यह सच्ची कहानी उत्तरप्रदेश के मेरठ की है – News

यह सच्ची कहानी उत्तरप्रदेश के मेरठ की है

यह सच्ची कहानी उत्तरप्रदेश के मेरठ की है

मेरठ का काला सच: वासना, धोखाधड़ी और प्रतिशोध की ख़ूनी रात

भूमिका: पंजरी गाँव की शांत फिज़ा में छुपा तूफ़ान

उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अपनी एक अलग पहचान रखता है। लेकिन इसी जिले की सीमा के भीतर बसा ‘पंजरी’ नाम का गाँव एक ऐसी भयानक और दिल दहला देने वाली घटना का साक्षी बना, जिसने समाज की नैतिकता, मानवीय संवेदनशीलता और पारिवारिक मर्यादाओं की नींव को हिलाकर रख दिया। बाहरी तौर पर पंजरी गाँव आम भारतीय ग्रामीण जीवन की तरह ही दिखाई देता था—सुबह-सुबह लहलहाते खेत, चहचहाते पक्षी, मवेशियों की घंटियाँ और चौपालों पर चाय की चुस्कियों के साथ होती बातें। किंतु इस शांत वातावरण के पीछे एक ऐसा घिनौना सत्य फल-फूल रहा था, जिसका अंत एक भयावह /ह/त्या/कांड/ के रूप में होने वाला था।

इस कहानी के केंद्र में है रोहतास सिंह नाम का एक अधेड़ व्यक्ति। रोहतास के पास अपनी पैतृक दो एकड़ ज़मीन थी। गाँव के मानकों के हिसाब से दो एकड़ ज़मीन कोई बहुत बड़ी संपत्ति नहीं मानी जाती थी, किंतु यदि कड़ी मेहनत और लगन से काम किया जाए, तो इससे चार सदस्यों के परिवार का भरण-पोषण सम्मानजनक ढंग से हो सकता था। लेकिन रोहतास के भीतर मेहनत का वह जज़्बा नहीं था। ज़मीन से पर्याप्त आय न हो पाने के कारण उसने अपने घर में दो-तीन दुधारू पशु पाल रखे थे। सुबह-शाम इन पशुओं से जो दूध मिलता था, उसे गाँव की डेयरी और आस-पास के बाज़ारों में बेचकर जो थोड़े-बहुत पैसे आते थे, उसी से उसके घर की दैनिक ज़रूरतों की गाड़ी खींची जा रही थी।

जब कभी घर में पैसों की तंगी अत्यधिक बढ़ जाती, तो रोहतास गाँव में ही या पास के निर्माण स्थलों पर दिहाड़ी/मज़दूरी का काम कर लिया करता था। किंतु उसकी सबसे बड़ी खराबी उसकी आदतें थीं। मज़दूरी और दूध बेचकर मिलने वाले पसीने के पैसे को वह अपने घर के विकास या परिवार के कल्याण में लगाने के बजाय /श/रा/ब/ और अ/नै/ति/क/ व्यसनों में उड़ा दिया करता था। रोहतास स्वभाव से एक चरित्रहीन और अ/नै/ति/क/ प्रवृत्तियों वाला व्यक्ति था। गाँव के लोग उसकी इस लत से भली-भांति परिचित थे, किंतु किसी को इस बात का दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि यही रोहतास भविष्य में ऐसी घिनौनी और दर्दनाक घटनाओं की श्रृंखला को जन्म देगा, जो तीन-तीन जिंदगियों को सदा के लिए तबाह कर देगी।

अध्याय 1: एक बेबस परिवार और बिखरते सपने

रोहतास के परिवार में उसके अलावा उसकी बहू नैना देवी और उसकी पोती सपना रहती थीं। रोहतास के बेटे की कुछ वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी थी, जिसके बाद से नैना विधवा के रूप में अपने ससुर और बेटी के साथ रह रही थी। घर की सारी जिम्मेदारियाँ और चौका-बर्तन का काम नैना देवी के कंधों पर था। नैना स्वभाव से कर्मठ महिला थी, किंतु परिस्थितियों के थपेड़ों और आर्थिक तंगी ने उसके जीवन को नीरस और कठिन बना दिया था।

नैना की बेटी सपना ने हाल ही में गाँव के ही स्कूल से दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। सपना एक समझदार और सुंदर लड़की थी, किंतु लगातार आर्थिक परेशानियों और घर के अशांत माहौल के कारण उसका मन आगे की पढ़ाई में नहीं लग पाया। उसने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और अपनी माँ का हाथ बँटाने लगी।

सपना का दैनिक जीवन अत्यंत व्यस्त रहता था। हर रोज़ सुबह लगभग 8:00 बजे वह अपनी माँ नैना देवी के साथ हाथ में हँसिया और बोरा लेकर खेतों की ओर निकल जाती थी। माँ-बेटी मिलकर मवेशियों के लिए हरा चारा काटतीं, उसे सिर पर लादकर घर लातीं और पशुओं की सेवा करतीं। दूध निकालने से लेकर उसे बाज़ार तक पहुँचाने और घर का राशन प्रबंधित करने में सपना अपनी माँ की मुख्य संबल थी। दूध और छोटी-मोटी बचत से माँ-बेटी किसी तरह अपना गुज़र-बसर चला रही थीं।

