बकरी चराने गई मां के साथ गलत होने पर बेटे ने दो ला#**शे बिछा दी/
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प्रतिशोध की ज्वाला: एक बेबस माँ और उसके बेटे के खौफनाक इंतकाम की कहानी
उत्तर प्रदेश का बागपत जिला। यहाँ की मिट्टी में गन्ने की मिठास और ग्रामीण जीवन का कड़ा संघर्ष दोनों घुले-मिले हैं। इसी जिले में एक गांव बसा है—बिजरोल। बाहर से शांत दिखने वाले इस गांव की पगडंडियों ने एक ऐसी खौफनाक और रूह कंपा देने वाली घटना देखी है, जिसकी गूंज आज भी लोगों के जहन में सिहरन पैदा कर देती है। यह कहानी कोई आम कहानी नहीं है; यह एक मजबूर विधवा के संघर्ष, समाज के भेड़ियों की दरिंदगी और एक बेटे द्वारा अपनी माँ के सम्मान के लिए उठाए गए खूनी प्रतिशोध की गाथा है।
सरोज देवी, बिजरोल गांव की एक बेहद गरीब और बेबस महिला थी। उसकी जिंदगी दुखों के एक ऐसे भंवर में फंसी थी, जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता था। छह साल पहले, खेतों में काम करते वक्त एक जहरीले सांप के काटने से उसके पति अनिल कुमार की दर्दनाक मौत हो गई थी। पति के साये के उठते ही सरोज की दुनिया उजड़ गई। लेकिन सरोज ने हार नहीं मानी। अपनी किस्मत का रोना रोने के बजाय, उसने अपने परिवार का पेट पालने के लिए कमर कस ली। उसने दिहाड़ी मजदूरी करनी शुरू की। चिलचिलाती धूप में पसीना बहाकर, पाई-पाई जोड़कर उसने 10-15 बकरियां खरीदीं। अब उसकी जिंदगी का मुख्य सहारा यही बकरियां थीं।
रोज सुबह नौ बजते ही सरोज देवी अपनी बकरियों को हांकते हुए जमींदारों के खेतों और बीहड़ों की तरफ निकल जाती थी। दिन भर बकरियां चराने के बाद शाम ढलने पर वह घर लौटती। उसकी इस सूनी और संघर्ष भरी जिंदगी में रोशनी की केवल दो किरणें थीं—उसका बेटा जयदेव और उसका देवर प्रताप सिंह।
जयदेव नौवीं कक्षा का छात्र था। वह अपनी उम्र के बाकी बच्चों से कहीं ज्यादा समझदार और होशियार था। गरीबी ने उसे समय से पहले बड़ा कर दिया था। वह अक्सर अपनी माँ के फटे हुए आंचल को देखकर कहता था, “माँ, तू चिंता मत कर। मैं खूब मन लगाकर पढूंगा और बड़ा होकर फौज में जाऊंगा। फिर तुझे कोई काम नहीं करना पड़ेगा।” जयदेव की ये बातें सरोज के सारे दिन की थकान मिटा देती थीं। वहीं, सरोज का देवर प्रताप सिंह पेशे से एक ट्रक ड्राइवर था। वह एक नेक इंसान था और महीनों भर ट्रक चलाकर जो भी पैसे कमाता, अपनी भाभी सरोज के हाथ पर रख देता था ताकि घर का खर्च चल सके।
यहाँ तक सरोज की जिंदगी कठिनाइयों के बावजूद एक सही पटरी पर चल रही थी। लेकिन सरोज के घर के ठीक सामने एक ऐसा शैतान रहता था, जिसकी काली परछाईं जल्द ही इस परिवार पर पड़ने वाली थी। उस शख्स का नाम था प्रेम सिंह। प्रेम सिंह पेशे से एक ऑटो ड्राइवर था, लेकिन उसकी असल जिंदगी शराब, जुए और औरतों के इर्द-गिर्द घूमती थी। दिन भर ऑटो चलाकर वह जो भी कमाता, शाम को शराब के ठेके पर या जिस्मफरोशी के अड्डों पर उड़ा देता था। उसकी पत्नी आरती देवी उसकी इन हरकतों से बेहद परेशान थी, लेकिन प्रेम सिंह एक जालिम पति था जो बात-बात पर अपनी पत्नी की बेरहमी से पिटाई करता था।
