गीता मां ने की फराह खान के भाई से शादी !
गीता मां ने की फराह खान के भाई से शादी !
बॉलीवुड की चकाचौंध के पीछे छिपा एक ख़ट्टा-मीठा, दर्दनाक और प्रेरणादायक सच
प्रस्तावना: अफ़वाहों का बाज़ार और एक सिंदूर का सच
सोशल मीडिया का ज़माना भी अजीब है। यहाँ एक तस्वीर बिना किसी संदर्भ के पोस्ट हो जाए, तो रातों-रात अफ़वाहों की आंधी आ जाती है। 2020 का दौर था। इंस्टाग्राम पर एक फोटो वायरल होती है, जिसमें टेलीविजन की सबसे चहेती कोरियोग्राफर और जज ‘गीता मां’ की मांग में गहरा लाल सिंदूर चमक रहा था। फोटो देखते ही इंटरनेट पर सनसनी फैल गई।
तरह-तरह के सवाल तैरने लगे—”क्या गीता मां ने कई सालों पहले ही चुपके से शादी कर ली थी?”, “क्या आज उनके तीन-तीन बच्चे हैं जिन्हें उन्होंने दुनिया से छुपाकर रखा है?”, “क्या सचमुच गीता मां अपनी ही सहेली और मेंटॉर फराह खान के भाई/करीबी के प्यार में पड़ गई थीं?”, और “क्या शराब की लत ने उनके सुनहरे करियर को तबाह कर दिया था?”
हर कोई इस सिंदूर के पीछे छिपी कहानी को अपने अंदाज़ में गढ़ रहा था। लेकिन बॉलीवुड की इस जगमगाती दुनिया में किसी की सच्चाई इतनी सीधी नहीं होती। इस एक तस्वीर के पीछे छिपी थी 50 सालों की एक ऐसी कहानी, जिसमें दर्द था, रिजेक्शन था, ₹226 का पहला लिफ़ाफ़ा था, 8 साल की गुमनामी थी, डिप्रेशन का अंधेरा था, और फिर ₹51 करोड़ का साम्राज्य बनाने का जज़्बा था।
चलिए, अफ़वाहों के पर्दों को हटाते हैं और 5 जुलाई 1973 से शुरू हुई गीता कपूर की असली दास्तान को विस्तार से समझते हैं।
अध्याय 1: मिडिल क्लास की तंग गलियाँ और नन्हीं गीता के खामोश सपने
5 जुलाई 1973। मुंबई, महाराष्ट्र के एक बेहद साधारण मिडिल क्लास इलाके में एक छोटी सी बच्ची की किलकारी गूंजी। पिता ने दुलार से उसका नाम रखा—गीता कपूर।
गीता जिस घर में पैदा हुई थीं, वहाँ ग्लैमर की दूर-दूर तक कोई परछाईं नहीं थी। न तो कोई फिल्मी कनेक्शन था और न ही घर में फ़ालतू पैसों की बहुतायत। पिता एक सरकारी स्कूल में प्राइमरी टीचर थे। उनकी हर महीने मिलने वाली सीमित तनख़्वाह से बमुश्किल घर का राशन, बिजली का बिल और बच्चों की स्कूल फ़ीस निकल पाती थी। माँ घर संभालती थीं—किफ़ायत से चूल्हा जलाना और हर पैसे का हिसाब रखना उनका रोज़मर्रा का काम था।
यह एक ऐसा घर था जहाँ सपने देखने पर मनाही तो नहीं थी, लेकिन उन सपनों को जुबान पर लाना एक बेवकूफ़ी मानी जाती थी। पिता का मानना था कि पढ़ाई-लिखाई करो, कोई छोटी-मोटी नौकरी पकड़ो और अपनी ज़िंदगी को सुकून से बिताओ। मगर गीता अलग मिट्टी की बनी थीं।
जब भी मोहल्ले में कोई शादी-ब्याह होता या पास के किसी घर में रेडियो पर 70 और 80 के दशक के गाने बजते, गीता के पैर अपने आप थिरकने लगते।
उन्हें किसी ने डांसर बनने के लिए नहीं कहा था।
उन्हें किसी ने क्लासिकल स्टेप्स नहीं सिखाए थे।
बस उनके अंदर एक अनजानी आग थी। एक ऐसी आग जो स्कूल की घंटी से नहीं बुझती थी, बल्कि संगीत की धुन सुनते ही भड़क उठती थी।
मगर स्कूल की चारदीवारी में गीता के लिए स्थितियां बिल्कुल अलग थीं। गणित की क्लास हो या साइंस का पीरियड, गीता का ध्यान हमेशा खिड़की से बाहर उड़ती चिड़ियों और हवा में गूंजती ध्वनियों पर रहता था। नतीजा यह होता कि जब भी रिपोर्ट कार्ड आता, गीता का नाम लिस्ट में सबसे नीचे होता। गणित में फेल, साइंस में किसी तरह पास।
शिक्षक माथे पर हाथ रख लेते और माँ-बाप चिंता में डूब जाते। पिता सोचते कि इस बच्ची का भविष्य क्या होगा? लेकिन जब भी स्कूल में कोई एनुअल फंक्शन, डांस या ड्रामा प्रोग्राम होता, तो गीता का एक अलग ही रूप देखने को मिलता। जो आँखें क्लासरूम में बुझी-बुझी रहती थीं, वे स्टेज पर जाते ही एक असीम चमक से भर उठती थीं।
गीता केवल पार्टिसिपेट नहीं करती थीं, बल्कि मेडल भी जीतकर लाती थीं। घर के मुख्य दरवाज़े पर गीता का जीता हुआ चमकता गोल्ड मेडल टंगता था और ठीक उसी मेडल के पीछे पिता डर के मारे उनका ख़राब रिपोर्ट कार्ड छुपा दिया करते थे ताकि रिश्तेदार न देख लें।
मगर इस बचपन में एक कड़वा घाव भी था। गीता का वजन बचपन से ही उम्र के दूसरे बच्चों से थोड़ा ज्यादा था। और बच्चे, मासूम होने के साथ-साथ कई बार बहुत क्रूर भी हो जाते हैं। जो सहपाठी डांस प्रतियोगिता में गीता का मुकाबला नहीं कर पाते थे, वे अपनी हार का बदला उनके शरीर का मज़ाक उड़ाकर लेते थे।
