गौरा बेटा पैदा होने पर पत्नी के साथ हो गया कां*ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/ – News

गौरा बेटा पैदा होने पर पत्नी के साथ हो गया कां*ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/

गौरा बेटा पैदा होने पर पत्नी के साथ हो गया कां*ड/असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/

गौरा बेटा पैदा होने पर पत्नी के साथ हो गया का/ंड | असली वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए

अध्याय 1: बीकानेर की माटी और ज्ञान भूषण का परिवार

राजस्थान की वीरभूमि अपने इतिहास, महलों और थार रेगिस्तान के सुनहरे आंसुओं के लिए तो जगजहाज़ है ही, लेकिन इसी मरुभूमि के अंचल में बसे कई छोटे-छोटे कस्बे और गांव अपनी सरल जीवनशैली के पीछे कभी-कभी ऐसी खौफनाक और दिल दहला देने वाली दास्तानों को छुपाए रखते हैं, जिनकी कल्पना सामान्य मानव मस्तिष्क आसानी से नहीं कर पाता। ऐसा ही एक जिला है बीकानेर, और इसी बीकानेर जिले की भारत-पाकिस्तान सीमा के पास स्थित एक तहसील व प्रसिद्ध गांव है—खाजूवाला।

खाजूवाला गांव की आबोहवा में सादगी और ग्रामीण जीवन की एक सौंधी महक घुली हुई थी। इसी गांव के एक शांत और संभ्रांत महल्ले में ज्ञान भूषण का परिवार निवास करता था। ज्ञान भूषण ढलती उम्र के एक बेहद कर्मठ, सीधे-सादे और धार्मिक स्वभाव के व्यक्ति थे। गांव के भीतर उनकी अपनी एक मिठाई की छोटी सी लेकिन पुरानी दुकान थी। शादी-विवाह का साया हो, मुंडन का उत्सव हो, या गांव के किसी घर में कोई भी मांगलिक कार्य हो—मिठाइयों के ऑर्डर के लिए हर ग्रामीण के मन में सबसे पहला नाम ज्ञान भूषण का ही आता था।

ज्ञान भूषण के हाथों में हलवाई कला का अनोखा हुनर था। उनकी बनाई मिठाइयों का स्वाद पूरे खाजूवाला और आसपास के ढाणियों में मशहूर था। वे शुद्ध देशी घी और प्रामाणिक सामग्रियों से मिठाइयां तैयार करते थे। उनके अच्छे व्यवहार, मधुर भाषा और सत्यनिष्ठा के कारण दुकान पर हर समय ग्राहकों की अच्छी-खासी चहल-पहल लगी रहती थी। इस दुकान के माध्यम से ज्ञान भूषण अपने परिवार का भरण-पोषण बहुत ही इज्जत और सम्मान के साथ कर रहे थे। दुकान से होने वाली कमाई इतनी पर्याप्त थी कि वे न केवल अपना घर सुचारू रूप से चलाते थे, बल्कि भविष्य के लिए भी थोड़ी-बहुत बचत कर लेते थे।

ज्ञान भूषण के छोटे से परिवार में उनके अलावा उनका इकलौता बेटा था—विवेक। विवेक बचपन से ही बहुत समझदार, शांत और पढ़ाई-लिखाई में मेधावी लड़का था। ज्ञान भूषण ने अपनी खून-पसीने की कमाई से विवेक को बीकानेर के अच्छे कॉलेज से उच्च शिक्षा दिलाई थी। विवेक की योग्यता और डिग्री के आधार पर ज्ञान भूषण को पूरी उम्मीद थी कि एक न एक दिन उनका बेटा किसी बड़े शहर में अच्छी सरकारी या कॉरपोरेट नौकरी हासिल करेगा और उनके खानदान का नाम रोशन करेगा।

विवेक इन दिनों दिल्ली और जयपुर जैसे बड़े शहरों की नामी-गिरामी कंपनियों में नौकरी के लिए आवेदन पत्र भेज रहा था और कई इंटरव्यू भी दे चुका था। हालांकि जब तक कोई अंतिम बुलावा या ऑफर लेटर नहीं आता, विवेक घर पर खाली बैठने के बजाय अपने पिता के काम में हाथ बटाया करता था। सुबह तड़के उठकर दुकान की सफाई करना, दूध-मावा का हिसाब रखना और ग्राहकों को हंसते हुए मिठाइयां देना—विवेक अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाता था। वह अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करता था, जिससे ज्ञान भूषण का मन गर्व से भर उठता था।

अध्याय 2: शादी के तीन साल और सूना आंगन

आज से लगभग तीन साल पहले ज्ञान भूषण ने अपने बेटे विवेक के लिए बड़े ही अरमानों के साथ बहु तलाशी थी। पास के ही एक कस्बे की रहने वाली लड़की रीटा के साथ विवेक का विवाह पूरे रीति-रिवाजों और धूमधाम के साथ संपन्न हुआ था।

रीटा देखने में काफी आकर्षक, सुडौल और खूबसूरत नैन-नक्श वाली महिला थी। हालांकि उसकी त्वचा का रंग थोड़ा सा सांवला था, परंतु उसकी बड़ी-बड़ी आंखें और तीखे नैन-नक्श किसी को भी पहली नजर में आकर्षित कर लेने के लिए काफी थे। इसके विपरीत उसके पति विवेक का शारीरिक रंग बिल्कुल काला था। विवेक का रंग चाहे सांवला-काला हो, लेकिन उसका दिल साफ था और वह अपनी पत्नी रीटा से बेहद प्यार करता था। शादी के शुरुआती दिनों में दोनों पति-पत्नी के बीच अच्छा सामंजस्य दिख रहा था। रीटा घर के कामकाज संभालने लगी—झाड़ू-पोछा, खाना पकाना, ससुर ज्ञान भूषण की सेवा करना और विवेक के दुकान से वापस आने पर उसका ख्याल रखना।

लेकिन इस बाहरी सादगी के पीछे रीटा का चरित्र और मानसिकता कुछ अलग ही दिशा में चलती थी। रीटा का चाल-चलन और नैतिक मूल्य कभी भी बहुत स्थिर नहीं थे। उसे अपने सांवले रंग के बावजूद अपनी शारीरिक सुंदरता पर बहुत घमंड था और उसके मन में हमेशा यह मलाल रहता था कि उसका पति काले रंग का है। रीटा के भीतर चंचलता और गैर-मर्दों के प्रति एक अजीब सा आकर्षण छिपा हुआ था। हालांकि, शुरुआत में उसने अपने इस रूप को घर की चारदीवारी के भीतर पूरी तरह से दबाकर रखा था, जिससे न तो सीधे-सादे विवेक को कोई भनक लगी और न ही ससुर ज्ञान भूषण को उसके इस गुप्त पहलू की भनक पड़ी।

समय बीतता चला गया। विवेक अपनी पढ़ाई और नौकरी की तैयारियों के साथ-साथ दुकान में हाथ बंटाता रहा, लेकिन जैसे-जैसे विवाह को तीन साल पूरे होने आए, विवेक और रीटा के दांपत्य जीवन में एक बहुत बड़ी कमी खलने लगी। उनके घर का आंगन संतान की किलकारियों से पूरी तरह महरूम था। तीन साल बीत जाने के बावजूद रीटा मां नहीं बन पाई थी।

जैसे-जैसे समय बीत रहा था, समाज और पड़ोसियों की चुभती नजरें और दबी ज़बान में की जाने वाली बातें परिवार को परेशान करने लगी थीं। संतान न होने का यह दंश धीरे-धीरे विवेक और रीटा के रिश्तों में दरार डालने लगा। घर का शांत माहौल अब आए दिन के तानों और कहासुनी में बदलने लगा। कभी रीटा गुस्से में आकर विवेक को ताना मार देती थी कि ‘तुम्हारी ही किसी कमी की वजह से हमारा आंगन सूना है’, तो कभी विवेक हताश होकर रीटा को ताना दे देता था कि ‘तुम ही शायद बच्चे को जन्म देने के काबिल नहीं हो।’

