लेकर रखे थे। अब पैसा ना चुकाने की वजह से अब बड़े-बड़े सरपंच जो थे वह उस पर दबाव बनाना शुरू कर देते हैं क्योंकि काफी ज्यादा समय बीत चुका था। अब जो सब्र का इंतहा था वह भी खत्म हो चुका था। अब सरपंच लोग घर पर धावा बोलने लगते हैं कि हमारा पैसा वापस करो। सूद के साथ ब्याज भी बढ़ रहा है। अब यह बार-बार समय मांगा करता था। लेकिन ऐसा करते-करते लगभग 5 साल का समय बीत चुका था। अब 5 साल के बाद दोस्तों जो यह सरपंच होते हैं वो आते हैं और फिर वहां घर पर जाने के बाद उनकी खेती को कहते हैं कि अब इसे मेरे नाम पर कर तुम लोगों को कल करना होगा। क्योंकि तुम लोगों का पैसा चुकाना बस की बात नहीं है। अब यह बात सुनकर के वह लड़का और भी ज्यादा परेशान हो जाता है और फिर वह सरपंच से कहता है कि सरपंच जी मैं आपके सामने हाथ जोड़ता हूं। बस मुझे कुछ और दिन का समय दीजिए। मैं मां की बीमारी की वजह से बाहर नहीं जा पा रहा हूं। लेकिन मैं एक साल के अंदर कोशिश करूंगा कि आपका आधा से ज्यादा पैसा लौटा दूं। वह चुप कर दूंगा। सरपंच कहता है कि तुम एक साल में भला ऐसा कौन सा काम कर लोगे कि मेरे 56 लाख तुम लौटा दोगे। तो फिर लड़का कहता है कि मैं अपने आप को बेच दूंगा। मैं अपने शरीर के अंगों तक को बेच दूंगा। लेकिन आपके कर्ज को मैं अपने ऊपर बिल्कुल नहीं रखूंगा। सरपंच कहता है कि तुम तो बहुत ही ज्यादा खुददार लगते हो। चलो देखता हूं कि एक साल में तू कैसे लौटाता है और अगर तुम नहीं लेते हो तो समझ लेना कि यह खेत मैं अपने नाम पर कर लूंगा।
तो वो कहता है कि ठीक है सरपंच। अब दोस्तों वो लड़का जिसका नाम संजय था जो कि मूल रूप से बिहार रहने का रहने वाला था। अब सर संजय को सरपंच की बातें कांटों की तरह चुब गई थी और उसने मन ही मन ठान लिया कि सर जाकर खुद मेहनत करूंगा। और फिर बड़े सपने लेकर के वो मां से कहता है कि मां मुझे शहर जाना ही पड़ेगा। पिताजी आपकी देखरेख कर लेंगे। मैं कुछ पैसे भेज दिया करूंगा जिससे कि आपकी दवाइयां चल जाएंगी और बाकी के कुछ पैसे मैं सरपंच को भी देता रहूंगा। जब मैं शहर जाऊंगा मेहनत जाऊंगा तो मैं अच्छे पैसे कमा लूंगा। अब दोस्तों वो भी अपने मां-बाप का इकलौता ही शहर था। उसका मां बार-बार यही कह रही थी कि बेटा शहर मत जा दूर मत जा। मेरी देखरेख आखिर कौन करेगा? तो लड़का कहता है कि मां अगर मैं तुम्हारी देखरेख करूंगा तो फिर सरपंच की बातें कौन सुनेगा? मुझसे अब उसकी बातें बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं होती। आप लोग सुन सकते हो लेकिन मैं नहीं सुन सकता हूं। वह अपनी मां से जिद करके घर में यही कहता है कि बस मुझे कुछ नाश्ते के लिए बना दो।
अब उसकी मां रोटी बनाती है और उसे एक अचार का टुकड़ा दे देती है और कहती है कि बेटा मैं तेरे लिए इतना ही कर सकती हूं। उसके भी पता था कि मेरी मां बीमार रहती है। वो कुछ कर नहीं सकती है। अब दोस्तों वो सूखी रोटी और एक अचार लेकर के बैग में दो चार कपड़े डालता है जो कि बरसों पुराने थे। मैले कुचले जिस स्थिति में थे उसी में वो रख लेता है और फिर ट्रेन पकड़ लेता है दिल्ली के लिए। अब दोस्तों दिल्ली का जो उसका सफर था वो काफी ज्यादा लंबा था। किसी तरीके से कुछ रोटियां उसमें से खाई थी और कुछ बचा करके रख लिया था। ना कोई सहारा था ना कोई उम्मीद थी शहर में। अनजान सा शहर था और वहां पर अनजान लोग भी थे। उसे पहले से ही आभास था कि वहां पर जाने के बाद उसके सामने क्या स्थिति बनेगी क्या-क्या बनेगी। लेकिन उसने सोच लिया था कि जो भी होगा देखा जाएगा। नया दोस्त बनाऊंगा कुछ जान पहचान ढूंढूंगा। अगर कोई मिल जाएगा सहारा दे देगा तो अच्छी बात है। वरना बात वरना तो फुटपाथ जिंदाबाद ही है। मेहनत मजदूरी कर लूंगा बोझा ढोलूंगा लेकिन फुटपाथ पे सुलूंगा। लेकिन सरपंच का कर्ज तो मैं किसी तरह से करूंगा।
