PART 2 4 साल बाद जब दामाद सास को देखने घर आया फिर – News

PART 2 4 साल बाद जब दामाद सास को देखने घर आया फिर

PART 2 4 साल बाद जब दामाद सास को देखने घर आया फिर

4 साल बाद जब दामाद सास के घर आया – भाग 2

घटना के बाद का सन्नाटा और पश्चाताप

कमला के घर से लौटने के बाद मोहन और उसकी पत्नी (सुनीता) के जीवन में एक गहरा सन्नाटा छा गया था। ट्रेन के पूरे सफ़र में दोनों के बीच एक भी शब्द की बात नहीं हुई। मोहन का सिर शर्मिंदगी से झुका हुआ था, जबकि सुनीता की आँखों में अपनी ही माँ और पति द्वारा दिए गए धोखे का दर्द साफ़ छलक रहा था।

घर पहुँचने पर मोहन के माता-पिता ने बड़ी आत्मीयता से उनका स्वागत किया। लेकिन उन्हें इस बात का ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि अरवल वाले घर में क्या घटित हो चुका था।

मोहन अपने कमरे में अकेला बैठ कर रोता रहता। उसे अपनी उस भूल पर बेहद पछतावा हो रहा था। उसने सोचा कि सासू माँ की लाचारी और अपने मन की दुर्बलता में आकर उसने जो अ/ध/र्म और गलत संबंध बनाया, उसने उसके खुशहाल शादीशुदा जीवन को तबाह कर दिया था।

उधर, सुनीता भी दिन-रात घुटती रहती। एक तरफ उसकी जन्म देने वाली माँ थी और दूसरी तरफ उसका पति। उसने अपने पति की सेवा और घर के कामों में खुद को व्यस्त कर लिया, लेकिन मोहन के साथ उसका पहले जैसा भावुक लगाव और अ/ंत/रं/ग नज़दीकियाँ पूरी तरह ख़त्म हो चुकी थीं।

अरवल में कमला की हालत

उधर अरवल गाँव में, कमला बिल्कुल अकेली पड़ गई थी। बेटी के चले जाने के बाद उसे अहसास हुआ कि उसने अपनी शारीरिक वासना और अ/के/ला/प/न की पूर्ति के लिए कितना बड़ा पाप कर दिया था।

कमला दिन-रात ईश्वर के सामने रो-रोकर अपने पापों की माफ़ी माँगती। गाँव-समाज के लोग जब उससे पूछते कि “कमला, दामाद जी इतनी जल्दी क्यों चले गए?”, तो कमला शर्म से नज़रें चुरा लेती।

कुछ ही हफ़्तों में पश्चाताप की अग्नि और मानसिक तनाव के कारण कमला सचमुच बहुत बीमार पड़ गई। इस बार उसकी बीमारी कोई भावनात्मक ढोंग नहीं थी, बल्कि अंदर ही अंदर पश्चाताप और ग्लानि उसे खाए जा रही थी। उसे तेज़ बुखार रहने लगा और उसका शरीर दिन-प्रतिदिन कमज़ोर होने लगा।

बेटी का निर्णय और बड़ा फ़ैसला

लगभग दो महीने बीत जाने के बाद भी मोहन और सुनीता का रिश्ता पटरी पर नहीं आया था। मोहन ने कई बार सुनीता के पैर पकड़कर माफ़ी माँगी और कहा, “सुनीता, मुझे माफ़ कर दो! मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई। मैंने अपनी मर्यादा की सीमा लांघ दी, लेकिन अब मैं तुम्हारे सिवा किसी के बारे में नहीं सोचता।”

सुनीता ने भारी मन से कहा, “मोहन, मैंने तुम्हें और माँ को माफ़ तो कर दिया है, लेकिन उस रात का दृश्य मेरी आँखों से नहीं हटता। फिर भी, मैं अपने इस परिवार को टूटने नहीं दूँगी।”

इसी बीच अरवल के एक पड़ोसी का फोन सुनीता के पास आया। पड़ोसी ने बताया कि कमला की हालत बहुत गंभीर है और वह पिछले कई दिनों से बिना कुछ खाए-पिये केवल बिस्तर पर पड़ी रोती रहती है।

यह सुनकर सुनीता का दिल पसीज गया। माँ की गलतियों के बावजूद वह अपनी माँ की मृत्यु की कामना नहीं कर सकती थी। उसने मोहन से कहा, “माँ सचमुच बहुत बीमार हैं और अंतिम सांसें गिन रही हैं। हमें एक बार अरवल जाना होगा।”

मोहन ने झिझकते हुए कहा, “क्या मेरा वहाँ जाना सही रहेगा? सासू माँ के सामने मैं फिर कैसे नज़रें मिला पाऊँगा?”

सुनीता ने कहा, “तुम्हें चलना होगा ताकि हम इस पूरे बिखरे हुए रिश्ते को एक सही मोड़ पर ला सकें और इस पाप की अग्नि को हमेशा के लिए शांत कर सकें।”

अंतिम मुलाकात और सच्चा धर्म

अगले ही दिन मोहन और सुनीता अरवल पहुँच गए। जब उन्होंने कमला के कमरे में कदम रखा, तो वहाँ का नज़ारा देखकर दोनों का कलेजा कांप उठा।

कमला सूखकर कांटा हो चुकी थी और उसकी आँखों की रोशनी ढलने लगी थी। अपने दामाद और बेटी को एक साथ दरवाज़े पर खड़ा देखकर कमला की आँखों से आँसू छलक पड़े।

कमला ने हाथ जोड़कर कहा, “बेटी… दामाद जी… आप दोनों आ गए? मुझे लगा था कि मैं बिना अपनी भूल की माफ़ी पाए ही मर जाऊँगी।”

सुनीता अपनी माँ के पास बैठी और उसका हाथ थामकर बोली, “माँ, तुमने जो किया वह गलत था, लेकिन पश्चाताप इंसान को पवित्र बना देता है। हमने तुम्हें माफ़ कर दिया है।”

मोहन ने भी कमला के आगे हाथ जोड़कर कहा, “सासू माँ, गलती केवल आपकी नहीं थी, मैं भी अपनी मर्यादा भूल गया था। मुझे भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए थी। आज ईश्वर को साक्षी मानकर मैं आपसे और अपनी पत्नी से वादा करता हूँ कि हम अपने पवित्र रिश्तों की सीमा कभी नहीं लांघेंगे।”

कमला ने मोहन और सुनीता के हाथों को एक साथ मिलाया और रोते हुए कहा, “दामाद पिता के समान और सास माँ के समान होती है। काम-वासना और अ/ंधे आकर्षण में पड़कर जो पाप हमने किया, ईश्वर किसी और को ऐसा बहकावा न दे। तुम दोनों हमेशा खुश रहो।”

निष्कर्ष और सीख

कमला को जब अपनी बेटी और दामाद का सच्चा आशीर्वाद और माफ़ी मिल गई, तो उसका मन हल्का हो गया। सुनीता ने कुछ दिन गाँव में रहकर अपनी माँ का सही इलाज करवाया और उन्हें स्वस्थ किया।

इसके बाद, मोहन और सुनीता अपने घर लौट आए। अब उनके बीच का खिंचाव ख़त्म हो चुका था और दोनों अपने रिश्ते को मर्यादा और प्रेम से निभाने लगे।

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Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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