बेटे-बहू ने बूढ़ी माँ को पहाड़ से धक्का दिया… लेकिन फिर जो हुआ… भगवान का न्याय देखिए
बेटे-बहू ने बूढ़ी माँ को पहाड़ से धक्का दिया… लेकिन फिर जो हुआ… भगवान का न्याय देखिए
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जिस मां को बेटे ने बोझ समझा, वही उसकी सबसे बड़ी सच्चाई बनकर लौट आई

उत्तराखंड की पहाड़ियों के बीच बसा एक छोटा-सा कस्बा था—देवगढ़। चारों तरफ ऊंचे पहाड़, देवदार के घने पेड़, सुबह के समय घाटियों में उतरती सफेद धुंध और शाम होते ही ठंडी हवा का ऐसा झोंका, जो हड्डियों तक को कंपा देता था।
उसी कस्बे के पुराने हिस्से में एक बहुत बड़ी हवेली थी। कभी उस हवेली में हर शाम लोगों की आवाजाही रहती थी। आंगन में बच्चों की हंसी गूंजती थी और रसोई से तरह-तरह के पकवानों की खुशबू आती थी। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से हवेली जैसे अपने ही सन्नाटे में डूब गई थी।
उस हवेली में रहती थी सत्तर साल की शांति देवी।
चेहरे पर झुर्रियां थीं, बाल पूरी तरह सफेद हो चुके थे और आंखों की रोशनी भी पहले जैसी नहीं रही थी। फिर भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी। जैसे जिंदगी ने उनसे बहुत कुछ छीना हो, लेकिन उनकी उम्मीद अभी भी बाकी हो।
शांति देवी का एक ही बेटा था—राघव।
उन्होंने राघव को अकेले पाला था।
जब राघव सिर्फ छह साल का था, उसके पिता की एक दुर्घटना में मौत हो गई थी। उस समय शांति देवी के सामने दो रास्ते थे—या तो मायके लौट जाएं और बेटे को रिश्तेदारों के भरोसे छोड़ दें, या खुद संघर्ष करके उसे बड़ा करें।
उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
उन्होंने लोगों के घरों में खाना बनाया। खेतों में मजदूरी की। सर्दियों में ऊन काता। कभी-कभी खुद भूखी सोईं, लेकिन राघव को भूखा नहीं सोने दिया।
राघव बड़ा हुआ। पढ़ाई की। शहर गया। नौकरी मिली। फिर उसकी शादी सीमा नाम की लड़की से हुई।
शादी के बाद कुछ वर्षों तक सब ठीक रहा।
लेकिन धीरे-धीरे सीमा की नजर उस हवेली पर टिक गई।
एक शाम सीमा ने अपने पति से कहा, “राघव, तुम्हारी मां की उम्र अब बहुत हो गई है। आखिर यह हवेली किसके काम आएगी? इतनी बड़ी जगह में हम तीन लोग रह रहे हैं।”
राघव चुप रहा।
सीमा ने फिर कहा, “अगर इसे बेच दें तो शहर में अच्छा फ्लैट ले सकते हैं। कुछ पैसा बिजनेस में लगा देंगे। जिंदगी बदल जाएगी।”
राघव ने उस दिन कोई जवाब नहीं दिया।
लेकिन उसके मन में पहली बार वह विचार पैदा हो चुका था।
कुछ महीनों बाद शांति देवी की तबीयत खराब रहने लगी। उन्हें दवाइयों की जरूरत पड़ती। डॉक्टर के पास जाना पड़ता।
सीमा को यह सब खर्चा लगता था।
एक दिन शांति देवी ने कांपती आवाज में कहा, “बहू, अगर बहुत परेशानी है तो मेरी दवा इस महीने मत लाना। मैं घरेलू नुस्खे से ठीक हो जाऊंगी।”
सीमा ने तीखे स्वर में जवाब दिया, “आपको पता भी है आपकी दवाइयां कितनी महंगी हैं?”