“मोटी भैंस!”—यह वो नाम था जो स्कूल के गलियारों में गीता के पीछे गुंजायमान रहता था। यह एक ऐसा मानसिक ज़ख्म था जो शरीर पर नहीं दिखता था, लेकिन आत्मा को छलनी कर देता था। गीता घर आकर कई बार रोतीं, लेकिन किसी से कुछ कह नहीं पाती थीं। उन्हें तब अंदाज़ा भी नहीं था कि यही शारीरिक बनावट आगे चलकर बॉलीवुड में भी उनका सबसे बड़ा दुश्मन बनने वाली थी।
अध्याय 2: 10वीं के बाद डांस की सनक और मुंबई की गलियों में दर-दर की ठोकरें
जैसे-जैसे गीता बड़ी हुईं, पढ़ाई से उनका नाता और टूटता गया। 10वीं की परीक्षा किसी तरह पास करने के बाद उन्होंने साइंस या कॉमर्स का रुख नहीं किया, क्योंकि वे जानती थीं कि वे रास्ते उनके लिए बने ही नहीं हैं। उन्होंने आर्ट्स चुना ताकि पढ़ाई का दबाव कम रहे और वे अपना पूरा ध्यान डांस पर लगा सकें।
10वीं के तुरंत बाद गीता ने मुंबई की एक बड़ी डांस क्लास में एडमिशन ले लिया। यहाँ पहली बार उन्हें समझ आया कि डांस केवल मुर्गियों की तरह हाथ-पैर मारना नहीं है। भारत में और दुनिया में नृत्य की दर्जनों शैलियाँ हैं। गीता ने अपने लिए दो रास्ते चुने:
-
इंडियन क्लासिकल (भारतीय शास्त्रीय नृत्य) – जिसमें भाव और ताल का अनुशासन था।
बॉलीवुड स्टाइल – जिसमें ऊर्जा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी।
अगले दो सालों तक गीता ने खुद को अभ्यास की भट्ठी में झोंक दिया। सुबह 5 बजे उठना, घंटों रियाज़ करना, पैरों में घुंघरू बांधकर तब तक नाचना जब तक कि तलवे छिल न जाएँ। 12वीं का रिज़ल्ट आया—महज़ 55% मार्क्स। लेकिन गीता को अब मार्क्स की परवाह नहीं थी, क्योंकि अब उनका शरीर और उनकी आत्मा पूरी तरह से एक डांसर के रूप में ढल चुके थे।
फिर आया कॉलेज का दौर। नई दुनिया, नए लोग। कॉलेज में दाखिला लेते ही कुछ ही दिनों में एक अंतर-कॉलेज डांस कम्पटीशन आयोजित हुआ। स्टेज पर एक से बढ़कर एक हैंडसम लड़के और खूबसूरत लड़कियाँ आईं, आधुनिक गानों पर नाचे और चले गए। फिर उद्घोषक ने नाम पुकारा—”गीता कपूर!”
गीता स्टेज पर आईं। जब संगीत शुरू हुआ और गीता ने थिरकना शुरू किया, तो पूरा हॉल सन्न रह गया। उनके भाव, उनके स्टेप्स की नज़ाकत और चेहरे की ऊर्जा इतनी सम्मोहक थी कि परफ़ॉर्मेंस खत्म होते ही पूरा ऑडिटोरियम खड़ा हो गया। तालियों की गड़गड़ाहट रुकने का नाम नहीं ले रही थी। जो लोग गीता को जानते भी नहीं थे, वे सीटी बजा रहे थे। कॉलेज की तरफ से उन्हें गोल्ड मेडल मिला।
यही वो पल था जब गीता ने पहली बार अपने दिल में पक्का कर लिया—”चाहे जो हो जाए, डांस ही मेरी ज़िंदगी है और मैं इसी में अपना नाम बनाऊंगी।”
कॉलेज खत्म हुआ। गीता अब एक प्रोफेशनली ट्रेंड डांसर थीं। वे बॉलीवुड की फ़िल्मों में बतौर डांसर काम करने के लिए पूरी तरह तैयार थीं। मगर… बॉलीवुड उनके लिए तैयार नहीं था।
ग्रेजुएशन के बाद के दो साल (लगभग 1994 से 1996) गीता कपूर के जीवन के सबसे थकाऊ और निराशाजनक साल थे। एक साधारण सी लड़की, हाथ में अपना पोर्टफोलियो (तस्वीरों का फ़ोल्डर) लिए मुंबई की चिलचिलाती धूप में बस और लोकल ट्रेनों के धक्के खाती रही।
एक डायरेक्टर का दफ़्तर—”मैडम, अभी कोई वैकेंसी नहीं है।”
एक प्रोड्यूसर का केबिन—”तुम्हारा लुक हीरोइन जैसा नहीं है, और डांसर के लिए भी हमें पतली लड़कियाँ चाहिए।”
ऑडिशन्स की लंबी लाइनें, घंटों इंतज़ार और अंत में सिर्फ एक शब्द—”रिजेक्टेड!”
गीता को धीरे-धीरे बॉलीवुड का पहला कड़वा सच समझ आ रहा था। यहाँ टैलेंट बाद में देखा जाता है, पहले कनेक्शन और गॉडफादर देखे जाते हैं। यदि आप किसी बड़े खानदान से नहीं हैं या आपका कोई गॉडफादर नहीं है, तो आपकी प्रतिभा दफ़्तरों की धूल चाटती रह जाती है।
निराशा इतनी बढ़ गई थी कि रात-रात भर गीता सो नहीं पाती थीं। आँखों के नीचे काले घेरे पड़ गए थे। तब हार मानकर गीता वापस अपने पुराने डांस टीचर के पास गईं। रोते हुए उन्होंने अपनी दास्तान सुनाई। टीचर ने गीता को ध्यान से सुना और एक ऐसी बात कही जिसने गीता के सोचने का नज़रिया ही बदल दिया।
टीचर ने कहा:
“गीता, तुम सीधे महल के मुख्य द्वार से अंदर घुसना चाहती हो, जहाँ दरबान तुम्हें भगा देता है। पहले किसी भी रास्ते से अंदर घुसो—चाहे वो खिड़की हो या चोर दरवाज़ा। एक बार अंदर पहुँच जाओगी, तो नाम अपने आप बन जाएगा।”
यह ‘चोर दरवाज़ा’ क्या था? यह था—बैकग्राउंड डांसर बनने का रास्ता!