संतान न होने के इस तनाव ने दोनों के बीच मिठास खत्म कर दी थी। आए दिन बेडरूम के भीतर से बहस और रोने-धोने की आवाजें आती थीं। ससुर ज्ञान भूषण इस पूरी स्थिति से भली-भांति वाकिफ थे। ज्ञान भूषण एक संवेदनशील बुजुर्ग थे। उन्होंने कई बार बेटे और बहू को अपने पास बैठाकर प्यार से समझाया: “बेटा विवेक, रीटा बहु… आपस में यूं झगड़ने से कोई मसला हल नहीं होता। जमाना बदल चुका है, विज्ञान और डॉक्टरी इलाज बहुत आगे बढ़ चुका है। तुम दोनों शहर के किसी अच्छे लेडीज और मेल स्पेशलिस्ट डॉक्टर के पास जाओ, अपनी मेडिकल जांच कराओ और जो भी कमी हो, उसकी दवाइयां लेना शुरू करो। ऊपर वाला सब ठीक कर देगा।”

परंतु ना तो विवेक अपनी पुरुषवादी झिझक के कारण डॉक्टर के पास जाना चाहता था और ना ही रीटा अस्पताल के चक्कर काटने को तैयार होती थी। कई बार रीटा विवेक पर दबाव बनाती थी कि वह अकेले जाकर अपना चेकअप कराए, लेकिन विवेक टालमटोल कर देता था। दोनों में से कोई यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि मूल समस्या वास्तव में किसके भीतर है।

अध्याय 3: डॉक्टर का खौफनाक खुलासा और गुप्त दर्द

एक दिन शहर (बीकानेर मुख्य शहर) में दुकान के लिए कुछ खास कच्चा माल और सामान खरीदने विवेक गया हुआ था। बाजार से खरीदारी करने के बाद जब वह वापस बस स्टैंड की तरफ लौट रहा था, तभी अचानक उसके जेहन में अपने पिता की कही बातें और पत्नी रीटा के रोज-रोज के ताने गूंज उठे।

विवेक ने अपने मन में फैसला किया—”आज मैं इस असमंजस को हमेशा के लिए खत्म कर दूंगा। आखिर मुझे भी तो पता चले कि कमी किसमें है।”

विवेक शहर के एक बड़े और प्रतिष्ठित निजी अस्पताल (हॉस्पिटल) के गुप्तांग व गुप्त-रोग विशेषज्ञ डॉक्टर के क्लिनिक में पहुंच गया। उसने डॉक्टर से मुलाकात की और अपनी शादी के तीन साल बीत जाने के बावजूद संतान न होने की पूरी समस्या ईमानदारी से बताई। डॉक्टर ने विवेक की बातों को गंभीरता से सुना और उसे कुछ जरूरी मेडिकल टेस्ट, ब्लड रिपोर्ट और सीमेन एनालिसिस (शुक्राणु जांच) कराने की सलाह दी। विवेक ने सारे टेस्ट करवाए और डॉक्टर ने उससे कहा कि रिपोर्ट दो दिन बाद आएगी।

दो दिन विवेक किसी तरह बेचैनी में बिताता रहा। दो दिन बीतने के बाद वह दोबारा चुपचाप अकेले शहर गया और डॉक्टर के क्लिनिक में दाखिल हुआ। डॉक्टर के केबिन में बैठते ही डॉक्टर का चेहरा थोड़ा गंभीर था। डॉक्टर ने रिपोर्ट की फाइल विवेक की तरफ बढ़ाई और बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण लेकिन सख्त स्वर में कहा:

“विवेक जी… जो रिपोर्ट आई है, उसे देखकर मुझे बहुत अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि आपके शरीर में शुक्राणुओं की संख्या (Sperm Count) शून्य यानी नील (Azoospermia) है। आपकी नसों में ऐसी स्थायी समस्या है कि आप चिकित्सा विज्ञान के अनुसार कभी भी प्राकृतिक रूप से पिता नहीं बन सकते। आपके शरीर में बच्चा पैदा करने वाले शुक्राणु बनते ही नहीं हैं। आप भविष्य में कभी भी किसी स्त्री को गर्/भान्वित नहीं कर सकते।”

डॉक्टर के यह शब्द विवेक के कानों में किसी जलते हुए तेजाब की तरह गिरे। उसके पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गई। आंखों के आगे गहरा अंधेरा छा गया। डॉक्टर आगे भी कुछ समझा रहे थे—मेडिकल विकल्पों के बारे में बोल रहे थे, लेकिन विवेक के कानों में सन्नाटा पसरा हुआ था। उसके दिमाग में बस एक ही बात हथौड़े की तरह बज रही थी—“तुम कभी पिता नहीं बन सकते… तुम कभी पिता नहीं बन सकते।”

मायूस, टूट चुका और अंदर से पूरी तरह बिखर चुका विवेक भारी कदमों से अस्पताल से बाहर निकला। डॉक्टर ने उसे कुछ सांत्वना देने वाली दवाइयां दी थीं, लेकिन विवेक जानता था कि अब उसकी किस्मत का फैसला हो चुका है। उसके मन में एक भयानक आघात लगा था। वह सोचने लगा कि अगर यह बात उसकी पत्नी रीटा या गांव वालों को पता चल गई, तो समाज में उसकी पुरुषत्व पर थू-थू होगी, उसका मज़ाक उड़ाया जाएगा और रीटा उसे छोड़कर चली जाएगी।

विवेक ने फैसला किया कि वह यह कड़वा सच किसी को नहीं बताएगा। वह इस राज़ को अपने सीने में दफ़न रखेगा। उसने दवाइयों का पैकेट जेब में छुपाया और उदास चेहरे के साथ घर लौट आया। न तो उसने अपने वृद्ध पिता ज्ञान भूषण से कोई बात की और न ही पत्नी रीटा को कुछ बताया। लेकिन उस दिन के बाद से विवेक अंदर ही अंदर घुटने लगा। उसका हँसता-खेलता स्वभाव एकदम शांत और गंभीर हो गया।

अध्याय 4: दिल्ली का बुलावा और रीटा की जिद

अभी इस सदमे को बीते चार-पांच दिन ही हुए थे कि एक दिन सुबह डाकिया ज्ञान भूषण के घर के दरवाजे पर आया और विवेक के नाम का एक पंजीकृत लिफाफा (लेटर) दे गया।

जब विवेक ने कांपते हाथों से उस लिफाफे को खोला, तो उसकी बांछें खिल गईं। वह लेटर दिल्ली की एक बहुत बड़ी और प्रतिष्ठित कंपनी का अपॉइंटमेंट लेटर (नौकरी का पत्र) था। विवेक को एक अच्छे पद और आकर्षक वेतन पर दिल्ली में नौकरी मिल चुकी थी। इस खबर ने विवेक के मुरझाए चेहरे पर थोड़ी देर के लिए खुशियों की रोशनी ला दी। उसे लगा कि शायद भगवान ने उसके एक दरवाजे बंद किए हैं तो करियर का नया रास्ता खोल दिया है। इस नौकरी के ज़रिए वह अपने गम को भुलाने की कोशिश कर सकता था।

विवेक दौड़ता हुआ अपनी पत्नी रीटा के पास गया और उत्साह में बोला: “रीटा! देखो, मेरी दिल्ली वाली कंपनी से ऑफर लेटर आ गया है! मुझे परसों ही दिल्ली जाकर जॉइन करना होगा। मेरी मेहनत रंग लाई रीटा!”