लेकिन इस परिवार के भीतर एक ऐसा ज्वार-भाटा उठने वाला था, जिसकी कल्पना उन दोनों मासूम महिलाओं ने कभी नहीं की थी। दिन बीतते जा रहे थे, और दिसंबर का महीना आ पहुँचा। ठंडी हवाओं के बीच गाँव में जीवन अपनी सामान्य गति से चल रहा था, लेकिन इस परिवार के भाग्य में एक भयानक मोड़ लिखा जा चुका था।

अध्याय 2: दुकान का विचार और सरपंच की नीयत का खोट

तारीख थी 10 दिसंबर 2025। सुबह के करीब 8:00 बजे का समय था। सूरज की हल्की किरणें पंजरी गाँव के कच्चे-पक्के मकानों पर पड़ रही थीं। नैना देवी रसोई में बर्तन सहेज रही थी कि तभी उसने देखा कि डिब्बे में बचा आटा और दाल ख़त्म होने की कगार पर है। उसने अपनी बेटी सपना को पास बुलाया और कहा, “बेटी सपना, घर का राशन-पानी बिल्कुल ख़त्म हो चुका है। ये कुछ पैसे लो और गाँव की परचून (किराने) की दुकान से जा कर राशन खरीद लाओ।”

सपना ने माँ से पैसे लिए और हाथ में थैला लेकर गाँव की मुख्य गली की ओर चल दी। रास्ते में चलते हुए वह गाँव की दुकानों के बारे में सोचने लगी। पंजरी गाँव में कुल मिलाकर तीन-चार छोटी किराने की दुकानें थीं, जहाँ हमेशा ग्रामीणों की भीड़ लगी रहती थी। किराने के सामान की माँग अधिक थी और दुकानें कम थीं।

सामान खरीदकर जब सपना घर लौट रही थी, तो उसके बाल-मन में एक विचार कौंधा। उसने सोचा कि उसकी माँ नैना देवी गाँव की अन्य महिलाओं की तुलना में अच्छी-खासी पढ़ी-लिखी हैं और हिसाब-किताब में भी चतुर हैं। यदि उसकी माँ गाँव में ही अपनी एक अच्छी किराने की दुकान खोल ले, तो इससे न केवल परिवार की गरीबी दूर होगी, बल्कि उन्हें दूसरों पर निर्भर भी नहीं रहना पड़ेगा।

घर पहुँचकर सपना ने राशन का थैला रसोई में रखा और उत्साहपूर्वक अपनी माँ से कहा, “माँ! मैं रास्ते में सोच रही थी कि तुम इतनी समझदार और पढ़ी-लिखी हो, फिर हम दूसरों की दुकानों पर निर्भर क्यों रहें? तुम खुद गाँव में एक किराने की दुकान क्यों नहीं खोल लेतीं? हमारे गाँव में सिर्फ तीन-चार दुकानें हैं। अगर हम दुकान खोलेंगे, तो वह बहुत अच्छी चलेगी और हमारी रोज़ की आर्थिक तंगी भी ख़त्म हो जाएगी।”

नैना देवी ने अपनी बेटी की बात सुनी। उसे विचार बहुत व्यावहारिक और सुंदर लगा। उसने गहरी साँस लेते हुए कहा, “बेटी, तेरा विचार तो बहुत अच्छा है, लेकिन दुकान खोलने के लिए कम से कम दो-तीन लाख रुपयों की पूँजी चाहिए। फिलहाल हमारे पास इतने पैसे कहाँ हैं?”

तभी सपना ने सुझाव दिया, “माँ, दादाजी के पास कुछ न कुछ बचत ज़रूर होगी। आप एक बार उनसे बात करके तो देखिए।”

सपना को उम्मीद थी कि उसके दादा रोहतास सिंह अपनी बहू और पोती के भविष्य के लिए ज़रूर कुछ आर्थिक मदद करेंगे। लेकिन रोहतास की सोच और उसकी नीयत का दायरा कुछ और ही था।

नैना देवी अपने ससुर रोहतास के पास गई, जो आँगन में खटिया पर बैठा तंबाकू मल रहा था। नैना ने बड़ी शालीनता से कहा, “पिताजी, मैं गाँव में ही एक छोटी किराने की दुकान खोलना चाहती हूँ ताकि घर का खर्च सुचारू रूप से चल सके। अगर आपके पास कुछ पैसे जमा हों, तो मुझे दे दीजिए।”

रोहतास ने आँखें तरेरकर अपनी बहू की ओर देखा और ठंडी साँस खींचते हुए बोला, “बहू, मेरे पास इस वक्त केवल एक लाख रुपये ही बचे हैं। इससे ज़्यादा मेरे पास फूटी कौड़ी भी नहीं है।”

नैना ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “पिताजी, केवल एक लाख रुपये में तो दुकान का सामान और किराया भी पूरा नहीं हो पाएगा। कम से कम दो-तीन लाख रुपये चाहिए होंगे।”

तब रोहतास ने एक उपाय सुझाया, “गाँव का सरपंच सेवक राम ब्याज पर पैसे देता है। मैं उससे बात करता हूँ। अगर वह ₹2 लाख ब्याज पर दे दे, तो कुल ₹3 लाख हो जाएँगे और तेरी दुकान अच्छे से शुरू हो जाएगी।”

