जिस घर में चोर चोरी करने गया फिर / ये कहानी बिहार की हैं
जिस घर में चोर चोरी करने गया फिर / ये कहानी बिहार की हैं
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जिस चोर को सब अपराधी समझते थे, उसी ने एक अकेली औरत की जिंदगी बदल दी
केरल के एक छोटे से गांव तनकपुर में रहने वाली पारुल देवी की जिंदगी बाहर से देखने में किसी रानी से कम नहीं थी।
65 साल की उम्र में भी पारुल एक मजबूत और आत्मनिर्भर महिला थीं। उनका जन्म एक बड़े जमींदार परिवार में हुआ था। उनके पास जमीन-जायदाद, पैसा और एक आलीशान बंगला था। गांव में उनका काफी सम्मान था।
लेकिन इतनी दौलत होने के बावजूद उनके जीवन में एक बहुत बड़ी कमी थी।

वह थी — अकेलापन।
कई साल पहले उनके पति का निधन हो चुका था। उनकी एक बेटी थी, जिसकी शादी बहुत पहले हो गई थी। बेटी अपने पति के साथ दूसरे शहर में रहती थी और कभी-कभी ही अपनी मां से मिलने आती थी।
जब बेटी आती भी थी तो कुछ दिन रुककर वापस चली जाती थी।
बड़ा घर था।
बहुत पैसा था।
हर सुविधा थी।
लेकिन उस बड़े घर में पारुल के साथ रहने वाला कोई नहीं था।
रात के समय जब पूरा गांव सो जाता, तब उस विशाल बंगले में सिर्फ पारुल की आवाज और दीवारों की खामोशी रह जाती।
लोग उन्हें देखकर कहते थे,
“इतनी संपत्ति होने के बाद भी पारुल अकेली जिंदगी जी रही हैं।”
लेकिन कोई नहीं समझता था कि इंसान को सिर्फ पैसा नहीं, एक साथी और अपनापन भी चाहिए होता है।
पारुल के पास सब कुछ था, लेकिन बात करने वाला कोई नहीं था।
उसी गांव के पास एक और गांव में विजय नाम का एक युवक रहता था।
विजय की उम्र लगभग 25-26 साल थी।
बचपन में ही उसके माता-पिता का निधन हो गया था। कोई परिवार नहीं था, कोई सहारा नहीं था।
वह अपने छोटे से घर में अकेला रहता था।
आर्थिक स्थिति खराब थी।
दिन में वह कभी-कभी छोटे-मोटे काम कर लेता था, लेकिन जब पैसों की जरूरत ज्यादा होती तो वह गलत रास्ते पर चला जाता।
विजय चोरी करता था।
वह रात के अंधेरे में अमीर घरों को निशाना बनाता और वहां से पैसे या कीमती सामान चुरा लेता।
लेकिन वह बेहद चालाक था।
आज तक पुलिस उसे पकड़ नहीं पाई थी।
वह हमेशा अकेले चोरी करता था और इस बात का ध्यान रखता था कि कोई उसका नाम तक न जान सके।
एक दिन विजय का एक दोस्त पुलिस के हाथ लग गया।
पुलिस ने उससे पूछताछ की।
डर और दबाव में आकर उसने अपना अपराध बचाने के लिए विजय का नाम बता दिया।
पुलिस ने विजय को पकड़ लिया।
विजय बार-बार कहता रहा,
“मैंने कुछ नहीं किया।”
लेकिन किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
उसे जेल भेज दिया गया।
कई महीनों तक विजय जेल में रहा।
वह सोचता रहता,
“जिस इंसान पर मैंने भरोसा किया, उसी ने मुझे धोखा दे दिया।”
जब वह जेल से बाहर आया तो उसकी जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी थी।
घर की हालत खराब थी।
कमाई का कोई साधन नहीं था।
घर में खाने तक की परेशानी थी।
विजय टूट गया।
उसने आसमान की तरफ देखकर सोचा,
“काश मेरे माता-पिता आज जिंदा होते।”
“काश मेरी पत्नी होती।”
“शायद मेरी जिंदगी इतनी अकेली नहीं होती।”
लेकिन उसके पास सिर्फ पछतावा था।
कुछ दिनों बाद विजय ने फिर चोरी करने का फैसला किया।
उसे लगा कि अगर वह गलत रास्ता नहीं अपनाएगा तो उसका घर कभी नहीं सुधरेगा।
वह रात में दूसरे गांवों में जाकर घरों की तलाश करने लगा।
एक दिन उसकी नजर पारुल के बड़े बंगले पर पड़ी।
बड़ा घर।
ऊंची दीवारें।
अच्छी सुरक्षा।
विजय ने सोचा,
“अगर इस घर में चोरी सफल हो गई तो मेरी जिंदगी बदल सकती है।”
उसने कई दिनों तक घर की निगरानी की।
फिर एक रात वह पूरी तैयारी के साथ पारुल के घर में घुस गया।
धीरे-धीरे चलते हुए वह उस कमरे तक पहुंच गया जहां पारुल सो रही थीं।
कमरे में हल्की रोशनी थी।
पारुल गहरी नींद में थीं।
विजय जैसे ही कमरे में पहुंचा, अचानक उसकी नजर पारुल पर पड़ी।
वह कुछ पल के लिए वहीं रुक गया।
वह चोरी करने आया था, लेकिन अब वह बस उन्हें देखता रह गया।
उसी समय अचानक पारुल की आंख खुल गई।
उन्होंने सामने एक अनजान आदमी को बैठे देखा तो वह डर गईं।
“कौन हो तुम?”