विवेक ने रीटा से कहा कि वह जल्दी से उसका सारा सामान, कपड़े और बैग पैक कर दे। लेकिन रीटा ने जैसे ही सुना कि विवेक दिल्ली जा रहा है, उसके चेहरे पर अजीब सी मायूसी और जि़द के भाव आ गए। रीटा ने तुरंत कहा: “मुझे भी अपने साथ दिल्ली ले चलो। मैं यहां गांव में तुम्हारे बिना अकेले क्या करूंगी?”

विवेक ने उसे बड़े प्यार से समझाते हुए कहा: “रीटा, बात को समझो। अभी मैं नया-नया शहर जा रहा हूं। वहां पहले मुझे कंपनी का माहौल देखना होगा, रहने के लिए कोई अच्छा सा कमरा या मकान किराए पर ढूंढना होगा। जैसे ही पांच-छह महीने बीत जाएंगे और मैं वहां अच्छी तरह सेट हो जाऊंगा, मैं तुरंत तुम्हें दिल्ली बुला लूंगा। फिर हम दोनों वहीं साथ मिलकर रहेंगे।”

परंतु रीटा का मन इस बात से बिल्कुल सहमत नहीं था। वह उदास हो गई, मुंह फुलाकर बैठ गई और रोने का नाटक करने लगी। वह बोली: “मैं इतने महीनों तक इस सूने घर में तुम्हारे बिना अकेली नहीं रह सकती।”

विवेक ने काफी देर तक अपनी पत्नी को पुचकारा, वादे किए और उसे दिलासा दिया कि पांच-छह महीने का समय चुटकी बजाते निकल जाएगा। जैसे-तैसे रीटा मान तो गई, लेकिन उसके मन में असंतोष की ज्वाला भड़क रही थी। दो दिनों के बाद विवेक ने अपने पिता ज्ञान भूषण के चरण छूकर उनका आशीर्वाद लिया, अपनी पत्नी रीटा को अलविदा कहा और अपना बैग उठाकर दिल्ली के लिए रवाना हो गया।

अध्याय 5: अकेलापन और भटकती नीयत

दिल्ली पहुंचने के बाद विवेक ने कंपनी में अपना काम संभाल लिया। वह दिन भर काम में व्यस्त रहता और हर रोज शाम को नियम से अपनी पत्नी रीटा को फोन कॉल करके उसका हाल-चाल पूछता था। वह अपने वृद्ध पिता ज्ञान भूषण से भी बातचीत करता और दुकान का हाल-चाल लेता।

लेकिन दूसरी तरफ, खाजूवाला गांव में रीटा का जीवन दिन-ब-दिन नीरस और उबाऊ होता जा रहा था। शुरुआत के 15-20 दिनों तक तो रीटा ने किसी तरह अपना समय घर के कामकाज में काटा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, रीटा को भयानक अकेलापन सताने लगा। ससुर ज्ञान भूषण सुबह ही दुकान चले जाते थे और देर शाम लौटते थे। दिन भर रीटा घर में अकेली रहती थी।

रात के समय जब ससुर अपने कमरे में सो जाते, तो रीटा का बेडरूम उसे काटने को दौड़ता था। उसके भीतर की चंचलता और वासना की भूख जवां होने लगी। वह मन ही मन सोचने लगी—“पति तो दिल्ली में जाकर मजे से नौकरी कर रहा है, और मैं यहां इस चारदीवारी में अपनी जवानी बर्बाद कर रही हूं। रात को मेरा वक्त ही नहीं कटता। मुझे अपने दिल बहलाने के लिए कोई न कोई उपाय करना ही पड़ेगा।”

रीटा की नियत अब पूरी तरह से गलत रास्ते पर फिसल चुकी थी। उसने अपने मन में ठान लिया कि वह गांव में ही किसी ऐसे नौजवान और हैंडसम लड़के की तलाश करेगी, जो उसकी शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा कर सके और जिसके साथ वह अपना समय रंगीन गुजार सके। रीटा ने जब भी बाजार या मोहल्ले में निकलती, तो गुप्त रूप से लड़कों पर नजरें टिकाना शुरू कर दिया। हालांकि, शुरुआत में कई दिनों तक कोशिश करने के बावजूद उसे कोई ऐसा लड़का नहीं मिल पा रहा था जिस पर वह भरोसा कर सके या जो उसके इस गं/दे खेल में भागीदार बन सके।

अध्याय 6: दुकान का नया नौकर—रजनीश

इसी दौरान समय का चक्र घूमता रहा और मई का महीना आ गया। तारीख थी 2 मई 2025। सुबह के लगभग 8:00 बज रहे थे।

ज्ञान भूषण दुकान पर जाने की तैयारी कर रहे थे। शादी-विवाह का सीजन शुरू होने के कारण मिठाइयों की मांग अचानक बहुत बढ़ गई थी। वृद्ध ज्ञान भूषण अकेले पूरी दुकान का काम नहीं संभाल पा रहे थे। नाप-तोल करना, मावा भूनना, चाशनी बनाना और ग्राहकों को सामान देना उनके बस से बाहर हो रहा था।

ज्ञान भूषण ने चाय पीते हुए अपनी बहू रीटा से कहा: “बहु रीटा! दुकान पर आजकल काम का बोझ बहुत ज्यादा बढ़ गया है। विवेक भी दिल्ली चला गया है। मेरी उम्र अब इतनी मेहनत सहने की नहीं रही। मैं सोच रहा हूं कि दुकान पर हाथ बंटाने के लिए किसी मेहनती लड़के को काम पर रख लूं।”

रीटा के शातिर दिमाग में तुरंत एक विचार कौंधा। उसने अपने ससुर से कहा: “पिताजी, यह तो बहुत अच्छी बात है। अगर गांव का ही कोई सीधा-साधा लड़का मिल जाए, तो उसे अपनी दुकान पर काम के लिए रख लीजिए। इससे आपको भी आराम मिलेगा और दुकान का काम भी अच्छे से चलेगा।”

ज्ञान भूषण ने गांव में किसी लड़के की तलाश शुरू कर दी। दोपहर तक उनकी यह तलाश पूरी हो गई। उन्हें गांव का ही एक नवयुवक मिला, जिसका नाम था—रजनीश।

ज्ञान भूषण ने रजनीश को अपनी दुकान पर बुलाया और कहा: “देखो रजनीश, मेरी मिठाई की दुकान पर काम बहुत बढ़ गया है। मुझे एक वफादार और मेहनती लड़के की जरूरत है। अगर तुम मेरी दुकान पर काम करोगे, तो मैं तुम्हें हर महीने ₹8,000 वेतन दूंगा। बोलो, मंजूर है?”

रजनीश उन दिनों बेरोजगार था और उसे पैसों की सख्त जरूरत थी। उसने तुरंत हां कर दी। लेकिन ज्ञान भूषण रजनीश के वास्तविक चरित्र और उसके काले अतीत से बिल्कुल अनजान थे।

रजनीश देखने में जितना सुगठित और सीधा लगता था, असल में वह बेहद आवारा, कामुक और चरित्रहीन किस्म का लड़का था। उसकी नज़र हमेशा गांव और मोहल्ले की खूबसूरत महिलाओं पर रहती थी। वह स्त्रियों को अपनी मीठी-मीठी बातों और शारीरिक सुडौलता के जाल में फंसाने में माहिर था। महिलाओं को अपने प्रेम जाल में फंसाकर उनके साथ शा/रीरिक संबंध (अ/वैध संबंध) बनाना और उनका फायदा उठाना उसकी पुरानी आदत थी।

ज्ञान भूषण ने रजनीश से कहा: “ठीक है रजनीश, तुम कल सुबह 9:00 बजे मेरे घर आ जाना। वहां बैठकर हम काम की बातें पक्की कर लेंगे और फिर वहीं से दुकान चलेंगे।”

अध्याय 7: पहली मुलाकात और अ/वैध प्रेम का अंकुर

अगले दिन सुबह के लगभग 8:30 बज रहे थे। ज्ञान भूषण सुबह की सैर (टहलने) के लिए बाहर गए हुए थे। घर में रीटा अकेली थी और रसोई में काम कर रही थी।