नैना देवी ससुर के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गई। रोहतास उसी समय खटिया से उठा और अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाले गाँव के सरपंच सेवक राम के घर की ओर चल दिया।

अध्याय 3: सरपंच का कुचक्र और अ/वै/ध सौदा

रोहतास जब सरपंच सेवक राम के आलीशान मकान पर पहुँचा, तो सेवक राम अपने चबूतरे पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। रोहतास ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया और बात शुरू की, “सरपंच साहब, मेरी बहू गाँव में एक किराने की दुकान खोलना चाहती है ताकि अपने पैरों पर खड़ी हो सके। हमें ₹2 लाख कर्ज़ की सख्त ज़रूरत है। आप जो ब्याज कहेंगे, हम चुका देंगे।”

सरपंच सेवक राम एक चतुर, दबंग और अ/नै/ति/क/ चरित्र का व्यक्ति था। उसने रोहतास को ऊपर से नीचे तक देखा। वह जानता था कि रोहतास /श/रा/बी/ और लापरवाह इंसान है। सेवक राम ने हुक्के का धुआँ छोड़ते हुए साफ़ मना कर दिया, “देख रोहतास, तेरा हिसाब-किताब मुझे बिल्कुल ठीक नहीं लगता। तू पैसे लेकर /श/रा/ब/ में उड़ा देगा। मुझे तुझ पर रत्ती भर भरोसा नहीं है।”

रोहतास का चेहरा उतर गया। तभी सेवक राम ने अपनी कुटिल चाल चलते हुए कहा, “हाँ, अगर तेरी बहू नैना खुद मेरे पास आए, तो मैं सोच सकता हूँ। मैं उसे दुकान चलाने और पैसों का हिसाब-किताब अच्छे से समझा दूँगा। तू अपनी बहू को मेरे पास भेज दे।”

रोहतास खाली हाथ अपने घर लौट आया। उसने नैना से कहा, “सरपंच ने मुझे पैसे देने से साफ़ इनकार कर दिया है। वह कह रहा है कि पैसों की बात करने के लिए तुम खुद उसके घर जाओ। तुम एक बार जाकर बात कर लो, शायद वह तुम्हें कर्ज़ दे दे।”

नैना देवी ने कुछ देर विचार किया और फिर 10-15 मिनट बाद सरपंच सेवक राम के घर की ओर चल दी। सरपंच के घर पहुँचकर उसने बड़ी विनम्रता से कहा, “सरपंच साहब, मुझे दुकान के लिए ₹2 लाख कर्ज़ चाहिए। मैं वादा करती हूँ कि दुकान चलते ही धीरे-धीरे ब्याज सहित आपका पूरा पैसा लौटा दूँगी।”

जैसे ही सेवक राम की गिद्ध दृष्टि नैना देवी के चेहरे और उसकी सुंदरता पर पड़ी, उसकी नीयत पूरी तरह डोल गई। उसके मन में वासना का पाप जाग उठा। उसने मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में कहा, “देखो नैना, पैसे देना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है। मैं तुम्हें ₹2 लाख दे दूँगा और तुम्हें ब्याज लौटाने की भी कोई ज़रूरत नहीं पड़ेगी… लेकिन इसकी एक कीमत होगी, जो तुम्हें चुकानी पड़ेगी।”

‘कीमत’ शब्द सुनते ही नैना देवी सरपंच के गंदे इरादों को भांप गई। किंतु नैना का अपना चरित्र भी कोई बहुत अडिग या पवित्र नहीं था। आर्थिक तंगी और लालच ने उसके नैतिक मूल्यों को पहले ही कमज़ोर कर दिया था। उसने तीखे स्वर में किंतु सहमति के लहजे में कहा, “सरपंच साहब, पैसे तो आपको देने ही पड़ेंगे। अगर आपने पैसे नहीं दिए, तो फिर जो चीज़ आप मुझसे पाना चाहते हैं, वह आपको कभी नहीं मिलेगी।”

सरपंच सेवक राम नैना के संकेत को समझ गया। वह मन ही मन प्रसन्न हुआ और बोला, “नैना, तुम एक विधवा औरत हो। तुम्हारे घर में बेतहाशा गरीबी है। अगर तुम मेरे साथ कुछ वक्त गुज़ारो, तो मैं तुम्हारी गरीबी और तंगी हमेशा के लिए मिटा सकता हूँ।”

नैना ने अपनी शर्तें रखते हुए कहा, “ठीक है सरपंच साहब, लेकिन आपको मुझे पूरे ₹2 लाख देने होंगे। आपकी ज़रूरतों की जहाँ तक बात है, वह मैं कल ही पूरी कर दूँगी। कल सुबह मैं अकेले ही खेत में चारा काटने जाऊँगी। आप वहीं आ जाना, हम वहीं बैठकर सारा हिसाब-किताब पूरा कर लेंगे।”

यह /अ/वै/ध/ सौदा पक्का हो गया। सरपंच सेवक राम का चेहरा वासनापूर्ण मुस्कान से खिल उठा। नैना वहाँ से निकलकर अपने घर वापस आ गई।