शांति देवी चुप हो गईं।
कुछ देर बाद बोलीं, “मुझे पता है बेटी। इसलिए तो कह रही हूं…”
सीमा हंस पड़ी।
“बेटी मत कहिए मुझे। मैं आपकी बेटी नहीं हूं।”
शांति देवी के चेहरे पर दर्द उतर आया।
उन्होंने धीरे से कहा, “मैंने तो तुम्हें हमेशा बेटी ही समझा।”
सीमा वहां से चली गई।
दरवाजे के पीछे खड़े राघव ने यह सब सुन लिया था।
लेकिन उसने अपनी पत्नी को रोकने की कोशिश नहीं की।
यही उसकी पहली बड़ी गलती थी।
दिन बीतते गए।
एक दिन राघव ने अपनी मां के कमरे में जाकर कहा, “मां, आपको एक बात बतानी है।”
शांति देवी मुस्कुराईं।
“क्या हुआ बेटा?”
“मैं सोच रहा हूं कि यह हवेली बेच दूं।”
शांति देवी कुछ पल चुप रहीं।
“बेच दोगे?”
“हां।”
“लेकिन बेटा, यह घर तुम्हारे पिता ने बनवाया था।”
“मुझे पता है।”
“और तुम्हारे बचपन की सारी यादें…”
राघव ने बीच में ही बात काट दी।
“मां, यादों से जिंदगी नहीं चलती।”
शांति देवी ने बेटे को देखा।
उन्हें पहली बार लगा कि जिस बच्चे को उन्होंने अपनी गोद में लेकर बड़ा किया था, वह उनके सामने तो खड़ा है, लेकिन शायद बहुत दूर जा चुका है।
उन्होंने पूछा, “तुम्हें पैसों की जरूरत है?”
राघव ने नजरें चुरा लीं।
“हां।”
“कितने?”
“बहुत।”
“मैंने तुम्हारे लिए कभी कुछ बचाकर नहीं रखा, बेटा। यह घर ही है।”
राघव ने कहा, “इसीलिए तो बेच रहा हूं।”
शांति देवी ने लंबी सांस ली।
“ठीक है।”
राघव चौंका।
“आपको बुरा नहीं लगा?”
शांति देवी मुस्कुराईं।
“घर ईंट-पत्थर से बनता है बेटा। अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारी जिंदगी इससे बेहतर हो जाएगी, तो बेच दो।”
लेकिन उन्हें पता नहीं था कि राघव की परेशानी सिर्फ पैसों की नहीं थी।
उसने कुछ महीने पहले एक व्यापार में बहुत बड़ा कर्ज लिया था। व्यापार बुरी तरह असफल हो गया था। बैंक और साहूकार लगातार पैसा मांग रहे थे।
और सीमा ने उसे एक ही रास्ता बताया था।
“हवेली बेचो।”
लेकिन हवेली के कागज आसानी से नहीं मिल रहे थे।
राघव ने मां से कागज मांगे।
शांति देवी ने कहा, “कागज मेरे पुराने संदूक में हैं।”
संदूक खोला गया।
लेकिन उसमें हवेली की पूरी मिल्कियत का दस्तावेज नहीं था।
सिर्फ कुछ पुराने कागज थे।
राघव घबरा गया।
“बाकी कागज कहां हैं?”
शांति देवी ने कहा, “मुझे नहीं पता।”
“आपको पता नहीं?”
“नहीं बेटा।”
सीमा ने तुरंत कहा, “झूठ बोल रही हैं।”
शांति देवी ने हैरानी से बहू को देखा।
“मैं क्यों झूठ बोलूंगी?”
सीमा ने राघव की ओर देखा।
“क्योंकि इन्हें पता है कि अगर हवेली बिक गई तो इनके पास कुछ नहीं बचेगा।”
उस रात राघव सो नहीं पाया।
अगली सुबह उसने फिर मां से पूछा।
“मां, आखिरी बार पूछ रहा हूं। कागज कहां हैं?”
