पत्नी ने पति को फोन कर घर आने को कहा था पर पति नहीं आया।
राजस्थान की सुनीता का दर्द और होली की वह खौफनाक रात
अध्याय 1: राजस्थान का देहाती आँगन और सुनीता का निष्छल बचपन
राजस्थान की पावन धरा अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, वीरों की गाथाओं और अपनी अनूठी संस्कृति के लिए पूरे विश्व में जानी जाती है। इसी खूबसूरत राज्य के एक दूर-दराज के देहाती क्षेत्र में बसा हुआ था एक छोटा सा शांत गाँव। गाँव की पगडंडियाँ, मिट्टी के बने कच्चे मकान और भोर की बेला में गूँजती पक्षियों की चहचहाहट यहाँ की पहचान थी। इस गाँव की आबो-हवा में सादगी और अपनापन घुला हुआ था, जहाँ लोग अपनी सीमित ज़रूरतों के साथ जीवन व्यतीत करते थे।
इसी छोटे से गाँव के एक साधारण से कच्चे मकान में जन्म हुआ था सुनीता का। सुनीता बचपन से ही देखने में अत्यंत सुंदर, तीखे नैन-नक्श और सीधे-सादे स्वभाव की लड़की थी। उसके घर की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी। सुनीता के माता-पिता अत्यंत गरीब और निष्छल किसान थे, जिनके पास अपनी खुद की कोई कृषि भूमि नहीं थी। वे अपनी आजीविका चलाने के लिए गाँव के बड़े ज़मींदारों और रसूखदार लोगों के खेतों में दिन-रात कड़ी मज़दूरी किया करते थे।
सुबह सूरज उगने से पहले ही सुनीता के माता-पिता हाथों में कुदाल और हँसिया लेकर दूसरों के खेतों की ओर निकल जाते थे। दिन भर कड़ी धूप और पसीने में मेहनत करने के बाद शाम को जो थोड़ी-बहुत दिहाड़ी मिलती, उसी से घर का चूल्हा जलता और परिवार का गुजर-बसर होता था। वे अक्सर सूखी रोटी और मिर्च की चटनी खाकर भी संतोष की साँस लेते थे।
हालाँकि घर में भयंकर गरीबी थी, परंतु इसके बावजूद सुनीता के मन में जीवन को लेकर कोई शिकायत नहीं थी। वह जानती थी कि उसके माता-पिता किस कदर मेहनत करके उसे पाल-पोस रहे हैं। सुनीता अपने कच्चे घर की लीपा-पोती करती, कुएँ से पानी भरकर लाती और अपनी माँ के साथ रसोई के कामों में हाथ बँटाती थी। गाँव के लोग अक्सर कहा करते थे कि भले ही सुनीता झोपड़ी में पल रही है, परंतु उसके संस्कार और उसकी समझदारी किसी राजघराने की बेटी से कम नहीं है।
सुनीता के पिता का एक ही सपना था कि भले ही वे खुद ताउम्र दूसरों के खेतों में पसीना बहाते रहे, लेकिन उनकी बेटी थोड़ी-बहुत पढ़ाई लिखाई कर ले ताकि उसे किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े। इसी उम्मीद के साथ उन्होंने गाँव के ही सरकारी विद्यालय में सुनीता का दाखिला करवा दिया था। सुनीता भी अपने पिता के सपनों को पूरा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत से पढ़ाई करने लगी।
अध्याय 2: कॉलेज की दहलीज़ और संजय की मोहब्बत का रंग
समय अपनी गति से सरकता रहा। सुनीता ने अपनी लगन और मेहनत के बल पर गाँव के स्कूल से 12वीं कक्षा की परीक्षा अच्छे अंकों के साथ उत्तीर्ण कर ली। 12वीं की परीक्षा पास करने के बाद उसके सामने आगे की पढ़ाई का सवाल खड़ा हो गया। गाँव में आगे की शिक्षा के लिए कोई कॉलेज नहीं था, इसलिए पास के कसबे में स्थित एक महाविद्यालय (कॉलेज) में सुनीता का दाखिला करवाया गया।
कच्चे घर की चौखट से निकलकर जब सुनीता पहली बार शहर के उस बड़े कॉलेज के प्रांगण में पहुँची, तो उसके लिए सब कुछ नया और अचंभित करने वाला था। कॉलेज में अलग-अलग गाँवों और शहरों से आए युवा और युवतियाँ पढ़ते थे। वहाँ का माहौल उसके गाँव के माहौल से बिल्कुल अलग था। शुरुआत में सुनीता शर्मीले स्वभाव के कारण किसी से अधिक बात नहीं करती थी और चुपचाप अपनी कक्षाओं में बैठकर पढ़ाई पर ध्यान देती थी।