“मेरे कमरे में कैसे आए?”
विजय ने घबराते हुए अपना परिचय दिया।
उसने सच बता दिया कि वह चोरी करने आया था।
पारुल ने उसे ध्यान से देखा।
लेकिन उन्होंने शोर नहीं मचाया।
उन्होंने शांत आवाज में कहा,
“अगर तुम्हें चोरी करनी है तो कर लो।”
विजय हैरान रह गया।
“क्या?”
पारुल बोलीं,
“मेरे पास पैसा है।”
“मेरे पास सोना है।”
“जो चाहिए ले सकते हो।”
विजय को समझ नहीं आया कि यह महिला ऐसा क्यों कह रही है।
फिर पारुल ने अपनी जिंदगी की सच्चाई बताई।
उन्होंने कहा,
“मेरे पास सब कुछ है, लेकिन मेरे पास कोई अपना नहीं है।”
“मैं इस बड़े घर में अकेली रहती हूं।”
“मुझे किसी ऐसे इंसान की जरूरत है जिससे मैं बात कर सकूं।”
“जिसके साथ मैं अपने अकेलेपन को बांट सकूं।”
विजय यह सुनकर चुप हो गया।
जिस महिला के घर में वह चोरी करने आया था, वह खुद अपने जीवन की सबसे बड़ी कमी बता रही थी।
उसके मन में संघर्ष शुरू हो गया।
एक तरफ गरीबी थी।
दूसरी तरफ उसका जमीर।
वह सोचने लगा,
“मैं अभी जेल से बाहर आया हूं।”
“मेरे घर की हालत खराब है।”
“अगर मुझे यहां से पैसा मिल जाता है तो मेरा जीवन सुधर सकता है।”
आखिरकार उसने पारुल की बात स्वीकार कर ली।
उस रात के बाद विजय और पारुल के बीच एक अलग रिश्ता बन गया।
विजय जब भी आता, पारुल उसे पैसे और सहायता देतीं।
धीरे-धीरे विजय को भी पारुल की आदत हो गई।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि कोई उसकी चिंता करता है।
कोई उसे सिर्फ अपराधी नहीं समझता।
कुछ समय बाद पारुल ने विजय से कहा,
“तुम हर बार छुपकर क्यों आते हो?”
“क्यों न हम हमेशा के लिए साथ रहें?”
“क्यों न हम शादी कर लें?”
विजय चौंक गया।
उसने कहा,
“लेकिन लोग क्या कहेंगे?”
“समाज हमें स्वीकार नहीं करेगा।”
पारुल ने जवाब दिया,
“मुझे समाज की चिंता नहीं है।”
“मैंने पूरी जिंदगी लोगों के लिए जी है।”
“अब मैं अपने लिए जीना चाहती हूं।”
विजय ने बहुत सोचा।
उसके सामने दो रास्ते थे।
एक तरफ गरीबी और अकेलापन।
दूसरी तरफ एक ऐसा जीवन जहां उसे सहारा मिल सकता था।
आखिरकार उसने शादी के लिए हामी भर दी।
अगली सुबह पारुल उसे मंदिर लेकर गईं।
वहां भगवान को साक्षी मानकर दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाई और पति-पत्नी बन गए।
जब पारुल विजय को अपने बंगले में लेकर आईं तो पूरे गांव में चर्चा शुरू हो गई।
लोग तरह-तरह की बातें करने लगे।
कोई कहता,
“इतनी उम्र में यह क्या कर रही है?”
कोई कहता,
“उस लड़के ने पैसे के लिए शादी की है।”
लेकिन पारुल ने किसी की परवाह नहीं की।
उन्होंने विजय का हाथ पकड़ा और कहा,
“मेरी जिंदगी है।”
“मैं अपना फैसला खुद करूंगी।”
धीरे-धीरे समय बीतने लगा।
शुरुआत में समाज ने विरोध किया।
लेकिन जब लोगों ने देखा कि विजय सच में पारुल का सम्मान करता है और दोनों साथ खुश हैं, तो धीरे-धीरे लोगों की सोच बदलने लगी।
इस कहानी से एक बात समझ आती है कि इंसान की जिंदगी सिर्फ उम्र, पैसा या समाज के नियमों से तय नहीं होती।
कभी-कभी दो अकेले लोग एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं।
लेकिन जीवन में लिए गए हर फैसले के पीछे सोच और जिम्मेदारी जरूरी होती है।
क्योंकि असली रिश्ता वही होता है जहां स्वार्थ नहीं, बल्कि सम्मान और विश्वास होता है।
समाप्त।
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