अध्याय 3: ₹226 की पहली कमाई और 8 साल का ‘गुमनाम’ बनवास
बॉलीवुड में बैकग्राउंड डांसर उस भीड़ को कहा जाता है जो मुख्य हीरो-हीरोइन के पीछे नाचती है।
कैमरा कभी उन पर रुकता नहीं है।
फ़िल्म के क्रेडिट्स में उनका नाम नहीं आता।
दर्शक कभी उनका चेहरा याद नहीं रखते।
और पारिश्रमिक के नाम पर उन्हें मूंगफली के दाने दिए जाते हैं।
मगर गीता कपूर ने तय कर लिया कि वे इस काम को छोटा नहीं मानेंगी। यह उनके लिए उस सीढ़ी की पहली पायदान थी जहाँ से उन्हें अपनी मंज़िल तक पहुँचना था।
वर्ष 1998। फ़िल्म बन रही थी ‘कुछ कुछ होता है’। निर्देशक थे करण जौहर। मुख्य कलाकार थे शाहरुख खान, काजोल और रानी मुखर्जी। फ़िल्म का एक बेहद भावुक गाना शूट हो रहा था—“तुझे याद ना मेरी आई, किसी से अब क्या कहना…”
सेट पर बड़ी-बड़ी लाइट्स लगी थीं, बड़े-बड़े सितारे वैनिटी वैन से बाहर आ रहे थे। और उनके पीछे लाल कपड़े पहने, भीड़ में चुपचाप खड़ी थी 25 साल की गीता कपूर।
शूटिंग शुरू हुई। गीता ने अपनी पूरी ताकत लगाकर डांस किया। हर स्टेप में उन्होंने अपनी आत्मा उड़ेल दी, भले ही कैमरा केवल काजोल और शाहरुख के चेहरों पर फोकस कर रहा था। दो दिनों की हाड़-तोड़ मेहनत, कड़ाके की ठंड में घंटों खड़े रहना, पैर दर्द से फटने लगते थे मगर रुकना मना था।
जब शूटिंग खत्म हुई और पेमेंट का वक्त आया, तो प्रोडक्शन कंट्रोलर ने डांसरों को एक लिफ़ाफ़ा थमाया। गीता ने कांपते हाथों से लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर कड़कड़ाते हुए नोट थे। उन्होंने गिना—₹226!
हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा। पूरे 226 रुपये!
बॉलीवुड के सबसे बड़े बैनर की फ़िल्म, 48 घंटे की मेहनत और हाथ में आई इतनी रकम कि आज के ज़माने में एक कप अच्छी कॉफ़ी भी न आए। गीता के मन में एक पल के लिए आया कि क्या उनकी मेहनत की कीमत बस इतनी सी है? क्या इसी दिन के लिए उन्होंने इतने सालों तक पसीना बहाया था?
लेकिन वे कुछ बोल नहीं सकती थीं। बैकग्राउंड डांसर की औकात इंडस्ट्री में इतनी ही होती थी। अगर ज़रा सा भी मुंह खोला या शिकायत की, तो अगली फ़िल्म से बाहर कर दिया जाता। गीता ने उन 226 रुपयों को माथे से लगाया, अपनी माँ के हाथों में रखा और चुपचाप मुस्कुरा दीं। यह उनका पहला क़दम था।
मगर यह कड़वा घूंट सिर्फ एक बार का नहीं था। ‘कुछ कुछ होता है’ के बाद महीने बीते, साल बीते। फिर फ़िल्म आई ‘दिल तो पागल है’, फिर ‘मैं हूं ना’ के कुछ शुरुआती ट्रैक्स, फिर अन्य फ़िल्में।
यह सिलसिला एक-दो महीने या एक-दो साल नहीं चला। पूरे 8 साल (1996 से 2004 तक) गीता कपूर केवल बैकग्राउंड डांसर बनकर भीड़ का हिस्सा बनी रहीं!
8 सालों तक:
-
किसी भी कैमरे ने उनके चेहरे पर 2 सेकंड से ज्यादा ज़ूम नहीं किया।
किसी भी दर्शक ने थिएटर से निकलते हुए यह नहीं कहा कि “देखो वो पीछे वाली लड़की कितना अच्छा नाच रही है!”
वे केवल एक बिना चेहरे वाली डांसर थीं, जिसे रोज़ आकर पसीना बहाना था और शाम को दिहाड़ी लेकर घर जाना था।
इंसाइडर्स बताते हैं कि इन 8 सालों में गीता के बैकग्राउंड में रहने की दो बड़ी वजहें थीं:
गॉडफादर का न होना: टैलेंट उनके पास कूट-कूट कर भरा था, लेकिन उन्हें कोई सोलो ब्रेक देने वाला नहीं था।
बॉडी टाइप (Body Type): बॉलीवुड की इंडस्ट्री में मुख्य डांसर या फ्रंट-पंक्ति डांसर के लिए भी एक तय शारीरिक मानक (Zero Size या पतली कमर) की मांग की जाती थी। गीता का वजन थोड़ा ज्यादा था, जिसकी वजह से कोरियोग्राफर्स उन्हें हमेशा पीछे की पंक्तियों में धकेल देते थे।
लेकिन गीता रुकी नहीं। इन 8 सालों की खामोशी में वे चुपचाप एक और काम कर रही थीं—वे रिश्ते बना रही थीं। सेट का लाइटमैन हो, जूनियर कोरियोग्राफर हो या असिस्टेंट डायरेक्टर, गीता अपने नम्र व्यवहार और काम के प्रति ईमानदारी से सबकी चहेती बन रही थीं। वे जानती थीं कि यह 8 साल का सन्नाटा एक दिन बहुत बड़े तूफ़ान में बदलने वाला है।
अध्याय 4: फराह खान का साथ, सुपरहिट दौर और अनकहा दर्द
1998 के आसपास बॉलीवुड की सबसे मशहूर कोरियोग्राफर फराह खान अपनी एक बड़ी टीम तैयार कर रही थीं। फराह को एक ऐसे असिस्टेंट की ज़रूरत थी जो न केवल खुद एक बेहतरीन डांसर हो, बल्कि जिसमें ग्रुप को कंट्रोल करने, स्टेप्स याद रखने और फराह के दिमाग को पढ़ने की क्षमता हो।
कई डांसरों के ऑडिशन हुए, लेकिन फराह को कोई पसंद नहीं आ रहा था। तभी किसी सेट असिस्टेंट ने फराह के कान में एक नाम फुसफुसाया—”मैडम, एक लड़की है गीता कपूर। बैकग्राउंड में नाचती है, लेकिन काम बहुत बारीकी से समझती है।”
फराह ने सोचा होगा—”कौन गीता कपूर? कोई बड़ा नाम नहीं, कोई पहचान नहीं।” लेकिन उन्होंने कहा, “ठीक है, एक बार बुलाओ।”
जब गीता फराह के सामने आईं और उन्होंने फराह के दिए हुए कठिन स्टेप्स को पलक झपकाते ही हूबहू दोहरा कर दिखा दिया, तो फराह की आँखें फटी की फटी रह गईं। फराह ने बिना एक पल गंवाए कहा—”कल से तुम मेरी चीफ़ असिस्टेंट हो!”