अध्याय 4: गन्ने के खेत में /दु/रा/चा/र/ और कर्ज़ की रकम

रात बीत गई। अगले दिन, यानी 11 दिसंबर 2025 की सुबह लगभग 8:00 बजे, नैना देवी ने अपनी योजना के अनुसार अपनी बेटी सपना से कहा, “बेटी, आज घर में कपड़े धोने और सफाई का बहुत सारा काम पेंडिंग पड़ा है। तुम घर का काम संभालो, आज मैं अकेले ही खेत जाकर चारा काट लाती हूँ।”

सपना ने कहा, “माँ, घर का काम तो मैं निपटा दूँगी, लेकिन अकेले खेत में चारा काटने में तुम्हें परेशानी होगी। मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूँ।”

लेकिन नैना देवी ने बहाना बनाकर अपनी बेटी को घर पर ही रोक लिया और उसे मना लिया।

सुबह करीब 9:00 बजे नैना देवी हाथ में दराती और अपना छोटा कीपैड फोन लेकर खेतों की ओर चल पड़ी। खेत में पहुँचते ही उसने इधर-उधर देखा कि आसपास कोई नहीं है। उसने तुरंत सरपंच सेवक राम के नंबर पर कॉल मिलाया और कहा, “सरपंच साहब, मैं खेत में बिल्कुल अकेली हूँ। आप ₹2 लाख लेकर जल्दी आ जाइए।”

उधर सरपंच सेवक राम तो इसी बुलावे के इंतज़ार में था। उसने अपने घर की अलमारी से ₹2 लाख नकद निकाले, जेब में रखे और अपनी मोटरसाइकिल उठाकर खेतों की पगडंडियों की ओर निकल पड़ा। कुछ ही देर में वह नैना के खेत के पास पहुँच गया।

मोटरसाइकिल एक झाड़ी के पीछे खड़ी करके वह नैना के पास आया और नोटों की गड्डी दिखाते हुए बोला, “मैं पूरे ₹2 लाख लेकर आया हूँ। लेकिन यह पैसा तुम्हें तभी मिलेगा जब मेरी सारी ख्वाहिशें पूरी होंगी।”

नैना ने पैसों की गड्डी देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “यहाँ खुले में ठीक नहीं है। पास में ही ईख (गन्ने) का घना खेत है, चलिए वहीं चलते हैं। वहीं मेरी और आपकी ज़रूरतें पूरी होंगी और आप मुझे पैसे सौंप देना।”

नैना सरपंच सेवक राम का हाथ पकड़कर घने गन्ने के खेत के भीतर ले गई। गन्ने के ऊँचे-ऊँचे पौधों के बीच दोनों ने समाज और धर्म की सारी मर्यादाओं को लांघते हुए /अ/वै/ध सं/बं/ध/ बनाए। जब सरपंच की वासना की तृप्ति हो गई, तो उसने ₹2 लाख नैना के हाथों में सौंप दिए और कड़क आवाज़ में कहा, “ध्यान रखना नैना, 6 महीने के भीतर मुझे मेरा मूलधन (2 लाख रुपये) वापस चाहिए। ब्याज मैं तुमसे नहीं लूँगा।”

नैना पैसे पाकर बेहद खुश थी। उसने पैसे अपने आँचल में छिपाए। सरपंच अपनी बाइक लेकर गाँव लौट गया, जबकि नैना ने जल्दी-जल्दी चारा काटा और दोपहर करीब 2:00 बजे घर पहुँची।

अध्याय 5: ससुर रोहतास की वासना और घर के भीतर का पाप

घर पहुँचकर नैना ने चारे की गठरी रखी और ₹2 लाख चुपचाप अपने बक्से में बंद कर दिए। इसके बाद वह अपने ससुर रोहतास के पास गई और बोली, “पिताजी, सरपंच साहब से मैंने ₹2 लाख का कर्ज़ ले लिया है। लेकिन दुकान को बड़े पैमाने पर खोलने और पूरा सामान भरने के लिए अभी कम से कम ₹1 लाख की और ज़रूरत पड़ेगी।”

रोहतास ने जब अपनी बहू के मुँह से सुना कि वह सरपंच से ₹2 लाख ले आई है, तो उसके /श/रा/बी/ और कुटिल दिमाग में ख़तरनाक विचार आने लगे। रोहतास मन ही मन सोचने लगा, “जब मेरी बहू सरपंच के साथ वक्त गुज़ार कर ₹2 लाख ला सकती है, तो मैं तो इस घर का मालिक हूँ। ₹1 लाख देने के बदले मैं क्यों न अपनी बहू से शारीरिक सुख वसूलूँ?”