तभी घर के मुख्य दरवाजे पर हल्की सी दस्तक (खटखट) हुई। रीटा ने अपना आंचल संभाला और जाकर दरवाजा खोला। जैसे ही दरवाजा खुला, रीटा की आंखें फटी की फटी रह गईं।

सामने रजनीश खड़ा था। रजनीश 22-23 साल का एक अत्यंत आकर्षक, सुडौल, चौड़ी छाती और मजबूत कद-काठी वाला नौजवान था। उसकी उभरी हुई मांसपेशियां और सुडौल शरीर रीटा की नज़रों में तुरंत बस गया। रीटा की आंखें रजनीश के गठीले शरीर पर टिक गईं और उसके भीतर एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। वह रजनीश के बलिष्ठ रूप की तरफ बुरी तरह आकर्षित हो गई।

दूसरी तरफ, जैसे ही रजनीश की नज़र रीटा पर पड़ी, उसकी नीयत भी डगमगा गई। रीटा का सांवला लेकिन कामुक रूप, खुली जुल्फें और सुडौल नैन-नक्श देखकर रजनीश भी उसे ऊपर से नीचे तक टकटकी बांधकर ताकने लगा। रजनीश की शातिर नजरें भांप गईं कि यह महिला अंदर से अकेली और प्यासी है।

रीटा ने अपनी धड़कनों को संभालते हुए पूछा: “तुम कौन हो? तुम्हें यहां क्या काम है?”

रजनीश ने अपनी कसी हुई आवाज में मुस्कुराते हुए कहा: “जी, मेरा नाम रजनीश है। ज्ञान भूषण जी ने मुझे आज सुबह घर पर बुलाया था। उन्होंने मुझे अपनी मिठाई की दुकान पर काम पर रखा है।”

रीटा का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने तुरंत मुस्कुराकर कहा: “अच्छा-अच्छा… पिताजी तो अभी बाहर टहलने गए हैं। तुम अंदर आ जाओ, बैठो।”

रीटा रजनीश को घर के अंदर बैठक (लिविंग रूम) में ले आई और उसे सोफे पर बैठाकर खुद रसोई में उसके लिए चाय बनाने चली गई। थोड़ी देर में ज्ञान भूषण भी टहलकर घर वापस आ गए। उन्होंने रजनीश को घर में बैठा देखा तो बहुत प्रसन्न हुए।

ज्ञान भूषण ने रजनीश से कहा: “शाबाश रजनीश! तुम समय के बहुत पाबंद हो। चलो, चाय पी लो और आज से ही दुकान पर काम संभाल लो।”

उस दिन से रजनीश ने ज्ञान भूषण की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। रजनीश चतुर था। उसने शुरुआती दिनों में बहुत ही मन लगाकर काम किया। वह ज्ञान भूषण के हर हुक्म का पालन करता, दुकान की साफ-सफाई रखता और ग्राहकों से नम्रता से पेश आता। मात्र 15-20 दिनों के भीतर ही रजनीश ने भोले-भाले ज्ञान भूषण का पूर्ण विश्वास जीत लिया।

इन 20 दिनों के दौरान रजनीश का ज्ञान भूषण के घर आना-जाना भी शुरू हो गया। कभी दुकान की चाबी लेने, कभी कोई सामान पहुंचाने तो कभी ज्ञान भूषण के लिए घर से टिफिन लाने के बहाने रजनीश दिन में दो-तीन बार घर आता था। जब भी रजनीश घर आता, ससुर की गैरमौजूदगी में रीटा उससे हंस-हंसकर बातें करती। दोनों के बीच नजरों ही नजरों में इशारे होने लगे। दूरियां मिटने लगीं और नज़दीकियां बढ़ने लगीं। दोनों एक-दूसरे की तरफ पूरी तरह से आकर्षित हो चुके थे और खाजूवाला गांव के इस शांत घर में एक गं/दे अ/वैध संबंध की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी।

अध्याय 8: 20 मई 2025—बंद कमरे का गं/दा खेल

दिन बीतते गए और वह तारीख आ ही गई जिसका दोनों को बेसब्री से इंतजार था—20 मई 2025।

सुबह के लगभग 9:00 बजे का समय था। रजनीश दुकान पर आ चुका था और ज्ञान भूषण के साथ काम में लगा हुआ था। दुकान पर कुछ ग्राहक आए, सामान खरीदा और चले गए। लगभग 9:30 बजे ज्ञान भूषण ने रजनीश से कहा:

“रजनीश, मुझे किसी जरूरी काम से और मिठाई के डिब्बे खरीदने के लिए बीकानेर शहर जाना पड़ रहा है। दुकान में थोड़ा सामान कम हो गया है। तुम दुकान पर ही रहना और ध्यान रखना। मुझे शहर से वापस लौटने में कम से कम दो से तीन घंटे का समय लगेगा।”

रजनीश का दिल खुशी से उछल पड़ा। उसने संजीदा चेहरा बनाकर कहा: “जी मालिक, आप बेफिक्र होकर जाइए। मैं दुकान संभाल लूंगा।”

ज्ञान भूषण बस पकड़ने के लिए शहर की तरफ रवाना हो गए। उनके जाने के ठीक 15 मिनट बाद, रजनीश की कामुकता उस पर हावी हो गई। उसने इधर-उधर देखा, कोई ग्राहक नहीं था। रजनीश ने बिना कोई देर किए दुकान का लोहे का शटर नीचे गिरा दिया और ताला लगा दिया।

दुकान बंद करके रजनीश तेजी से गलियों से होता हुआ सीधे ज्ञान भूषण के घर के दरवाजे पर पहुंच गया। उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई और घर के मुख्य किवाड़ पर दस्तक दी।

अंदर रीटा ही थी। जैसे ही उसने दरवाजा खोला और सामने रजनीश को खड़े देखा, उसकी बांछें खिल गईं। रीटा के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई। रजनीश तुरंत घर के भीतर दाखिल हुआ और रीटा ने बिना एक पल गंवाए घर का मुख्य भारी दरवाजा अंदर से बंद करके कुंडी लगा दी।

रजनीश ने रीटा की कमर में हाथ डालते हुए उसकी आंखों में आंखें डालकर कहा: “आज तुम्हारे ससुर शहर गए हैं। कम से कम तीन घंटे तक वापस नहीं आएंगे। आज हमारे पास पूरा मौका है…”

रीटा जो लंबे समय से इस पल का इंतजार कर रही थी, नैतिकता और सामाजिक मर्यादा की सारी सीमाएं भूल चुकी थी। उसने रजनीश का हाथ थामा और उसे सीधे अपने बेडरूम (शयनकक्ष) के भीतर ले गई। बेडरूम का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया गया और कुंडी चढ़ा दी गई।

उस बंद कमरे के भीतर, अपने पति विवेक की गैरमौजूदगी में और ससुर के विश्वास की बलि चढ़ाते हुए, रीटा और उसके नौकर रजनीश के बीच पहली बार शा/रीरिक संबंध कायम हुए। दोनों वासना के अंधे कुएं में गिर चुके थे। वे काफी देर तक उस बंद कमरे में इस गं/दे और पापकर्म को अंजाम देते रहे। जब दोनों की घिनौनी इच्छाएं पूरी हो गईं, तो रजनीश ने अपने कपड़े दुरुस्त किए।

लगभग 11:00 बजे रजनीश बहुत ही चालाकी से घर का पिछला दरवाजा खोलकर बाहर निकला, चुपके से दुकान पर पहुंचा, शटर उठाया और ऐसे बैठ गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।

