गरीब लड़की ने बुजुर्ग की मदद के लिए छोड़ा इंटरव्यू, फिर हुआ ऐसा खुलासा कि सब हैरान रह गए!
गरीब लड़की ने बुजुर्ग की मदद के लिए छोड़ा इंटरव्यू, फिर हुआ ऐसा खुलासा कि सब हैरान रह गए!
शहर के सबसे व्यस्त इलाके में बनी अद्वैत इंडस्ट्रीज की 25 मंजिला इमारत सुबह से ही उम्मीदवारों की भीड़ से भरी हुई थी। कंपनी में जनरल मैनेजर की एक बड़ी बड़ी पोस्ट खाली थी और उसके लिए देश भर से हजारों आवेदन आए थे। अंतिम चरण के इंटरव्यू के लिए लगभग 50 उम्मीदवार बुलाए गए थे। किसी के हाथ में महंगी डिग्रियों की फाइल थी। किसी के पास विदेशी यूनिवर्सिटी की सर्टिफिकेट कॉपी। कोई मोबाइल पर आखिरी मिनट में अपना रिज्यूमे पढ़ रहा था तो कोई शीशे में अपना चेहरा देखकर बाल ठीक कर रहा था। हर किसी की आंखों में एक ही सपना। आज नौकरी मिल जाए तो जिंदगी बदल जाएगी।
उसी भीड़ में एक लड़की चुपचाप खड़ी थी। उसका नाम था नेहा वर्मा। सादा नीला सलवार कुर्ता, पैरों में साधारण चप्पल, कंधे पर पुराना कपड़े का बैग और हाथ में एक पतली सी फाइल। नेहा ने अपनी फाइल खोली और आखिरी बार कागज देखे। हे भगवान, बस आज मेरी मेहनत बेकार मत जाने देना।

उसके पास खड़ा एक लड़का उसकी तरफ देखकर मुस्कुराया। उसका नाम था आदित्य कपूर। महंगा सूट, चमकदार जूते, हाथ में प्रीमियम घड़ी और चेहरे पर आत्मविश्वास। पहली बार इतनी बड़ी कंपनी में आई हो? जी। घबराने की जरूरत नहीं है। बस अपने जवाब अच्छे रखना। यहां भावनाओं से नौकरी नहीं मिलती। हम सही कहा आपने। लेकिन कभी-कभी अच्छे फैसले सिर्फ दिमाग से नहीं। दिल से भी लेने पड़ते हैं।
आप इंटरव्यू देने आई हैं या मोटिवेशनल स्पीच? ठीक उसी समय कंपनी के मुख्य गेट के बाहर एक बुजुर्ग आदमी धीरे-धीरे चलता हुआ दिखाई दिया। लगभग 68 साल की उम्र, सफेद बाल, हल्की बढ़ी हुई दाढ़ी, पुरानी भूरे रंग की जैकेट, हाथ में एक कपड़े की थैली। वो बेहद साधारण और थका हुआ दिखाई दे रहा था। वास्तव में वह अद्वैत इंडस्ट्रीज का मालिक और चेयरमैन देवेंद्र राठौर था। लेकिन आज किसी को इसकी जानकारी नहीं थी। देवेंद्र ने जानबूझकर अपना भेष बदला था। उन्हें कई दिनों से एक सवाल परेशान कर रहा था। क्या मेरी कंपनी में काम करने वाले लोग सिर्फ काबिल हैं या अच्छे इंसान? उन्होंने फैसला किया था कि आज इसका जवाब हम खुद तलाशेंगे। वह कंपनी के गेट के पास पहुंचे। अचानक उन्होंने लड़खड़ाने का नाटक किया और जमीन पर गिर पड़े। धड़ाम उनकी थैली एक तरफ जा गिरी। कुछ कागज सड़क पर फैल गए। पुराना चश्मा दूर जा गिरा। अरे कोई है बेटा जरा मुझे उठाने में मदद कर दो। यार अंदर रिपोर्टिंग का टाइम हो गया है सिक्योरिटी वाले हैं ना वही देख लेंगे हम यहां इंटरव्यू देने आए हैं किसी को संभालने नहीं। बेटा मेरा चश्मा जरा उठा देना दिखाई नहीं दे रहा। सॉरी बाबा देर हो रही है उसका पैर चश्मे से टकराया। चश्मा टूट। ओह ध्यान नहीं था।