धीरे-धीरे कॉलेज में उसकी कुछ सहेलियाँ बन गईं। उसी कॉलेज में उसके साथ ही एक युवक भी पढ़ता था, जिसका नाम संजय था। संजय देखने में अत्यधिक आकर्षक, ऊँचे कद-काठी और समृद्ध परिवार का लड़का था। संजय के पिता क्षेत्र के जाने-माने और संपन्न व्यापारी थे, इसलिए संजय के पास पैसों, महँगी गाड़ियों और आधुनिक साधनों की कोई कमी नहीं थी।
संजय ने जब पहली बार सुनीता को कॉलेज के गलियारे में देखा, तो वह उसकी सादगी और मासूमियत पर मोहित हो गया। जहाँ कॉलेज की अन्य लड़कियाँ आधुनिकता के रंग में रंगी रहती थीं, वहीं साधारण से सूती सूट में लिपटी सुनीता की सादगी संजय के दिल में उतर गई।
संजय ने धीरे-धीरे सुनीता से बातचीत करने का प्रयास शुरू किया। शुरुआत में तो सुनीता झिझकती रही, लेकिन संजय के नम्र व्यवहार और मीठी बातों ने धीरे-धीरे उसके मन का डर दूर कर दिया। दोनों के बीच दोस्ती हो गई। वे कॉलेज के कैंटीन में साथ बैठते, पढ़ाई के विषय में चर्चा करते और एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करने लगे।
संजय जानता था कि सुनीता एक बेहद गरीब परिवार से आती है। इसलिए वह अक्सर सुनीता की मदद करने के बहाने उसके लिए महँगे उपहार, नए कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और तरह-तरह के खाने-पीने की चीज़ें लेकर आता था। शुरुआत में तो सुनीता उपहार लेने से मना करती थी, लेकिन संजय के अत्यधिक ज़िद करने पर वह मुस्कुराकर स्वीकार कर लेती थी।
संजय का यह ध्यान रखना और निस्वार्थ स्नेह देखकर सुनीता के निष्छल मन में भी संजय के लिए प्रेम का अंकुर फूट पड़ा। कॉलेज की औपचारिक दोस्ती कब दो दिलों की अटूट मोहब्बत में बदल गई, यह उन दोनों को भी पता न चला। दोनों एक-दूसरे से बेपनाह प्यार करने लगे और साथ जीने-मरने की कसमें खाने लगे।
अध्याय 3: गुप्त फ़ोन, छिपी मोहब्बत और सच का उजागर होना
जब सुनीता और संजय के प्रेम-प्रसंग को कॉलेज में लगभग डेढ़ साल का समय बीत गया, तो दोनों की बेचैनी और बढ़ गई। वे छुट्टियों के दिनों में या कॉलेज के बाद भी एक-दूसरे से बात करना चाहते थे। परंतु सुनीता के पास कोई मोबाइल फ़ोन नहीं था।
सुनीता की इस परेशानी को समझते हुए संजय ने एक दिन उसे एक नया और महँगा स्मार्टफोन उपहार में दे दिया। स्मार्टफोन पाकर सुनीता की खुशी का ठिकाना न रहा। अब वे दोनों दिन-रात एक-दूसरे से जुड़ सकते थे।
परंतु सुनीता के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस फ़ोन को अपने माता-पिता से छिपाकर रखने की थी। सुनीता के माता-पिता दिन भर खेतों में कठिन परिश्रम करते थे और देर शाम थके-हारे घर लौटते थे। सुनीता दिन भर जब घर पर अकेली होती, तो वह अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करके घंटों संजय से फ़ोन पर बातें करती, अपनी मीठी यादें साझा करती और भविष्य के सपने बुनती।
शाम को माता-पिता के लौटने से पहले सुनीता उस फ़ोन को साइलेंट करके अपनी अलमारी के सबसे निचले हिस्से में कपड़ों के पीछे छिपा देती थी। जब माता-पिता घर आते, तो सुनीता उनके सामने एक आज्ञाकारी बेटी की तरह प्रस्तुत होती और रात का भोजन बनाकर उन्हें परोसती। माता-पिता को ज़रा भी भनक नहीं थी कि उनकी सीधी-साधी बेटी के जीवन में एक गुप्त प्रेम-प्रसंग चल रहा है और उसके पास एक महँगा मोबाइल फ़ोन भी है।