और यही वो पल था जिसने गीता कपूर की किस्मत का पहिया 180 डिग्री घुमा दिया।
फ़िल्म का नाम
रिलीज़ का साल
गीता कपूर का योगदान
फ़िल्म की सफलता
दिल तो पागल है
1997
असिस्टेंट कोरियोग्राफर
ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर
मोहब्बतें
2000
ग्रुप कोरियोग्राफी एवं ट्रेनिंग
सुपरहिट
कभी खुशी कभी गम
2001
‘बोले चूड़ियां’ गाने की कोरियोग्राफी
मेगा ब्लॉकबस्टर
कल हो ना हो
2003
गानों की सिंक कोरियोग्राफी
सुपरहिट
मैं हूं ना
2004
असिस्टेंट डायरेक्टर व कोरियोग्राफर
ब्लॉकबस्टर
ओम शांति ओम
2007
‘दिल्लगी’ व मुख्य गानों की ट्रेनिंग
ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर
फराह खान और गीता कपूर की जोड़ी ने बॉलीवुड के कोरियोग्राफी डिपार्टमेंट में तहलका मचा दिया। शाहरुख़ खान, अमिताभ बच्चन, ऋतिक रोशन, करीना कपूर और काजोल जैसे बड़े-बड़े सितारों को नचाने की ज़िम्मेदारी फराह के साथ-साथ गीता के कंधों पर होती थी।
गीता का वेतन अब ₹226 से बढ़कर ₹45,000 प्रति माह हो चुका था। 1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती सालों में ₹45,000 एक बहुत बड़ी रकम थी। घर की आर्थिक स्थिति सुधर गई। पिता की पेंशन और गीता की सैलरी से मुंबई में एक अच्छा घर आ गया। रात को अब गीता को चैन की नींद आने लगी थी।
मगर… यहाँ आता है इस कहानी का सबसे गहरा और कड़वा पहलू।
गीता ने 6 से 8 साल फराह खान के साथ रात-दिन एक करके काम किया। बॉलीवुड के जितने भी आइकॉनिक गाने आपने उस दौर में देखे—चाहे वो ‘बोले चूड़ियां’ हो या ‘छैया छैया’—इन सबके पीछे गीता की हफ्तों की अनथक मेहनत थी।
लेकिन जब भी फ़िल्म का पोस्टर छपता था, जब भी किसी मैगज़ीन में इंटरव्यू आता था या जब भी फ़िल्मफेयर अवॉर्ड्स की घोषणा होती थी, हर जगह केवल एक ही नाम चमकता था—फराह खान!
गीता का नाम या तो क्रेडिट्स में इतने छोटे फ़ॉन्ट में होता था जिसे पढ़ने के लिए लेंस की ज़रूरत पड़े, या फिर कहीं होता ही नहीं था। यह बॉलीवुड की एक बहुत पुरानी परंपरा रही है—”काम करे असिस्टेंट, नाम ले बॉस!”
क्या गीता को इसका दुख नहीं होता होगा? बिल्कुल होता होगा। जिस गाने को आपने अपनी उंगलियों से तराशा हो, उसका क्रेडिट जब कोई और ले जाए, तो दिल पर क्या बीतती है, यह सिर्फ एक कलाकार समझ सकता है। लेकिन गीता ने कभी मीडिया के सामने जाकर रोना नहीं रोया। वे चुप रहीं, मुस्कुराती रहीं और अपना काम करती रहीं।
लेकिन वर्ष 2000 आते-आते गीता के अंदर के स्वाभिमान ने ज़ोर मारा। उन्होंने एक बहुत बड़ा और ख़तरनाक फ़ैसला लिया—फराह खान का साया छोड़कर सोलो (इंडिपेंडेंट) कोरियोग्राफर बनने का फैसला!
यह एक ऐसा कदम था जिसमें सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। फराह के साथ रहने पर हर महीने बंधा-बंधाया पैसा और बड़ी फ़िल्में मिल रही थीं। अकेले होने का मतलब था—समुद्र में बिना पतवार के उतरना।
अध्याय 5: सोलो करियर के करारे झटके और फ्लॉप गानों की हैट्रिक
जब इंसान अपने दम पर खड़ा होने की कोशिश करता है, तो दुनिया सबसे पहले उसकी जड़ें हिलाने की कोशिश करती है। गीता के साथ भी यही हुआ।
वर्ष 2000 में गीता कपूर को बतौर इंडिपेंडेंट (स्वतंत्र) मुख्य कोरियोग्राफर पहली फ़िल्म मिली—‘फिज़ा’। फ़िल्म में करिश्मा कपूर और ऋतिक रोशन थे। गीता ने अपनी जान लगा दी। हर स्टेप नया सोचा, हर मूव पर हफ़्तों रीटेक लिए। लेकिन जब फ़िल्म रिलीज़ हुई, तो बॉक्स ऑफिस पर ‘फिज़ा’ औंधे मुंह गिरी। लोग सिनेमाघरों तक पहुँचे ही नहीं।
गीता का दिल दहल गया—”क्या मैंने फराह का साथ छोड़कर बहुत बड़ी गलती कर दी?”
