PART 2 होली के दिन बेटी ने माता पिता के साथ कर दिया कारनामा/पुलिस के भी होश उड़ गए/
होली के दिन बेटी ने माता-पिता के साथ किया खौफ़नाक कांड (भाग 2 – अंतिम भाग): पुलिस की तफ़तीश, ज़मींदारों की गिरफ़्तारी और न्याय का अंतिम फ़ैसला
भाग 1 में आपने देखा कि किस तरह श/राब की लत और पैसों के अंधे लालच में आकर माता-पिता (लखन सिंह और सुंदरी देवी) ने अपनी ही 14 साल की मासूम बेटी अंजलि का सौदा ज़मींदार नसीब सिंह और चेतन के साथ कर दिया। आहत और आक्रोशित होकर अंजलि ने होली की रात दराँ/ती से अपने माता-पिता का गला रें/तकर उनकी ह/त्या कर दी और ताऊ के ज़रिए पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
भाग 2 (अंतिम भाग) में पढ़ें थाने की हवालात में अंजलि का सनसनीखेज बयान, हैवान ज़मींदारों पर पुलिस का शिकंजा, अदालत की सुनवाई और इस दर्दनाक दास्तान का स्थायी सामाजिक संदेश।
1. थाने की हवालात में अंजलि की आपबीती और पुलिस अफ़सरों की स्तब्धता
मेरठ के संबंधित थाने की हवालात में जब महिला पुलिस अधिकारियों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों (SSP) की टीम ने 14 वर्षीय अंजलि से पूछताछ की, तो अंजलि के चेहरे पर न तो कोई पछतावा था और न ही कोई ख़ौ/फ़।
अंजलि ने पुलिस के सामने दिए अपने बयान में कहा:
“साहब, जिन्हें भगवान का दर्जा दिया जाता है, वही मेरे माँ-बाप मेरी अस्मत के सौदेबाज़ बन चुके थे। अगर मैं उस रात उन्हें न मा/रती, तो वे रोज़ रात मुझे उन हैवान ज़मींदारों के हवाले करते रहते। मैंने अपनी इज़्ज़त और स्वाभिमान बचाने के लिए वह दराँ/ती उठाई थी।”
अंजलि के इन शब्दों ने कड़ाके की ड्यूटी करने वाले पुलिस अफ़सरों के भी रोंगटे खड़े कर दिए। फॉरेंसिक टीम ने मौके से ख़ू/न से सनी दराँ/ती, बिस्तर के ख़ू/न आलूदा साक्ष्य और श/व को सील करके पो/स्टमार्टम रिपोर्ट के लिए भेज दिया।
2. हैवान ज़मींदारों पर पुलिस का शिकंजा और पो/क्सो (POCSO) एक्ट
अंजलि के बयान के आधार पर पुलिस ने मामले का दायरा बढ़ाते हुए तुरंत दो मुख्य आरोपियों—ज़मींदार नसीब सिंह और चेतन ज़मींदार की गिर/फ़्तारी के लिए दबिश देनी शुरू कर दी।
- फरार होने की कोशिश: वारदात की खबर फैलते ही नसीब सिंह और चेतन गाँव छोड़कर भागने की फ़िराक में थे। लेकिन पुलिस की स्वाट (SWAT) और सर्विलांस टीम ने घेराबंदी करके दोनों ज़मींदारों को मेरठ-मुज़फ़्फ़रनगर हाईवे के पास से धर दबोचा।
- कड़ी धाराएँ: पुलिस ने दोनों ज़मींदारों के खिलाफ पो/क्सो एक्ट (POCSO Act), मानव तस्करी (Human Trafficking), और नाबालिग के साथ ब/लात्कार व शो/षण की संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।
जब पुलिस दोनों ज़मींदारों को हथकड़ी लगाकर गाँव से ले जा रही थी, तो गाँव वालों ने उन पर थू-थू की और पत्थरबाजी करने की कोशिश की।
3. ताऊ-ताई का पश्चाताप और खासपुर गाँव में आक्रोश
इस दोहरे ह/त्याकांड और घिनौने सौदेबाज़ी के खुलासे के बाद पूरे खासपुर गाँव में भूचाल आ गया।