अब दोस्तों वो लड़का दिल्ली पहुंच जाता है और फिर वहां से बस पकड़ करके यह नोएडा शहर आ जाता है। नोएडा आने के बाद क्या होता है कि दो दिन नौकरी के चक्कर में इधर-उधर भटकता है। कहीं भी जाता तो 10 000 की नौकरी जो थी वो 12 घंटे की ड्यूटी उसे मिला करती थी। उसे लगा कि 10 000 में खाएगा क्या? बचाएगा क्या? मां का इलाज कैसे कराएगा? उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वो काम क्या करें? अब एक दो जो वो ठेला पर बोझा ढोने वाले लोग होते उससे संपर्क किया। बोला कि मैं भी यह काम करना चाहता हूं। इसके बदले में कितना मेहनताना मिलेगा? तो वो कहते हैं कि जितना वजन उठाओगे उस हिसाब से पैसा मिलेगा। तो वो कहता है कि अभी मैं जवान हूं। मेरे शरीर में ताकत है। मैं अच्छे से वजन उठा लूंगा। तो फिर वो कहते हैं कि ठीक है लेकिन फिर इसके लिए तुम्हें ठेले की जरूरत पड़ेगी जो कि तुम्हें बनवाना पड़ेगा। अब उसके लिए बहुत बड़ी समस्या आ जाती है कि ठेले के लिए रकम कहां से लाएगा? जेब में उसके तो 1000 ही थे और उसी से उसको आगे का भी सफर तय करना था।
अब दरअसल दोस्तों जो यह लड़का संजय था वह थोड़ा बहुत गाड़ी चलाना भी जानता था। गांव में या फिर फ्री टाइम में जभी भी रहा करता था। गांव के लोग जो थे जिनके पास एक दो गाड़ियां थी तो वह बुकिंग वगैरह ले लिया करता था। जिससे कि 400 उसे दिहाड़ी मिल जाया करते थी। तो उससे उसके घर के खर्च चल जाया करते थे। उसके पास हुनर था और उसके पास लाइसेंस भी था। तो इस वजह से होता क्या है दोस्तों कि वो एक उम्मीद लेकर के शहर गया था कि अगर कुछ नहीं मिलेगा तो मैं दिन रात गाड़ी चलाऊंगा और गाड़ी चलाऊंगा तो 300 रुपए तो मैं आराम से कमा ही लूंगा। अब दोस्तों वह गाड़ी ढूंढने लगता है कि अगर कोई मालिक मिल जाए और गाड़ी चलाने को मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है। हो सकता है कि अगर मैं मालिक को दुख दर्द बताऊं तो वह पसीज जाए और वो मेरी मदद भी कर दे। लेकिन दोस्तों ऐसा अक्सर होता नहीं है। ऐसा बहुत ही कम होता है।
ऐसा नहीं है कि दुनिया में अच्छे लोग है नहीं। बहुत ही अच्छे लोग हैं। इसी वजह से दुनिया तो विश्वास पर टिकी हुई है और प्रेम पर टिकी हुई है। वरना कब की यह धरती जो है वो तहस-नहस हो जाती। अच्छे लोगों की भी कमी नहीं है। अब दो दिन बीत जाता है लेकिन उसे काम अभी तक नहीं मिला था। अब दूसरे दिन की जब रात होती है लगभग 9 10 बजे के रात का समय हो चुका था और थक हार करके यह फुटपाथ के बगल में बैठा हुआ लेटा हुआ था और अचानक से वहां तेज बारिश होने लगती है और बारिश इतनी ज्यादा तेज थी कि वो आधा से ज्यादा भीग भी जाता उसका बैग भीग जाता है और वो भी भीग जाता है।
अब वो अपने आप को बचाने का प्रयास करने लगता है कि अगर कहीं छुपने की जगह मिल जाती तो सर को ढक लेता। कम से कम मेरा बदन तो नहीं भीगता। अब इधर-उधर वो देखता है तो कहीं उसे कुछ नहीं दिखाई देता है। अक्सर दोस्तों शहरों में घर के बाहर बाउंड्री बनी होती है जिस पर ना कोई छत होती है और ना ही कुछ होता है। अचानक उसकी नजर एक बड़े घर के सामने पड़ती है क्योंकि जहां वो बैठा था उसके सामने एक बड़ा घर दिखा। उसे एक सहारा टाइप में छत का एक रेलिंग उसे दिखाई दे जाता है। अब वो यह सोच करके वहां चला जाता है कि नहीं हो रहा तो यहां कम से कम खड़ा हो के रात बिता लूंगा। अब दोस्तों वो लड़का वहां पर जाकर के खड़ा हो जाता