रोहतास की नीयत अपनी ही बहू पर पूरी तरह ख़राब हो चुकी थी। वह मौके की तलाश करने लगा।

तभी रोहतास की पोती सपना अपनी मां नैना के पास आई और बोली, “माँ, मैं अपनी सहेली के घर जा रही हूँ, एक-दो घंटे में काम निपटाकर वापस आती हूँ।” नैना ने सपना को जाने की अनुमति दे दी। सपना घर से बाहर निकल गई।

अब घर में केवल ससुर रोहतास और बहू नैना देवी ही अकेले रह गए। मौका मिलते ही रोहतास अपनी बहू के पास पहुँचा। उसकी आँखों में वासना की हवस साफ़ झलक रही थी। उसने नज़दीक आते हुए कहा, “बहू, मैं तुम्हें ₹1 लाख देने को तैयार हूँ, लेकिन मुफ़्त में नहीं। इसकी कीमत तुम्हें मुझे भी चुकानी होगी।”

नैना रोहतास की बात सुनकर चौंक गई। उसने पीछे हटते हुए कहा, “पिताजी, यह आप क्या कह रहे हैं? आप मेरे पिता के समान हैं। आप मेरे बारे में ऐसा गंदा विचार कैसे ला सकते हैं?”

लेकिन रोहतास पर तो हवस का भूत सवार था। उसने अड़ते हुए कहा, “पिता-बहू का रिश्ता अपनी जगह है और पैसा अपनी जगह। अगर ₹1 लाख चाहिए, तो तुम्हें मेरे साथ कमरे में चलना होगा, वरना भूल जाओ दुकान का सपना।”

नैना देवी ने पल भर के लिए सोचा। उसके मन के नैतिक मूल्य पहले ही सरपंच के साथ गिर चुके थे। उसने सोचा, “जब गाँव के सरपंच के साथ वक्त गुज़ार सकती हूँ, तो अपने ही घर के ससुर के साथ ऐसा करने में क्या हर्ज़ है? यह बात तो घर की चारदीवारी के भीतर ही दफ़न रहेगी, बाहर किसी को पता भी नहीं चलेगा।”

वासना और आर्थिक लालच के इस अ/नै/ति/क/ संगम में नैना सहमत हो गई। उसने जाकर घर का मुख्य दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। इसके बाद रोहतास और नैना दोनों कमरे के भीतर चले गए।

रोहतास की आत्मा और ज़मीर पूरी तरह मर चुका था। उसने एक पल के लिए भी यह नहीं सोचा कि नैना उसके मृत बेटे की पत्नी है। दोनों ने कमरे के भीतर /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध सं/बं/ध/ स्थापित किए। जब दोनों की वासना शांत हो गई, तो रोहतास ने हाँफते हुए कहा, “कल सुबह मैं बैंक जाऊँगा और अपने खाते से ₹1 लाख निकाल कर तुम्हें दे दूँगा।”

अगले दिन रोहतास बैंक गया, ₹1 लाख नकद निकाले और लाकर नैना को दे दिए। अब नैना के पास कुल ₹3 लाख हो चुके थे।

अध्याय 6: दुकान की शुरुआत और नया कुचक्र

अगले तीन-चार दिनों के भीतर नैना देवी ने गाँव के मुख्य मोड़ पर एक अच्छी दुकान किराये पर ली, उसमें रैक लगवाए और ₹3 लाख का परचून का सामान भरवा कर ‘नैना किराना स्टोर’ का उद्घाटन कर दिया।

अब नैना का दैनिक जीवन बदल गया। वह हर सुबह 7:00 बजे दुकान पर चली जाती, दिनभर बिक्री करती और रात को 8:30 या 9:00 बजे घर लौटती। दुकान बहुत अच्छी चलने लगी और घर में पैसों की आवक शुरू हो गई।

लेकिन घर के भीतर एक और ख़तरनाक खेल शुरू होने वाला था। दुकान खुलने के बाद मवेशियों की देखभाल और चारा काटने की जिम्मेदारी दादा रोहतास और पोती सपना पर आ गई थी। रोहतास हर सुबह करीब 8:00 बजे सपना को साथ लेकर खेतों में चारा काटने जाने लगा। चारा काटकर दोनों वापस आते और मवेशियों को सान-पानी करते।

लगभग 15-20 दिन इसी तरह शांति से बीत गए। घर में दो पैसे आने से सब कुछ ठीक-ठाक दिखाई दे रहा था। किंतु रोहतास का लालच और उसकी वासना की भूख अभी शांत नहीं हुई थी। अब उसकी हवसभरी नज़र अपनी ही 15-16 वर्षीय पोती सपना पर टिक गई थी।

अध्याय 7: 25 दिसंबर की ख़ूनी ज़मीन और पोती पर /दु/रा/चा/र/

तारीख आई 25 दिसंबर 2025। बड़ा दिन (क्रिसमस) था, ठंड काफी बढ़ चुकी थी। सुबह के करीब 7:00 बजे सपना घर की सफाई कर रही थी। उसकी माँ नैना देवी दुकान जाने के लिए तैयार हो रही थी। नैना ने जाते-जाते कहा, “सपना बेटी, तू जल्दी से घर का काम निपटाकर दादाजी के साथ खेत से चारा ले आना, मैं दुकान खोलने जा रही हूँ।”

नैना के जाने के बाद सपना अकेली काम में जुटी थी। तभी रोहतास घर के भीतर आया। उसने अपनी पोती सपना की ओर देखा। सपना की युवा अवस्था और उसकी मासूमियत को देखकर रोहतास के भीतर दानव जाग उठा।