कहा जाता है कि ‘इश्क़ और मुश्क़ छिपाए नहीं छुपते।’ यही बात सुनीता के साथ भी हुई।
एक दिन सुनीता की तबियत थोड़ी खराब थी, इसलिए वह कॉलेज नहीं गई थी। दोपहर के समय वह अपने बिस्तर पर लेटी हुई संजय से फ़ोन पर फुसफुसाकर बातें कर रही थी। उसी दिन इत्तेफाक से खेतों में पानी की बारी खत्म हो जाने के कारण उसके पिता दोपहर में ही असामयिक रूप से घर वापस लौट आए।
पिता ने जैसे ही घर के भीतर कदम रखा, उन्हें सुनीता के कमरे से किसी पुरुष से बातें करने की धीमी आवाज़ सुनाई दी। पिता के कदम वहीं ठिठक गए। उन्होंने दबे पाँव कमरे के दरवाज़े की झिरी से अंदर झाँका। उन्होंने देखा कि उनकी बेटी हाथ में एक महँगा फ़ोन पकड़े मुस्कुराते हुए किसी लड़के से बातें कर रही है और उसके भाव पूरी तरह प्रेम में डूबे हुए हैं।
पिता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। जिस बेटी पर उन्हें अपनी गरीबी से भी ज़्यादा नाज़ था, वह अपनी मर्यादा लाँघकर यह सब कर रही थी! पिता ने गुस्से में दरवाज़े को ज़ोर से धक्का दिया और कमरे के भीतर दाखिल हो गए।
पिता को अचानक सामने खड़ा देखकर सुनीता के हाथ से फ़ोन छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसका चेहरा डर के मारे ज़र्द पड़ गया। पिता ने झपटकर वह फ़ोन उठाया और दहाड़ते हुए पूछा, “यह फ़ोन कहाँ से आया सुनीता? और तू इतनी दोपहर में किससे बातें कर रही थी?”
सुनीता डर के मारे काँपने लगी और फूट-फूटकर रोने लगी। जब शाम को उसकी माँ भी घर लौटी, तो पिता ने पूरे घर में हंगामा खड़ा कर दिया। कड़ाई से पूछताछ करने पर सुनीता ने रोते हुए संजय और अपने प्रेम-प्रसंग का पूरा सच उगल दिया।
अध्याय 4: मजबूरी की शादी, 12 साल का गृहस्थ जीवन और दूरी का दर्द
बेटी के मुख से एक संपन्न परिवार के लड़के के साथ प्रेम-प्रसंग की बात सुनकर माता-पिता के होश उड़ गए। वे जानते थे कि उनकी सामाजिक स्थिति और गरीबी के कारण संजय का अमीर परिवार कभी सुनीता को अपनी बहू के रूप में स्वीकार नहीं करेगा। इसके अलावा, गाँव में इस बात की भनक लगने पर उनकी बची-कुची प्रतिष्ठा भी मिट्टी में मिल जाती।
सुनीता के पिता ने उसी रात कड़ा फैसला लिया। उन्होंने सुनीता का कॉलेज जाना तुरंत प्रभाव से बंद करवा दिया और उसका मोबाइल फ़ोन तोड़कर फेंक दिया। उन्होंने साफ़ शब्दों में कह दिया, “हम गरीब ज़रूर हैं सुनीता, लेकिन अपनी मर्यादा बेचकर किसी अमीर के घर की कठपुतली नहीं बनेंगे। तेरा यह प्यार और कॉलेज कल से खत्म!”
इसके बाद सुनीता के माता-पिता ने अपनी सामाजिक साख बचाने के लिए तुरंत उसके रिश्ते की तलाश शुरू कर दी। बहुत ढूँढने के बाद, उन्हें पास ही के एक अन्य गाँव में एक मध्यमवर्गीय परिवार का रिश्ता मिला। लड़का सीधा-साधा था और उसका नाम राजेश था। राजेश का परिवार खेती-बाड़ी और छोटे-मोटे व्यापार से जुड़ा हुआ था।
संजय से अलग होने के गम में सुनीता का रो-रोकर बुरा हाल था, परंतु अपने गरीब माता-पिता की दुहाई और पारिवारिक मर्यादा की दुहाई के आगे सुनीता असहाय हो गई। भारी मन से उसने अपनी किस्मत से समझौता कर लिया और माता-पिता की इच्छा के आगे सिर झुका दिया।
वर्ष 2014 के आसपास सुनीता का विवाह बड़े ही साधारण रीति-रिवाजों के साथ राजेश से संपन्न हो गया। विवाह के बाद सुनीता अपने पति के घर आ गई।