नेहा कुछ दूरी से यह सब देख रही थी। उसने पहले कंपनी के गेट की तरफ देखा। फिर अपनी घड़ी देखी। इंटरव्यू शुरू होने में केवल 4 मिनट बाकी थे। उसने मन ही मन सोचा। अगर अभी रुकी तो शायद मेरा नंबर ही नहीं आएगा। नेहा कुछ सेकंड तक खड़ी रही। फिर उसने अपनी फाइल बंद की। बैग नीचे रखा और दौड़ कर बुजुर्ग के पास पहुंच गई। बेटी कोई मेरी मदद कर देगा क्या? बाबा आपको ज्यादा चोट तो नहीं लगी? पता नहीं बेटी। पैर में काफी दर्द है। आप पहले आराम से बैठिए। घबराइए मत। किसी के पास पानी है? कोई नहीं रुका। नेहा ने अपना बैग खोला। मेरे पास पानी है। उसने बोतल निकाली और बुजुर्ग को पानी दिया। तुम्हारा कहीं जाना था क्या बेटी? जी इंटरव्यू था। तो तुम यहां क्यों रुकी? इंटरव्यू थोड़ी देर से हो जाएगा तो तो शायद जिंदगी खत्म नहीं होगी। लेकिन आपको अभी मदद नहीं मिली तो परेशानी बढ़ सकती है। और अगर तुम्हारी नौकरी चली गई तो फिर दूसरी नौकरी ढूंढ लूंगी। लेकिन अगर किसी जरूरतमंद को देखकर मैं चली गई और बाद में कुछ गलत हो गया तो खुद से नजरें नहीं मिला पाऊंगी।
देवेंद्र के चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई। तुम्हारा नाम क्या है? नेहा। नेहा तुम मुझे जानती हो? नहीं बाबा। फिर इतनी मदद क्यों कर रही हो? मेरी मां कहती हैं कि किसी की मदद करने से पहले यह मत पूछो कि सामने वाला तुम्हारे कितने काम आएगा। तुम्हारे परिवार में कौन-कौन है? तुम्हारे पिता नेहा की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई। पापा अब हमारे साथ नहीं है। लेकिन उन्होंने भी मुझे यही सिखाया था कि किसी इंसान की हालत देखकर उसका सम्मान कम नहीं होना चाहिए।
मैडम आपका इंटरव्यू निकल जाएगा। इतना टाइम है तो आप समाज सेवा करिए। अगर किसी की मदद करना समाज सेवा कहलाता है तो मुझे इसमें कोई बुराई नहीं लगती। वो मेडिकल स्टोर की तरफ जाने लगी। कहां जा रही हो? आपके पैर पर चोट है। पट्टी लेकर आती हूं। लेकिन बेटी तुम्हारा इंटरव्यू आज नौकरी नहीं मिली तो कल कोशिश करूंगी लेकिन चोट लगी है तो पट्टी आज ही चाहिए। वो तेज कदमों से मेडिकल स्टोर की तरफ चली गई। रास्ते में उसकी चप्पल सड़क के एक पत्थर में फंस गई। चप्पल टूट गई। आज तो मेरी परीक्षा सच में हो रही है। उसने टूटी चप्पल हाथ में उठाई और नंगे पैर ही आगे दौड़ गई। कुछ मिनट बाद वह पट्टी और दर्द की दवा लेकर वापस आई। बाबा पैर आगे कीजिए। तुम्हें पता है कि तुम्हारा इंटरव्यू अब शायद खत्म हो चुका है? जी। फिर भी पछतावा नहीं? थोड़ा दुख है लेकिन पछतावा नहीं। उसने सावधानी से उनके पैर पर पट्टी बांध दी। तुम्हें लगता है कि तुम्हें नौकरी मिलनी चाहिए? यह फैसला कंपनी करेगी। मैं तो बस वही कर रही हूं जो मुझे सही लगा।
देवेंद्र ने पहली बार उसकी आंखों में गौर से देखा। वह लड़की थकी हुई थी। नंगे पैर थी। इंटरव्यू का मौका खो चुकी थी। फिर भी उसके चेहरे पर शिकायत नहीं थी। करीब 20 मिनट बाद नेहा ने बुजुर्ग को सहारा देकर कंपनी के गेट तक पहुंचाया। अब आप अंदर बैठ जाइए। सिक्योरिटी वाले आपकी मदद कर देंगे। और तुम मैं घर जाऊंगी। इतनी जल्दी हार मान ली? अंदर जाओ। हो सकता है तुम्हारे लिए अभी भी कोई मौका बचा हो। आपको लगता है मुझे भरोसा है। नेहा ने अपनी टूटी चप्पल हाथ में ली और कंपनी के अंदर चली गई। लॉबी में पहुंचते ही कई उम्मीदवारों की नजर उस पर पड़ी। नंगे पैर, हाथ में टूटी चप्पल, कंधे पर पुराना बैग। अरे नेहा जी, इंटरव्यू में आने की नई फैशन शुरू हो गई है क्या? सुना है आप बाहर किसी बुजुर्ग की सेवा कर रही थी। नौकरी चाहिए या पुरस्कार? मुझे नौकरी चाहिए। लेकिन इसके लिए किसी जरूरतमंद को छोड़ना जरूरी नहीं है। दुनिया ऐसे नहीं चलती मैडम। यहां वही आगे जाता है जो मौका पकड़ता है। मौका पकड़ना अच्छी बात है। लेकिन किसी इंसान को गिरा कर आगे बढ़ना नहीं। लॉबी में मौजूद कुछ उम्मीदवार चुप हो गए। सभी उम्मीदवार बोर्ड रूम में पहुंचे। चेयरमैन अभी आने वाले हैं। सभी उम्मीदवार तेजी से बोर्ड रूम की तरफ बढ़े। अब पता चलेगा असली काबिल कौन है।
बोर्ड रूम का दरवाजा खुला। अंदर कंपनी के डायरेक्टर्स, एचआर हेड और बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य बैठे थे। सबसे आगे चेयरमैन की कुर्सी खाली थी। कुछ सेकंड बाद दरवाजा खुला। एक व्यक्ति अंदर आया। महंगा ग्रे सूट, सलीके से बने बाल, गंभीर चेहरा और आंखों पर चश्मा। नेहा की आंखें अचानक फैल गई। वो वहीं बुजुर्ग था। आप हां नेहा मैं ही हूं। आप सभी के सामने अद्वैत इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और सीईओ श्री देवेंद्र राठौर हैं। आदित्य का चेहरा उतर गया। उसे अचानक सुबह का दृश्य याद आया। टूटा हुआ चश्मा जमीन पर पड़े बुजुर्ग और उसका वहां से निकल जाना। देवेंद्र ने टेबल की दराज खोली। एक छोटा डिब्बा निकाला। उसमें टूटा हुआ चश्मा रखा था। क्या किसी को यह याद है? कोई जवाब नहीं आया। तुम्हें याद है? अ जी सर। शायद आदित्य की आवाज अटक गई। शायद नहीं। सच बताओ। आदित्य चुप हो गया। आज सुबह मैं जमीन पर गिरा था। मैंने मदद मांगी थी। तुम मेरे पास से गुजरे थे। सर मुझे नहीं पता था कि आप कि मैं कौन हूं। जी आदित्य चुप। यही तो समस्या है। तुम्हें मदद करने से पहले यह जानना था कि सामने वाला कौन है। नेहा की तरफ देखकर देवेंद्र की नजरों में संतोष की हल्की झलक थी। और तुमने बिना कुछ जाने मदद की। सर मुझे लगा कि आप घायल हैं। बस इतना ही देखा। देवेंद्र ने उसकी बात ध्यान से सुनी। अगर तुम्हें पहले पता होता कि मैं इस कंपनी का चेयरमैन हूं तो तब भी मैं आपकी मदद करती हूं। फर्क सिर्फ इतना होता कि शायद मैं और जल्दी दौड़ कर आती। कमरे में हल्की हंसी गूंजी। देवेंद्र भी मुस्कुरा दिए। लेकिन फिर उनका चेहरा गंभीर हो गया। आप सभी ने आज एक इंटरव्यू दिया है। लेकिन वह इंटरव्यू बोर्ड रूम में नहीं था। वो इंटरव्यू कंपनी के गेट पर था। सभी उम्मीदवार एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। मैं यह जानना चाहता था कि जब आपके सामने ऐसा इंसान हो जिससे आपको कोई फायदा नहीं मिलने वाला। तब आप उसके साथ कैसा व्यवहार करते हैं। उन्होंने कुछ सेकंड रुक कर कहा और आज मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया। लेकिन फैसला अभी पूरा नहीं हुआ है। आदित्य ने राहत की सांस ली। आप सभी को दूसरा कार्य दिया जाएगा। उम्मीदवारों को लॉबी में भेज दिया गया। वहां कंपनी के पुराने कर्मचारी हरिशंकर कुछ फाइलों का ढेर लेकर खड़े थे। उनकी उम्र करीब 62 साल थी। अचानक उनके हाथ से सारी फाइलें जमीन पर गिर गई। कागज चारों तरफ फैल गए। अरे बेटा जरा कोई कागज उठाने में मदद कर दो। काका हमें अपना काम करना है। आप धीरे-धीरे उठा लीजिए। वो आगे बढ़ गया। नेहा वहीं रुक गई। वो जमीन पर बैठी और कागज उठाने लगी। बेटी तुम रहने दो। तुम्हारा भी काम होगा। काका लगता है आज मेरा काम ही दूसरों के कागज उठाना है। तो फिर आज मैं आपका सहायक हुआ। हम दोनों मिलकर फाइलें उठाने लगे। दूर खड़े देवेंद्र यह सब देख रहे थे।
दोपहर में सभी उम्मीदवारों को भोजन के लिए भी बुलाया गया। टेबल पर अच्छा खाना लगा था। नेहा अपनी प्लेट लेकर बैठी ही थी कि उसने देखा हरिशंकर एक तरफ खड़े थे। काका आप खाना नहीं खाएंगे? नहीं बेटी पहले आप लोग खा लो। आप मेरे साथ खाइए। लेकिन तुम्हारा खाना मैं दूसरी प्लेट ले लूंगी। फिर शुरू हो गई आपकी मदद योजना। आदित्य सर दूसरों की मदद देखकर हंसना आसान है। लेकिन कभी ऐसा दिन आया जब तुम्हें खुद मदद की जरूरत हो। तब शायद तुम्हें आज की हंसी याद आए। आदित्य ने सिर झुका लिया।
शाम को सभी उम्मीदवार फिर बोर्ड रूम में बैठे। देवेंद्र ने एक-एक फाइल देखी। आदित्य कपूर जी सर तुम्हारी पढ़ाई शानदार है। तुम्हारा अनुभव भी अच्छा है। इंटरव्यू में तुम्हारे जवाब सबसे मजबूत थे। लेकिन एक कमी है। कौन सी कमी सर? तुम्हें लोगों की कीमत, उनके पद और उपयोगिता से तय करने की आदत है। कमरे में सन्नाटा छा गया। आदित्य का चेहरा फिर गंभीर हो गया। अगर कल तुम्हारे सामने तुम्हारा अपना पिता सड़क पर गिरा मिले और उसके कपड़े पुराने हो तो क्या तुम पहले यह देखोगे कि वह कौन है या पहले उसे उठाओगे? सर मैं आदित्य की आंखें नीचे हो गई। उसके चेहरे पर शर्म साफ दिखाई देने लगी। आज सुबह तुम्हारे पास एक मौका था। तुमने इंसान नहीं देखा। तुमने सिर्फ एक अनजान बूढ़ा देखा। तुम इस पद के लिए योग्य नहीं हो। सर सिर्फ एक गलती की वजह से। यह सिर्फ एक गलती नहीं थी। यह उस सोच की झलक थी जो तुम अपने साथ लेकर चलते हो। जी सर। लेकिन जाने से पहले नेहा से माफी मांगो। नेहा मैंने तुम्हारा मजाक उड़ाया। तुम्हें कमजोर समझा। मुझे माफ कर दो। मैंने आपको उसी वक्त माफ कर दिया था। तुम नाराज नहीं हो। अगर मैं भी तुम्हें नीचा दिखाऊंगी तो फिर हम दोनों में फर्क क्या रहेगा? आदित्य की आंखें नम हो गई। देवेंद्र ने गर्व से नेहा की तरफ देखा। हम यही फर्क है। नेहा तुम्हें पता है नेतृत्व क्या होता है? शायद लोगों को आदेश देने के बजाय उनके साथ खड़ा होना। बिल्कुल। तुमने मेरे लिए अपना इंटरव्यू छोड़ा। अपने पैसे से पट्टी खरीदी। चप्पल टूटने के लिए नंगे पैर दौड़ी। फिर भी किसी से शिकायत नहीं की। नेहा की आंखें भर आई। तुम्हारे रिज्यूमे में शायद बहुत बड़ी-बड़ी कंपनियों के नाम नहीं है। लेकिन आज मैंने तुम्हारे अंदर ऐसी क्षमता देखी है जो किसी किताब में नहीं सिखाई जाती। सर, तो क्या आप इन्हें मैनेजर की पोस्ट देंगे? नहीं। सभी चौंक गए। नेहा भी हैरान रह गई। देवेंद्र मुस्कुराए। मैं इन्हें सिर्फ मैनेजर की नौकरी नहीं दे रहा। मैं इन्हें अपनी नई मैनेजमेंट टीम में शामिल कर रहा हूं। शुरुआत एक विशेष प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी से होगी। कमरे में तालियां गूंज उठी। नेहा