शांति देवी ने कहा, “मुझे सच में नहीं पता।”
राघव का गुस्सा बढ़ गया।
“आप मेरी मदद क्यों नहीं कर रही हैं?”
शांति देवी की आंखों में आंसू आ गए।
“मैं तुम्हारी मां हूं राघव। तुम्हारी दुश्मन नहीं।”
राघव ने कुछ नहीं कहा।
उस रात सीमा ने उसे एक ऐसी बात कही, जिसने राघव की इंसानियत की आखिरी दीवार भी कमजोर कर दी।
“अगर तुम्हारी मां नहीं रहेंगी, तो हवेली पर कोई दावा करने वाला नहीं होगा।”
राघव ने पत्नी की ओर देखा।
“तुम क्या कहना चाहती हो?”
सीमा ने धीमे स्वर में कहा, “मैं कुछ नहीं कह रही। बस इतना कह रही हूं कि जिंदगी में कुछ फैसले बहुत कठोर होते हैं।”
राघव ने सिर झुका लिया।
अगले दिन उसने मां से कहा, “मां, आपको एक जगह ले जाना है।”
“कहां?”
“एक मंदिर।”
शांति देवी की आंखें चमक उठीं।
“सच?”
“हां।”
“बहुत दिनों से भगवान के दर्शन करने की इच्छा थी।”
राघव ने नजरें झुका लीं।
उस शाम कार हवेली से निकल गई।
शांति देवी पीछे की सीट पर बैठी थीं।
उनके हाथ में छोटी-सी पूजा की थैली थी।
रास्ते भर वह बेटे से बातें करती रहीं।
“राघव, याद है जब तुम छोटे थे तो तुम्हें पहाड़ों में घूमना कितना पसंद था?”
राघव चुप रहा।
“तुम कहते थे कि बड़े होकर मुझे बहुत दूर घुमाने ले जाओगे।”
राघव ने कोई जवाब नहीं दिया।
कुछ देर बाद शांति देवी ने पूछा, “बेटा, तुम इतने चुप क्यों हो?”
“कुछ नहीं।”
कार शहर से दूर निकल चुकी थी।
सड़क संकरी होती जा रही थी।
आसपास कोई घर नहीं था।
अचानक कार एक पुराने पहाड़ी रास्ते पर रुक गई।
शांति देवी ने खिड़की से बाहर देखा।
“मंदिर कहां है?”
राघव ने कार बंद कर दी।
सीमा भी दूसरी कार से पीछे-पीछे वहां पहुंच चुकी थी।
शांति देवी के चेहरे पर चिंता आ गई।
“बेटा, हम यहां क्यों आए हैं?”
राघव ने दरवाजा खोला।
“नीचे उतरिए।”
“लेकिन मंदिर?”
“कोई मंदिर नहीं है।”
शांति देवी कुछ समझ नहीं पाईं।
राघव ने उनकी ओर देखा।
उसकी आंखों में वह बच्चा नहीं था जिसे शांति देवी ने अपनी गोद में खिलाया था।
“मां, मुझे माफ कर देना।”
शांति देवी का दिल बैठ गया।
“क्या हुआ बेटा?”
सीमा ने पीछे से कहा, “बहुत सवाल मत पूछिए।”
शांति देवी ने दोनों को देखा।
फिर बोलीं, “तुम दोनों मुझसे क्या चाहते हो?”
राघव की आवाज कांप रही थी।
“हवेली के कागज।”
“मेरे पास नहीं हैं।”
“झूठ!”
“नहीं बेटा।”
“कहां छिपाए हैं?”