शुरुआती कुछ महीनों में सुनीता का मन अपने नए घर में नहीं लगता था, लेकिन समय के साथ उसने अपने अतीत को पूरी तरह भुला दिया और अपने पति राजेश तथा अपने ससुराल को ही अपनी दुनिया मान लिया। राजेश स्वभाव से एक सहृदय और निष्छल इंसान था। उसने अपनी पत्नी सुनीता को पूरा आदर और स्नेह दिया।
समय बीतता गया और देखते ही देखते सुनीता की शादी को पूरे 12 साल बीत चुके थे! अब समय आ चुका था—वर्ष 2026।
इन 12 वर्षों में सुनीता की उम्र अब लगभग 32-33 वर्ष के करीब पहुँच चुकी थी। वह अपने गृहस्थ जीवन को पूरी निष्ठा से सँभाल रही थी। परंतु इस दांपत्य जीवन में एक बहुत बड़ी कमी थी—पति-पत्नी के बीच की भौतिक दूरी।
राजेश गाँव में रहकर पर्याप्त कमाई नहीं कर पाता था, इसलिए उसने आजीविका कमाने के लिए राज्य से बाहर (एक दूरस्थ शहर) में नौकरी कर ली थी। राजेश अक्सर नौकरी के सिलसिले में 4 महीने, 6 महीने या 8 महीने तक घर से बाहर ही रहता था। वह साल में केवल एक या दो बार ही कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने घर आ पाता था।
ससुराल में अब केवल दो ही लोग मुख्य रूप से रहते थे—सुनीता और उसका वृद्ध ससुर। ससुर की उम्र लगभग 60-65 वर्ष के आसपास थी। सुनीता का पति बाहर रहता था, इसलिए घर की पूरी ज़िम्मेदारी सुनीता के कंधों पर ही थी। वह अपने ससुर के खाने-पीने, दवा-पानी और घर की साफ़-सफ़ाई का पूरा ध्यान रखती थी। गाँव वाले भी सुनीता के पतिव्रता धर्म और ससुर की सेवा की मिसाल दिया करते थे।
परंतु सुनीता भीतर ही भीतर अपने पति की निरंतर अनुपस्थिति से बेहद उदास और एकाकीपन महसूस करती थी। वह चाहती थी कि उसका पति त्योहारों और विशेष अवसरों पर उसके साथ रहे।
अध्याय 5: होली का पावन पर्व और पति का घर आने से इनकार
तारीख आ चुकी थी—मार्च 2026 (होली का दिन)।
पूरे देश के साथ-साथ राजस्थान के इस छोटे से गाँव में भी रंगों का पावन पर्व ‘होली’ बड़े ही धूमधाम से मनाया जा रहा था। सुबह से ही हवाओं में गुलाल की महक तैर रही थी। गाँव के बच्चे, युवा और बुजुर्ग टोली बनाकर ढोलक की थाप पर नाचते-गाते हुए एक-दूसरे को रंग लगा रहे थे। हर घर से गुझिया और मिठाइयों की खुशबू आ रही थी।
परंतु सुनीता का दिल इस त्योहार के माहौल में भी उदास था। उसके पति राजेश को शहर गए हुए लगभग 6 महीने बीत चुके थे।
होली से ठीक दो दिन पहले, सुनीता ने अपने पति राजेश को फ़ोन लगाया था। उसने फ़ोन पर बेहद भावुक होकर कहा था, “सुनिए जी! इस बार होली पर आप घर ज़रूर आ जाइए। 6 महीने हो गए हैं आपको देखे हुए। गाँव में सब अपने परिवार के साथ होली खेल रहे हैं। मेरा मन अकेले बिल्कुल नहीं लगता। आप कम से कम दो दिन की छुट्टी लेकर आ जाइए।”
परंतु राजेश ने अपनी लाचारी व्यक्त करते हुए कहा था, “सुनीता! मैं भी घर आना चाहता हूँ, लेकिन मेरी कंपनी में इस समय काम का बहुत ज़्यादा दबाव है। मालिक ने छुट्टी देने से साफ़ मना कर दिया है। अगर मैं बिना बताए आया तो मेरी नौकरी छूट जाएगी। तुम उदास मत हो, मैं अगले महीने पक्का आऊँगा। तुम पिताजी के साथ घर पर अच्छे से त्योहार मना लेना।”
पति के इनकार के बाद सुनीता का दिल टूट गया। उसने भारी मन से फ़ोन रख दिया।
होली वाले दिन (मार्च 2026) की सुबह लगभग 10:00 बजे का समय था। गाँव की गलियों में लोग होली के हुड़दंग में मग्न थे। सुनीता ने घर के सारे काम निपटा लिए थे। उसने नए कपड़े पहन रखे थे, परंतु उसके चेहरे पर कोई रंग नहीं लगा था। वह सूने मन से घर के आँगन में बैठी हुई थी।