की आंखों से आंसू निकल आए। सर, मैं पूरी मेहनत करूंगी। मुझे तुम्हारी मेहनत पर भरोसा है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना। किसी पद को बड़ा मत समझना। उस पद पर बैठकर तुम कितने लोगों की जिंदगी आसान करती हो, यही तुम्हारी असली सफलता होगी। नेहा ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया। आज इस चश्मे ने मुझे एक बात साफ दिखाई है। सभी उनकी तरफ देखने लगे। इंसान की पहचान उसके कपड़ों, पैसों या पद से नहीं होती। असली पहचान तब होती है जब उसे कोई देख नहीं रहा होता और फिर भी वह सही काम करता है। बोर्ड रूम तालियों से गूंज उठा।
नेहा की नजर अपनी टूटी चप्पल पर गई। उसे सुबह की सारी बातें याद आ गई। उसे लगा था कि आज उसने अपनी नौकरी खो दी। लेकिन उसे क्या पता था कि जिस रास्ते पर उसकी चप्पल टूटी थी, उसी रास्ते ने उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दरवाजा खोल दिया। और उस दिन अद्वैत इंडस्ट्रीज में सिर्फ एक मैनेजर नहीं चुना गया था। एक ऐसी सोच चुनी गई थी जिसमें काबिलियत के साथ इंसानियत भी जरूरी थी। क्योंकि डिग्री आपको किसी पद तक पहुंचा सकती है। अनुभव आपको काम सिखाता है। पैसा आपको सुविधाएं दे सकता है। लेकिन किसी जरूरतमंद के लिए रुक जाना। किसी कमजोर का हाथ पकड़ लेना। और बिना किसी स्वार्थ के सही काम करना यही तय करता है कि आप सिर्फ सफल हैं या सच में एक अच्छे इंसान भी हैं।
नेहा का दिन अब एक सपने जैसा लग रहा था। वह लॉबी से बाहर निकलते ही सुबह की यादें आ गईं। सड़क पर टूटा चश्मा, बुजुर्ग की चप्पल फंसती हुई, और वह दौड़ती हुई। लेकिन अब सब कुछ याद आ रहा था कि वह नंगे पैर दौड़कर पट्टी खरीदी, बुजुर्ग को सहारा दिया और अंत में उसकी आंखों में संतोष देखा। देवेंद्र ने खुद फोन करके उसे ऑफिस में बुलाया। नेहा आई तो देवेंद्र मुस्कुराते हुए बोले, “नेहा, आज का इंटरव्यू सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं था। यह तुम्हारे लिए एक नई शुरुआत थी। तुम्हारी मेहनत और दिल की गर्मजोशी ने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया।” नेहा ने सिर झुकाकर कहा, “सर, मैं सिर्फ वही कर रही थी जो अच्छा लगता था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि आप मुझे पहचान लेंगे।” देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले, “लेकिन नेहा, आज से तुम्हारी जिंदगी बदल गई है। मैंने तुम्हें अपनी नई टीम में शामिल किया है। तुम विशेष प्रोजेक्ट पर काम करोगी। लेकिन याद रखना, सफलता सिर्फ पद से नहीं आती। यह दिल से आती है।”
लगभग एक महीने बाद नेहा अपनी नई टीम के साथ प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी। वह सुबह आठ बजे ऑफिस पहुंचती, शाम सात बजे तक रिपोर्ट्स तैयार करती। देवेंद्र ने खुद कहा, “नेहा, तुम्हारे बिना यह प्रोजेक्ट अधूरा रह जाता। तुम्हारी टीम को बताओ कि जरूरतमंदों की मदद करना भी एक काम है।” नेहा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सर, मैंने सुबह देखा कि एक गरीब बच्ची स्कूल जाते वक्त चप्पल फंस गई। मैंने उसे पट्टी बांधी और घर तक पहुंचाया। आज से मैं हर ऐसे मौके पर मदद करूंगी।” देवेंद्र के चेहरे पर गर्व की मुस्कान थी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। नेहा की जिंदगी में अब छोटी-छोटी घटनाएं आने लगीं जो उसे याद दिलाती थीं कि असली सफलता क्या है। एक दिन ऑफिस के बाहर एक बच्चा भूख से रो रहा था। नेहा ने अपने बैग से सैंडविच निकाला और बच्चे को दिया। उसी दिन वह आदित्य से मिली। आदित्य ने आंखें नम करके कहा, “नेहा, सुबह मैंने गलती की थी। लेकिन तुमने मुझे सिखा दिया कि इंसानियत कितनी जरूरी है। तुम्हारे लिए धन्यवाद।” नेहा ने उसे गले लगाया और बोली, “आदित्य, अब हम साथ मिलकर काम करेंगे। लेकिन याद रखो, मदद बिना किसी सोचे-समझे होनी चाहिए।”
देवेंद्र राठौर ने नेहा को आधिकारिक रूप से ऑफिशियल बनाया। उनके ऑफिस के लॉग में लिखा गया – “नेहा वर्मा, इंसानियत की मिसाल।” वह अब हर हफ्ते किसी जरूरतमंद की मदद करती। एक दिन एक बुजुर्ग ने उनके घर आकर कहा, “मैडम, आपने मेरी मदद की थी। अब मैं भी आपकी मदद करूंगा।” नेहा हंस पड़ी और बोली, “नाना जी, आपकी मदद करने की जरूरत नहीं। मैं बस वही करती हूं जो आपने मुझे सिखाया था।”
धीरे-धीरे नेहा की कहानी पूरे शहर में फैल गई। लोग कहते, “वही लड़की जो नंगे पैर दौड़ी थी, आज बड़ी कंपनी की मैनेजर बन गई।” लेकिन नेहा कभी घमंड नहीं करती। वह रोज ऑफिस आकर कहती, “सर, आज का दिन अच्छा रहा। मैंने तीन गरीबों की मदद की।” देवेंद्र हमेशा जवाब देते, “नेहा, तुम्हारी ये छोटी-छोटी मददें ही मेरी कंपनी की असली ताकत हैं।”
एक साल बाद नेहा ने अपनी पहली बेटी को जन्म दिया। जब बच्ची जन्म ले रही थी, नेहा ने देवेंद्र को फोन किया, “सर, मेरा बच्चा जन्म ले रहा है। लेकिन मैं चिंतित हूं। आपकी टीम को मैं कैसे संभालूंगी?” देवेंद्र ने तुरंत कहा, “नेहा, तुम्हारा बच्चा हमेशा प्राथमिकता होगा। हमारी टीम तुम्हारी देखभाल करेगी। लेकिन याद रखना, तुम्हारी जिंदगी अब सिर्फ नौकरी की नहीं, परिवार की भी है। तुमने मुझे सिखाया कि सफलता परिवार और दिल से आती है।”
यहां तक कहानी नहीं रुकी। नेहा अब समाज सेवा भी करती थी। वह हर हफ्ते एक स्कूल में जाती और गरीब बच्चों को गणित पढ़ाती। एक दिन उसने कहा, “मेरी मां ने मुझे यही सिखाया था कि किसी की मदद करना सबसे बड़ा धर्म है। आज मैं भी वही कर रही हूं।” देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा और बोले, “नेहा, तुम मेरी सबसे अच्छी टीम लीडर बन गई हो। लेकिन असली नेता तुम हो, क्योंकि तुमने साबित किया कि इंसानियता से पद बड़ा होता है।”
नेहा की कहानी अब सिर्फ एक इंटरव्यू की नहीं, बल्कि एक जीवन की है। वह हर सुबह उठकर सोचती, “भगवान ने मुझे एक मौका दिया। मैं उसे अच्छा काम करने में लगा रही हूं।” और हर शाम, जब वह घर लौटती, वह टूटी चप्पल की याद में मुस्कुराती। क्योंकि वह जानती थी कि उस टूटी चप्पल ने उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा दरवाजा खोला था।
देवेंद्र राठौर अब भी ऑफिस में बैठकर सोचते, कि उन्होंने सुबह चश्मा टूटने के नाटक क्यों किया। लेकिन अब उन्हें पता था – असली सफलता इंसानियता में है। और नेहा ने उसे सिखा दिया।