है। बारिश जो थी वो खूब तेज रफ्तार से होए जा रही थी और थोड़ी देर के बाद अचानक से जो उस घर की मालकिन होती है जो नजर पड़ती है तो देखती है कि उसके घर के गेट के सामने जो छज्जा बना हुआ उसी के नीचे एक लड़का चिपका हुआ खड़ा है। उसे शंका हुआ कि कहीं ऐसा तो नहीं कि कोई चोर चका आ गया हो जो ऐसे खड़ा हो क्योंकि बहुत ज्यादा रात का समय का था था भी नहीं। अभी रात के 8 9 00 बजे ही होंगे। अब वो मन में यह ख्याल आती है और फिर उसके बाद तो वह अंदर जाती है और अंदर जाने के बाद कुछ देर तो वह अपने आप को काम में व्यस्त करती है लेकिन फिर भी उसके दिमाग में उस लड़के की परछाई चली जा रही थी। वो बार-बार यही सोच रही थी कि कहीं ऐसा ना हो कि कोई चोर हो क्योंकि उसके घर में कोई पुरुष था नहीं। दो बच्चे थे और दोनों ही विदेश में पढ़ा करते थे।
अब जो यह पति था वह कोरोना काल में उसका दुनिया छोड़ के चला गया था। मन ही मन उसे काफी डर होने लगा शंका होने लगा और फिर से वह बाहर आती है बालकनी के पास और जोर से आवाज लगाती है कि कौन उधर खड़ा हुआ है। दो-तीन बार वो आवाज लगाती है। लेकिन जो ये संजय होता है वो यह जोर-जोर से चिल्लाकर कहता है कि आंटी मैं हूं बारिश आया भीग रहा था इसलिए मैं यहां बचने के लिए खड़ा हूं। जब वो इतना प्रेम से बोलता है तो फिर जो ये महिला होती है उसे लगा कि शायद कोई सभ्य और अच्छा लड़का है। अब होता क्या है दोस्तों कि थोड़ी ही देर के बाद बारिश जो है वो थम जाती बंद हो जाती है और फिर वो महिला घर से बाहर निकलती है तो देखती है कि वो लड़का अभी भी वहीं खड़ा हुआ है।
अब वो समझ नहीं पा रही थी कि बारिश बंद होने के बाद यह लड़का क्यों नहीं गया। अभी तक वहीं क्यों खड़ा है? अब वो घर से नीचे उतरती है। गेट नहीं खोलती है। गेट बंद ही रहता है। और फिर उससे पूछती है कि कौन हो और तुम यहां पर इतनी देर से क्यों खड़े हो? बारिश भी तो बंद हो गई। कहां तुम्हें जाना है? अब इतना सुनते ही जो यह लड़का संजय होता है वो यह कहता है कि आंटी ना तो मेरा कोई ठिकाना है और ना ही मेरा कोई जगह है। बस यूं ही कहीं मुझे जगह मिल जाती है तो मैं ऐसे ही सो जाता हूं। तो वो कहती है कि क्या करते हो बेटा कि अभी तुम गांव से नए आए हो क्या? तो वो बोला कि हां आंटी मैं अभी गांव से नया आया हूं। मुझे दो दिन हुआ यहां आए हो और अभी काम धंधा ढूंढने का ही प्रयास में हूं। मुझे अभी तक कोई काम मिला नहीं है। और मेरा कोई ऐसा मित्र भी नहीं है जिसके यहां पर मैं जाकर के रुक जाऊं। घर पर बूढ़ी मां रहती है कि जो बीमार है और पिता हैं वो भी वृद्ध हो चले हैं।
अब दोस्तों वो जो लड़का है वो आंटी से अपनी इन हालातों के बारे में कहीं ना कहीं बताया जा रहा था। आंटी जब वो महिला थी जब वो इसकी इस तरह की बातें सुन रही थी तो कहीं ना कहीं उसे उनकी बातों में सच्चाई लग रही थी। उसे लग रहा था कि ये जो लड़का है वो उससे सच बोल रहा है। उसे थोड़ा सा भी इस बात के बारे में नहीं डाउट हुआ था कि यह कुछ गलत या कुछ झूठ बोल रहा है। वो अपने घर के हालातों के बारे में बयां करना शुरू कर देता है और यह भी बताता है कि परिवार की ये स्थिति है कि अगर मैं ना कमाऊं तो फिर जो यह हमारे पास छोटा-मोटा खेत है वो भी सरपंच छीन लेगा। अब ये सारी बात जब वो उस महिला को बताता है तो फिर वो महिला अंदर से उसके लिए पिघल जाती है। उसे लगा कि हो सकता है कि कोई परिस्थिति का मारा हुआ क्योंकि उम्र भी ज्यादा नहीं 21 22 साल का लड़का होता है।