उस दिन के बाद से रीटा और नौकर रजनीश का अ/वैध संबंध नियमित रूप से चलने लगा। रीटा अब अपने पति विवेक की कमी को इस नौजवान नौकर से पूरा करने लगी थी। जब भी ससुर दुकान पर व्यस्त होते या किसी काम से बाहर जाते, रीटा रजनीश को घर बुला लेती। कई बार तो रीटा ससुर की तिजोरी से कुछ पैसे चुराकर या अपने पास से पैसे रजनीश को देती थी ताकि वह उससे खुश रखे। दोनों खाजूवाला में एक खौफनाक और घिनौने खेल के अभ्यस्त हो चुके थे।

अध्याय 9: विवेक का गांव आना और रीटा का नाटक

दिन बीतते चले गए और मई का महीना खत्म होने को आया। तारीख आई 30 मई 2025।

सुबह के लगभग 11:00 बजे का समय था। विवेक दिल्ली से दो दिनों की छुट्टी लेकर अचानक अपने गांव खाजूवाला आ पहुंचा। विवेक जैसे ही अपने घर के भीतर दाखिल हुआ, उसने अपनी पत्नी रीटा को देखा।

रीटा इन दिनों बहुत खुश नजर आ रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सा निखार और चमक (तेज) थी। सीधे-सादे विवेक ने जब अपनी पत्नी के हंसमुख और खिले हुए चेहरे को देखा, तो वह मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ। विवेक ने सोचा कि शायद अब उसकी पत्नी घर के माहौल में ढल गई है और खुश रहने लगी है। लेकिन भोला विवेक यह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि उसकी पत्नी के चेहरे की यह चमक उसके ससुर के नौकर के साथ कायम अ/वैध संबंधों और व्यभिचार की देन थी।

विवेक ने मुस्कुराते हुए रीटा से कहा: “रीटा! आज तुम बहुत खुश लग रही हो। चलो, आज हम दोनों शहर के किसी अच्छे होटल में चलते हैं, वहां खाना खाएंगे और थोड़ा घूम-फिर लेंगे।”

लेकिन रीटा डर गई कि अगर वह होटल गई तो रजनीश के साथ उसका समय खराब होगा और ससुर को भी शक हो सकता है। रीटा ने तुरंत मना करते हुए कहा: “नहीं-नहीं, होटल में जाकर फिजूलखर्ची करने की क्या जरूरत है? आज मैं तुम्हारे लिए घर पर ही तुम्हारे मनपसंद पकवान और अच्छा खाना बनाऊंगी।”

विवेक अपनी पत्नी के इस जवाब से बहुत प्रभावित हुआ। उसी समय ससुर ज्ञान भूषण भी दुकान का काम निपटाकर बेटे से मिलने घर आ गए। पिता और पुत्र एक-दूसरे से गले मिले, हाल-चाल पूछा और काफी देर तक बातें करते रहे।

तभी दुकान से कुछ सामान देने के बहाने नौकर रजनीश भी घर के भीतर दाखिल हुआ। विवेक ने जब उस अजनबी सुडौल नौजवान को घर के आंगन में देखा, तो उसने अपने पिता से पूछा: “पिताजी, यह लड़का कौन है?”

ज्ञान भूषण ने मुस्कुराते हुए कहा: “बेटा विवेक, यह रजनीश है। अपनी दुकान का नया नौकर। बहुत ही मेहनती और वफादार लड़का है।”

पास ही खड़ी रीटा तुरंत बोल पड़ी: “हां विवेक! जब से यह लड़का रजनीश हमारी दुकान पर काम करने आया है, तब से दुकान की बिक्री बहुत बढ़ गई है और पिताजी को भी बहुत आराम मिल गया है। दुकान तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही है।”

विवेक ने एक पल के लिए रीटा के चेहरे के उतावलेपन और रजनीश की नजरों को देखा। विवेक के मन में एक क्षण के लिए अजीब सा संदेह कौंधा, लेकिन उसने अपनी ही सोच को धिक्कारा और बात को नजरअंदाज कर दिया।

इसके बाद विवेक ने अपने पिता ज्ञान भूषण से कहा: “पिताजी, मैं केवल दो दिनों की छुट्टी पर आया हूं। दो दिन बाद जब मैं वापस दिल्ली जाऊंगा, तो रीटा को भी अपने साथ दिल्ली ले जाऊंगा। मैंने वहां रहने का इंतजाम कर लिया है।”

ज्ञान भूषण ने खुश होकर कहा: “यह तो बहुत उत्तम बात है बेटा! रीटा तुम्हारे साथ दिल्ली रहेगी तो तुम दोनों का मन भी लगा रहेगा।”

लेकिन रीटा के तो जैसे होश उड़ गए। अगर वह दिल्ली चली जाती, तो रजनीश के साथ उसका रंगीन जीवन और आजादी हमेशा के लिए खत्म हो जाती। रीटा ने तुरंत एक रोना रोना शुरू कर दिया। रीटा ने विवेक का हाथ पकड़कर कहा:

“नहीं विवेक! मैं अभी तुम्हारे साथ दिल्ली नहीं जा सकती। पिताजी यहां गांव में अकेले रह जाएंगे। इस उम्र में इनकी देखभाल कौन करेगा? अगर अचानक रात-बिरात इनकी तबीयत खराब हो गई या ये बीमार पड़ गए, तो इनका ख्याल कौन रखेगा? मैं इन्हें इस हालत में अकेला छोड़कर दिल्ली नहीं जा सकती।”

रीटा की यह बात सुनकर बेवकूफ विवेक भावुक हो गया। उसने अपनी पत्नी को गले से लगा लिया और आंख में आंसू भरकर कहा: “रीटा! तुम कितनी महान हो। ससुर को अपने पिता से बढ़कर मानती हो। तुम जैसी संस्कारवान पत्नी भगवान हर किसी को दे!”

विवेक दो दिनों तक गांव में रुका। उसने कई बार रीटा से चलने को कहा, लेकिन रीटा ने हर बार ससुर की सेवा का बहाना बनाकर मना कर दिया। दो दिन बीतने के बाद विवेक अपनी पत्नी पर अंधा विश्वास लेकर वापस दिल्ली लौट गया और अपनी नौकरी में व्यस्त हो गया।

अध्याय 10: दोपहर का दु/राचार और बढ़ता दुस्साहस

विवेक के दिल्ली लौटते ही रीटा और रजनीश के हौसले और बुलंद हो गए। अब तो उनके सिर से डर नाम की चीज़ पूरी तरह से गायब हो चुकी थी।

20 जून 2025 का दिन था। सुबह के करीब 8:00 बजे ज्ञान भूषण दुकान पर गए। त्यौहार का सीजन (जैसे सावन की शुरुआत या कोई स्थानीय पर्व) होने के कारण दुकान पर ग्राहकों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। ज्ञान भूषण और रजनीश दोनों सुबह से शाम तक मिठाइयां बेचने में पसीना-पसीना हो रहे थे।

दोपहर के लगभग 12:00 बज चुके थे। भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। ज्ञान भूषण ने थककर रजनीश से कहा: “रजनीश, आज तो ग्राहकों की बहुत भीड़ है। दुकान बंद करके घर जाकर खाना खाने का समय नहीं है। ऐसा करो, तुम मेरे घर चले जाओ और बहू रीटा से दोपहर का खाना (टिफिन) दुकान पर ही ले आओ। हम दोनों यहीं बैठकर खाना खा लेंगे।”

ज्ञान भूषण का अपने नौकर पर अंधा भरोसा था। रजनीश ने तुरंत कहा: “जी मालिक, मैं अभी जाकर खाना ले आता हूं।”

रजनीश दुकान से निकला और तेजी से ज्ञान भूषण के घर पहुंचा। उसने दरवाजा खटखटाया। रीटा ने जब दरवाजा खोला और सामने रजनीश को देखा, तो चौक गई। रजनीश ने अंदर आते ही कहा: “मालिक ने दुकान पर ही टिफिन मंगवाया है। खाना तैयार है क्या?”