- ताऊ का पछतावा: अंजलि के ताऊ राजेश और ताई मीनाक्षी रो-रोकर अपनी गलती मान रहे थे। उन्होंने स्वीकार किया कि जब अंजलि रोते हुए उनके पास मदद मांगने आई थी, तब अगर उन्होंने पुलिस को खबर दी होती या अंजलि को अपने घर में पनाह दी होती, तो आज यह खौ/फ़नाक महा-संहार न हुआ होता।
- गाँव की महापंचायत: गाँव के बुजुर्गों और युवाओं ने मिलकर एक आपातकालीन पंचायत बुलाई। पंचायत में सर्वसम्मति से फ़ैसला लिया गया कि गाँव में श/राब की अवैध बिक्री और देह-व्यापार/शो/षण जैसे अ/नैतिक कामों में लिप्त लोगों का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा।
4. बाल न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) में कानूनी जंग
चूँकि अंजलि की उम्र केवल 14 वर्ष (नाबालिग) थी, इसलिए इस केस को बाल न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) के समक्ष प्रस्तुत किया गया।
- बचाव पक्ष के वकील की दलील: अंजलि की तरफ से पैरवी कर रहे सरकारी मुफ़्त कानूनी सहायता (Legal Aid) के वकील ने अदालत में ‘आत्मरक्षा’ (Self Defense) और ‘गंभीर मानसिक आ/घात’ (Extreme Mental Trauma) का सिद्धांत रखा। वकील ने तर्क दिया:
“आरोपी एक 14 साल की बच्ची है, जिसका अपने ही सगे माता-पिता द्वारा लगातार शारीरिक व मानसिक शो/षण कराया जा रहा था। बच्ची ने यह अ/पराध किसी आपराधिक मानसिकता से नहीं, बल्कि अपनी अस्मत और जीवन की रक्षा के लिए घोर आवेश व विवशता में किया है।”
- अभियोजन पक्ष (Prosecution): सरकारी वकील ने माना कि परिस्थितियाँ बेहद दुखद थीं, लेकिन दो जिंदगियों को दराँ/ती से काट डालना कानून हाथ में लेने जैसा गंभीर अ/पराध है।
5. अदालत का ऐतिहासिक फ़ैसला और अंजलि का भविष्य
मामले की गंभीरता, फॉरेंसिक साक्ष्यों, पो/स्टमार्टम रिपोर्ट और अंजलि के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण (Psychological Evaluation) के बाद अदालत ने अपना फ़ैसला सुनाया।
- ज़मींदारों को कठोर सजा: अदालत ने ज़मींदार नसीब सिंह और चेतन को नाबालिग से ब/लात्कार और मानव तस्करी के जुर्म में 20-20 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई।
- अंजलि का पुनर्वास: अंजलि की कम उम्र, उसके साथ हुए भयानक शो/षण और आत्मरक्षा की परिस्थितियों को देखते हुए बाल न्याय बोर्ड ने उसे बा/ल सुधार गृह (Juvenile Reformation Home) भेजने का आदेश दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि अंजलि को वहाँ मनोचिकित्सक (Psychiatrist) की देखरेख, परामर्श और आगे की पढ़ाई-लिखाई की पूरी सुविधा दी जाए।
6. महा-निष्कर्ष और समाज के लिए कड़वे सबक
मेरठ के खासपुर गाँव की यह दर्दनाक कहानी केवल एक क्राइम रिपोर्ट नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के लिए एक चेतावनी है:
- श/राब का भयानक रूप: श/राब की लत इंसान से उसकी सोचने-समझने की शक्ति, ज़मीर और नैतिकता छीन लेती है।
- चुप रहने की कीमत: अंजलि के ताऊ-ताई की बेरुखी और पड़ोसियों की चुप्पी ने एक मासूम को हत्या/रा बनने पर मजबूर कर दिया। अगर समय रहते जुल्म के खिलाफ आवाज उठाई जाए, तो ऐसी त्रासदी से बचा जा सकता है।
- बाल अधिकारों की रक्षा: बच्चों की सुरक्षा केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज और कानून का कर्तव्य है।