मगर अभी इम्तिहान बाकी था।
2001 में आई शाहरुख खान की भव्य फ़िल्म ‘अशोका’। बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन यह फ़िल्म भी बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप हो गई।
2002 में आई ‘साथिया’। गाने तो सराहे गए, लेकिन कोरियोग्राफर के रूप में गीता को वो पहचान नहीं मिली जिसकी वे हकदार थीं।
लगातार तीन फ्लॉप फ़िल्में!
बॉलीवुड का नियम बहुत निर्दयी है। यहाँ अगर आपकी तीन फ़िल्में लगातार पिट जाती हैं, तो डायरेक्टर्स आपके फ़ोन उठाना बंद कर देते हैं। दफ़्तरों के दरवाज़े मुंह पर बंद हो जाते हैं। लोग आपको “अनलकी” (अशुभ) मानने लगते हैं।
गीता कपूर के साथ भी वही होने लगा। काम मिलना बंद हो गया। जो लोग कल तक फराह खान के सेट पर उनके आगे-पीछे घूमते थे, वे अब रास्ते में मिलने पर मुंह फेरने लगे। गीता अपने अंधेरे कमरे में बैठकर रोती थीं। सुबह उठने का मन नहीं करता था। ऐसा लगता था कि करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो गया।
लेकिन सच्ची प्रतिभा कभी ज़्यादा देर तक दबी नहीं रह सकती।
वर्ष 2003 में निर्देशक साजिद खान की फ़िल्म आई ‘हे बेबी’। इस फ़िल्म के टाइटल ट्रैक की कोरियोग्राफी गीता कपूर को मिली। गीता ने इस बार कोई पारंपरिक तरीका नहीं अपनाया। उन्होंने वेस्टर्न स्टाइल, बॉलीवुड तड़का और एक जबरदस्त एनर्जी का फ्यूजन तैयार किया।
जब ‘हे बेबी’ का गाना टीवी पर आया, तो पूरे देश के युवा उस पर थिरकने लगे। गाना सुपर-डुपर हिट हो गया!
इसके बाद आई फ़िल्म ‘थोड़ा प्यार थोड़ा मैजिक’ और फिर 2008 में ‘अलादीन’। गीता कपूर के गानों ने एक बार फिर बॉक्स ऑफिस और म्यूज़िक चार्ट्स पर तहलका मचा दिया।
अब गीता कपूर केवल फराह खान की असिस्टेंट नहीं थीं। अब वे बॉलीवुड की जानी-मानी मुख्य कोरियोग्राफर ‘गीता कपूर’ थीं। उनकी फीस अब बढ़कर ₹2 लाख प्रति फ़िल्म हो चुकी थी। जो लड़की ₹226 में भीड़ में नाची थी, अब वो अपनी शर्तों पर काम कर रही थी।
लेकिन उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट अभी आना बाकी था—एक ऐसा मोड़ जिसे वे खुद लगभग ठुकरा चुकी थीं!
अध्याय 6: ‘डांस इंडिया डांस’ – टीवी का भूचाल और ‘गीता मां’ का जन्म
वर्ष 2008 का उत्तरार्ध। ज़ी टीवी एक नया डांस रियलिटी शो शुरू करने की योजना बना रहा था। कॉन्सेप्ट यह था कि आम भारत के आम बच्चों और युवाओं को मंच दिया जाएगा और बॉलीवुड के बड़े कोरियोग्राफर उन्हें जज करेंगे।
शो के मेकर्स ने गीता कपूर से संपर्क किया—”मैडम, हम एक शो बना रहे हैं, नाम है ‘डांस इंडिया डांस’ (DID)। हम चाहते हैं कि आप इसमें मिथुन चक्रवर्ती (ग्रैंड मास्टर), रेमो डिसूजा और टेरेंस लुईस के साथ जज बनें।”
गीता कपूर ने ऑफर सुना और मन ही मन हँसीं। उन्होंने सीधे शब्दों में मना कर दिया—”नहीं, मुझे टीवी नहीं करना। मैं बॉलीवुड फ़िल्मों की कोरियोग्राफर हूँ। टीवी बहुत छोटा मीडियम है। यह शो दो-तीन महीने चलेगा, बंद हो जाएगा। इससे मेरे फ़िल्मी करियर को नुकसान होगा।”
सोचने वाली बात है! उस दौर में फ़िल्म इंडस्ट्री के लोग टीवी पर काम करने को अपना डिमोशन मानते थे।
गीता मना करने ही वाली थीं कि उनके एक करीबी दोस्त और शुभचिंतक ने उन्हें रोका। उसने कहा:
“गीता, फ़िल्मों में तुम पर्दे के पीछे रहती हो। तुम्हें सिर्फ इंडस्ट्री के लोग जानते हैं, आम जनता नहीं। टीवी तुम्हें हर घर के ड्रॉइंग रूम तक ले जाएगा। एक बार ट्राई करने में क्या हर्ज़ है?”
गीता ने थोड़ा झिझकते हुए ‘हाँ’ कह दी।
और दोस्तों, वह एक ‘हाँ’ भारतीय टेलीविजन के इतिहास की सबसे बड़ी ‘हाँ’ साबित हुई!
2009 की शुरुआत में जब ‘डांस इंडिया डांस’ (DID Season 1) ज़ी टीवी पर टेलीकास्ट हुआ, तो उसने टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले।
शुक्रवार और शनिवार की रात 9 बजते ही पूरा भारत टीवी स्क्रीन से चिपक जाता था।
रेमो डिसूजा का शांत अंदाज़,
टेरेंस लुईस का टेक्निकल नॉलेज,
मिथुन दादा का ‘क्या बात, क्या बात, क्या बात!’,
और इन सबके बीच गीता कपूर का ममता से भरा दिल!
शो में आने वाले छोटे-छोटे बच्चे और प्रतियोगी जब रिजेक्ट होकर रोते थे, तो गीता उन्हें गले से लगा लेती थीं। वे केवल कमियाँ नहीं बताती थीं, बल्कि एक माँ की तरह दुलारती थीं, उनके आंसू पोंछती थीं और उन्हें सिखाती थीं।
इसी दौरान शो के कंटेस्टेंट्स और एंकर जय भानुशाली ने उन्हें एक नाम दिया—“गीता मां!”
यह नाम कोई स्क्रिप्टेड नाम नहीं था। यह नाम गीता के निष्कलंक प्रेम और वात्सल्य से उपजा था। रातों-रात 8 साल तक बैकग्राउंड में छिपी रहने वाली वो गुमनाम डांसर पूरे भारत की “गीता मां” बन गई!