5 जुलाई 2026 की रात। यह वह मनहूस रात थी जिसने आगे चलकर बिजरोल गांव में खून की नदियां बहा दीं। प्रेम सिंह अपनी ऑटो रिक्शा लेकर लौट रहा था। उसने रास्ते में एक ठेके से शराब खरीदी और ऑटो में बैठकर जमकर पी। नशे में धुत्त होकर जब वह आगे बढ़ा, तो सड़क किनारे उसे कंचन देवी नाम की एक महिला मिली। कंचन गांव और शहर के अमीर मर्दों को अपने जिस्म के जाल में फंसाकर मोटी कमाई करती थी। प्रेम सिंह ने उसे ऑटो में बैठा लिया और उसके साथ रात गुजारने का सौदा किया। बातों-बातों में कंचन ने उसे बताया कि वह एक रात में चार से पांच हजार रुपये आसानी से कमा लेती है।
यह बात प्रेम सिंह के शैतानी दिमाग में घर कर गई। रात भर कंचन के साथ मुंह काला करने के बाद जब वह घर लौटा, तो उसकी पत्नी आरती ने उसे इतनी रात गए शराब पीकर आने पर टोका। प्रेम सिंह का दिमाग तो पहले ही कंचन की कमाई सुनकर खराब हो चुका था। उसने अपनी पत्नी आरती से कहा, “तुम दिन भर घर में खाली बैठी रहती हो। हमारे पड़ोस की कंचन एक रात में हजारों कमाती है। कल से तुम भी गैर मर्दों के साथ रात गुजारना शुरू कर दो, ताकि हम भी अमीर हो सकें।”
एक पति के मुंह से इतने नीच शब्द सुनकर आरती सन्न रह गई। उसने इस घिनौने काम से साफ इंकार कर दिया। इस पर प्रेम सिंह हैवान बन गया और उसने आरती की बुरी तरह पिटाई शुरू कर दी। जान बचाने के लिए आरती चीखती-चिल्लाती हुई घर से भागी और सामने रहने वाली सरोज देवी के दरवाजे पर गिर पड़ी।
सरोज देवी और उसके बेटे जयदेव ने दरवाजा खोला। आरती खून से लथपथ थी। सरोज ने उसे संभाला, लेकिन तभी पीछे से प्रेम सिंह वहां आ धमका और सरोज के सामने ही आरती को फिर से पीटने लगा। सरोज देवी एक निडर महिला थी, उसने प्रेम सिंह को रोका। जब वह नहीं माना, तो सरोज और उसके बेटे जयदेव ने मिलकर उस शराबी प्रेम सिंह की जमकर धुनाई कर दी। मोहल्ले वाले भी इकट्ठा हो गए और प्रेम सिंह को वहां से भगा दिया। लेकिन जाते-जाते प्रेम सिंह ने सरोज को एक खौफनाक धमकी दी, “तूने आज मुझे पीटा है ना! याद रखना, एक दिन तुझे तेरे घर से उठाकर ले जाऊंगा और तेरा वो हश्र करूंगा कि तू कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी।” सरोज ने इसे एक शराबी की बकवास समझकर नजरअंदाज कर दिया, जो आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई।
प्रेम सिंह के दिल में सरोज के खिलाफ बदले की आग भड़क उठी थी। कुछ दिन बीते, 11 जुलाई को प्रेम सिंह अपने एक दोस्त पंकज के पास पहुंचा। पंकज गांव का एक रसूखदार और अमीर जमींदार था, जिसके पास सात-आठ एकड़ जमीन थी। पैसा और पावर पंकज के दिमाग पर चढ़ा हुआ था। प्रेम सिंह ने पंकज से दस हजार रुपये उधार मांगे। पंकज ने पैसे दे दिए। इसके बाद दोनों ने शराब खरीदी और प्रेम सिंह के घर आ गए।
शराब पीते हुए पंकज की गंदी नजर प्रेम सिंह की पत्नी आरती पर पड़ी। प्रेम सिंह ने यह भांप लिया। उसे अपने दस हजार रुपये चुकाने नहीं थे, इसलिए उसने एक बेहद घिनौनी चाल चली। उसने दरवाजा बंद किया और पंकज से कहा, “आज की रात तू मेरी पत्नी के साथ गुजार सकता है।” आरती ने जब विरोध किया, तो प्रेम सिंह ने उसे जान से मारने की धमकी देकर एक कमरे में बंद कर दिया और पंकज ने आरती के साथ दरिंदगी की।
इस खौफनाक सौदे के बाद प्रेम सिंह ने पंकज से कहा, “मैंने तेरी हवस पूरी की है, अब तुझे मेरा एक काम करना होगा। सामने रहने वाली सरोज देवी ने मेरी बेइज्जती की थी, मुझे उससे बदला लेना है।” पंकज जो अब प्रेम सिंह का अहसानमंद हो चुका था, तुरंत तैयार हो गया।