रोहतास मन ही मन सोचने लगा, “बहू नैना को तो मैंने अपने वश में कर ही लिया है। लेकिन इस घर में जो यह कोहिनूर का हीरा (सपना) है, इसे भी किसी तरह हासिल करना होगा।”

रोहतास का जमीर इस हद तक गिर चुका था कि दादा-पोती के पवित्र रिश्ते का भी उसे कोई ध्यान नहीं रहा। वह अपनी पोती से बोला, “सपना, मैं 15-20 मिनट में बाहर से एक ज़रूरी काम निपटाकर आता हूँ, फिर हम दोनों खेत चलेंगे।”

सपना ने मासूमियत से कहा, “ठीक है दादाजी।”

रोहतास घर से निकलकर सीधे गाँव के ठेके पर गया। वहाँ से उसने /श/रा/ब/ की बोतल खरीदी और एक सुनसान जगह पर बैठकर गटक गया। जब /श/रा/ब/ का नशा उसके सिर पर चढ़ गया, तो वह झूमता हुआ घर लौटा और सपना से बोला, “चल सपना, खेत चल चारा काटने।”

सपना जैसे ही रोहतास के पास आई, उसे रोहतास के मुँह से /श/रा/ब/ की तीखी बदबू आई। सपना ने टोकते हुए कहा, “दादाजी, आपने तो सुबह-सुबह ही /श/रा/ब/ पी रखी है! आप घर पर आराम कीजिए, मैं अकेले ही खेत जाकर चारा काट लाती हूँ।”

लेकिन रोहतास ने जिद्द पकड़ ली, “मैंने कोई ज़्यादा नहीं पी है। तू अकेले इतना चारा नहीं ला पाएगी, चल मेरे साथ।”

सपना न चाहते हुए भी अपने दादा के साथ चल दी। सुबह करीब 9:30 बजे दोनों खेत में पहुँच गए। सपना दराती लेकर घास काटने लगी। रोहतास ने चारों तरफ देखा—कोहरे और ठंड के कारण दूर-दूर तक खेतों में कोई इंसान नज़र नहीं आ रहा था। सन्नाटा पसरा हुआ था।

रोहतास दबे पाँव सपना के पीछे पहुँचा और झटके से उसके हाथ से दराती छीन ली। इससे पहले कि सपना कुछ समझ पाती, रोहतास ने उस धारदार दराती को सपना की गर्दन पर टिका दिया और गुर्राते हुए बोला, “अगर तूने एक शब्द भी चीखने या चिल्लाने की कोशिश की, तो तेरा गला यहीं काट कर फेंक दूँगा!”

सपना दराती की ठंडी धार अपनी गर्दन पर महसूस करके बुरी तरह काँप उठी। उसकी आँखों में भय के आँसू आ गए। वह समझ नहीं पा रही थी कि उसका सगा दादा उसके साथ यह क्या कर रहा है।

रोहतास ने उसका हाथ दबोचा और घसीटते हुए पास के घने गन्ने (ईख) के खेत के अंदर ले गया। गन्ने के खेत के भीतर ले जाकर रोहतास ने दादा-पोती के रिश्ते को हमेशा के लिए कलंकित कर दिया। उसने अपनी ही पोती के साथ बर्बरतापूर्वक /श/री/रि/क शो/ष/ण/ और /दु/रा/चा/र/ किया।

सपना रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, हाथ जोड़कर कहती रही, “दादाजी! दया करो, आप मेरे दादा हो, यह बहुत बड़ा पाप है… मुझे छोड़ दो!” लेकिन /श/रा/ब/ और वासना के नशे में अंधे रोहतास पर पोती की चीखों का कोई असर नहीं हुआ। उसने अपनी हवस पूरी की।

काम ख़त्म होने के बाद रोहतास ने सपना के बालों को पकड़कर घसीटा और धमकी दी, “अगर यह बात तूने अपनी माँ नैना या गाँव में किसी को भी बताई, तो मैं तुझे और तेरी माँ दोनों को जान से मार दूँगा और घर से बाहर निकाल दूँगा। चुपचाप चारा उठा और घर चल!”

भयभीत सपना काँपते हाथों से चारा लादकर घर लौटी। शाम को जब उसकी माँ नैना दुकान से आई, तो सपना गुमसुम बैठी रही। उसने डर के मारे अपनी माँ को कुछ नहीं बताया। उसे लगा कि यदि वह माँ को बताएगी, तो दादा उन दोनों को जान से मार देगा। यही सपना की सबसे बड़ी भूल साबित हुई।

इसके बाद रोहतास का हौसला और बढ़ गया। वह हर रोज़ चारा काटने के बहाने सपना को खेत ले जाता और डरा-धमकाकर उसका /श/री/रि/क शो/ष/ण/ करता रहा। पूरा एक महीना बीत गया।

अध्याय 8: /ग/र्भ/व/ती/ होने का सच और पाप का घड़ा

समय बीता और तारीख आ गई 28 जनवरी 2026।

सुबह के करीब 7:00 बजे सपना घर में बर्तन साफ कर रही थी। नैना देवी आज दुकान जाने में थोड़ी देर कर रही थी। अचानक सपना को तेज़ी से चक्कर आया और वह ज़मीन पर गिर पड़ी। उसे ज़ोरदार उल्टी (जी मिचलाना) होने लगी और वह निढाल हो गई।