अब वो महिला तभी बोली है कि बेटा आजकल थोड़ा लोगों के ऊपर भरोसा करना रिस्की होता है क्योंकि जो समय चल रहा है उसमें धोखा ही ज्यादातर हो रहा है। जिसको पनाह दो शरण दो वही हमारे साथ गलत कर देता है। तो लड़का बोला कि आंटी ऐसा कुछ नहीं है। ऐसा मेरे खून में बिल्कुल नहीं है। लेकिन फिलहाल अगर आपको भरोसा नहीं है तो कोई बात नहीं। बस मुझे यहां खड़े रहने दीजिए। इतनी सी जगह मुझे दे दीजिए। तो फिर वो कहती है कि ठीक है कोई बात नहीं तुम यहां पर रह सकते हो। अब दोस्तों वह जो लड़का था वह वहीं पर उसी छज्जे के नीचे बैठ जाता है और फिर वह महिला जो होती है वह अंदर चली जाती है और फिर उसके बाद यह वहां पर अपना खाना पीना खाता है। महिला जो है वो खाना पीना खा के अपने बिस्तर पर लेट गई थी।
लेकिन अभी जो संजय से थोड़ी देर पहले उसने बात की थी वो सारी बातें उसके दिमाग में घूमने लगती है। वो सारी स्थितियां जो उसने अपने बचपन में गरीबी के आलम देखे थे उसके दिमाग में भी चलने लगता है कि मेरे पिताजी कितने गरीब थे। हम लोगों ने कितनी गरीबी देखी थी। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] अब समय का चक्र तो बदलता ही रहता है। अगर मेरे पिता या मेरे भाई मेहनत नहीं किए होते तो शायद मेरे शादी इतने बड़े घर में नहीं हुई होती और इतने अच्छे घर में अगर शादी नहीं होती तो पता नहीं आज मैं क्या होती कहां होती और यह सोच करके उसके मन में काफी उथल-पुथल मचाना था। नींद भी नहीं आ रही थी। एक दो बार वो अपने छत से देखती है तो वह लड़का जो था वो वहीं पर लेटा हुआ था। अब रात में कि महिला थी अकेली थी इसी वजह से उसकी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। अब वो नीचे आती है और फिर वो आने के बाद उसे कहती है कि एक काम करो कि तुम यहां पर लेटे हो कोई बात नहीं लेकिन तुम सुबह मुझसे बिना मिले या बिना बताए जाना मत। मैं तुम्हारे लिए काम का इंतजाम कर दूंगी कुछ ना कुछ।
अब यह सुनकर के संजय के दिल में एक उम्मीद जाग जाती है। कहता है कि ठीक है आंटी अगर मुझे काम मिल गया तो ठीक मैं आपका एहसान जिंदगी में नहीं भूलूंगा। अब दोस्तों अगले दिन सुबह हो जाती है। अब सुबह होते ही सबसे पहले वह महिला जिसका नाम अर्पिता होता है वह सबसे पहले वह अपने बालकनी में आती है और देखती है कि वो जो लड़का है वो अभी भी वहीं पर बैठा हुआ है। वो आती है और गेट खोलती है और कहती है कि एक काम करो कि तुम अंदर आ जाओ। अब वो उस लड़के को अंदर लेकर के जाती है। और फिर उसके बाद दोस्तों जो उसके यहां नौकर काम करने वाले लगे हुए थे उनके लिए बाथरूम वगैरह सब कुछ की व्यवस्था अलग थी। वो उसे बताती है कि देखो इधर टॉयलेट बना हुआ है। इधर बाथरूम बना हुआ है। तुम जाकर के फ्रेश हो जाओ। कपड़े वगैरह अगर गंदे हो तो धो लो नहा धो लो। और फिर उसके बाद मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं। दोस्तों अर्पिता जाती है घर में अपनी चाय बनाती है। उसके लिए भी और संजय के लिए भी। अब दोनों बैठ के चाय पीने लगते हैं। संजय से पूछती है कि तुम कितने पढ़े लिखे हो? लड़का कहता है कि मैं बहुत ज्यादा नहीं। मैंने बस इंटर लिखा इंटर ही किया क्योंकि घर की हालत ठीक नहीं है। मैंने तो आपको पहले ही बताया कि मेरी मां बीमार रहती है। मैं थोड़ा बहुत गांव ही में गाड़ी चला लेता हूं। गांव में भी मैं गाड़ी चलाया करता था। तो कहती है कि गांव में गाड़ी चलाना और शहर में चलाना बहुत अंतर होता है। तो वो कहता है कि ठीक है अगर आपके पास ड्राइवर की जगह या कोई और काम हो तो मुझे दे दीजिए। तो वो कहती है कि ठीक है तुम एक काम करो कि तुम मेरे ऑफिस में काम करो। मैं तुम्हें अगर गाड़ी ही चलाने का शौक है तो मैं तुम्हें गाड़ी दे दूंगी। लेकिन थोड़ा सा पहले तुम अपने हाथ वगैरह चला करके साफ कर लो।