शांति देवी रो पड़ीं।
“मुझे सच में नहीं पता।”
सीमा ने राघव से कहा, “समय बर्बाद मत करो।”
शांति देवी ने हाथ जोड़ दिए।
“राघव, मैं तुम्हारी मां हूं।”
राघव ने आंखें बंद कर लीं।
लेकिन उसने जो करने का फैसला किया था, उससे पीछे नहीं हटा।
उसने मां को सड़क से नीचे एक सुरक्षित जगह पर बैठने को कहा और बोला, “कुछ देर यहां रहो।”
शांति देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे अकेला मत छोड़ना।”
राघव ने हाथ छुड़ा लिया।
“मैं वापस आऊंगा।”
वह झूठ बोल रहा था।
कार चली गई।
शांति देवी कुछ देर तक उस सड़क को देखती रहीं।
फिर धीरे-धीरे उन्हें सब समझ आने लगा।
उनका अपना बेटा उन्हें छोड़कर जा चुका था।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई थी।
किस्मत ने अभी उनके लिए एक और पन्ना बचाकर रखा था।
शांति देवी रात होने तक वहीं बैठी रहीं।
ठंड बढ़ती गई।
उनके पास न खाना था, न पानी।
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
उन्होंने धीरे-धीरे उठकर सड़क की ओर चलने की कोशिश की।
कुछ दूर जाते ही उनका पैर फिसला और वह ढलान पर गिर पड़ीं।
उनका शरीर कई मीटर नीचे जाकर एक पेड़ की जड़ में अटक गया।
उनके सिर पर चोट लगी।
वह बेहोश हो गईं।
अगली सुबह एक स्कूल शिक्षक, देवेंद्र, उसी रास्ते से गुजर रहा था।
उसने नीचे किसी को देखा।
वह तुरंत नीचे उतरा।
“मांजी!”
शांति देवी बेहोश थीं।
देवेंद्र ने गांव वालों को बुलाया।
कुछ ही देर में लोग रस्सियों की मदद से उन्हें ऊपर लाए।
उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया।
डॉक्टर ने कहा, “हालत गंभीर है, लेकिन उम्मीद है।”
दो दिन तक शांति देवी बेहोश रहीं।
तीसरे दिन उनकी आंखें खुलीं।
उन्होंने सबसे पहले पूछा, “मेरा बेटा कहां है?”
देवेंद्र ने चुपचाप उनकी ओर देखा।
उसे सब समझ आ गया था।
“मांजी, पहले आप ठीक हो जाइए।”
शांति देवी ने आंखें बंद कर लीं।
उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
लेकिन इस बार उन आंसुओं में केवल दुख नहीं था।
एक निर्णय भी था।
कुछ दिनों बाद जब उनकी हालत सुधरी तो देवेंद्र ने पूछा, “आपके परिवार को खबर कर दूं?”
शांति देवी ने शांत आवाज में कहा, “नहीं।”
“लेकिन आपका बेटा…”
“वह मेरा बेटा था।”
देवेंद्र ने उनकी ओर देखा।
शांति देवी बोलीं, “अब मैं उसे अपने फैसले से पहचानूंगी, रिश्ते से नहीं।”
अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शांति देवी गांव के एक छोटे-से कमरे में रहने लगीं।
लेकिन उनके मन में एक सवाल लगातार घूम रहा था।
हवेली के कागज आखिर कहां थे?
फिर उन्हें अचानक अपने पति की एक बात याद आई।
उनके पति ने कई साल पहले कहा था—
“अगर कभी ऐसा समय आए जब तुम्हें अपने ही लोगों से खतरा लगे, तो पुराने मंदिर के पीछे वाली जमीन के दस्तावेज संभालकर रखना।”
शांति देवी को लगा कि शायद वह कुछ भूल रही थीं।
वह अपने पुराने परिचित वकील हरिशंकर के पास पहुंचीं।
“हरिशंकर जी, मुझे एक काम करना है।”
वकील ने उन्हें पहचान लिया।
“बहनजी, इतने साल बाद?”