रीटा ने कहा: “हां, खाना तो तैयार है, तुम टिफिन लेकर दुकान चले जाओ।”

लेकिन रजनीश की नीयत बिगड़ चुकी थी। उसने रीटा का हाथ पकड़कर खींचते हुए कहा: “रीटा, ऐसा सुनहरा मौका बार-बार नहीं मिलता। बूढ़ा मालिक दुकान पर ग्राहकों की भीड़ में फंसा हुआ है। वह दो घंटे तक यहां नहीं आ सकता। पहले हम अपना काम पूरा करते हैं, फिर मैं खाना लेकर जाऊंगा।”

रीटा की वासना भी जाग उठी। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि दिन का उजाला है, आसपास पड़ोसी हैं। रीटा ने तुरंत घर का मुख्य दरवाजा बंद किया, कुंडी चढ़ाई और रजनीश को लेकर बेडरूम में चली गई। दिन के 12:30 बजे, बंद कमरे के भीतर मालकिन और नौकर के बीच फिर से वह गं/दा और घिनौना खेल खेला गया।

जब दोनों की तृप्ति हो गई, तो रीटा ने रसोई में जाकर आराम से टिफिन पैक किया और रजनीश को दे दिया। रजनीश टिफिन लेकर दुकान पहुंचा। ज्ञान भूषण ने बिना किसी शक के नौकर के साथ बैठकर खाना खाया और उसकी तारीफ की।

अध्याय 11: श/राब का नशा और दरिंदगी का नया मोड़

रीटा और रजनीश का यह अ/वैध संबंध इसी तरह पनपता रहा। लेकिन रीटा यह नहीं जानती थी कि रजनीश जैसे चरित्रहीन इंसान पर भरोसा करना उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित होने वाला था।

30 जून 2025 की शाम के करीब 7:00 बज रहे थे। रजनीश ने दुकान पर ज्ञान भूषण से कहा: “मालिक, आज मुझे घर पर थोड़ा जरूरी काम है, क्या मैं आज थोड़ा जल्दी निकल जाऊं?”

ज्ञान भूषण ने कहा: “हां-हां रजनीश, तुम जा सकते हो।”

दुकान से निकलकर रजनीश अपने गांव के रास्ते पर जा रहा था कि रास्ते में उसे उसका पुराना जिगरी दोस्त मिला—संजय। संजय भी गांव का एक मनचला, श/राबी और आवारा किस्म का लड़का था।

संजय ने रजनीश को रोककर कहा: “अरे रजनीश! बड़े आदमी हो गए हो, जब से मिठाई की दुकान पर लगे हो, दोस्तों को भूल ही गए हो।”

रजनीश ने कहा: “ऐसी बात नहीं है भाई। चलो आज बहुत दिन हो गए हैं, साथ बैठकर पार्टी करते हैं।”

दोनों दोस्त एक मोटरसाइकिल पर सवार होकर पास के श/राब के ठेके पर पहुंचे। वहां से उन्होंने म/दिरा (श/राब) की कई बोतलें खरीदीं और गांव से बाहर सुनसान खेतों की तरफ चले गए। राम सिंह नाम के किसान के खेत में बने एक छप्पर के नीचे बैठकर दोनों दोस्त श/राब पीने लगे।

रात के 8:30 बज चुके थे। श/राब के कई पैग अंदर जाते ही रजनीश को गहरा नशा चढ़ने लगा। नशे की धुन में रजनीश अपनी झूठी शान बघारने लगा। रजनीश ने संजय के कंधे पर हाथ रखकर हंसते हुए कहा:

“संजय भाई… तू मुझे क्या समझता है? तेरी भाभी यानी मेरे मालिक की बहु रीटा… इतनी खूबसूरत औरत है ना, वह मेरे पैरों की दीवानी है! जब मेरा मन करता है, मैं उसके बेडरूम में जाकर उसके साथ रंगरेलियां मनाता हूं। वह मुझे खुद पैसे भी देती है!”

संजय को रजनीश की बात पर यकीन नहीं हुआ। संजय ने ठहाका लगाते हुए कहा: “चल हट फेंकना बंद कर! ज्ञान भूषण की बहु तो बहुत सीधी-साधी और पर्दे में रहने वाली औरत है। वह तेरे जैसे नौकर के मुंह भी नहीं लगेगी। तू नशे में गप्प हांक रहा है।”

रजनीश को अपनी बात पर अविश्वास सहन नहीं हुआ। नशे में धुत रजनीश ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और कहा: “तुझे मेरी बात पर यकीन नहीं है न? रुक, मैं अभी सबूत देता हूं।”

रजनीश ने रात के 9:00 बजे सीधे रीटा के पर्सनल नंबर पर फोन कॉल लगा दिया और मोबाइल का स्पीकर ऑन कर दिया।

उधर से रीटा ने फोन उठाया और कामुक आवाज में बोली: “हेलो रजनीश… कहां हो तुम? आज फोन कैसे किया?”

रजनीश ने नशे में कहा: “रीटा, मैं अपने दोस्त संजय के साथ राम सिंह के खेतों में बैठकर श/राब पी रहा हूं। मेरा दोस्त संजय तेरी सुंदरता की बातें सुन रहा था। वह भी तेरे साथ वक्त गुजारना चाहता है।”

संजय यह सुनकर हैरान रह गया और ध्यान से सुनने लगा।

एक सामान्य और चरित्रवान स्त्री होती तो इस बात पर आग बबूला हो जाती, लेकिन रीटा की नैतिकता पूरी तरह नष्ट हो चुकी थी। रीटा ने फोन पर बेशर्मी से हंसते हुए कहा: “अरे रजनीश! अगर वह तुम्हारा पक्का दोस्त है, तो वह मेरा भी तो कुछ लगता है। इसमें पूछने वाली क्या बात है?”

रजनीश ने कहा: “तो फिर देर किस बात की? राम सिंह के खेत में जो पुराना कुआँ और छप्पर है, तुम जल्दी से अंधेरे का फायदा उठाकर वहां आ जाओ।”

रीटा ने बिना कुछ सोचे-समझे, अपनी इज्जत और मर्यादा को ताक पर रखकर कहा: “ठीक है, मैं 10 मिनट में पहुंच रही हूं।”

अध्याय 12: खेतों का घि/नौना का/ंड

रीटा ने घर में देखा, ससुर ज्ञान भूषण खाना खाकर अपने कमरे में सो चुके थे। रीटा ने काले रंग की साड़ी पहनी, चेहरे पर पल्लू ढका और अंधेरी रात में खामोशी से घर का दरवाजा खोलकर खेत की पगडंडियों की तरफ बढ़ गई।

कुछ ही देर में रीटा राम सिंह के खेत में बने छप्पर के पास पहुंच गई। वहां टॉर्च की रोशनी में रजनीश और संजय श/राब की बोतलों के साथ बैठे थे। रीटा को देखकर संजय की आंखें फटी की फटी रह गईं।

तीनों ने मिलकर छप्पर के नीचे बैठकर कुछ देर बातें कीं और श/राब की घूंट भरी। इसके बाद, रजनीश और संजय रीटा को पास के बाजरे के ऊंचे खेत के भीतर ले गए।

उस रात, राम सिंह के खेत में, रीटा की पूरी सहमति और रजामंदी से दोनों लड़कों—रजनीश और संजय—ने बारी-बारी से रीटा के साथ शा/रीरिक संबंध (अ/वैध संबंध) बनाए। वासना के उस घिनौने खेल को दोनों लड़कों ने तब तक अंजाम दिया जब तक उनका मन नहीं भर गया।

जब यह घि/नौना काम खत्म हुआ, तो रीटा ने अपने कपड़े ठीक किए और बोली: “अब मुझे घर जाना चाहिए, कहीं ससुर जी की नींद न खुल जाए।”