और फिर उसके बाद अब दरअसल जो अर्पिता थी और जो उसके पति थे दोस्तों जिनका नाम देवी प्रसाद था उनका ट्रांसपोर्ट का काम था। उनकी कंपनियों में गाड़ी लगी हुई थी छोटी-छोटी कैब जिसमें जो एंप्लई थे वो पिकअप और ड्रॉप का काम करते थे। यही उनका मेन बिजनेस था और अच्छा खासा इससे पैसे भी कमा रहे थे। लेकिन देवी प्रसाद के जाने के बाद कोरोना काल में कुछ तो धंधा चौपट हो गया और कुछ उनके जाने के बाद पूरी तरीके से चौपट हो गया। स्थितियां यह बन गई थी कि जो गाड़ी की किस्त थी वह भरने तक के पैसे नहीं बचते थे। क्योंकि जो बेटे थे वह दूसरे शहर में विदेश में जाकर के पढ़ते थे तो उनका भी खर्चा बहुत आता था। लेकिन दोस्तों उनके पास कुछ ऐसे ड्राइवर थे जिन्होंने मेहनत की पूरी वक्त में साथ दिया और फिर से धीरे-धीरे करके उनकी जो कंपनी होती है उसे रनिंग में लेकर आते हैं। तो वर्तमान समय में लगभग उनके पास 100 150 के आसपास गाड़ियां थी और 100-150 ड्राइवर थे। सभी ईमानदारी से काम करते थे। पूरा बिजनेस जो था वो अर्पिता ही देख रही थी।
अब चाय नाश्ता होने के बाद जो अर्पिता होती है वो अपनी ऑफिस के लिए तैयार होती है और उस लड़के से कहती है कि फटाफट कपड़े पहनकर मेरे साथ ऑफिस चलो और गाड़ी तुम चला करके चलोगे तो मैं देखती हूं कि तुम गाड़ी चलाते कैसा हो। अगर अच्छा चलाओगे तो फिर मैं तुम्हें अपनी गाड़ी दे दूंगी। मेरी कंपनी में वैसे भी बहुत सारी गाड़ियां हैं। तो वो कहता है कि ठीक है मैडम जी। अब वो उसे मैडम कहना शुरू कर देता है। जब इसे पता चला कि ये मालकिन और उसे नौकरी दे रही है। तो वो उसे कहती है कि तुम मुझे आंटी कह सकते हो मुझे कोई दिक्कत नहीं है।
दरअसल अर्पिता की उम्र लगभग 45 साल के आसपास थी। अब दोस्तों दोनों ही तैयार होते हैं और ऑफिस के लिए निकल जाते हैं। अर्पिता गाड़ी की चाबी देती है और फिर संजय से कहती है कि गाड़ी तुम ड्राइव करके ले चलो। संजय गाड़ी में बैठता है। सीट बेल्ट वगैरह जो भी बकायदा नियम होते हैं ट्रैफिक के वह सारे फॉलो करता है। गाड़ी में बैठकर सेल्फ लगाता है और फिर गाड़ी को लेकर वहां से लगभग 12 13 कि.मी. दूर उस ऑफिस में पहुंच जाता है जहां पर अर्पिता की ऑफिस होती है। इतनी साफसथरी गाड़ी चलाता है कि अर्पिता उसके हर एक एंगल को नोटिस कर रही थी क्योंकि वो उसे एक तरह से उसका टेस्ट ले रही थी। हाईवे पर गाड़ी चलवा रही थी और गली कुची में हर तरह से घुमा करके वह उसे लेकर के गई थी। वह देखना चाहती थी कि यह गाड़ी चलाना जानता भी या नहीं। अब दोस्तों चंद्र 14-15 कि.मी. का सफर तय करने के बाद दोनों ऑफिस पहुंचते हैं। और ऑफिस पहुंचने के बाद अर्पिता संजय से कहती है कि संजय मैंने यह देखा कि तुम गाड़ी बहुत अच्छी चला लेते हो। तो ऐसा करो कि मैं तुम्हें एक गाड़ी देती हूं और मैं तुम्हें एक ऐसी गाड़ी दूंगी जिसका तुम किस्त भरते रहो और जो इसका डाउन पेमेंट होगा वो सारी चीजें जो है तुम्हें अपनी मेहनत से ही करनी होगी। मैंने यह देखा कि तुम गाड़ी चलाना तो यह मैं समझ चुकी हूं कि तुम जानते हो और अच्छे से ही तुमने आज भी ड्राइविंग की। तुम्हें कहीं भी कोई दिक्कत नहीं हुई। और जो गाड़ी का डाउन पेमेंट वगैरह रहा होगा तुम बाद में ही पेमेंट कर देना। बाकी जो उसी की भी कमाई होगी उसमें चाहे तुम 10 कमाना या तुम 100 कमाना वो पूरा के पूरा तुम्हारा रहेगा। गाड़ी का पूरा मेंटेनेंस तुम्हारा रहेगा।