सड़क पर निकलतीं तो बूढ़ी औरतें आकर उनके सिर पर हाथ रख देतीं, बच्चे दौड़कर उनसे लिपट जाते, एयरपोर्ट्स पर लोग ऑटोग्राफ़ के लिए लाइन लगा लेते। जो पहचान 15 साल की फ़िल्मी मेहनत ने नहीं दी थी, वह पहचान टीवी के एक शो ने दे दी।
और कमाई?
DID के पहले सीज़न में गीता को ₹80,000 प्रति एपिसोड मिले।
महीने के 8 एपिसोड्स का मतलब था—₹6,400,000 (साढ़े छह लाख रुपये से ज्यादा प्रति माह)!
आगे चलकर यह फीस ₹3 लाख प्रति एपिसोड तक पहुँच गई।
लेकिन जैसा कि अक्सर होता है—जब रोशनी बहुत तेज़ होती है, तो उसके नीचे का अंधेरा भी बहुत गहरा हो जाता है। इसी शो के सेट पर गीता कपूर की ज़िंदगी में एक ऐसा इंसान आया, जिसने उन्हें सफलता के शिखर से उठाकर अवसाद के सबसे गहरे गड्ढे में फेंक दिया।
अध्याय 7: राजीव खींची से अफेयर, सीक्रेट शादी की अफवाहें और 3 साल का सन्नाटा
2008-2009 के दौर में ‘डांस इंडिया डांस’ के सेट्स पर चहल-पहल रहती थी। इसी दौरान गीता कपूर की मुलाकात एक युवा और टैलेंटेड कोरियोग्राफर से हुई—राजीव खींची (कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में इन्हें राजीव सुरती या राजीव कच्ची भी कहा गया)।
राजीव अपने काम में बेहद कुशल थे, हैंडसम थे और डांस की दुनिया की गहरी समझ रखते थे। शुरुआत में दोनों की मुलाकातें केवल काम तक सीमित थीं। शो के स्टेप्स डिस्कस करना, गानों की टाइमिंग सेट करना।
लेकिन धीरे-धीरे सेट के बाद भी मीटिंग्स होने लगीं। देर रात तक फ़ोन पर बातें होने लगीं। गीता, जो इतने सालों से अकेलेपन और संघर्ष से जूझ रही थीं, उन्हें राजीव के रूप में एक ऐसा कंधा मिला जिस पर वे अपना सिर रख सकती थीं। दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, पता ही नहीं चला।
इंडस्ट्री के लोग बताते हैं कि दोनों को अक्सर बॉलीवुड पार्टीज़, डिनर डेट्स और इवेंट्स में साथ देखा जाने लगा। लेकिन जब भी कोई रिपोर्टर उनसे पूछता, दोनों मुस्कुराकर टाल देते। न गीता ने कभी खुलकर इक़रार किया, न इनकार किया।
और इसी खामोशी का फायदा उठाया पीत पत्रकारिता (Yellow Journalism) ने!
वर्ष 2011। एक नामी न्यूज़ पोर्टल और टीवी चैनल पर एक सनसनीखेज रिपोर्ट छपी। हेडिंग थी:
“गीता मां का बड़ा खुलासा! कोरियोग्राफर राजीव खींची से की चुपके से शादी, तीन बच्चों की हैं माँ!”
खबर में दावा किया गया कि गीता कपूर ने मीडिया और फैंस से छुपाकर राजीव से कोर्ट मैरिज कर ली है और उनके तीन बच्चे भी हैं जिन्हें वे मुंबई से बाहर किसी गुप्त स्थान पर पाल रही हैं।
यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गई। फैंस सन्न रह गए। सोशल मीडिया पर कमेंट्स की बाढ़ आ गई—”क्या यह सच है?”, “गीता मां ने हमसे इतना बड़ा सच क्यों छुपाया?”, “बच्चे कहाँ हैं?”
अब यहाँ सवाल उठता है—असली गलती किसकी थी?
खबर छपने के बाद होना तो यह चाहिए था कि गीता या राजीव तुरंत एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाते और इस मनगढ़ंत खबर का खंडन करते। लेकिन दोनों में से किसी ने एक शब्द नहीं बोला!
न कोई आधिकारिक बयान आया,
न ही कोई लीगल नोटिस भेजा गया।
दोनों की इस रहस्यमयी खामोशी ने अफ़वाहों को और बल दिया। लोग सोचने लगे कि “अगर खबर झूठी होती, तो वे चुप क्यों रहते? ज़रूर दाल में कुछ काला है!”
पूरे तीन साल (2011 से 2014 तक) यह अफ़वाह इंटरनेट पर तैरती रही। लोग गीता को शादीशुदा और बच्चों की माँ मानते रहे।
फिर आया वर्ष 2014।
2014 में अचानक राजीव खींची मीडिया के सामने आए। एक इंटरव्यू में जब उनसे गीता के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने झल्लाते हुए कहा:
“यह सब बकवास है! न मेरी गीता से कोई शादी हुई है, न ही हमारे कोई बच्चे हैं। हम केवल बहुत अच्छे दोस्त हैं। मीडिया ने बिना किसी सबूत के हमारे नाम से झूठी कहानियाँ गढ़ी हैं।”
3 साल बाद सच सामने आया। फैंस ने उस न्यूज़ चैनल और रिपोर्टर को खूब लताड़ा। लेकिन जो सवाल पीछे छूट गया वो यह था कि—3 साल तक दोनों चुप क्यों रहे?
इंडस्ट्री इंसाइडर्स का मानना है कि गीता और राजीव के बीच वास्तव में एक गंभीर रिलेशनशिप था। लेकिन शादी और बच्चों की बात पूरी तरह झूठ थी। उस अफ़वाह के दौरान ही दोनों के रिश्तों में दरारें आनी शुरू हो गई थीं।
और आखिरकार, 2014 के अंत तक गीता कपूर और राजीव खींची का ब्रेकअप हो गया!