दूसरी ओर, सुनीता का ससुर सुबह 9:00 बजे ही घर से बाहर निकल चुका था। वह गाँव के अपने हमउम्र दोस्तों और रसूखदार लोगों की चौपाल पर होली खेलने गया था।
गाँव की चौपाल पर होली खेलने के बहाने पुरुषों के बीच मदिरापान का दौर शुरू हो गया। ससुर जो सामान्य दिनों में थोड़ा संयमित रहता था, उसे होली के पावन पर्व का बहाना मिल गया। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अत्यधिक मात्रा में मदिरा का सेवन कर लिया।
शराब का तीखा नशा जैसे-जैसे ससुर के सिर पर चढ़ने लगा, उसके भीतर का नैतिक विवेक और सामाजिक मर्यादा की भावना क्षीण होने लगी। ढलती उम्र में मदिरा के नशे ने उसके मन में छुपी नीच वासना को जगा दिया था। वह नशे में धुत होकर अपने घर की ओर लौटने लगा।
अध्याय 6: मदिरा का नशा, ससुर का बहकता मन और होली का बहाना
सुबह के लगभग 11:00 बज चुके थे।
सुनीता अपने विशालकाय कच्चे-पक्के मकान के भीतर अकेली थी। मुख्य द्वार आधा खुला हुआ था। सुनीता रसोई में दोपहर के भोजन की तैयारी कर रही थी। पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था, केवल बाहर की गली से कभी-कभार बच्चों के चिल्लाने की आवाज़ें आ रही थीं।
तभी हवेली के मुख्य दरवाज़े पर भारी और लड़खड़ाते कदमों की आहट हुई। सुनीता का ससुर नशे में पूरी तरह धुत होकर भीतर दाखिल हुआ। उसके कपड़ों पर लाल-हरे रंग लगे हुए थे और उसकी आँखें मदिरा के अत्यधिक सेवन के कारण अँगारे की तरह लाल हो रही थीं। उसके मुँह से शराब की तीव्र दुर्गंध आ रही थी।
ससुर ने जैसे ही आँगन में कदम रखा, उसकी नज़र रसोई के मुहाने पर खड़ी अपनी बहू सुनीता पर पड़ी।
सुनीता के चेहरे पर कोई रंग नहीं लगा था। वह बिल्कुल सादे और निखरे रूप में खड़ी थी। शराब के नशे में धुत ससुर की कामुक नज़रों ने जब अपनी बहू के ढलते रूप और निखरी काया को देखा, तो उसके भीतर का शैतान पूरी तरह जाग उठा। उसने धर्म, मर्यादा और ससुर-बहू के पवित्र रिश्ते को एक ही पल में भुला दिया।
ससुर ने अपनी जेब से गुलाल की एक पुड़िया निकाली और लड़खड़ाती ज़बान में कहा, “अरे… बहू! तूने अभी तक होली नहीं खेली? पूरा गाँव रंगों में डूब रहा है और तू यहाँ बिना रंग के उदास खड़ी है? आज तो होली है बहू… आज तो रंग लगाना ही पड़ेगा!”
सुनीता ने अपने ससुर की हालत देखी तो वह समझ गई कि उसके ससुर ने अत्यधिक मदिरापान कर रखा है। सुनीता ने नम्रता से अपने हाथ जोड़ लिए और पीछे हटते हुए कहा, “नहीं पिताजी! आप बहुत ज़्यादा नशे में हैं। आप जाकर अपने कमरे में आराम कीजिए। मैंने आपके लिए नींबू पानी बना देती हूँ। मुझे रंग मत लगाइए।”
परंतु ससुर के सिर पर वासना और शराब का भूत सवार हो चुका था। वह कुटिलता से मुस्कुराते हुए आगे बढ़ा और बोला, “अरे बहू! ससुर तो पिता समान होता है… पिता अगर अपनी बहू को रंग लगाए तो इसमें ऐतराज कैसा?”
यह कहते हुए ससुर ने ज़बरदस्ती आगे बढ़कर अपने दोनों हाथों में गुलाल भरा और सुनीता के गालों तथा गर्दन पर ज़ोर-ज़ोर से मलना शुरू कर दिया।
ससुर के हाथों का स्पर्श और उसकी नीयत देखकर सुनीता का माथा ठनक गया। ससुर का स्पर्श पिता समान आदर का नहीं, बल्कि वासना से भरा हुआ था। उसकी मदिरा से भरी साँसें सुनीता के चेहरे पर पड़ रही थीं।
सुनीता को घिन आने लगी। उसने ससुर को धक्का देकर पीछे हटाने का प्रयास किया और कड़े स्वर में कहा, “पिताजी! अपनी मर्यादा में रहिए! आप होश में नहीं हैं! पीछे हटिए वरना मैं अच्छा नहीं होगा!”