शांति देवी ने कहा, “मुझे हवेली के सारे पुराने रिकॉर्ड चाहिए।”
वकील ने अलमारी से फाइल निकाली।
कागजों को देखकर शांति देवी की आंखें फैल गईं।
हवेली केवल उनके नाम नहीं थी।
उसके साथ लगी लगभग आठ एकड़ जमीन भी उनके नाम थी।
और सबसे महत्वपूर्ण बात—उनके पति ने अपनी मृत्यु से पहले एक वसीयत बनाई थी।
उस वसीयत में लिखा था कि शांति देवी के जीवित रहते हवेली या जमीन को उनकी अनुमति के बिना कोई बेच नहीं सकता।
लेकिन राघव को यह जानकारी नहीं थी।
हरिशंकर ने कहा, “आप चाहें तो पुलिस में शिकायत कर सकती हैं।”
शांति देवी ने कुछ देर सोचा।
“अभी नहीं।”
“क्यों?”
“मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा खुद देखे कि लालच ने उसे कहां पहुंचा दिया।”
उधर राघव को यकीन था कि मां अब इस दुनिया में नहीं हैं।
उसने सीमा के साथ हवेली बेचने की तैयारी शुरू कर दी।
एक खरीदार मिल गया।
कागज तैयार किए जाने लगे।
सीमा ने नया घर भी देख लिया।
वह खुश थी।
“राघव, अब हमारी जिंदगी बदल जाएगी।”
राघव ने कहा, “हां।”
लेकिन उसी रात उसे एक फोन आया।
“राघव जी, आपकी मां की संपत्ति के संबंध में कुछ दस्तावेज मिले हैं। आपको वकील से संपर्क करना चाहिए।”
राघव घबरा गया।
“मेरी मां तो…”
वह रुक गया।
दूसरी तरफ से आवाज आई, “क्या?”
“कुछ नहीं।”
अगले दिन राघव वकील के पास गया।
वहां उसे पता चला कि हवेली बेचने के लिए मां की अनुमति जरूरी थी।
“लेकिन मेरी मां…”
वकील ने पूछा, “आपकी मां कहां हैं?”
राघव चुप रहा।
उसी समय बाहर एक कार आकर रुकी।
दरवाजा खुला।
सफेद साड़ी पहने एक वृद्ध महिला धीरे-धीरे बाहर उतरी।
उसके हाथ में लकड़ी की छड़ी थी।
राघव ने जैसे ही उसे देखा, उसके चेहरे का रंग उड़ गया।
वह शांति देवी थीं।
जिंदा।
राघव पीछे हट गया।
“मां…”
शांति देवी ने उसे देखा।
उनकी आंखों में आंसू नहीं थे।
सिर्फ एक गहरी शांति थी।
“क्यों राघव?”
राघव के होंठ कांपने लगे।
“मां, मैं…”
“मुझे वहां छोड़कर क्यों गए थे?”
राघव के पास कोई जवाब नहीं था।
सीमा भी वहां पहुंच गई।
वह शांति देवी को देखकर घबरा गई।
“यह… यह कैसे संभव है?”
शांति देवी ने कहा, “जिस मां को तुमने कमजोर समझा था, उसकी सांसों को भगवान ने अभी रोका नहीं था।”
राघव घुटनों पर बैठ गया।
“मां, मुझे माफ कर दो।”
शांति देवी ने कहा, “माफी मांगना आसान है।”
“मैं बदल जाऊंगा।”
“तुम पहले ही बदल चुके हो।”
“मां…”
“नहीं राघव। आज मुझे मां मत कहो।”
राघव की आंखों से आंसू निकलने लगे।
शांति देवी ने वकील की ओर देखा।
“उन्हें सारे दस्तावेज दिखा दीजिए।”
वकील ने फाइल खोली।
राघव ने कागज पढ़े।
हवेली, जमीन और उससे जुड़ी सारी संपत्ति शांति देवी के नाम थी।
राघव की सारी योजनाएं एक पल में खत्म हो गईं।
लेकिन शांति देवी ने वहीं एक और घोषणा की।
“मैंने फैसला कर लिया है।”
राघव ने उम्मीद से उनकी ओर देखा।
“क्या आप मुझे हवेली दे देंगी?”
