PART 2 पति से परेशान होकर पत्नी ने पति के साथ कर दिया बड़ा करनामा/पति की हुई मौ*त/
कानपुर की दर्दनाक दास्तान (भाग-2): सपना की न्याय की जंग और पुनर्वास की गाथा
नमस्कार दोस्तों, मैं कुलदीप राणा। कानपुर के ‘आखारी’ गाँव की उस खौफनाक रात के बाद, जहाँ सपना ने अपने श/रा/बी पति दिनेश के जुल्मों का अंत किया था, इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश में सनसनी फैला दी थी।
दिनेश की मौ*त के बाद पुलिस ने सपना को गिर/फ्तार कर लिया था और दरिंदे राजवीर तथा मुल्तान सिंह को भी सलाखों के पीछे भेज दिया था। लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है—अदालत की चौखट पर न्याय की जंग और एक माँ के अपने मासूम बेटे मुन्ना के लिए संघर्ष की महा-गाथा।
अदालत में गूंजी जुल्म की दास्तान
जब मामला कानपुर की जिला अ/दा/ल/त में पहुँचा, तो शुरुआती दौर में सपना को एक अ/प/रा/धी के रूप में देखा जा रहा था। सरकारी वकील का कहना था कि कानून हाथ में लेना और कैंची से पति की ह/त्या करना एक गंभीर अ/प/रा/ध है।
लेकिन तभी राज्य की एक प्रसिद्ध महिला वकील ‘अंजली वर्मा’ ने सपना का केस मुफ्त में लड़ने का फैसला किया। अंजलि जी ने अदालत के सामने सपना पर हुए असहनीय अ/त्या/चा/रों और श/ो/ष/ण के दस्तावेजी सबूत पेश किए।
अदालत में जब सपना की माँ दयावती की गवाही हुई, तो उन्होंने रोते हुए वह फोन कॉल की बात बताई जो सपना ने 20 अगस्त 2026 को की थी। इसके अलावा गाँव के किराना व्यवसायी और ईंट-भट्टे के कुछ कामगारों ने भी गवाही दी कि कैसे दिनेश अपनी पत्नी को श/रा/ब और पैसों के बदले राजवीर और मुल्तान सिंह के पास जबरन भेजता था।
ऐतिहासिक फैसला: आत्मरक्षा का अधिकार
अदालत में सुनवाई के दौरान मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों से यह पूरी तरह सिद्ध हो गया कि सपना बीते कई महीनों से अत्यंत गंभीर मानसिक व शारीरिक प्र/ता/ड़/ना की शिकार थी। 21 सितंबर की रात को भी दिनेश उसे मुल्तान सिंह के घर भेजने पर मजबूर कर रहा था।
न्यायाधीश ने मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए कहा:
“जब किसी महिला की अस्मिता और जीवन पर निरंतर आघात किया जाता है, और उसके पास आत्मरक्षा का कोई अन्य रास्ता नहीं बचता, तो ऐसी स्थिति में उठाया गया कदम अत्यधिक मानसिक आघात (Extreme Trauma) और आत्मरक्षा (Self-Defense) की श्रेणी में आता है।”
अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए:
- राजवीर और मुल्तान सिंह को मानव तस्करी, शो/ष/ण और उकसाने के जुर्म में 14-14 साल की कठोर कारा/वास की स/ज़ा सुनाई।
- सपना को उसकी विशेष परिस्थितियों और परिस्थिति-जन्य आत्मरक्षा के आधार पर जेल की स/ज़ा से रिहा करते हुए उसके पुनर्वास (Rehabilitation) का आदेश दिया।
समाज का ताना और मुन्ना की जिम्मेदारी
अदालत से रिहा होने के बाद सपना जब अपने 4 साल के मासूम बेटे मुन्ना को लेकर गाँव लौटी, तो राह आसान नहीं थी। समाज के कुछ संकीर्ण सोच वाले लोग उस पर ताने कसते थे और उसे ब/द/ना/म महिला कहते थे।
लेकिन सपना ने हार नहीं मानी। उसने ठान लिया था कि अपने बेटे मुन्ना को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छा और संवेदनशील इंसान बनाएगी ताकि वह कभी किसी नारी पर अ/त्या/चा/र न करे।
सपना ने गाँव छोड़कर कानपुर शहर के एक कोने में एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। जिला प्रशासन और महिला कल्याण विभाग की मदद से उसे एक स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group) में सिलाई और कढ़ाई का काम मिला।
नारी सुरक्षा और जागरूकता की नई मिसाल
समय का पहिया घूमता रहा। सपना ने अपनी मेहनत और लगन से अपनी एक छोटी सी सिलाई अकादमी खोल ली। अब वह केवल कपड़े ही नहीं सीती थी, बल्कि आसपास की उन तमाम पीड़ित और लाचार महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने का प्रशिक्षण भी देती थी जो घरेलू हिं/सा और अ/त्या/चा/र सह रही थीं।
सपना अक्सर महिलाओं को समझाती:
“कभी भी किसी जुल्म या अ/त्या/चा/र को चुपचाप सहन मत करो। सहना भी पाप है। समय रहते पुलिस, कानून और अपनों की मदद लो, ताकि किसी को कैंची उठाने की नौबत न आए।”
उसका बेटा मुन्ना अब स्कूल जाने लगा था और अपनी माँ के इस संघर्ष व स्वाभिमान पर गर्व करता था।
संपूर्ण कहानी का निष्कर्ष (Conclusion)
कानपुर की यह घटना हमें समाज के दो कड़वे सच दिखाती है:
- श/रा/ब की लत और जुल्म किस तरह एक इंसान के जमीर को मार देते हैं।
- समाज की चुप्पी और ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर किसी महिला को किस हद तक तबाही की ओर धकेलता है।
सपना की कहानी हर उस महिला के लिए एक सबक है कि जुल्म सहने से जुल्म करने वाले का हौसला बढ़ता है। कानून और समाज को हमेशा ऐसे मामलों में पीड़ित के साथ खड़े होना चाहिए।
दोस्तों, कानपुर की इस संपूर्ण दो-भागों की कहानी पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? कमेंट सेक्शन में अपनी राय अवश्य लिखें।
जय हिंद, वंदे मातरम!’