6 साल का रिश्ता एक झटके में टूटकर बिखर गया। 41 साल की उम्र में गीता कपूर एक बार फिर बिल्कुल अकेली रह गईं। यह उनके लिए सिर्फ एक ब्रेकअप नहीं था, बल्कि उनके उन सारे सपनों का कत्ल था जो उन्होंने एक परिवार बसाने के लिए देखे थे।
अध्याय 8: डिप्रेशन, शराब की लत और 2015 की वो ख़ौफ़नाक रात
ब्रेकअप के बाद की गीता कपूर वो गीता नहीं थीं जो टीवी स्क्रीन पर हंसती-खिलखिलाती दिखती थीं। कैमरे के हटते ही वे एक ज़ख्मी शेरनी की तरह अपने अकेलेपन में सिमट जाती थीं।
गंभीर अवसाद (Depression)—यह एक ऐसा शब्द है जो इंसान को अंदर से खोखला कर देता है। गीता डिप्रेशन के शिकार हो गईं।
रात को नींद नहीं आती थी।
दिमाग में अतीत के कड़वे संस्मरण घूमते रहते थे।
और इस दर्द से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने सहारा लिया—शराब का!
शुरुआत कभी-कभी एक-दो पैग से हुई, लेकिन धीरे-धीरे यह अवसाद की दवा बन गई। जब भी दर्द बढ़ता, गीता बोतल खोल लेतीं। शराब की पीक में दर्द कुछ घंटों के लिए सो जाता था, लेकिन अगली सुबह जब नशा उतरता, तो दर्द दोगुना होकर वापस लौटता था।
और इसी लत का सबसे वीभत्स और शर्मनाक नज़ारा देखने को मिला 12 मार्च 2015 की वो कड़ाके की ठंडी रात को!
घटना का विवरण: स्थान: वर्सोवा, अंधेरी पश्चिम, मुंबई।
समय: रात के लगभग 1:00 बजे।
गीता कपूर मुंबई के एक पॉश इलाके में आयोजित किसी देर रात की पार्टी से लौट रही थीं। अंदर अत्यधिक शराब थी, बाहर अंधेरा था, और हाथ में उनकी सफेद रंग की सेडान कार की स्टीयरिंग व्हील थी। कार अत्यधिक तेज़ गति में थी और अनियंत्रित हो रही थी।
सड़क पर 28 वर्ष का एक आम युवक, समीर निसार काजी, अपनी नाइट शिफ्ट खत्म करके पैदल अपने घर लौट रहा था। उसे क्या पता था कि अगले ही पल उसकी ज़िंदगी अपाहिज होने वाली है।
गीता की कार अनियंत्रित हुई, फुटपाथ के करीब आई और ज़ोरदार टक्कर के साथ समीर काजी को रौंदते हुए निकल गई!
समीर की चीख से सन्नाटा दहल गया।
उसकी दाहिनी टांग की हड्डी कई टुकड़ों में टूट गई (Multiple Fractures)।
उसकी गर्दन की रीढ़ की हड्डी में गंभीर क्रैक आया।
वह खून से लथपथ सड़क पर तड़पने लगा—”बचाओ! कोई मेरी मदद करो!”
मगर गीता ने क्या किया?
कार कुछ दूर जाकर रुकी। गीता ने बैक गियर डाला, एक पल के लिए देखा और फिर गाड़ी घुमाकर अंधेरे में भाग गईं! एक तड़पते हुए, खून से लथपथ इंसान को सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया गया।
सीसीटीवी का जाल और पुलिस की गिरफ्तारी: गीता को लगा कि अंधेरे में किसी ने उनका नंबर नहीं देखा। लेकिन वे भूल गई थीं कि मुंबई पुलिस के सीसीटीवी कैमरे हर चौराहे पर पहरा दे रहे थे।
सीसीटीवी फुटेज में कार का नंबर स्पष्ट दर्ज हो गया। अगली सुबह जब पूरा देश चाय की चुस्की ले रहा था, वर्सोवा पुलिस स्टेशन की टीम गीता कपूर के आलीशान फ्लैट के दरवाज़े पर खड़ी थी।
दरवाज़ा खुला। पुलिस ने गीता को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279 (रैश एवं लापरवाही से गाड़ी चलाना) और धारा 338 (किसी की जान जोखिम में डालकर गंभीर चोट पहुँचाना) के तहत गिरफ्तार कर लिया।
इंसाफ़ या पैसों का खेल? गीता को पुलिस स्टेशन लाया गया। मीडिया के कैमरे बाहर जमा हो गए। टीवी पर हेडलाइंस चलने लगीं—“गीता मां ने शराब के नशे में युवक को उड़ाया!”
लेकिन इसके बाद जो हुआ, उसने भारतीय कानूनी व्यवस्था और सेलिब्रिटी प्रिविलेज (सितारों के विशेषाधिकार) पर बहुत बड़ा सवालिया निशान लगा दिया।
गीता को कोर्ट से तुरंत ज़मानत मिल गई। पुलिस ने पीड़ित परिवार और गीता के बीच टेबल टॉक (समझौता) करवाया।
गीता कपूर ने पीड़ित समीर काजी के इलाज का पूरा खर्च उठाने का वादा किया।
उन्होंने ₹7 लाख नकद (Cash) और ₹3 लाख का चेक पीड़ित परिवार को सौंपा—कुल ₹10 लाख।
मामला कोर्ट के बाहर रफा-दफ़ा हो गया।
लेकिन आज भी यह सवाल हवा में तैरता है:
-
जिस इंसान की टांग हमेशा के लिए खराब हो गई, जिसकी गर्दन टूट गई, क्या उसके दर्द की कीमत सिर्फ ₹10 लाख थी?
अगर सड़क पर सीसीटीवी कैमरा नहीं होता, तो क्या ‘गीता मां’ कभी वापस मुड़कर उस गरीब लड़के का हाल पूछने जातीं?
क्या एक आम नागरिक ऐसा अपराध करता तो उसे जेल नहीं होती?
पैसों और शोहरत के दम पर केस तो बंद हो गया, लेकिन गीता कपूर की बेदाग छवि पर एक ऐसा ख़ूनी दाग लग गया जिसे धो पाना नामुमकिन था।
अध्याय 9: सिंदूर का बवंडर, ‘सुपर डांसर’ का नया साम्राज्य और ₹51 करोड़ की नेटवर्थ
2015 के इस काले हादसे के बाद गीता कपूर कुछ समय के लिए डिप्रेशन के और गहरे दौर में चली गईं। लेकिन जीवन का चक्र रुकता नहीं है।
2016 में गीता ने एक बड़ा व्यावसायिक फैसला लिया। उन्होंने 8 सालों से जुड़े शो ‘डांस इंडिया डांस’ (ज़ी टीवी) को अलविदा कह दिया। वजह थी—सोनी टीवी का नया और बड़ा ऑफर!