शांति देवी ने सिर हिलाया।
“नहीं।”
राघव की आंखें झुक गईं।
“फिर?”
“यह हवेली अब तुम्हारी नहीं होगी।”
कुछ पल बाद उन्होंने कहा,
“लेकिन मेरी भी नहीं होगी।”
राघव ने आश्चर्य से देखा।
“मैंने तय किया है कि हवेली को वृद्धाश्रम बनाया जाएगा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“और जमीन का एक हिस्सा गांव के गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए इस्तेमाल होगा।”
वकील मुस्कुराया।
शांति देवी ने कहा, “मैंने जिंदगी भर दूसरों के लिए जिया। अब बाकी जिंदगी उन लोगों के लिए जीऊंगी जिन्हें अपने बच्चोंैं ने छोड़ दिया है।”
राघव रोने लगा।
“मां, मुझे एक मौका दे दो।”
शांति देवी ने उसकी ओर देखा।
“मौका जिंदगी देती है। लेकिन भरोसा इंसान खुद कमाता है।”
राघव ने सिर झुका लिया।
“मैं क्या करूं?”
“पहले अपने किए हुए अपराध की जिम्मेदारी स्वीकार करो।”
राघव ने पुलिस के सामने अपना बयान दिया।
उसने सब सच बता दिया।
सीमा ने भी पहले झूठ बोलने की कोशिश की, लेकिन बाद में उसने भी सच्चाई स्वीकार कर ली।
कानून ने अपना काम किया।
दोनों को अपने किए की सजा मिली।
लेकिन शांति देवी ने उनके खिलाफ निजी बदले की कोई मांग नहीं की।
वह अक्सर कहतीं,
“मुझे उनका जीवन बर्बाद नहीं करना। मुझे बस यह सुनिश्चित करना है कि उन्होंने जो किया, वह किसी और मां के साथ न हो।”
कई महीने बीत गए।
पुरानी हवेली बदलने लगी।
जहां कभी लालच की बातें होती थीं, वहां अब बुजुर्गों की हंसी सुनाई देने लगी।
आंगन में पेड़ लगाए गए।
एक कमरे को पुस्तकालय बनाया गया।
रसोई में रोज खाना बनता।
शांति देवी सुबह उठकर सबसे पहले आंगन में बैठतीं और चाय पीतीं।
एक दिन एक वृद्ध महिला ने उनका हाथ पकड़कर कहा,
“बहन, आपने हमें घर दे दिया।”
शांति देवी मुस्कुराईं।
“नहीं। मैंने सिर्फ एक खाली घर को फिर से घर बना दिया।”
कुछ समय बाद राघव जेल से बाहर आया।
उसके पास न हवेली थी, न पैसा, न वह सम्मान जिसके लिए उसने अपनी मां तक को छोड़ दिया था।
वह वृद्धाश्रम के बाहर खड़ा रहा।
शांति देवी ने उसे देखा।
राघव ने अंदर आने की अनुमति मांगी।
“मां, क्या मैं अंदर आ सकता हूं?”
शांति देवी कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं,
“यह घर उन लोगों का है जिन्हें अपनों ने छोड़ दिया है।”
राघव ने सिर झुका लिया।
“तो क्या मेरे लिए कोई जगह नहीं?”