वक्त अपनी रफ्तार से आगे बढ़ा। 22 जुलाई 2026 की वो मनहूस सुबह आई। सरोज देवी रोज की तरह अपनी बकरियां लेकर खेतों की तरफ गई थी। अचानक उसकी बकरियां भटककर नरेश कुमार नाम के एक अन्य जमींदार के खेत में घुस गईं और फसल को थोड़ा नुकसान पहुंचा दिया। नरेश कुमार ने गुस्से में आकर अपने कमरे से एक तेज धारदार हथियार निकाला और सरोज की दो बकरियों को बुरी तरह काट डाला। बकरियां खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ीं। सरोज देवी फूट-फूट कर रोने लगी। उसका पूरा रोजगार उन बकरियों पर ही टिका था। वह असहाय होकर खेतों के बीचों-बीच रो रही थी और दूर-दूर तक कोई उसकी मदद करने वाला नहीं था।
तभी वहां से ऑटो रिक्शा में प्रेम सिंह गुजरा। सरोज को खेतों में अकेला और लाचार देखकर उसकी आंखों में शैतानी चमक आ गई। उसने तुरंत अपने दोस्त पंकज को फोन किया, “पंकज, शिकार आज खेत में बिल्कुल अकेला है। जल्दी से एक धारदार चाकू और मोटरसाइकिल लेकर आ जा।”
प्रेम सिंह एक हमदर्द का नाटक करते हुए सरोज के पास पहुंचा और बोला, “सरोज बहन, रो मत। मैं तेरी घायल बकरियों को अपने ऑटो में डालकर जानवरों के अस्पताल ले चलता हूँ।” सरोज उसकी मीठी बातों में आ गई। कुछ ही मिनटों में पंकज भी वहां पहुंच गया। इससे पहले कि सरोज कुछ समझ पाती, प्रेम सिंह ने पंकज के हाथ से चाकू लिया और सरोज की गर्दन पर रख दिया। “अगर एक भी आवाज निकाली, तो तेरा गला यहीं रेत दूंगा।”
सरोज की रूह कांप उठी। प्रेम सिंह और पंकज ने उसे जबरन ऑटो रिक्शा में डाला। पंकज ऑटो चलाने लगा और प्रेम सिंह ने चाकू की नोक पर सरोज को बंधक बनाए रखा। वे उसे गांव से दूर एक सुनसान नदी के किनारे ले गए। वहां चारों तरफ ऊंची-ऊंची झाड़ियां थीं और सन्नाटा पसरा था। दोनों दरिंदों ने सरोज को घसीटकर झाड़ियों के पीछे फेंका। उसकी ही चुन्नी से उसके हाथ-पैर बांध दिए गए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया गया ताकि उसकी चीखें बाहर न आ सकें।
उस दिन इंसानियत शर्मसार हो गई। पंकज और प्रेम सिंह ने मिलकर उस बेबस विधवा के साथ सारी हदें पार कर दीं। वे दोनों भूखे भेड़ियों की तरह उस पर टूट पड़े। कई घंटों तक वे उसकी आबरू को तार-तार करते रहे। जब उनकी हवस शांत हो गई, तो प्रेम सिंह ने कहा, “इसे नदी में फेंक देते हैं, किस्सा ही खत्म हो जाएगा।” लेकिन पंकज पुलिस के डर से घबरा गया और बोला, “नहीं, इसे जान से नहीं मारते। इसे ऐसे ही छोड़ देते हैं, यह किसी से कुछ नहीं कह पाएगी।”
इसके बाद पंकज ठेके से और शराब ले आया। दोनों ने फिर से शराब पी और नशे में धुत्त होकर उस अधमरी सरोज के साथ दोबारा दरिंदगी की। शाम ढलने को आई थी। जब दरिंदे पूरी तरह थक गए, तो उन्होंने सरोज को वापस ऑटो में डाला और गांव के बाहरी किनारे पर फेंक कर फरार हो गए।
फटे कपड़े, रिसता हुआ खून और तार-तार हो चुकी आत्मा के साथ सरोज किसी तरह घिसटते हुए अपने घर पहुंची। रात घिर आई थी। उसका बेटा जयदेव घर के दरवाजे पर अपनी माँ का इंतजार कर रहा था। माँ की यह बदहवाल और लहूलुहान हालत देखकर 14 साल के जयदेव के पैरों तले जमीन खिसक गई। “माँ… माँ तुझे क्या हुआ? तेरी ये हालत किसने की?” वह रोते हुए पूछने लगा।