अध्याय 7: कमरा बंद, चीख-पुकार और ससुर का खौफनाक कारनामा
परंतु 32 वर्षीय सुनीता की शारीरिक ताक़त उस नशे में धुत और हैवान बन चुके 60 वर्षीय ससुर के आगे कम पड़ने लगी।
जब सुनीता ने पीछे हटने का प्रयास किया, तो ससुर का आपा पूरी तरह खो गया। उसने होली खेलने के सारे बहाने दरकिनार कर दिए। ससुर ने हैवानियत की सारी सीमाएँ लाँघते हुए अचानक ज़बरदस्ती सुनीता को कमर से दबोच लिया।
सुनीता चीख उठी, “छोड़िए मुझे! आप यह क्या नीचता कर रहे हैं? आप मेरे पिता समान हैं!”
परंतु ससुर पर वासना का अंधियारा छाया हुआ था। उसने सुनीता की चीख-पुकार की परवाह किए बिना उसे अपनी गोद में उठा लिया। सुनीता अपने हाथ-पैर मारती रही, ससुर के चेहरे पर नाखून मारती रही और खुद को छुड़ाने के लिए पूरी ताक़त से छटपटाती रही। परंतु ससुर ने उसे कसकर भींच रखा था।
वह नशेड़ी ससुर अपनी बहू को गोद में उठाए हुए सीधे अपने बेडरूम की ओर बढ़ा। उसने सुनीता को कमरे के भीतर ले जाकर बिस्तर पर दे मारा और आनन-फानन में कमरे का भारी लकड़ी का दरवाज़ा अंदर से बंद करके सांकल चढ़ा दी!
कमरा बंद होते ही सुनीता के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे समझ आ गया कि आज उसके अपने ही घर में उसकी अस्मत पर सबसे बड़ा हमला होने वाला है।
सुनीता बिस्तर से उठकर दरवाज़े की ओर भागी और कुंडी खोलने की कोशिश करने लगी। परंतु ससुर ने पीछे से आकर उसके बालों को कसकर पकड़ लिया और उसे वापस खींचकर बिस्तर पर पटक दिया।
“पिताजी! भगवान के लिए मुझे छोड़ दीजिए! आपका बेटा बाहर मेरी कमाई के लिए पसीना बहा रहा है और आप उसके पीछे यह क्या अधर्म कर रहे हैं? आपको ईश्वर का खौफ़ नहीं है?” सुनीता रोते-गिड़गिड़ाते हुए चिल्लाई।
परंतु उस हैवान बने ससुर पर बहू की इन गिड़गिड़ाने वाली बातों का कोई असर नहीं हुआ। ससुर ने घमंड और वासना के अंधेपन में कहा, “आज कोई तुझे बचाने नहीं आएगा! मेरा बेटा दूर शहर में बैठा है और घर में सिर्फ मैं और तू हैं!”
इसके बाद जो कुछ उस बंद कमरे में हुआ, वह किसी भी सभ्य समाज के लिए कलंक और खौफनाक त्रासदी से कम नहीं था।
उस नशेड़ी ससुर ने अपनी ही सगी बहू सुनीता के साथ ज़बरदस्ती करते हुए उसकी साड़ी को फाड़ डाला और उसके साथ अत्यंत /मर्यादाहीन आचरण/ तथा /अनैतिक कृत्य/ को अंजाम देना शुरू कर दिया। सुनीता अपनी पूरी ताक़त से संघर्ष करती रही, उसने ससुर के हाथों पर काटा, उसे धकेला, परंतु ससुर ने उसके दोनों हाथों को बिस्तर से दबा दिया।
उस बंद कमरे के भीतर ससुर ने बहू की अस्मत को तार-तार करते हुए उसके साथ घोर /अनाचार/ और /मर्यादा का उल्लंघन/ किया। सुनीता की चीखें उस ठंडी दीवारों से टकराकर दम तोड़ती रहीं। होली के पावन पर्व पर, जिस घर में खुशियों के रंग बिखरने चाहिए थे, उस घर के भीतर कामुकता और नीचता का नग्न नाच हो रहा था।
लगभग आधे घंटे तक उस खौफनाक /अनैतिक कृत्य/ को अंजाम देने के बाद, जब ससुर की हवस शांत हुई, तो वह हाँफता हुआ बिस्तर के किनारे बैठ गया। शराब का नशा और शारीरिक थकावट के कारण वह वहीं बेसुध होकर ढह गया।
दूसरी ओर, बिस्तर के कोने में पड़ी सुनीता की हालत अत्यंत दयनीय और खराब हो चुकी थी। उसके कपड़े फटे हुए थे, शरीर पर नीले निशान पड़े हुए थे, बाल बिखरे थे और चेहरा आंसुओं व गुलाल के घिनौने मिश्रण से भरा हुआ था। वह अपनी अस्मत लुट जाने के गम में अंदर तक टूट चुकी थी।
अध्याय 8: फ़ोन की देर से बजती घंटी, पति का लौट आना और सच का सामना
कमरे के फर्श पर पड़ी सुनीता फूट-फूटकर रो रही थी। उसका पूरा शरीर दर्द और ग्लानि से काँप रहा था। जिस ससुर को वह पिता का दर्जा देती थी, उसने उसके विश्वास और पवित्र रिश्ते की बलि चढ़ा दी थी।
तभी, कमरे के कोने में रखी सुनीता की अलमारी के ऊपर पड़े उसके मोबाइल फ़ोन की घंटी बज उठी।
सुनीता ने काँपते हाथों और रेंगते हुए कदमों से जाकर फ़ोन उठाया। स्क्रीन पर उसके पति ‘राजेश’ का नाम चमक रहा था।
सुनीता ने जैसे ही फ़ोन उठाकर कान से लगाया, दूसरी ओर से राजेश की प्रसन्न आवाज़ आई, “हेलो सुनीता! हैप्पी होली! मैंने सोचा कि तुम्हें होली की बधाई दे दूँ। तुम कैसी हो? पिताजी कहाँ हैं?”