शांति देवी ने कहा,
“जगह है।”
राघव ने उम्मीद से उनकी ओर देखा।
“लेकिन बेटे की तरह नहीं।”
राघव की आंखें भर आईं।
शांति देवी ने आगे कहा,
“अगर सच में बदल गए हो, तो यहां सेवा कर सकते हो।”
राघव ने बिना कुछ कहे सिर झुका दिया।
उस दिन से उसने वृद्धाश्रम में काम करना शुरू कर दिया।
वह बुजुर्गों के लिए दवाइयां लाता, खाना परोसता और रात में जरूरत पड़ने पर उनकी देखभाल करता।
कई महीने बाद शांति देवी ने उसे पहली बार अपने पास बुलाया।
“राघव।”
“जी मां।”
शांति देवी ने उसकी ओर देखा।
“आज तुमने पहली बार यह शब्द सही अर्थ में बोला है।”
राघव रो पड़ा।
“क्या आप मुझे माफ कर सकती हैं?”
शांति देवी ने कहा,
“मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ कर दिया था।”
राघव ने हैरानी से पूछा,
“फिर आपने मुझे वापस क्यों नहीं बुलाया?”
शांति देवी ने कहा,
“क्योंकि माफी का मतलब यह नहीं कि इंसान को उसके कर्मों से बचा लिया जाए। कभी-कभी सजा भी इंसान को बदलने का रास्ता दिखाती है।”
राघव ने मां के पैर छू लिए।
शांति देवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
लेकिन इस बार वह हाथ उस बेटे के सिर पर था जिसने अपना सबक सीख लिया था।
उस शाम हवेली के आंगन में बहुत से बच्चे खेल रहे थे।
कुछ बुजुर्ग उन्हें देखकर मुस्कुरा रहे थे।
शांति देवी बराम अपना घर खोया नहीं था। आपने तो मुझे बहुत बड़ा भूखा रहकर खिलाया हो, उसे उम्र के आखिरी पड़ाव पर बोझ समझना केवल एक इंसान को कुछ समय के लिए जीत का भ्रम दे सकता है, लेकिन वह कभी सच्ची शदे में बैठी थीं।
सूरज धीरे-धीरे पहाड़ियों के पीछे उतर रहा था।
देवदार के पेड़ों से आती हवा उनके चेहरे को छू रही थी।
उन्होंने आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा,
“भगवान, मैंने अपना घर खोया नहीं था। आपने तो मुझे बहुत बड़ा परिवार दे दिया।”
उनकी आंखों में इस बार आंसू थे।
लेकिन वे दुख के आंसू नहीं थे।
वे संतोष के आंसू थे।
इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है कि माता-पिता की कीमत उनकी संपत्ति से नहीं, उनके त्याग से तय होती है।
जिस मां ने अपने बच्चे को भूखा रहकर खिलाया हो, उसे उम्र के आखिरी पड़ाव पर बोझ समझना केवल एक इंसान के साथ अन्याय नहीं, बल्कि अपने ही अतीत से विश्वासघात है।
लालच इंसान को कुछ समय के लिए जीत का भ्रम दे सकता है, लेकिन वह कभी सच्ची शांति नहीं दे सकता।
राघव ने हवेली पाने के लिए अपनी मां को खोना चाहा था।
लेकिन अंत में उसने हवेली भी खो दी और अपनी मां का विश्वास भी।
और शांति देवी?
उन्होंने अपना घर किसी एक बेटे के नाम नहीं किया।
उन्होंने उसे उन तमाम लोगों के नाम कर दिया जिन्हें जीवन ने अकेला कर दिया था।
क्योंकि कभी-कभी भगवान हमें वह नहीं देते जो हम चाहते हैं।
वह हमें उससे कहीं बड़ा देते हैं जिसकी हमें जरूरत होती है।
और शायद इसी का नाम न्याय है।
देर हो सकती है।
रास्ता लंबा हो सकता है।
लेकिन सच्चाई की सांस बहुत लंबी होती है।
और जब सच्चाई लौटकर आती है, तो झूठ के पास छिपने के लिए कोई जगह नहीं बचती।
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