सरोज की आंखों से बस आंसू बह रहे थे। उसके गले से आवाज नहीं निकल रही थी। उसने कांपते हाथों से बस इतना इशारा किया और कहा, “बेटा… अपने चाचा प्रताप को तुरंत फोन कर और उसे अभी घर बुला ले।” जयदेव ने रोते हुए तुरंत अपने चाचा प्रताप सिंह को फोन मिलाया। “चाचा, जल्दी आ जाओ… माँ के साथ कुछ बहुत बुरा हुआ है।” फोन पर भतीजे की रुंधती आवाज सुनकर प्रताप सिंह ने ट्रक मोड़ा और रात भर सफर करके अगली सुबह नौ बजे घर पहुंच गया।
प्रताप को सामने खड़ा देख सरोज देवी फूट-फूट कर रो पड़ी। उसने रोते और गिड़गिड़ाते हुए अपने देवर को पूरी खौफनाक दास्तान सुनाई कि कैसे प्रेम सिंह और पंकज ने उसे अगवा किया और नदी किनारे उसके साथ हैवानियत की सारी हदें पार कर दीं।
अपनी भाभी के साथ हुए इस जघन्य अपराध को सुनकर प्रताप सिंह का खून खौल उठा। उसकी नसें गुस्से से तन गईं। वहीं पास खड़ा नौवीं कक्षा का छात्र जयदेव भी अपनी माँ की आपबीती सुन रहा था। जो बेटा कल तक फौज में जाकर देश की रक्षा करने के सपने देखता था, आज उसकी आंखों में अपनी माँ के मुजरिमों का खून उतर आया था। जयदेव के बालमन पर इस घटना ने इतना गहरा आघात किया कि उसके अंदर का बच्चा उसी पल मर गया और एक खूंखार प्रतिशोधी ने जन्म ले लिया।
प्रताप सिंह ने गुस्से से कांपते हुए कहा, “भाभी, तू आंसू पोंछ ले। आज के बाद वो दोनों दरिंदे किसी और महिला की तरफ आंख उठाने लायक नहीं रहेंगे। आज मैं उन्हें जिंदा नहीं छोडूंगा।”
प्रताप सिंह अपने ट्रक से एक भारी लोहे की रॉड निकाल लाया। जयदेव खामोशी से घर के अंदर गया और चारा काटने वाली एक धारदार और भारी गंडासी (कुल्हाड़ीनुमा हथियार) उठा लाया। चाचा और भतीजा मौत के दूत बनकर घर से निकले। उनकी आंखों में सिर्फ खून सवार था।
सबसे पहले वे प्रेम सिंह के घर में घुसे। प्रेम सिंह उस वक्त बड़े इत्मीनान से चारपाई पर बैठकर खाना खा रहा था। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाता, प्रताप सिंह ने लोहे की रॉड पूरी ताकत से उसके सिर पर दे मारी। प्रेम सिंह का सिर फट गया और वह खून से लथपथ होकर गिर पड़ा।
जयदेव की आंखों से शोले बरस रहे थे। उसने अपने चाचा से कहा, “चाचा, इस सूअर को घर के अंदर नहीं, बीच सड़क पर घसीट कर ले चलो। पूरे गांव को पता चलना चाहिए कि मेरी माँ की इज्जत पर हाथ डालने वाले का क्या अंजाम होता है।” प्रताप और जयदेव ने अधमरे प्रेम सिंह को कॉलर से पकड़ा और घसीटते हुए गांव की चौपाल की तरफ बीच सड़क पर ले आए।
गांव वाले दहशत में घरों से बाहर निकल आए थे, लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उन दोनों के पास फटक सके। बीच सड़क पर, सबके सामने, जयदेव ने हवा में गंडासी लहराई और पूरी ताकत से प्रेम सिंह की गर्दन पर दे मारी। एक ही झटके में प्रेम सिंह का गला कट गया और फव्वारे की तरह खून सड़क पर बह निकला। प्रेम सिंह तड़पकर वहीं ढेर हो गया।
लेकिन इंतकाम की यह आग अभी बुझी नहीं थी। अब बारी थी दूसरे दरिंदे पंकज की। चाचा-भतीजा सीधे पंकज के घर पहुंचे। घर वालों से पता चला कि पंकज अपने खेतों पर गया हुआ है। प्रताप सिंह ने तुरंत अपनी मोटरसाइकिल निकाली, जयदेव को पीछे बैठाया और खेतों की तरफ उड़ चला।