सोनी टीवी नया शो ला रहा था—‘सुपर डांसर’ (शिल्पा शेट्टी और अनुराग बासु के साथ)।
DID के आखिरी दिनों में गीता को ₹3 लाख प्रति एपिसोड मिल रहे थे।
‘सुपर डांसर’ ने उन्हें ₹4 लाख प्रति एपिसोड का ऑफर दिया!
गीता ने तुरंत हाँ कर दी। महीने के 8 एपिसोड्स का मतलब था—₹32 लाख प्रति माह! केवल एक टीवी शो से!
‘सुपर डांसर’ सुपरहिट साबित हुआ। शिल्पा शेट्टी का ग्लैमर, अनुराग बासु की मस्ती और गीता मां का वही पुराना वात्सल्य—इस तिकड़ी ने टीआरपी के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
इसी शो के दौरान मई 2020 में वो घटना घटी जिसका ज़िक्र हमने इस कहानी की शुरुआत में किया था।
गीता ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक फोटो अपलोड की। लाल साड़ी, खुले बाल और माथे से लेकर मांग तक भरा हुआ गाढ़ा लाल सिंदूर!
कैप्शन में कुछ खास नहीं लिखा था। फोटो पोस्ट होते ही इंटरनेट पर भूचाल आ गया।
“क्या गीता मां ने 47 साल की उम्र में चुपके से शादी कर ली?”
“दूल्हा कौन है? क्या राजीव खींची वापस आ गए या फराह खान के भाई साजिद खान से शादी हुई है?”
दिनों तक यह बहस चलती रही। मीडिया हाउस उनके घर के चक्कर काटने लगे। आखिरकार, जब पानी सिर से ऊपर चला गया, तो गीता कपूर ने एक बयान जारी किया:
“मैंने शादी नहीं की है! अगर मैं शादी करूंगी, तो छुपाऊंगी क्यों? मैं पूरे डंके की चोट पर सबको बताकर शादी करूंगी। यह सिंदूर ‘सुपर डांसर’ के एक विशेष बॉलीवुड-थीम वाले एपिसोड के शूट के लिए लगाया गया था। लोग बिना वजह अफ़वाहें न फैलाएं।”
लेकिन आज भी, सोशल मीडिया के कई पन्नों पर लोग इस बात को नहीं मानते। उनका मानना है कि गीता कपूर ने अपने निजी जीवन को पूरी तरह से गुप्त रखने के लिए यह कहानी गढ़ी।
आर्थिक सफलता का नया शिखर:
चाहे विवाद जो भी रहे हों, व्यवसायिक रूप से गीता कपूर ने जो हासिल किया, वह अकल्पनीय है।
1998 (पहली कमाई): ₹226
2000 (असिस्टेंट सैलरी): ₹45,000/माह
2008 (DID Season 1): ₹80,000/एपिसोड
2016 (Super Dancer): ₹4,000,000/एपिसोड
2026 (अनुमानित कुल संपत्ति): ₹51 करोड़+ (Approx. $6.1 Million)
आज रिपोर्ट्स के मुताबिक, गीता कपूर की कुल नेटवर्थ लगभग ₹51 करोड़ है।
मुंबई के पॉश इलाके में उनके अपने लग्जरी फ्लैट्स हैं।
कई कमर्शियल प्रॉपर्टीज से उन्हें भारी किराया आता है।
वे कई ब्रांड्स को एंडॉर्स करती हैं और प्राइवेट शोज़ की जजिंग के लिए लाखों रुपये चार्ज करती हैं।
₹226 के एक लिफ़ाफ़े से शुरू हुआ सफर आज ₹51 करोड़ के साम्राज्य में बदल चुका है।
अध्याय 10: आज का सच, ट्रॉलिंग के जख्म और निष्कर्ष
आज गीता कपूर 50 वर्ष से अधिक की हो चुकी हैं। वे सिंगल हैं, अविवाहित हैं और अपने काम में व्यस्त हैं।
मगर क्या ₹51 करोड़ की संपत्ति और ‘गीता मां’ का तमगा बचपन के उन ज़ख्मों को भर पाया है?
जवाब है—नहीं।
आज भी, जब गीता कपूर इंस्टाग्राम या फेसबुक पर अपनी कोई तस्वीर पोस्ट करती हैं, तो नीचे कमेंट सेक्शन में सैकड़ों लोग उनका मज़ाक उड़ाते हैं:
“इतनी मोटी क्यों हो?”
“थोड़ा कम खाया करो।”
“हाथी जैसा शरीर बना रखा है।”
बचपन में स्कूल की दीवारों पर जो “मोटी भैंस” लिखा जाता था, आज वो सोशल मीडिया के कीबोर्ड्स पर टाइप होता है। दुनिया नहीं बदली, केवल माध्यम बदल गया।
गीता कपूर इन ट्रोल्स का कभी जवाब नहीं देतीं। वे चुप रहती हैं। वे जानती हैं कि उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह अपने शरीर के बल पर नहीं, बल्कि अपने हुनर, अपनी आत्मा और अपनी मेहनत के बल पर हासिल किया है।
निष्कर्ष:
गीता कपूर की ज़िंदगी बॉलीवुड का वो दर्पण है जिसमें चमक भी है और कालिख भी।
यह कहानी हमें सिखाती है कि अगर आपके अंदर जुनून है, तो ₹226 की पहली कमाई भी आपको ₹51 करोड़ तक पहुँचा सकती है।
यह कहानी हमें यह भी सचेत करती है कि सफलता की ऊंचाइयों पर पहुँचकर एक पल का अहंकार या शराब का नशा आपकी पूरी ज़िंदगी को एक झटके में तबाह कर सकता है।
गीता मां कोई देवी नहीं हैं। वे एक साधारण इंसान हैं—जिन्होंने गलतियाँ भी कीं, जो टूटीं भी, जो भटकीं भी, लेकिन हर बार गिरकर वापस खड़ी हुईं और आज भी करोड़ों डांसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं।