मजबूर महिला के साथ सरपंच ने यह क्या किया | – News

मजबूर महिला के साथ सरपंच ने यह क्या किया |

मजबूर महिला के साथ सरपंच ने यह क्या किया |

मजबूर महिला के साथ बाहुबली काशी का अत्याचार

1990 के दशक में कर्नाटक के एक गाँव की वास्तविक व दिल दहला देने वाली घटना पर आधारित विस्तृत कहानी

अध्याय 1: कर्नाटक का वह गाँव और शैलजा का संघर्ष

1990 का दशक उत्तर व दक्षिण भारत के कई ग्रामीण अंचलों में बाहुबलियों और स्थानीय माफियाओं के खौफनाक दौर के रूप में जाना जाता था। कानून का राज केवल कागजों तक सीमित था, जबकि जमीनी हकीकत पर दबंगों की मर्जी ही कानून हुआ करती थी। कर्नाटक के एक दूरदराज गाँव में हरी-भरी पहाड़ियों और नारियल के ऊँचे वृक्षों के बीच बसा एक छोटा सा मजरा था। गाँव दिखने में जितना शांत था, उसकी तहों के नीचे उतनी ही गहरी खामोशी और खौफ दबा हुआ था।

इसी गाँव की एक कच्ची सी झोपड़ी में शैलजा अपने दो मासूम बच्चों के साथ रहती थी। शैलजा की बड़ी बेटी रत्ना 15 वर्ष की एक सीधी-साधी किशोरी थी, जो घर के कामों में माँ का हाथ बँटाती थी। छोटा बेटा अरमान महज 11 साल का एक चंचल लेकिन समझदार बालक था। शैलजा के पति की कई साल पहले संदिग्ध परिस्थितियों में /ह/त्या/ हो चुकी थी। पति के गुजर जाने के बाद पूरे परिवार के भरण-पोषण का सारा बोझ अकेली शैलजा के कमजोर कंधों पर आ पड़ा था।

गाँव के किनारे एक विशालकाय गढ़नुमा हवेली थी, जो पूरे इलाके में ‘बाहुबली काशी’ की कोठी के नाम से जानी जाती थी। काशी एक ऐसा रसूखदार और खूँखार शख्स था, जिसके नाम से ही पूरा इलाका काँपता था। उसके खिलाफ न तो स्थानीय पुलिस प्रशासन कोई कदम उठाने की हिम्मत करता था और न ही कोई ग्रामीण उसके सामने मुँह खोलने की जुर्रत पाता था। यहाँ तक कि जब स्थानीय थाने के सिपाही या अफसर उसकी हवेली के आसपास से गुजरते, तो अपनी गाड़ियों की नंबर प्लेट और वर्दी की नेमप्लेट ढक लिया करते थे, ताकि काशी की उन पर बुरी नजर न पड़े।

शैलजा पिछले लगभग छह सालों से काशी की इसी विशाल हवेली में चौका-बर्तन, साफ-सफाई और मवेशियों की देखरेख का काम करती थी। उस हवेली से मिलने वाले चंद रुपयों और अनाज से ही शैलजा अपने दोनों बच्चों का पेट पाल रही थी। लेकिन इस मजदूरी के पीछे जो असहनीय मानसिक व /शा/री/रि/क/ /उ उत्पीड़न/ और /शो/षण/ छुपा था, उसे शैलजा ने कभी अपने बच्चों या गाँव वालों के सामने जाहिर नहीं होने दिया था। वह चुपचाप हर दर्द सहती आ रही थी, ताकि उसके बच्चे सुरक्षित रह सकें।

अध्याय 2: सूनी भोर, गायब माँ-बहन और अरमान का डर

दिसंबर की एक ठंडी और धुंधली रात थी। वातावरण में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। शैलजा हर रोज की तरह शाम को काशी की हवेली पर काम करने गई थी। उसने बच्चों से कहा था कि वह काम खत्म करके रात आठ बजे तक लौट आएगी। 11 साल का अरमान और 15 साल की रत्ना घर में माँ के लौटने का इंतजार कर रहे थे।

रात ढलती गई। नौ बजे, दस बजे, फिर मध्यरात्रि का समय आ गया, लेकिन शैलजा वापस नहीं लौटी।

अचानक रात के लगभग एक बजे झोपड़ी के लकड़ी के मुख्य किवाड़ पर जोर-जोर से दस्तक होने लगी। कोई बाहर से दरवाजा खटखटा रहा था। आवाज में एक अजीब सी जल्दबाजी और आक्रामकता थी। अरमान डर के मारे अपनी रजाई में दुबक गया। रत्ना ने दरवाजे के पास जाकर धीमी आवाज में पूछा, “कौन है बाहर? माँ, तुम हो क्या?”

लेकिन बाहर से कोई जवाब नहीं आया, बस दरवाजे पर चोट और तेज हो गई। भय से थर-थर काँपता अरमान कोने में मुँह छिपाकर सो जाने का नाटक करने लगा। धीरे-धीरे भय और थकान के कारण उसकी आँख लग गई।

जब सुबह की पहली किरण फैली और चिड़ियों की चहचहाहट शुरू हुई, तो अरमान की आँख खुली। कमरे में अजीब सा सन्नाटा था। उसने उठकर देखा—न तो माँ घर पर थी और न ही उसकी बड़ी बहन रत्ना कहीं नजर आ रही थी। रसोई का सामान बिखरा हुआ था और दरवाजा आधा खुला पड़ा था।

“दीदी! दीदी! माँ!” अरमान ने रोते हुए पूरे घर और आसपास के आँगन में पुकारा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

11 साल का मासूम बच्चा घबराकर गाँव की पगडंडियों पर भागने लगा। उसने पास के कुएँ, मवेशियों के छप्पर और पड़ोसी के खेतों में ढूँढा, पर दोनों का कोई सुराग नहीं मिला। अरमान फूट-फूटकर रोने लगा। गाँव का कोई भी व्यक्ति उससे बात करने या उसकी मदद करने आगे नहीं आया, क्योंकि सब जानते थे कि मामला अगर काशी की तरफ जाता है, तो उसमें पड़ना अपनी जान जोखिम में डालना है।

रोते-बिलखते अरमान ने सोचा कि अब वह क्या करे? उसे याद आया कि उसकी माँ कभी-कभी उसे अपने मायके यानी अरमान के मामा मदन के गाँव ले जाया करती थी। मामा का गाँव यहाँ से लगभग बीस किलोमीटर दूर था। अरमान के पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी। उसने अपनी झोपड़ी के मटके में रखा थोड़ा सा कच्चा चावल एक कपड़े में बाँधा और गाँव की एक छोटी सी परचून दुकान पर जाकर गिड़गिड़ाया। दुकानदार ने तरस खाकर चावल के बदले उसे कुछ सिक्के दे दिए।

उन सिक्कों से किसी तरह बस का आधा किराया चुकाकर और बाकी रास्ता नंगे पाँव पैदल तय करके, शाम ढलते-ढलते मासूम अरमान अपने मामा मदन के दरवाजे पर जा पहुँचा।

अध्याय 3: मामा मदन का खौफ और काशी का गढ़

अरमान को बदहवास, धूल से सने और रोते हुए देखकर उसके मामा मदन घबरा गए। मदन एक बेहद गरीब, सीधा-साधा और अनपढ़ मजदूर था, जो नदी में जाल डालकर मछली पकड़ने और मजदूरी करके अपना तथा अपने परिवार का पेट पालता था।

अरमान ने रोते-रोते अपने मामा को पूरी बात बताई, “मामा जी! कल रात मम्मी काम पर गई थीं, पर वापस नहीं आईं। रात को कोई बहुत जोर-जोर से दरवाजा खटखटा रहा था। मैं डर के मारे सो गया। सुबह उठा तो घर में न मम्मी थीं और न रत्ना दीदी। घर का दरवाजा खुला था। मुझे बहुत डर लग रहा है मामा!”

यह सुनते ही मदन के पैर तले जमीन खिसक गई। मदन जानता था कि उसकी बहन शैलजा बाहुबली काशी के यहाँ काम करती है। काशी का नाम सुनते ही गाँव-देहात के अच्छे-अच्छे शूरवीरों का खून जम जाता था। मदन समझ गया कि यह कोई साधारण गुमशुदगी नहीं है, बल्कि इसके पीछे जरूर उस हैवान काशी का हाथ है।

पूरी रात मदन करवटें बदलता रहा। अगली सुबह सूरज निकलते ही मदन ने अपने कदम बहन के गाँव की तरफ बढ़ा दिए। वह सीधे काशी की उस ऊँची दीवार वाली हवेली पर पहुँचा। हवेली के मुख्य द्वार पर असलाहधारी खूँखार पहरेदार तैनात थे।

जब मदन ने थर-थर काँपते हुए पहरेदारों से कहा कि वह शैलजा का भाई है और अपनी बहन से मिलना चाहता है, तो पहरेदारों ने उसे धक्का देकर पीछे धकेल दिया। लेकिन जब उसने बार-बार मिन्नतें कीं, तो एक कारिंदा उसे अंदर विशाल प्रांगण में ले गया, जहाँ बाहुबली काशी एक ऊँची नक्काशीदार कुर्सी पर बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था।

मदन ने हाथ जोड़कर, जमीन पर सिर झुकाते हुए कहा, “सरकार! मालिक! मेरी बहन शैलजा आपके यहाँ बरसों से काम करती है। वह परसों रात से अपने घर नहीं पहुँची और मेरी 15 साल की भांजी भी गायब है। रात को कोई दरवाजा खटखटा रहा था। सरकार, कुछ पता चल जाता तो गरीब पर बड़ा उपकार होता!”

काशी ने हुक्के का धुआँ छोड़ते हुए मदन को सर से पैर तक घूरकर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी क्रूर मुस्कान तैर गई। उसने भारी आवाज में कहा: “तू शैलजा का भाई है? तुझे कैसे पता चला कि रात को कोई दरवाजा खटखटा रहा था? वो छोटा लड़का तेरे पास पहुँचा है क्या?”

मदन ने सहमकर कहा, “जी मालिक, मेरा भांजा अरमान रोता हुआ मेरे घर आया था।”

काशी ने ठहाका लगाया और कहा, “हाँ! तेरी बहन शैलजा यहीं है, मेरे पास। लेकिन तेरी भांजी रत्ना यहाँ नहीं है। उसका मुझे कुछ नहीं पता।”

मदन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मालिक! एक बार मेरी बहन से मिला दीजिए, बस दो बातें पूछ लूँ।”

काशी का दिल पत्थर का था, लेकिन उसने एक घमंडी चाल के तहत मदन को उसकी बहन से मिलाने की इजाजत दे दी।

अध्याय 4: बंदिशों के बीच भाई-बहन का दर्दनाक मिलन

हवेली के पिछले हिस्से में बने एक अंधेरे, बदबूदार और सीलन भरे कमरे में मदन को ले जाया गया। वहाँ जो दृश्य मदन ने देखा, उसे देखकर किसी भी भाई की आत्मा काँप उठती।

शैलजा एक फटे-पुराने कपड़े में लिपटी, दीवार से टेक लगाए बैठी थी। उसकी आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे, चेहरे पर /अत्या/चार/ और /शो/षण/ के स्पष्ट निशान थे। ऐसा लग रहा था जैसे उसकी जिजीविषा पूरी तरह निचोड़ ली गई हो।

मदन दौड़कर अपनी बहन के पास पहुँचा और घुटनों के बल बैठकर रोने लगा, “बहन! यह क्या हाल बना रखा है तूने? तू घर क्यों नहीं आई? और रत्ना कहाँ है? अरमान भागकर मेरे घर आया है, वह बहुत रो रहा है। बता बहन, रत्ना कहाँ है?”

शैलजा की आँखों से आँसू की पतली धार बह निकली। उसने अपने काँपते हुए हाथों से भाई का हाथ पकड़ा और बेहद धीमी, घुटती हुई आवाज में बोली: “भैया… रत्ना भी यहीं है… इसी हवेली के किसी गुप्त कमरे में बंद है…”

मदन स्तब्ध रह गया। उसने कहा, “लेकिन बाहर तो मालिक कह रहे हैं कि रत्ना का उन्हें कुछ नहीं पता!”

शैलजा ने बदहवास होकर अपने भाई के मुँह पर हाथ रख दिया और गिड़गिड़ाते हुए फुसफुसाकर बोली: “भैया! ईश्वर के लिए चुप हो जाओ! जो वो कह रहे हैं, बस चुपचाप सुन लो। उनसे कोई सवाल-जवाब मत करना, वरना वे तुम्हें और अरमान को भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे। वे बहुत बड़े हैवान हैं। तुम यहाँ से तुरंत चले जाओ भैया! 10-15 दिन देखना… अगर हम जिंदा बचकर आ गए तो ठीक, वरना तुम अरमान का ध्यान रखना… उसे अपने बच्चों की तरह पाल लेना भैया… यही मेरी आखिरी भीख है तुमसे!”

मदन की आँखों के सामने अँधेरा छा गया। अपनी सगी बहन और मासूम भांजी को इस हैवानियत की गिरफ्त में देखते हुए भी वह कुछ नहीं कर सकता था। वह बेबस, अपाहिज और असहाय था।

जब मदन कमरे से बाहर निकला, तो काशी सामने खड़ा मुस्कुरा रहा था। उसने मदन के कंधे पर हाथ रखकर व्यंग्य से पूछा, “क्या हुआ? मिल लिया बहन से? कुछ पता चला भांजी का?”

मदन ने अपना सिर झुका लिया, आँखें बंद कीं और कलेजे पर पत्थर रखकर कहा, “नहीं मालिक… बहन ने कहा कि उसे नहीं पता, कहीं गई होगी…”

काशी और उसके गुर्गे अट्टहास मारकर हँस पड़े। मदन अपमान और दर्द के कड़वे घूँट पीकर वहाँ से अपने गाँव की तरफ लौट पड़ा।

अध्याय 5: मामा के घर का कलेश और अरमान की रवानगी

घर पहुँचने पर 11 साल का अरमान अपने मामा से चिपट गया, “मामा जी! मम्मी मिली? दीदी कहाँ हैं? क्या हम घर वापस जा रहे हैं?”

मदन ने रोते हुए अरमान को गले से लगा लिया और झूठ बोला, “बेटा, तुम्हारी मम्मी मालिक के काम से बाहर गई हैं। 10-15 दिन में आ जाएँगी। तुम यहीं मेरे पास रहो।”

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मदन तो अपनी बहन के बेटे को अपनी औलाद की तरह प्यार करता था, लेकिन मदन की पत्नी (अरमान की मामी) का दिल बहुत कठोर था। गरीबी के कारण उनके अपने चार बच्चों का पेट पालना भारी पड़ रहा था। ऐसे में एक और बेघर बच्चे का आ जाना मामी को फूटी आँख नहीं सुहा रहा था।

जब भी मदन घर पर नहीं होता, मामी अरमान को ताने मारती, उससे घर का भारी-भारी काम करवाती और बात-बात पर उसे डांटती-पीटती।

चार-पाँच दिन बीत गए। एक दिन मदन तड़के ही नदी पर मछली पकड़ने चला गया था। घर में मामी ने अरमान को बासी रोटी का एक टुकड़ा दिया और किसी बात पर चिढ़कर उसे जोर से थप्पड़ मार दिया और चिल्लाई, “भाग यहाँ से! तेरे बाप-माँ ने हमारे सिर पर बोझ मढ़ दिया है! निकल जा मेरे घर से!”

11 साल का मासूम अरमान रोते-बिलखते घर से बाहर भाग निकला। उसके छोटे से मन में केवल अपनी माँ का चेहरा घूम रहा था। उसने सोचा कि उसके मामा ने कहा था कि मम्मी काशी मालिक की हवेली पर है। यद्यपि अरमान ने गाँव वालों से काशी के खौफ की बातें सुन रखी थीं, लेकिन माँ से मिलने की तड़प उसके बाल-मन के सारे डर पर भारी पड़ गई।

अरमान धूल भरी सड़क पर रोता, बिलखता और ठोकरें खाता हुआ काशी की हवेली वाले गाँव की तरफ अकेले ही पैदल चल पड़ा।

अध्याय 6: रास्तों का मसीहा: इंस्पेक्टर नकुल से मुलाकात

दिसंबर की ढलती दोपहर थी। कच्ची सड़क पर धूल उड़ रही थी। 11 साल का अरमान रोते हुए चले जा रहा था। तभी पीछे से एक बुलेट मोटरसाइकिल के स्टार्ट होने की भारी आवाज आई और वह अरमान के बिल्कुल पास आकर रुकी।

मोटरसाइकिल पर लगभग 28-29 साल का एक सुगठित, रोबीला और रौबदार नवयुवक बैठा था। उसने खाकी वर्दी पहन रखी थी, कंधे पर तीन सितारे चमक रहे थे। वह थे उसी इलाके के नए पुलिस इंस्पेक्टर नकुल।

इन्स्पेक्टर नकुल उस दौर के पारंपारिक, बिक चुके और डरपोक पुलिस अफसरों से बिल्कुल अलग थे। वे एक निर्भीक, ईमानदार और जनता के रक्षक किस्म के योद्धा अधिकारी थे।

नकुल ने बुलेट बंद की और अरमान के चेहरे पर जमा धूल और आँसू देखकर नरमी से पूछा, “अरे बेटा! तुम इतने छोटे हो, इस सुनसान रास्ते पर रोते हुए कहाँ जा रहे हो? तुम्हारे माता-पिता कहाँ हैं?”

पहले तो अरमान खाकी वर्दी देखकर घबरा गया और पीछे हटने लगा। लेकिन नकुल ने अपनी जेब से एक टॉफी निकाली, अरमान की तरफ बढ़ाई और बहुत प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा, “डरो मत बेटा! मैं पुलिस अफसर हूँ, लोगों की मदद करता हूँ। बताओ, क्या तकलीफ है?”

नकुल के आत्मीय स्पर्श से अरमान का सब्र का बाँध टूट गया। वह फूट-फूटकर रोने लगा और उसने जो कुछ भी घटित हुआ था—माँ का गायब होना, रात की दस्तक, बहन रत्ना का अचानक लापता होना, मामा का हवेली जाना और मामी की मार—सब कुछ नकुल को सच-सच बता दिया।

अरमान ने कहा, “साहब! मेरी मम्मी बाहुबली काशी की हवेली में काम करती हैं। मामा ने कहा था कि मम्मी वहीं हैं। मैं अपनी मम्मी के पास जा रहा हूँ!”

काशी का नाम सुनते ही इंस्पेक्टर नकुल की आँखों में एक तीखी चमक कौंध गई। असल में, नकुल पिछले कुछ दिनों से काशी के खिलाफ सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे थे। कुछ ही घंटे पहले वे एक अन्य आपराधिक मामले की छानबीन के सिलसिले में काशी की हवेली पर गए थे, जहाँ काशी ने अपने राजनीतिक आकाओं के दम पर नकुल को खुलेआम धमकी दी थी।

नकुल ने अरमान के कंधे को थामा और दृढ़ता से कहा, “बेटा! मेरी बुलेट पर बैठो। मैं तुम्हें तुम्हारी माँ के पास ले चलता हूँ!”

अध्याय 7: बाहुबली काशी के गढ़ में पुलिस अफसर की ललकार

बुलेट की गड़गड़ाहट के साथ इंस्पेक्टर नकुल 11 साल के अरमान को पीछे बैठाकर सीधे बाहुबली काशी की हवेली के विशाल लोहे के फाटक पर पहुँचे।

नकुल ने बिना रुके बुलेट सीधे हवेली के अंदर प्रांगण में खड़ी कर दी।

काशी अपने 10-12 हथियारबंद गुर्गों के साथ बरामदे में बैठा हुआ था। नकुल को दोबारा, और वह भी एक छोटे बच्चे के साथ अपनी हवेली में देखकर काशी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह अपनी कुर्सी से उठा और गरजते हुए बोला: “इन्स्पेक्टर! तेरी हिम्मत कैसे हुई फिर से मेरी हवेली में बिना इजाजत घुसे चले आने की? सुबह जो केस का सवाल पूछने आया था, उसका जवाब तुझे मिल चुका है। अब इस लौंडे को लेकर यहाँ क्या नौटंकी कर रहा है?”

नकुल ने अपनी टोपी सँभाली, काशी की आँखों में आँखें डालकर निडरता से कहा: “काशी! मैं यहाँ किसी सरकारी केस के काम से नहीं, बल्कि इस मासूम बच्चे का हक दिलाने आया हूँ। इसकी माँ शैलजा तुम्हारे यहाँ काम करती है और इसकी बहन गायब है। इस बच्चे की माँ कहाँ है? उसे तुरंत मेरे सामने लाओ!”

काशी ने अट्टहास लगाया, “इन्स्पेक्टर! अपनी औकात में रह। यह मेरी निजी हवेली है। यहाँ कौन काम करता है और कौन कहाँ जाता है, यह तय करना तेरा काम नहीं है। तू यहाँ से चुपचाप चला जा, वरना तेरी वर्दी उतरवा दूंगा!”

नकुल ने एक कदम आगे बढ़ाया और कड़क आवाज में कहा, “जब तक मैं इस बच्चे की माँ से खुद बात नहीं कर लेता, मैं यहाँ से एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाला। कानून से ऊपर कोई नहीं है, चाहे वह बाहुबली हो या कोई और!”

माहौल बेहद तनावपूर्ण हो गया। काशी के गुर्गों ने अपनी बंदूकों और कट्टों की मूठ पर हाथ रख लिए। लेकिन नकुल के चेहरे पर खौफ का नामोनिशान नहीं था।

अपनी हवेली में पुलिस अफसर के इस तीखे तेवर को देखकर काशी समझ गया कि यह अफसर आसानी से टलने वाला नहीं है। उसने मन ही मन सोचा कि अगर इस समय मामला ज्यादा बढ़ा, तो गाँव में फजीहत होगी। उसने अपने एक आदमी को इशारा किया, “जाओ, शैलजा को अंदर से बाहर लाओ।”

अध्याय 8: काँपती निगाहें, इशारों का संदेश और नकुल की प्रतिज्ञा

कुछ ही देर में हवेली के अंदरूनी हिस्से से शैलजा को लाया गया। उसके साथ दो हथियारबंद कारिंदे चल रहे थे।

अरमान अपनी माँ को देखते ही चीख पड़ा, “मम्मी! मम्मी!” और दौड़कर शैलजा के आँचल से लिपट गया। शैलजा ने रोते हुए अपने कलेजे के टुकड़े को सीने से लगा लिया और उसकी पेशानी को चूमने लगी।

नकुल ने आगे बढ़कर शैलजा से पूछा, “बहन जी! आप घबराइए मत। मैं कानून का नुमाइंदा हूँ। आप मुझे सच-सच बताइए—आप इतने दिनों से घर क्यों नहीं गईं? और आपकी 15 साल की बेटी रत्ना कहाँ है? क्या आपके साथ यहाँ कोई जबरदस्ती या /अत्या/चार/ हो रहा है?”

शैलजा की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने देखा कि बगल में ही काशी हाथ में पिस्टल लिए कड़ा रुख अपनाए खड़ा था और उसके गुर्गे घूर रहे थे।

शैलजा जानती थी कि अगर उसने इस वक्त मुँह खोला, तो नकुल के जाते ही काशी उसके बेटे अरमान और बेटी रत्ना की /ह/त्या/ कर देगा।

शैलजा ने रोते हुए, काँपती आवाज में कहा, “नहीं साहब… मेरे साथ कोई जबरदस्ती नहीं हो रही है। मैं अपनी मर्जी से यहाँ काम कर रही हूँ… और मेरी बेटी… मेरी बेटी अपनी सहेली के घर गई है… आप चिंता मत कीजिए… आप चले जाइए।”

काशी के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान आ गई। उसने नकुल से कहा, “सुन लिया इन्स्पेक्टर? सुन लिया औरत का बयान? अब अपना यह नाटक बंद कर और मेरी हवेली से दफा हो जा!”

लेकिन इंस्पेक्टर नकुल केवल एक कानून के रखवाले ही नहीं थे, वे इंसानी चेहरों को पढ़ने के माहिर थे। उन्होंने देखा कि जब शैलजा यह बयान दे रही थी, तब उसकी आँखें चीख-चीखकर सच बयाँ कर रही थीं।

शैलजा ने अरमान को नकुल की तरफ धकेला और नकुल की आँखों में देखते हुए अपनी आँखों और चेहरे के हाव-भाव से एक मौन याचना की। उस आँख के इशारे का साफ मतलब था—“साहब! मुझे यहाँ छोड़ दीजिए, लेकिन मेरे इस मासूम बेटे अरमान को अपने साथ ले जाइए, वरना ये लोग इसे मार डालेंगे!”

नकुल शैलजा के उस दर्दभरे इशारे को पूरी तरह समझ गए। उन्होंने अरमान का हाथ थामा।

काशी के आदमियों ने अरमान को रोकने की कोशिश की, “लड़के को यहीं रहने दो!”

लेकिन नकुल ने अपनी सर्विस रिवॉल्वर पर हाथ रखते हुए कड़क आवाज में कहा, “खबरदार! जो किसी ने इस बच्चे को हाथ भी लगाया! यह बच्चा मेरे संरक्षण में जाएगा!”

नकुल अरमान को अपनी बुलेट पर बैठाकर काशी की हवेली से सुरक्षित बाहर ले आए।

अध्याय 9: मामा का दर्द और लाचारी का कड़वा सच

हवेली से निकलकर इंस्पेक्टर नकुल सीधे अरमान को लेकर उसके मामा मदन के घर पहुँचे।

जब मदन ने नकुल को पुलिस वर्दी में अरमान के साथ आते देखा, तो वह घबरा गया। नकुल ने मदन को एकांत में बुलाया और कड़े लहजे में पूछा: “मदन! तुम अपनी बहन और भांजी के साथ हो रहे इस घिनौने /अत्या/चार/ पर चुप क्यों हो? तुम जानते हो कि तुम्हारी बहन शैलजा और भांजी रत्ना काशी की कैद में हैं और उनके साथ बहुत बुरा हो रहा है। फिर भी तुम पुलिस में शिकायत दर्ज कराने से क्यों डर रहे हो?”

मदन घुटनों के बल जमीन पर गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। उसकी आँखों में बेबसी का समुंदर था।

मदन ने रोते हुए जो शब्द कहे, वे समाज की कड़वी हकीकत को नंगा करने वाले थे: “साहब! आप तो अफसर हैं, आप हमारी गरीबी और लाचारी का दर्द क्या समझेंगे? मुझे सब पता है साहब… मुझे सब पता है कि मेरी बहन और मासूम भांजी के साथ उस हैवान की हवेली में क्या /अत्या/चार/ और /शो/षण/ हो रहा होगा! मैं दिन-रात खुद को और भगवान को कोसता हूँ कि उसने हमें इतना गरीब और बेबस क्यों बनाया!”

मदन ने अपनी सिसकियों को सँभालते हुए आगे कहा: “साहब! हम गरीब लोग हैं। हमारी किस्मत में सिर्फ अत्याचार सहना लिखा है। अगर मैं पुलिस में शिकायत कर दूँ या काशी के खिलाफ मुँह खोल दूँ, तो कल सुबह मेरी पत्नी और मेरे चार छोटे-छोटे बच्चों की लाशें नदी में तैरती मिलेंगी! काशी का साम्राज्य बहुत बड़ा है साहब, पुलिस और अदालत भी उसी की जेब में हैं। हमारे पास सहने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है साहब… कोई रास्ता नहीं है!”

मदन की यह बात सुनकर नकुल का कलेजा छलनी हो गया। उन्हें अहसास हुआ कि कानून की कमजोरियों और माफियाओं के खौफ ने आम जनता का विश्वास तंत्र से पूरी तरह उठा दिया है।

नकुल ने मदन के कंधे पर हाथ रखा और बेहद शांत तथा गंभीर आवाज में कहा: “मदन! तुम सही कहते हो। लेकिन मैं तुम्हें वादा करता हूँ कि तुम्हारी बहन और भांजी के साथ न्याय होगा। तुम्हें किसी कोर्ट-कचहरी के चक्कर में नहीं पड़ना होगा। बस तुम अरमान को सँभालो, बाकी काम मुझ पर छोड़ दो।”

अध्याय 10: धर्मयुद्ध की गुप्त तैयारी और तीन जांबाज

थाने लौटकर इंस्पेक्टर नकुल गहरे चिंतन में डूब गए। वे जानते थे कि बाहुबली काशी जैसी नागिन को केवल कानून की कागजी किताबों से नहीं कुचला जा सकता। काशी के पास दर्जनों भाड़े के कातिल, अवैध /अ/सला/ह/ और राजनीतिक संरक्षण था। अगर वे सरकारी प्रक्रिया के तहत बड़े अफसरों से बैकअप माँगते, तो खबर लीक होने का पूरा डर था।

नकुल ने अपने थाने के दो युवा कांस्टेबलों को अपने गुप्त कमरे में बुलाया। इन दोनों सिपाहियों की उम्र 24-25 साल के आसपास थी। दोनों बेहद साहसी, जांबाज और नकुल की तरह ही ईमानदार थे। खास बात यह थी कि उन दोनों सिपाहियों के आगे-पीछे कोई परिवार नहीं था—न शादी हुई थी, न कोई बाल-बच्चे थे। वे समाज में कानून का राज देखने के लिए अपनी जान दांव पर लगाने को हर वक्त तैयार रहते थे।

नकुल ने दोनों सिपाहियों के सामने मेज पर हाथ रखा और कहा: “साथियो! एक ऐसा मिशन है जहाँ से शायद हम तीनों जिंदा वापस न आएँ। हमें किसी वरिष्ठ अधिकारी से लिखित इजाजत नहीं मिलने वाली और न ही हमें कोई सरकारी मेडल मिलेगा। मामला एक बेबस महिला और उसकी 15 साल की मासूम बेटी को बाहुबली काशी की दरिंदगी से बचाने का है। क्या तुम मेरा साथ दोगे?”

दोनों जांबाज सिपाहियों की आँखों में ज्वाला भड़क उठी। उन्होंने तुरंत सैल्यूट किया और कहा, “सर! हम खाकी वर्दी सिर्फ नौकरी करने के लिए नहीं, बल्कि ऐसे हैवानों का अंत करने के लिए पहनते हैं। आप जो हुक्म देंगे, हम जान की बाजी लगा देंगे!”

नकुल ने मालखाने से वे गैर-सरकारी और जब्त किए गए अवैध /अ/सला/ह/ (हथियार) निकाले, जो विभिन्न बदमाशों से बरामद किए गए थे और जिन्हें अभी तक सरकारी रिकॉर्ड में जमा नहीं किया गया था। इन हथियारों में अत्याधुनिक कट्टे, पिस्टल और कारतूस शामिल थे।

वास्तव में, नकुल को अपने एक बेहद कड़े और ईमानदार सीनियर आईपीएस अधिकारी का मौन, मौखिक समर्थन प्राप्त था। उस वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी ने नकुल से अकेले में कहा था, “नकुल! काशी इस इलाके का वो नासूर बन चुका है जिसे उखाड़ना ही एकमात्र इलाज है। सरकारी कागजों के झंझट में पड़े बिना उस हैवान का चैप्टर क्लोज कर दो। मैं पीछे से सब सँभाल लूँगा।”

तीनों जांबाजों ने अपने-अपने हथियार लोड किए, सादे कपड़ों पर होलस्टर बाँधे और शाम का अँधेरा होने का इंतजार करने लगे।

अध्याय 11: खौफ के गढ़ में धावा और हैवानियत का सच

दो दिन बाद, शाम के ठीक सात बज रहे थे। कड़ाके की ठंड और घने कोहरे ने पूरे गाँव को अपनी आगोश में ले लिया था। सड़कों पर सन्नाटा पसरा हुआ था।

एक बिना नंबर प्लेट की जीप में सवार होकर इंस्पेक्टर नकुल और उनके दो जांबाज सिपाही बाहुबली काशी की विशाल हवेली के पिछले गुप्त दरवाजे पर पहुँचे। अँधेरे का फायदा उठाकर तीनों अंदर दाखिल हो गए।

प्रांगण में काशी अपने पाँच-छह मुख्य गुर्गों के साथ शराब की महफिल सजाए बैठा था और ठहाके लगा रहा था।

अचानक अँधेरे में से निकलकर इंस्पेक्टर नकुल अपनी लोड की हुई पिस्टल ताने सामने खड़े हो गए। दोनों सिपाहियों ने भी अपनी-अपनी बंदूकें काशी और उसके आदमियों पर तान दीं।

काशी चकित रह गया। उसने अपनी बोतल साइड में रखी और गुस्से से लाल होकर गालियां बकने लगा, “इन्स्पेक्टर! तेरी मौत आई है क्या? तू अपनी पुलिसिया औकात भूल गया है? मेरे आदमियों! उड़ा दो इन तीनों को!”

लेकिन नकुल ने गर्जना की, “एक इंच भी हिलने की कोशिश मत करना, वरना पहली गोली तेरे भेजे के पार होगी काशी!”

नकुल ने सिपाही को इशारा किया और हवेली के अंदरूनी कमरों में बंद शैलजा को बाहर लाने को कहा।

कुछ ही क्षणों में शैलजा को सामने लाया गया। नकुल ने कड़क लेकिन सांत्वना भरी आवाज में कहा: “शैलजा जी! आप बिल्कुल मत डरिए। आज हम यहाँ कानून की कोई किताब लेकर नहीं, बल्कि इस हैवान का अंत करने आए हैं। आप बेखौफ होकर बताइए—आपके और आपकी बेटी के साथ यहाँ क्या-क्या हुआ है?”

शैलजा ने जब देखा कि आज यह पुलिस अफसर अपनी जान हथेली पर रखकर आया है, तो उसकी हिम्मत का बाँध टूट गया। वह फूट-फूटकर रोने लगी और उसने जो सच्चाई उजागर की, उसे सुनकर तीनों पुलिस वालों के रोंगटे खड़े हो गए।

शैलजा ने काँपती आवाज में बताया: “साहब! यह हैवान पिछले छह सालों से मेरा /शो/षण/ और /उ उत्पीड़न/ कर रहा है। छह साल पहले मेरे पति ने जब इसके जुल्मों का विरोध किया था, तो इसी काशी ने मेरे पति का /क/त्ल/ करवा दिया था! उसके बाद से मैं अपने बच्चों की जान बचाने के लिए इसके यहाँ काम करने पर मजबूर थी।”

शैलजा ने आगे सिसकते हुए कहा: “साहब! यह दरिंदा मुझे सिर्फ अपने यहाँ काम कराने के लिए नहीं रखता था, बल्कि अपने यहाँ आने वाले दबंग मेहमानों और राजनीतिक आकाओं के सामने मुझे परोस देता था! मैंने अपने बच्चों के पेट के लिए यह सब नरक सहा साहब… लेकिन परसों रात इस हैवान की नजर मेरी 15 साल की मासूम बेटी रत्ना पर पड़ गई!”

शैलजा की आँखों से खून के आँसू छलक पड़े, “जब इसने मेरी बेटी की माँग की, तो मैं इसके पैरों में गिर पड़ी, गिड़गिड़ाई कि मेरी बेटी अभी बहुत छोटी है, उसे बखश दो! लेकिन यह नहीं माना। इसने मुझे कमरे में बाँध दिया और अपने गुर्गों को मेरे घर भेजा। जब मेरी बेटी ने दरवाजा नहीं खोला, तो ये लोग मुझे घसीटते हुए मेरे घर ले गए और मेरे ऊपर /अत्या/चार/ करने लगे। मेरी चीखें सुनकर मेरी मासूम बेटी ने दरिंदगी रोकने के लिए दरवाजा खोल दिया… और ये हैवान मेरी बेटी को उठाकर ले आए!”

शैलजा ने चीखते हुए खुलासा किया, “साहब! मेरी बेटी पिछले एक हफ्ते से हवेली के तहखाने में /बंध/क/ बनी पड़ी है! कल इनका कोई बहुत बड़ा ख़ास मेहमान आने वाला है, और ये हैवान मेरी 15 साल की बच्ची को उस मेहमान के आगे परोसने की तैयारी कर रहे हैं!”

अध्याय 12: गोलियों की गूँज और बाहुबली काशी का अंत

शैलजा की बात सुनते ही इंस्पेक्टर नकुल और दोनों सिपाहियों का खून खौल उठा। उनकी आँखों में अंगारे दहकने लगे।

काशी ने स्थिति की गंभीरता को भांप लिया। उसने अपनी कमर में खोसा हुआ कट्टा निकालने की कोशिश की और चिल्लाया, “मारो इन सालों को!”

लेकिन नकुल को रत्ती भर भी संकोच नहीं था। इससे पहले कि काशी का हाथ उसके हथियार तक पहुँचता, इंस्पेक्टर नकुल की पिस्टल से ‘धाँय-धाँय!’ की दो कड़कड़ाती गोलियाँ निकलीं और सीधे बाहुबली काशी के सीने को चीरती हुई पार निकल गईं!

काशी की आँखों में अचरज और खौफ का सन्नाटा छा गया। वह अपना सीना थामकर धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा।

हवेली में भगदड़ मच गई। काशी के हथियारबंद गुर्गों ने गोलियाँ चलानी शुरू कीं। लेकिन नकुल और उनके दोनों सिपाहियों ने मोर्चा सँभाल लिया था। सीढ़ियों और खंभों की ओट लेकर तीनों जांबाजों ने अचूक निशाने साधे।

महज पाँच मिनट के भयानक एनकाउंटर और गोलियों की तड़तड़ाहट के बाद, काशी के चार खूँखार गुर्गे ढेर हो चुके थे और बाकी अपनी बंदूकें फेंककर अँधेरे में दुम दबाकर भाग निकले।

पूरी हवेली में बारूद का धुआँ और सन्नाटा छा गया।

नकुल ने तुरंत हवेली की चाबियाँ उठाईं और शैलजा को लेकर तहखाने की तरफ भागे। भारी लोहे का दरवाजा खोला गया। अंदर 15 साल की मासूम रत्ना रस्सियों से बँधी, मुँह पर कपड़ा ठूँसा हुआ, खौफ से काँप रही थी।

शैलजा ने दौड़कर अपनी बेटी के बंधन खोले और उसे सीने से लगा लिया। माँ और बेटी के मिलाप के आँसुओं ने पिछले छह सालों के सारे /अत्या/चार/ और खौफ को धो डाला।

अध्याय 13: आज़ादी की भोर और न्याय का नया सूर्योदय

उस खौफनाक रात के बाद गाँव में एक नया सूर्योदय हुआ। जब गाँव वालों को पता चला कि बाहुबली काशी और उसके साम्राज्य का अंत हो चुका है, तो पूरे इलाके ने राहत की साँस ली।

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी के गुप्त सहयोग से इस पूरे एनकाउंटर को आत्मरक्षा में हुई मुठभेड़ का रूप दिया गया। काशी के पास से भारी मात्रा में अवैध /अ/सला/ह/ और मादक पदार्थ बरामद दिखाए गए, जिससे नकुल और उनकी टीम पर कोई कानूनी अड़चन नहीं आई।

काशी की हवेली से मिले गैर-कानूनी खजाने का एक हिस्सा और सरकारी सहायता योजना के तहत शैलजा को मुआवजा दिलाया गया।

शैलजा, उसकी बेटी रत्ना और छोटा बेटा अरमान अब अपने मामा के गाँव के पास ही एक सुरक्षित और पक्के मकान में एक साथ रहने लगे। नकुल ने अरमान और रत्ना के दाखिले शहर के एक अच्छे स्कूल में करवा दिए।

1990 के उस काले दौर में जब माफियाओं का राज चलता था, तब इंस्पेक्टर नकुल जैसे विरले योद्धाओं ने यह साबित किया कि यदि वर्दी के पीछे एक सच्चा और साहसी दिल धड़कता हो, तो सबसे बड़े हैवान और बाहुबली का घमंड भी मिट्टी में मिलाया जा सकता है।

शैलजा का परिवार अब बेखौफ होकर आज़ादी की हवा में साँस ले रहा था, और 11 साल का अरमान जब भी पुलिस की गाड़ियों को देखता, तो गर्व से मुस्कुराकर अपने मसीहा इंस्पेक्टर नकुल को याद करता।

कहानी से मिलने वाला सामाजिक संदेश:

    अन्याय के खिलाफ आवाज: जुल्म और अत्याचार को चुपचाप सहना अपराधी के हौसलों को और बुलंद करता है। सही समय पर सही इंसान के सामने आवाज उठाना बेहद जरूरी है।
    कर्तव्यनिष्ठा और साहस: पद और पावर का सही इस्तेमाल वही है जो समाज के अंतिम, सबसे कमजोर और असहाय व्यक्ति को न्याय और सुरक्षा दिला सके।
    माफियाराज का अंत: बाहुबल और खौफ का साम्राज्य चाहे कितना भी विशाल क्यों न हो, सत्य और धर्म के एक प्रहार से उसका पतन निश्चित होता है।

समाप्त

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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