रीटा अंधेरे में चुपचाप अपने घर लौट आई। उस रात के बाद रीटा का पतन और भयानक हो गया। अब जब भी रीटा का मन करता या जब भी विवेक घर पर नहीं होता, रीटा कभी रजनीश को तो कभी संजय को या कभी दोनों को बारी-बारी से अपने घर पर बुला लेती थी और उनके साथ वक्त गुजारती थी। खाजूवाला गांव के इस घर में पाप की जड़ें बहुत गहरी जम चुकी थीं।

अध्याय 13: गर्/भधारण का समाचार और खुशियों का भ्रम

इसी तरह पाप का यह सिलसिला चलता रहा। समय बीतता गया और एक दिन तारीख आई—10 जुलाई 2025।

सुबह के करीब 9:00 बजे का समय था। ससुर ज्ञान भूषण दुकान पर जा चुके थे और रजनीश भी दुकान पहुंच चुका था। रीटा घर में झाड़ू-पोछा कर रही थी कि अचानक उसे भयानक चक्कर आया और उल्टी (जी मिचलाना) आने लगी। रीटा का शरीर निढाल हो गया और वह सोफे पर गिर पड़ी।

रीटा को लगा कि उसकी तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो रही है। घर में कोई नहीं था, इसलिए उसने तुरंत अपने ससुर ज्ञान भूषण के मोबाइल पर फोन किया।

रीटा ने कांपती आवाज में कहा: “पिताजी… मेरी तबीयत बहुत खराब लग रही है। मुझे चक्कर आ रहे हैं और घबराहट हो रही है।”

ज्ञान भूषण ने जैसे ही सुना, वे चितित हो गए। उन्होंने तुरंत दुकान पर रजनीश से कहा: “रजनीश, तुम दुकान पर बैठो। मैं बहू रीटा को लेकर शहर के अस्पताल जा रहा हूं, उसकी तबीयत ठीक नहीं है।”

ज्ञान भूषण घर पहुंचे, एक टैक्सी मंगवाई और रीटा को लेकर पास के बीकानेर के बड़े अस्पताल पहुंचे। अस्पताल में महिला डॉक्टर ने रीटा की प्राथमिक जांच की, ब्लड सैंपल लिया और यूरिन टेस्ट कराया।

लगभग एक घंटे के बाद महिला डॉक्टर अपने केबिन से मुस्कुराते हुए बाहर आईं। डॉक्टर ने ज्ञान भूषण और रीटा को अंदर बुलाया और बधाई देते हुए कहा:

“बधाई हो ज्ञान भूषण जी! आपकी बहु रीटा एक महीने की गर्/भवती (Pregnant) है! यह मां बनने वाली है।”

यह सुनते ही रीटा का चेहरा खुशी से खिल उठा। रीटा ने अपने मन में सोचा—“हे भगवान! आखिरकार मेरी सूनी गोद भर गई! मैं मां बनने वाली हूं!” रीटा इस मूर्खता में डूबी थी कि उसके गर्भ में बच्चा आ गया है, लेकिन वह यह भूल चुकी थी कि यह बच्चा उसके पति विवेक का नहीं, बल्कि उसके अ/वैध संबंधों (रजनीश या संजय) की पाप की उपज था।

ससुर ज्ञान भूषण तो खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। तीन साल के लंबे इंतजार के बाद उनके घर में पोता या पोती आने वाली थी। उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए।

ज्ञान भूषण तुरंत अस्पताल के बरामदे में आए और उन्होंने कांपते हाथों से दिल्ली में अपने बेटे विवेक को फोन मिलाया।

ज्ञान भूषण ने चहकते हुए कहा: “बेटा विवेक! बहुत बड़ी खुशखबरी है! भगवान ने हमारी सुन ली! रीटा डॉक्टर के पास आई थी… डॉक्टर ने बताया है कि रीटा एक महीने के गर्/भ से है! तुम बाप बनने वाले हो बेटा!”

अध्याय 14: विवेक के पैरों तले खिसकी जमीन

उधर दिल्ली में, जैसे ही विवेक ने अपने पिता के मुंह से यह शब्द सुने कि “रीटा एक महीने की गर्/भवती है…”—उसके हाथ से मोबाइल फोन छूटते-छूटते बचा।

विवेक का पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया। उसके पैरों तले से मानो पूरी ज़मीन ही गायब हो गई। उसकी आंखों के सामने बीकानेर अस्पताल के उस डॉक्टर का चेहरा और उसकी रिपोर्ट गूंजने लगी: “विवेक जी… आप जीवन में कभी भी पिता नहीं बन सकते। आपके शरीर में शुक्राणु शून्य हैं।”

विवेक का दिमाग सनन्न रह गया। वह मन ही मन चीख उठा—“जब डॉक्टर ने साफ-साफ कह दिया था कि मैं कभी पिता बन ही नहीं सकता, तो रीटा गर्/भवती कैसे हो सकती है? यह बच्चा मेरा हो ही नहीं सकता!”

सच्चाई एक भयानक दैत्य की तरह विवेक के सामने खड़ी थी। विवेक समझ गया कि उसकी गैरमौजूदगी में उसकी पत्नी रीटा ने किसी गैर-मर्द के साथ अ/वैध संबंध बनाए हैं और यह बच्चा उसी व्यभिचार की देन है!

फोन पर पिता ज्ञान भूषण बोले जा रहे थे: “हेलो… विवेक? तुम सुन रहे हो न बेटा? तुम खुश नहीं हुए?”

विवेक ने अपनी रुंधी हुई आवाज को संभालते हुए किसी तरह कहा: “हां… हां पिताजी, मैं सुन रहा हूं। मैं बहुत खुश हूं… मैं बाद में बात करता हूं।”

विवेक ने फोन काट दिया। वह अपने कमरे में बैठकर सिर पकड़कर रोने लगा। उसके भीतर गुस्से, अपमान और नफरत का तूफान उठ खड़ा हुआ। उसने सोचा कि वह अभी गांव जाकर रीटा और पिता को सच बता दे। लेकिन तभी उसके भीतर की पुरुषवादी हीनभावना और लोक-लाज का डर आड़े आ गया।

विवेक ने सोचा—“अगर मैंने आज यह सच सबको बताया कि मैं नामर्द (बांझ) हूं और यह बच्चा मेरा नहीं है, तो पूरे गांव में मेरी थू-थू होगी। लोग मेरा मज़ाक उड़ाएंगे कि मैं अपनी पत्नी को संतुष्ट नहीं रख सका। मेरी नपुंसकता का ढिंढोरा पूरे समाज में पिट जाएगा।”

इस सामाजिक अपमान के डर से विवेक ने खामोश रहने का फैसला किया। लेकिन वह इस धोखे को बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था। अगले ही दिन विवेक ने दिल्ली में अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया, अपना बैग पैक किया और खाजूवाला गांव वापस आ गया।

जब वह घर पहुंचा, तो पिता ज्ञान भूषण ने हैरान होकर पूछा: “बेटा विवेक! तुम अचानक नौकरी छोड़कर वापस क्यों आ गए?”