पति की आवाज़ सुनते ही सुनीता के भीतर रुका हुआ आंसुओं का सैलाब फट पड़ा। वह फ़ोन पर ही चीख-चीखकर रोने लगी। उसकी हिकी बंद गई और मुख से शब्द नहीं निकल पा रहे थे।
राजेश घबरा गया। उसने पूछा, “सुनीता! क्या हुआ? तुम ऐसे रो क्यों रही हो? क्या गाँव में कोई हादसा हो गया है? बताओ मुझे!”
सुनीता ने रोते-बिलखते हुए रुँधे गले से कहा, “राजेश… आप तुरंत घर आ जाइए! अगर आप आज घर नहीं आए तो मैं अपनी जान दे दूँगी! आपके बाप ने… आपके पिता ने मेरे साथ बहुत बड़ा अधर्म कर दिया है! मेरी ज़िंदगी तबाह हो गई!”
पत्नी के मुख से यह खौफनाक बात सुनते ही शहर में बैठे राजेश के हाथों से फ़ोन लगभग छूट ही गया। राजेश ने बिना एक सेकंड गँवाए कहा, “सुनीता! तुम शांत रहो, कोई गलत कदम मत उठाना! मैं अभी के अभी बस पकड़कर घर आ रहा हूँ!”
राजेश ने तुरंत अपने कारखाने के मालिक को सूचना दी और पहली उपलब्ध बस पकड़कर अपने गाँव की ओर रवाना हो गया। शहर से गाँव की दूरी लगभग 6-7 घंटे की थी। उन 6 घंटों में राजेश के दिल पर क्या गुज़री, यह केवल वही जानता था।
रात के लगभग 8:00 बज चुके थे।
राजेश बदहवास हालत में अपने घर के मुख्य द्वार पर पहुँचा। घर के भीतर गहरा सन्नाटा और अँधेरा छाया हुआ था। राजेश दौड़कर भीतर पहुँचा। उसने देखा कि उसकी पत्नी सुनीता अपने बेडरूम के कोने में घुटनों में सिर छिपाए रो रही थी। उसकी हालत देखकर राजेश का कलेजा मुँह को आ गया।
राजेश अपनी पत्नी के पास घुटनों के बल बैठ गया और उसके हाथ थामकर पूछा, “सुनीता! बताओ क्या हुआ? पिताजी कहाँ हैं?”
सुनीता ने रोते हुए अपने पति के गले लगकर पूरी दास्तान कह सुनाई। उसने बताया कि कैसे होली के दिन 11:00 बजे उसका ससुर नशे में धुत होकर आया, कैसे उसने ज़बरदस्ती उसे गोद में उठाकर कमरे में बंद किया और कैसे उसके साथ घोर /मर्यादाहीन कृत्य/ और /अनाचार/ किया।
पत्नी की बात सुनते ही राजेश की आँखों से खून उतर आया। उसके दिमाग की नसें फटने लगीं। जिस पिता को वह अपना आदर्श मानता था, वही पिता इतना नीच और कामुक निकलेगा, इसकी कल्पना भी राजेश ने नहीं की थी।
राजेश गुस्से में गर्जता हुआ पास वाले कमरे में घुसा, जहाँ उसका ससुर शराब के नशे से थोड़ा होश में आकर खाट पर बैठा हुआ था।
राजेश ने अपने ससुर (पिता) का कॉलर दबोच लिया और चिल्लाया, “हरामख़ोर! तुझे शर्म नहीं आई? अपनी ही बहू के साथ ऐसा नीच कारनामा करते हुए तुझे ज़रा भी हया नहीं आई?”
ससुर ने शुरुआत में तो ढिठाई दिखाते हुए बात को दबाने की कोशिश की, “अरे राजेश! तू अपनी बीवी के बहकावे में मत आ! यह तो होली का रंग लगाने की बात थी…”
परंतु राजेश ने पिता के मुँह पर एक ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया। राजेश ने गर्जते हुए कहा, “रंग लगाने के लिए कमरा अंदर से बंद किया जाता है? कपड़े फाड़े जाते हैं? तू पिता कहलाने के लायक नहीं है!”
अध्याय 9: पुलिस की तफ़तीश, न्याय की गुहार और सामाजिक दृष्टिकोण
अब मामला घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहने वाला था। राजेश ने अपनी पत्नी सुनीता के स्वाभिमान और न्याय के लिए खड़ा होने का फैसला किया।
राजेश ने तुरंत अपने मोबाइल से स्थानीय पुलिस स्टेशन को फ़ोन करके पूरी घटना की सूचना दे दी।
लगभग आधे घंटे के भीतर पुलिस की जीप सायरन बजाती हुई उनके घर के बाहर आ खड़ी हुई। पुलिसकर्मियों ने घर के भीतर प्रवेश किया। सुनीता की हालत, फटे कपड़े और कमरे के साक्ष्यों को देखकर पुलिस अधिकारियों को घटना की गंभीरता का अंदाज़ा हो गया।
पुलिस ने मौक़े से ही नशे में धुत ससुर को अपनी हिरासत में ले लिया और उसे जीप में डालकर थाने ले आई।
अगले दिन सुबह, सुनीता को महिला पुलिस कर्मियों की सुरक्षा में ज़िला अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसका चिकित्सकीय परीक्षण (मेडिकल एग्जामिनेशन) करवाया गया। मेडिकल रिपोर्ट में सुनीता के शरीर पर चोट के निशान और जबरदस्ती किए गए /अनैतिक कृत्य/ की पुष्टि हो गई।
थाने में जब कड़ाई से पूछताछ की गई, तो आरोपी ससुर ने रोते हुए अपना अपराध कबूल कर लिया। उसने माना कि शराब के अत्यधिक नशे और कामुकता के वशीभूत होकर उसने अपनी बहू के साथ यह खौफनाक हरकत की थी।
पुलिस ने पीड़ित सुनीता के बयानों और साक्ष्यों के आधार पर आरोपी ससुर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की संगीन धाराओं के तहत मामला दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहाँ से अदालत ने उसे जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया।
सामाजिक एवं नैतिक दृष्टिकोण
राजस्थान के एक गाँव में घटित हुई यह सत्य घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज के सामने कई कड़वे और गंभीर प्रश्न खड़े करती है:
- पवित्र रिश्तों का पतन: ससुर और बहू का रिश्ता समाज में पिता और पुत्री के समान अत्यंत पवित्र और आदरणीय माना जाता है। परंतु मदिरा के अत्यधिक सेवन और कामुकता के वशीभूत होकर जब कोई व्यक्ति इस मर्यादा को तार-तार करता है, तो पूरे समाज का सिर शर्म से झुक जाता है।
- नशे का विनाशकारी रूप: इस घटना से यह साफ़ सिद्ध होता है कि शराब का नशा इंसान के भीतर के विवेक और सोचने-समझने की क्षमता को पूरी तरह नष्ट कर देता है। मदिरापान केवल स्वास्थ्य का नाश नहीं करता, बल्कि इंसान को हैवान बनाकर उससे ऐसे अक्षम्य अपराध करवा बैठता है जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकती।
- पति का सहयोगात्मक रुख: इस पूरी दुखद घटना में राजेश (पति) का रुख अत्यंत सराहनीय रहा। उसने अपने अपराधी पिता का अंधा समर्थन करने के बजाय अपनी पीड़िता पत्नी के सत्य का साथ दिया और उसे न्याय दिलाने के लिए कड़ा कदम उठाया। यदि समाज का हर पति अपनी पत्नी के स्वाभिमान के साथ खड़ा रहे, तो महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों पर लगाम लगाई जा सकती है।
यह घटना समाज को यह संदेश देती है कि व्यभिचार, कामुकता और मर्यादाहीन आचरण का मार्ग अंततः केवल विनाश, जेल की सलाखों और सामाजिक कलंक की ओर ही ले जाता है।