सारे खर्च तुम्हारे रहेंगे। तुम जितना कमा सकते हो कमाओ में काम दे सकते हो तुम्हें। यह सुनकर के संजय बहुत खुश हो जाता है कि बहुत अच्छी बात है। गाड़ी तो कंपनी में पहले से ही लगी हुई थी और काम था ही। अब यहीं से संजय को एक उम्मीद मिल जाती है कि कहीं ना कहीं रास्ता खुरा रहा है। अब उधर जो वो सरपंच दी थी उनके बातें उनके कानों में बार-बार चुभ रही थी। किसी ना किसी तरीके से साल भर के अंदर उसे पैसा वापस करना ही कहना है। अब दोस्तों जो यह संजय होता है उसे एक गाड़ी देती है। अब चाबी लेता है संजय और फिर उसे जहां पर कंपनी में गाड़ी लगी हुई थी वहां पर एक ड्राइवर से कहती है कि इसे ले जाकर के सब दिखाओ। Google मैप का जमाना है। हर आदमी अब एकदम से आसानी से जान सकता है कि कहां जाना है कहां जाना है नहीं। अब वो भी समझ जाता है। अब संजय भी बहुत अच्छे तरीके से काम करने लगता है और लगभग 1 महीने के आसपास खूब मेहनत से काम करता है। लगभग 18 घंटे 20-20 घंटे वह काम किया करता था। 1 महीने में वह अच्छा खासा पैसा भी कमा लेता है और पैसा कमाने के बाद कुछ पैसे वह अपनी मां को दवा के लिए भेज देता है और कुछ पैसे वह सरपंच जी के लिए भेजता है।
अब दोस्तों सरपंच जब पहले महीने के कुछ पैसे पाता है तो वह सोचता है कि यार इतने यह इतनी जल्दी इतने पैसे कहां से कमाने लगा क्योंकि 00 उसने सरपंच को दिए थे और लगभग 10 000 अपनी मां को दिए और कुछ पैसे अपने पास रखे। अब यहीं से संजय की जिंदगी अच्छे से चलने लगती है। अब जो यह अर्पिता थी वह संजय का हालचाल लिया कराती थी। संजय के रहने की भी व्यवस्था करा दे रही जहां सारे ड्राइवर रहते थे वहीं पर उसके भी इंतजाम कराया जाता है। अब यह हंसी-खुशी से रहने लगता है और समय बीतता जाता है।
अब एक दिन अचानक से क्या होता है कि जो यह संजय था वो अर्पिता के घर आया था। दोपहर के लगभग 2 00 बजे के आसपास था है। संडे का दिन था। उस दिन अर्पिता का ऑफिस बंद रहता था। संडे को वो वैसे भी जिस कंपनी में गाड़ियां लगी रहती उस दिन कंपनी में भी काम कम रहता था। इसीलिए अर्पिता उस दिन छुट्टी ले लेती थी और उसका सारा बिजनेस उस दिन मैनेजर देखा करते थे। संजय भी उस दिन अर्पिता के ही घर पर था।
अचानक से अर्पिता अंदर से खूब जोर-जोर से चिल्लाने लगती है। संजय उसकी चीखने की आवाज सुनकर के काफी हैरान हो जाता है। अब दो-तीन सब चिल्लाने के आते हैं। उसके बाद आवाज रुक जाती है और फिर वो भागता हुआ सीधे ही सेकंड फ्लोर पर जाता है और जाकर के वो जो नजारा वहां देखता है वो बिल्कुल ही दंग रह जाता है। वो यह देखता है कि जो उसकी मालकिन है वो फर्श पर पड़ी हुई है और उसके मुख से कुछ झाक सा निकल रहा था। उसे लगा कि पता नहीं इनसे कौन सी बीमारी हो गई क्या हो गया। तो उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है और फिर वो आननफानन में बिना सोचे समझे उनको उठाता है और उठा करके उनको गाड़ी के बीच वाली सीट पर ले लेटा के सीधा हॉस्पिटल पहुंच जाता है और हॉस्पिटल में उन्हें इमरजेंसी में ले जाकर के भर्ती करवाता रहता है। उसके पास ना तो पैसे थे और ना ही कुछ और कुछ खास था। लेकिन उसने एक इंसानियत के नाते जो कुछ होता है उसे दिखाते हुए जो कुछ हॉस्पिटल ले जाकर के एडमिट करा दिए। डॉक्टर पैसे वगैरह की डिमांड करते हैं तो कहता है कि मेरे पास 10-15 000 हैं। आप इसे लीजिए और फिर उसके बाद जो पैसा लगेगा हमारी मालकिन है वह बहुत बड़ी बिजनेसमैन वूमेन है। तो आप पैसे की चिंता मत कीजिए। आप ट्रीटमेंट कीजिए क्योंकि इनके जो बच्चे हैं वो बाहर रहते हैं। इनके पति है नहीं। तो जब तक यह होश में नहीं रहे आएंगे तब तक बाकी पैसे का इंतजाम नहीं होगा। आप ट्रीटमेंट कीजिए। आपको पैसा मिल जाएगा।
डॉक्टर को बहुत अच्छे तरीके से समझाते हैं। डॉक्टर भी बहुत अच्छे वो एडमिट कर लेते हैं और ट्रीटमेंट भी शुरू कर देते हैं। लगभग 6 7 घंटे के बाद जाकर के मैडम को होश आता है। अब जब मैडम को होश आता है तो वो देखती है कि वो हॉस्पिटल में है। वो समझ नहीं पा रही थी कि मैं घर पर थी तो घर से हॉस्पिटल कैसे आ गई। सारी बात उसे संजय बताता है और तब जाकर उसे जिंदगी में एहसास हुआ कि इंसानियत का जो रिश्ता था वह कहीं ना कहीं बहुत बड़ा होता है। सारी मतलब कि जो उस अगर संजय के साथ महिला ने इंसानियत का रिश्ता नहीं निभाया होता तो शायद आज अर्पिता दुनिया में होती अभी नहीं भी होती। उस दिन जाकर के इसे ऐसा लगा कि इसके साथ मैंने जो कुछ भी किया था शायद उसी का फल भगवान ने उसे इस तरीके से दिया था। नहीं तो पता नहीं उसके दो बच्चे उसे मिल भी पाते या नहीं मिल पाते।
अब दोस्तों जैसे उन बच्चों को यह बात पता चलता है कि उनकी मां बीमार है तो फिर वो लोग आने के लिए बोलने लगते हैं और पिता कहती है कि घबराने की कोई जरूरत नहीं। मैं बिल्कुल ठीक हो गई हूं। घर जाऊंगी कल। आप लोग अपने रह करके पढ़ाई पर ध्यान दीजिए क्योंकि बस अब चार छ महीने का समय ही बचा हुआ है और बीच में आओगे तो पढ़ाई डिस्टर्ब हो जाएगी और उसके बाद तुम लोगों की जॉब लग जाएगी। वैसे मेरा क्या मैं कितनी उम्र मेरी बची है मैं कैसे भी काट लूंगी। वो अपने बच्चों को समझा देती है। अब दोस्तों जो संजय था वो पूरी तरीके से उसका बेटा बनकर रहने लगा और उस दिन से अर्पिता के दिल में संजय एक अलग ही जगह बना लेता था। अभी तक तो वह सिर्फ एक ड्राइवर था और एक एहसानमंद था। लेकिन आज जो उसने उसके ऊपर एहसान किया था उस एहसान के नीचे उसका एहसान बहुत बड़ा हो चुका था।
अब दोस्तों अर्पिता जो थी वो कहीं ना कहीं संजय को और ज्यादा नजदीक रखने लगती है। सबसे ज्यादा मानने लगती है जितने ड्राइवर तुम में सबसे ज्यादा इसे मानती थी। एक दिन अचानक से संजय जो है वो गाड़ी साफ कर रहा था कि उसके घर से फोन आता है और जैसे ही फोन आता है वो रोने लगता है। उसके रोने की आवाज सुनकर के अर्पिता संजय से पूछती है कि क्या हुआ? तुम रो क्यों रहे हो? तो फिर वह बताता है कि मेरी ताबी मां की तबीयत बहुत ज़्यादा खराब हो गई है और उनको हॉस्पिटल में एडमिट किया गया है और डॉक्टर 50 की डिमांड कर रहे हैं। 50 तुरंत दूंगा तभी ट्रीटमेंट होगा। तो वह कहती है कि बस इतनी सी बात के लिए तुम रो रहे हो। घबराओ नहीं चाहे जितना भी पैसा लगे तुम अपनी मां का इलाज करो। एक काम करो कि तुम पहले सीधा गांव जाओ काम धंधा छोड़ दो। अब वो गाड़ी की चाबी देती है और कहती है कि गाड़ी लेकर के जाओ। क्योंकि ट्रेन से जाओगे तो कब मिलेगी कहां मिलेगी? इस वजह से तुम बहुत ज्यादा परेशान हो जाओगे। तुम गाड़ी से ही घर जाओ।
अब दोस्तों वह उसे गाड़ी देती है और 1 लाख भी कैश में देती है। गाड़ी का खर्चा प्लस अपना खर्चा। टोल टैक्स जो भी लगे वह सब खर्च करते हुए जाना। 50 अपने मां के ट्रीटमेंट के लिए। बाकी अगर फिर भी कुछ पैसे लगेंगे तो निसंकोच मेरे पास फोन कर देना। अब दोस्तों लगभग 30 घंटे का वो सफर करता है और 30 घंटे के सफर के बाद वो अपने गांव पहुंचता है हॉस्पिटल पहुंचता है तो उसकी मां बिस्तर पर लेटी हुई थी और उनका ट्रीटमेंट चल रहा था। और जो उसके पिता थे वो किसी के कर्ज की स्थिति कर्ज देने की स्थिति में पहले से ही नहीं थी क्योंकि कोई उनको देता ही नहीं। उसने डॉक्टर को आश्वासन दिया था कि मैं पैसे लेकर के आया हूं। वो पहले ही उसे भेज चुका था और इसीलिए उसकी मां का ट्रीटमेंट भी थोड़ा चल रहा चल चुका था। अब दोस्तों वो लाकर के पैसे डॉक्टर को देता है और कहता है कि आप इलाज करिए घबराइए नहीं। अब दोस्तों जो डॉक्टर है वो इलाज करते रहते हैं और लगभग एक सप्ताह के आसपास का समय बीत जाता है।
लेकिन फिर अचानक एक दिन संजय की मां की जो सांसे होती है वह थम जाती है। अब दोस्तों संजय की जिंदगी के लिए वो सबसे उसका बुरा दिन था। वो फूट-फूट करके रोने लगता है। मानो कि उसकी पूरी दुनिया ही उजड़ गई हो। उसका पूरा सब कुछ एक बार में ही खत्म हो गया हो। अब दोस्तों संजय के दिल पर क्या गुजरी थी? यह तो हम शब्दों में भी बयां नहीं कर सकते। अब दो-तीन दिन का समय बीत गया और पिता से भी बात भी नहीं हुई थी और पिता उसे फोन करके पूछती है कि क्या हुआ संजय? तुमने कुछ बताया नहीं। संजय जैसे ही अपनी मां की स्थिति के बारे में बताता है तो वह सन रह जाती है। वो कहती है कि तुमने इतनी बड़ी बात मुझे बताया तक नहीं। तो वह बोला कि मालकिन मेरी हिम्मत ही नहीं हो रही थी कि मैं आपको फ़ करूं। मेरी तो पूरी दुनिया ही उजड़ गई है। मेरा सहारा इस दुनिया से चला गया है। मेरे सर पर जो छांव था वह चला गया। तो अर्पिता कहती है कि तुम घबराओ नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं है। अगर तुम्हारी एक मां गई है तो भी तुम्हारी दूसरी मां जिंदा है। मैं जब तक जिंदा रहूंगी तुम्हें आज नहीं आने दूंगी। क्योंकि तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया है आज तक मेरे लिए उतना किसी ने मेरे लिए इतना बड़ा उपकार नहीं किया है।
अब दोस्तों यहीं से जो संजय होता है उसकी जिंदगी बदल जाती है। अर्पिता जो है वो उसका साथ देने लगती है एक मां की तरह। और अब उसे जभी भी पैसे की जरूरत पड़ती वह उसे पैसे दिया करती थी। धीरे-धीरे वक्त बीतता जाता है। अब जैसे-जैसे अर्पिता की उम्र बढ़ती जा रही थी अर्पिता एक दिन संजय से कहती है कि ऐसा करो कि तुम अब गाड़ी वगैरह चलाना छोड़ दो। और जो यह ट्रांसपोर्ट का बिजनेस है अब मैं इस काम को देखते-देखते थक चुकी हूं। तो ऐसा करो कि तुम अपना समझ करके तुम अपने तरीके से इसे देखो। और क्या प्रॉफिट हो रहा है और क्या लॉस हो रहा है इससे अब मुझे कोई लेना देना नहीं है। बस अगर मुझे अगर घर खर्च के लिए पैसा मिल जाएगा तो मेरा सब चल जाएगा। क्योंकि उनके दोनों जो बेटे थे वह अच्छी कंपनी में जॉब पा चुके थे। अब दोनों अमेरिका में ही नौकरी करने लगते हैं और वह लोग वहीं पर सेटल भी हो जाते हैं। अब इधर जो संजय था वो मालिक बन चुका था और इधर जो सरपंच जी थे उनके मुंह पर पैसा भी यह दे चुका था। सरपंच जी भी सन्न रह गए कि एक लड़का इतनी जल्दी कैसे प्रोग्रेस कर गया। लेकिन उसे नहीं पता था कि इतनी जल्दी प्रोग्रेस करने के पीछे उसकी मां की दुआएं और उसकी मेहनत और लगन और उसकी इंसानियत और उसका विश्वास बहुत सारी चीजें जुड़ी हुई थी जो कि उसे यहां तक लेकर के पहुंची थी। तो दोस्तों इसीलिए कहते हैं कि जिंदगी में आप कहीं भी जाइए तो जल्दबाजी मत करिए। भरोसा रखिए हिम्मत रखिए और मेहनत करते रहिए। हो सकता है कि जिंदगी में आप भी सफल हो जाए। तो दोस्तों आपको यह वीडियो कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा। संजय जैसे लड़के बहुत ही होंगे दोस्तों जो बेहद ही मजबूरी में दूसरे शहर में कमाने के लिए जाते हैं। सबकी भले किस्मत एक जैसी नहीं होती लेकिन एक ना एक दिन किस्मत जरूर बदलती है और समय जरूर अच्छा हो जाता है। तो इसीलिए ईमानदारी से काम करते रहिए। कभी भी किसी का भी समय एक जैसा नहीं रहता है। तो दोस्तों जो भी राय आप लोगो ने बताई है कमेंट में जरूर बताइएगा। धन्यवाद।
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