नैना देवी ने जब अपनी बेटी की यह हालत देखी, तो दौड़कर उसके पास आई और सिर सहलाते हुए बोली, “बेटी सपना, तेरी तबीयत बहुत ख़राब लग रही है। तू आज घर पर आराम कर, खेत मत जाना।”

सपना ने रोते हुए कहा, “माँ, मुझे बहुत बेचैनी और घबराहट हो रही है, मुझसे सहन नहीं हो रहा।”

नैना ने कहा, “चल, मैं तुझे अभी शहर के बड़े अस्पताल ले चलती हूँ। पहले डॉक्टर को दिखाएंगे, दुकान बाद में खोलूँगी।”

सुबह 9:00 बजे नैना अपनी बेटी को लेकर पास के शहर के एक नामी अस्पताल पहुँची। वहाँ महिला डॉक्टर (गायनेकोलॉजिस्ट) ने सपना को स्ट्रैचर पर लिटाया और उसकी प्राथमिक जाँच तथा ब्लड/यूरिन टेस्ट किए।

कुछ देर बाद जाँच रिपोर्ट लेकर महिला डॉक्टर बाहर आई। डॉक्टर का चेहरा गंभीर था। उसने नैना को अपने केबिन में बुलाया और कहा, “नैना जी, आपकी बेटी सपना /ग/र्भ/व/ती/ (Pregnant) है।”

यह सुनते ही नैना देवी के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उसके सिर पर जैसे आसमान टूट पड़ा। वह सन्न रह गई। उसके दिमाग में तरह-तरह के विचार कौंधने लगे—”15 साल की मेरी बेटी /ग/र्भ/व/ती/ कैसे हो सकती है? क्या इसका किसी आवारा लड़के से चक्कर था? इसने कुल का नाम डुबो दिया!”

नैना ने डॉक्टर से कुछ दवाइयाँ लीं और घसीटते कदमों से सपना को लेकर घर वापस आ गई।

घर पहुँचकर नैना ने अंदर से कुंडी लगाई और सपना को थप्पड़ मारते हुए चिल्लाई, “बता हरामज़ादी! तूने किस मुँह काले के साथ यह पाप किया है? किस लड़के के साथ तेरा चक्कर चल रहा था?”

सपना फूट-फूटकर रोने लगी। आज उसके भीतर का डर ख़त्म हो चुका था। उसने अपनी माँ की आँखों में आँखें डालकर कहा, “माँ! किसी बाहर वाले ने नहीं… हमारे घर के भीतर ही एक राक्षस छिपा हुआ है! और उस राक्षस के कमरे में तुम भी हर रात जाती रही हो! मैंने अपनी आँखों से तुम्हें उस राक्षस के कमरे में जाते देखा है!”

नैना का चेहरा पीला पड़ गया। उसने थरथराते हुए कहा, “तू… तू क्या कह रही है सपना? साफ़-साफ़ बता!”

सपना ने रोते हुए पूरा सच उगल दिया, “माँ, दादाजी हर रोज़ मुझे खेत में ले जाकर दराती की नोक पर मेरा /श/री/रि/क शो/ष/ण/ करते थे! उन्होंने मुझे धमकी दी थी कि अगर तुम्हें बताया तो हम दोनों को मार देंगे। तुम तो उनके साथ अपनी मर्जी से सोती थी पैसे के लिए, लेकिन उन्होंने मेरे साथ ज़बरदस्ती /दु/रा/चा/र/ किया है!”

अपनी मासूम पोती पर ससुर के इस भयानक अत्याचार और वासना की कहानी सुनकर नैना देवी के भीतर की माँ जाग उठी। उसका खून खौल उठा। जिस ससुर को उसने पैसों के लिए अपना शरीर सौंपा था, वही ससुर उसकी बच्ची की ज़िंदगी तबाह कर चुका था।

नैना ने सपना को गले से लगाया और आँख में असीम नफ़रत लिए बोली, “बस बेटी! अब बहुत हो चुका। आज रात ही हम उस बूढ़े राक्षस का काम तमाम करेंगे!”

सपना ने अपनी माँ की आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला देखी और कत्ल की इस योजना में शामिल होने के लिए तुरंत सहमत हो गई।

अध्याय 9: प्रतिशोध की ख़ूनी रात

दिन ढल गया और रात का अंधेरा पंजरी गाँव पर छा गया।

रात के लगभग 9:30 बजे रोहतास सिंह हमेशा की तरह ठेके से ढींचक /श/रा/ब/ पीकर धुत्त होकर घर पहुँचा। उसकी आँखें लाल थीं और चाल लड़खड़ा रही थी। उसने रसोई में रखा खाना खाया और बिना कुछ सोचे-समझे अपने कमरे में जाकर चारपाई पर बेसुध होकर सो गया। /श/रा/ब/ के नशे में वह खर्राटे लेने लगा।

माँ-बेटी अपने कमरे में जाग रही थीं। वे घड़ी की सुइयों पर नज़र गड़ाए बैठी थीं।

रात के ठीक 11:00 बजे, जब पूरे गाँव में सन्नाटा पसर गया और चारों तरफ केवल कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आ रही थीं, नैना और सपना चुपचाप रसोई में गईं। नैना ने सब्जी काटने वाला बड़ा और धारदार चाकू उठाया।

दोनों दबे पाँव रोहतास के कमरे में दाखिल हुईं। कमरे में हल्की डिबरी (दीपक) जल रही थी। रोहतास बेखबर सो रहा था।

सपना के मन में महीनेभर से जमा नफ़रत और दर्द उबल पड़ा। उसने आगे बढ़कर चाकू अपने हाथ में लिया और अपने दादा रोहतास की गर्दन और छाती पर एक के बाद एक तीन बार ज़ोरदार वार कर दिए! रोहतास दर्द से छटपटाकर उठा और चीखने की कोशिश करने लगा।

लेकिन नैना देवी तो हैवान बन चुकी थी। उसने रोहतास का मुँह तकिये से भींच दिया और सपना से चाकू छीनकर रोहतास की गर्दन पर तब तक रेतती रही जब तक कि उसकी साँसों की डोरी पूरी तरह टूट नहीं गई।

कमरे की दीवारें और बिस्तर रोहतास के ख़ून से लाल हो गए। कुछ ही मिनटों में रोहतास सिंह तड़प-तड़पकर ठंडा पड़ गया। उसकी जीवन-लीला समाप्त हो चुकी थी।

अध्याय 10: आत्मसमर्पण और पुलिस कार्रवाई

/ह/त्या/कांड/ को अंजाम देने के बाद माँ-बेटी ने अपने ख़ून से सने हाथ-पैर धोए। कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंद किया।

रात के लगभग 12:30 बजे, घने कोहरे के बीच नैना और सपना पैदल चलते हुए पास के पुलिस स्टेशन (थाने) पहुँचीं। थाने में उस वक्त नाइट ड्यूटी पर तैनात दरोगा (एसएचओ) अपनी मेज पर बैठा फ़ाइलें देख रहा था।

दो महिलाओं को आधी रात को बदहवास हालत में थाने में आते देख दरोगा चौकन्ना हो गया। नैना देवी ने काँपते किंतु दृढ़ स्वर में कहा, “साहब! हमने अपने ससुर रोहतास सिंह का कत्ल कर दिया है। उसकी लाश हमारे घर के कमरे में पड़ी है।”

दरोगा और अन्य पुलिसकर्मी सन्न रह गए। तुरंत पुलिस की एक टीम जीप लेकर पंजरी गाँव स्थित रोहतास के मकान पर पहुँची। जब कमरे का दरवाज़ा खोला गया, तो अंदर का नज़ारा देखकर पुलिस अधिकारियों के भी रोंगटे खड़े हो गए। पूरा बिस्तर ख़ून से लाल था और रोहतास का शव विकृत अवस्था में पड़ा था।

पुलिस ने तुरंत फोरेंसिक टीम को बुलाया। साक्ष्य जुटाए गए, ख़ून से सना चाकू बरामद किया गया और रोहतास के शव को पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया।

थाने लाकर जब पुलिस ने गहन पूछताछ की, तो नैना और सपना ने सरपंच सेवक राम के कुचक्र, ससुर रोहतास की हवस, /ग/र्भ/व/ती/ होने की रिपोर्ट और कत्ल की पूरी दास्तान बयान कर दी। पुलिस ने नैना देवी और सपना दोनों के खिलाफ /ह/त्या/ (धारा 302/103) का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया। साथ ही, सपना के बयानों के आधार पर पुलिस ने मृतक रोहतास के मरणोपरांत रिकॉर्ड और सरपंच सेवक राम के खिलाफ भी अ/वै/ध/ लेनदेन और शो/ष/ण/ की धाराओं में जाँच शुरू कर दी।

उपसंहार: न्याय की कसौटी और समाज पर प्रश्नचिह्न

यह दर्दनाक घटना आज भी मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में चर्चा का विषय बनी हुई है। अदालत में केस की सुनवाई जारी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। कानूनी दृष्टिकोण से किसी की जान लेना अपराध है, और जज साहब भविष्य में नैना तथा सपना को क्या सजा सुनाएंगे, यह कानून के गर्भ में छिपा है।

किंतु यह घटना समाज के सामने कई कड़वे और गंभीर प्रश्न छोड़ जाती है:

  1. क्या केवल गरीबी और तंगी के कारण नैतिक मर्यादाओं को ताक पर रख देना उचित था?
  2. जिस दादा का फर्ज़ अपनी पोती की रक्षा करना था, जब वही भक्षक बन जाए, तो समाज अपनी बेटियों को कहाँ सुरक्षित महसूस कराए?
  3. क्या नैना देवी का पैसों के लिए ससुर और सरपंच के साथ समझौता करना इस त्रासदी की पहली नींव नहीं बना?

रोहतास के पापों का अंत ख़ून से हुआ, किंतु इस घटना ने तीन जिंदगियों को पूरी तरह तबाह कर दिया—रोहतास की जान गई, सपना की मासूमियत और भविष्य नष्ट हुआ, और नैना सलाखों के पीछे पहुँच गई। यह कहानी समाज के लिए एक चेतावनी है कि लालच और अ/नै/ति/क/ वासना का अंत हमेशा विनाशकारी ही होता है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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