खेतों में बने अपने कमरे के बाहर पंकज चारपाई पर बैठकर शराब पी रहा था। उसने जैसे ही प्रताप और जयदेव को खून से लथपथ हथियार लिए अपनी तरफ आते देखा, उसके नशे के सारे सुरूर हवा हो गए। वह भागने के लिए उठा, लेकिन प्रताप सिंह ने छलांग लगाकर लोहे की रॉड सीधा उसके माथे पर जड़ दी। पंकज धड़ाम से जमीन पर गिर गया और बेहोश हो गया।
जयदेव के अंदर अपनी माँ के दर्द का समंदर उबल रहा था। वह पंकज के पास पहुंचा। “तूने मेरी माँ को उन हाथों से छुआ था ना!” यह कहते हुए जयदेव ने गंडासी से पंकज के दोनों हाथ कलाई से काट दिए। फिर भी उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ। उसने पंकज के पैर भी काट डाले। जब वह दरिंदा एक कटे हुए तने की तरह जमीन पर पड़ा था, तब जयदेव ने आखिरी वार किया और पंकज की गर्दन धड़ से अलग कर दी।
दो दरिंदों को उनके अंजाम तक पहुंचाने के बाद प्रताप और जयदेव के चेहरे पर खून के छींटे पड़े थे, लेकिन उनकी आंखों में एक अजीब सा सुकून था। प्रताप सिंह ने अपनी रॉड जमीन पर फेंकी और जयदेव से कहा, “बेटा, हमने अपना फर्ज निभा दिया। अब कानून अपना काम करेगा। चल, थाने चलते हैं।”
दो घंटे बाद, प्रताप सिंह और 14 साल का जयदेव खून से सने कपड़ों और हथियारों के साथ सीधे स्थानीय पुलिस स्टेशन पहुंचे। उस वक्त थाने में इंस्पेक्टर धीरज कुमार बैठे थे। जब उन्होंने एक अधेड़ आदमी और एक स्कूली बच्चे को खून से सने हथियारों के साथ थाने के अंदर आते देखा, तो उनके भी होश उड़ गए।
“ये क्या है? तुम लोग कौन हो और किसका खून करके आए हो?” इंस्पेक्टर ने हड़बड़ाते हुए पूछा।
प्रताप सिंह ने पूरी शांति से जवाब दिया, “साहब, हम बिजरोल गांव से आए हैं। गांव के दो दबंगों, प्रेम सिंह और पंकज ने कल मेरी भाभी को अगवा करके उसके साथ दरिंदगी की थी। हमने उन दोनों का सिर धड़ से अलग कर दिया है। उनकी लाशें गांव में और खेतों में पड़ी हैं। हमें गिरफ्तार कर लीजिए।”
जयदेव ने भी अपनी गंडासी थाने के टेबल पर रख दी। पुलिस अधिकारियों ने तुरंत उन्हें हिरासत में लिया। इंस्पेक्टर धीरज कुमार भारी पुलिस बल के साथ बिजरोल गांव पहुंचे। वहां का नजारा देखकर पुलिस वालों की भी रूह कांप गई। सड़क पर प्रेम सिंह की सिर कटी लाश पड़ी थी और खेतों में पंकज का क्षत-विक्षत धड़ पड़ा था। पुलिस ने दोनों लाशों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया।
आज प्रताप सिंह और जयदेव सलाखों के पीछे हैं। कानून की नजर में उन्होंने एक जघन्य हत्या की है, और अदालत भविष्य में यह तय करेगी कि उन्हें इसकी क्या सजा मिलेगी। लेकिन बिजरोल गांव और पूरे जिले में आज भी यह बहस का विषय बना हुआ है। जब कानून के रखवाले समय पर न्याय नहीं दे पाते और समाज के भेड़िये किसी मजबूर औरत की आबरू को तार-तार कर देते हैं, तो क्या एक बेटे का अपनी माँ के सम्मान के लिए हथियार उठाना पूरी तरह से गलत था?
इस घटना ने समाज के सामने कई ज्वलंत सवाल खड़े कर दिए हैं। एक विधवा की लाचारी, एक शराबी की दरिंदगी और एक मासूम बेटे का खूंखार हत्यारा बन जाना—यह सब हमारे समाज की उस सड़ी-गली व्यवस्था का आईना है, जहां एक छोटी सी चिंगारी कब दावानल का रूप ले ले, कोई नहीं जानता। सत्य यही है कि अपराध हमेशा एक दूसरे अपराध को जन्म देता है, और अंततः बर्बादी दोनों तरफ होती है।
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