विवेक ने झूठी कहानी बनाते हुए कहा: “पिताजी, कंपनी में कुछ मंदी चल रही थी, इसलिए मेरी नौकरी छूट गई। अब मैं कहीं बाहर नहीं जाऊंगा। मैं यहीं गांव में रहकर आपकी मिठाई की दुकान संभालूंगा और रीटा का ख्याल रखूंगा।”

कोई नहीं जानता था कि विवेक के शांत चेहरे के पीछे प्रतिशोध और भयानक नफरत की आग सुलग रही थी। वह बिल्कुल चुपचाप, खामोश और गुमसुम रहने लगा। वह दिन भर दुकान पर रजनीश के साथ काम करता, उसकी हर हरकत पर गुप्त नज़र रखता, लेकिन चेहरे पर कोई भाव नहीं आने देता था।

अध्याय 15: गोरे बच्चे का जन्म और बेनकाब होता सच

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा। जुलाई से मार्च का महीना आ गया।

तारीख थी 10 मार्च 2026। शाम के करीब 6:00 बजे का समय था।

रीटा की गर्भावस्था के नौ महीने पूरे हो चुके थे और उसे अचानक भयानक प्रसव पीड़ा (Delivery Pain) शुरू हो गई। विवेक और उसके पिता ज्ञान भूषण तुरंत रीटा को पास के सरकारी अस्पताल ले गए।

अस्पताल में डॉक्टरों की टीम ने रीटा को लेबर रूम में भर्ती कराया। लगभग दो घंटे की मशक्कत के बाद लेबर रूम से बच्चे के रोने की आवाज गूंजी। डॉक्टर मुस्कुराते हुए बाहर आए और उन्होंने ज्ञान भूषण और विवेक को सूचना दी:

“बधाई हो! आपकी पत्नी ने एक बहुत ही स्वस्थ और सुंदर बेटे (बालक) को जन्म दिया है!”

पूरे अस्पताल में ज्ञान भूषण की खुशी का ठिकाना नहीं था। वे अस्पताल में मिठाइयां बांटने लगे। जब नर्स उस नवजात शिशु को कपड़े में लपेटकर बाहर लाई और विवेक की गोद में थमाया, तो विवेक ने बच्चे का चेहरा देखा।

बच्चे का चेहरा देखते ही विवेक का खून खौल उठा।

वह नवजात शिशु अत्यंत गोरा-चिट्टा, सुंदर और तीखे नैन-नक्श वाला था।

विवेक ने मन ही मन तुलना की—“मेरा रंग बिल्कुल काला है। मेरी पत्नी रीटा का रंग भी सांवला-काला है। दो काले रंग के माता-पिता के घर में इतना दूध जैसा गोरा-चिट्टा बच्चा कैसे पैदा हो सकता है?”

विवेक का संदेह अब 100% पक्के यकीन में बदल चुका था। हालांकि, उसने अस्पताल में अपना आपा नहीं खोया। उसने सात दिनों तक किसी तरह अपने गुस्से को पीकर रखा।

इन सात दिनों के भीतर, विवेक चुपचाप बीकानेर शहर के एक दूसरे बड़े पैथोलॉजी लैब और अस्पताल में गया। वहां उसने दोबारा अपनी सीमेन एनालिसिस (शुक्राणु जांच) कराई। दो दिन बाद जब रिपोर्ट आई, तो दूसरे अस्पताल के डॉक्टरों ने भी वही बात दोहराई: “आपकी रिपोर्ट में 0% स्पर्म हैं। आप जीवन में कभी पिता नहीं बन सकते।”

अब विवेक के पास संदेह की कोई गुंजाइश नहीं बची थी। उसे पूरा यकीन हो गया था कि रीटा ने उसके साथ बहुत बड़ा छलावा किया है और यह गोरा बच्चा उसके किसी आशिक का है।

अध्याय 16: 16 मार्च 2026—खौफनाक रात और कु/ल्हाड़ी का तांडव

16 मार्च 2026 का दिन। रीटा बच्चे को लेकर अस्पताल से घर आ चुकी थी। घर में चारों तरफ बधाई देने वालों का तांता लगा हुआ था, लेकिन रात होते ही सन्नाटा छा गया।

रात के लगभग 10:00 बज रहे थे। ससुर ज्ञान भूषण खाना खाकर अपने कमरे में सो चुके थे। नवजात बच्चा पालने में सो रहा था और रीटा अपने बेडरूम में बिस्तर पर लेटी हुई थी।

विवेक अपने कमरे में बैठा था। उसके दिमाग में पिछले तीन सालों का धोखा, डॉक्टर की रिपोर्ट और उस गोरे बच्चे का चेहरा घूम रहा था। गुस्से और नफरत ने विवेक के सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। वह हैवान बन चुका था।

विवेक खामोशी से अपने कमरे से बाहर निकला। घर के आंगन के कोने में लकड़ी काटने वाली एक भारी और तेज धारदार कु/ल्हाड़ी रखी हुई थी। विवेक ने कांपते हाथों से उस लोहे की कु/ल्हाड़ी को उठाया और उसके ब्लेड की धार को महसूस किया।

कु/ल्हाड़ी को अपने पीछे छुपाकर विवेक रीटा के बेडरूम के भीतर दाखिल हुआ और अंदर से कुंडी बंद कर ली।

बिस्तर पर रीटा सो रही थी। विवेक ने अपनी भारी आवाज में कहा: “रीटा… उठो।”

रीटा ने जैसे ही आंखें खोलीं, उसने देखा कि कमरे की लाइट जल रही है और उसका पति विवेक हाथ में खू/न से प्यासी कु/ल्हाड़ी लिए उसके सिरहाने खड़ा है। उसकी आंखें खू/न की तरह लाल थीं।

रीटा डर के मारे कांपने लगी। उसने घबराकर पूछा: “वि… विवेक! यह तुम्हारे हाथ में कु/ल्हाड़ी क्यों है? तुम मुझे ऐसे क्यों देख रहे हो?”

विवेक ने कु/ल्हाड़ी की धार रीटा की गर्दन पर टिका दी और गुर्राते हुए कहा: “रीटा! आज अगर तुमने सच नहीं बोला, तो मैं तुम्हारी गर्दन धड़ से अलग कर दूंगा! मुझे सच-सच बताओ कि यह बच्चा किसका है? मेरा रंग काला है, तुम्हारा रंग सांवला है… फिर यह बच्चा इतना गोरा-चिट्टा कैसे पैदा हुआ? और दूसरी बात… शादी के दो साल बाद ही डॉक्टर ने मुझे बता दिया था कि मैं कभी पिता बन ही नहीं सकता! अब सच उगल कि यह किसकी न/हूसत है?!”

जैसे ही रीटा ने सुना कि विवेक को अपनी नामर्दी का सच पहले से पता था और उसने गर्दन पर कु/ल्हाड़ी की ठंडी धार महसूस की, रीटा के प्राण सूख गए। मौत को सामने देखकर रीटा फुट-फुटकर रोने लगी और कांपते हुए सच उगलने पर मजबूर हो गई।

रीटा ने रोते हुए हाथ जोड़कर कहा: “विवेक! मुझे माफ कर दो! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई! जब तुम दिल्ली गए थे, तो मैं अकेली पड़ गई थी… यह बच्चा तुम्हारी दुकान के नौकर रजनीश का है! और… और उसके दोस्त संजय का भी! मैंने उन दोनों के साथ शा/रीरिक संबंध बनाए थे… मुझे मत मारो विवेक! मुझे माफ कर दो!”

अध्याय 17: ह/त्या, खू/न की नदियां और पुलिस का आगमन

जैसे ही रीटा के मुंह से दुकान के नौकर रजनीश और उसके दोस्त संजय का नाम निकला, विवेक के भीतर छिपा हैवान पूरी तरह जाग उठा। जिस नौकर को उसके पिता ने ₹8,000 पर रखा था, जिस नौकर को उसने छोटा भाई माना था, उसी ने उसकी पीठ में इतना बड़ा छुरा घोंपा था!

विवेक का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया। उसने चीखते हुए कहा: “रा/क्षसी! छि/नाल! तूने मेरे बाप के भरोसे और मेरी इज्जत का यह हश्र किया!”

इससे पहले कि रीटा अपनी जान बचाने के लिए चीख पाती या बिस्तर से उठ पाती, विवेक ने पूरी ताकत से कु/ल्हाड़ी हवा में लहराई और सीधे रीटा की गर्दन पर दे मारी!

छपाक!

एक ही वार में कु/ल्हाड़ी रीटा की गर्दन को चीरती हुई हड्डियों तक गहराई में धंस गई। रीटा के गले से खू/न का फव्वारा छूटा और वह बिस्तर पर तड़पने लगी। विवेक पर पागलपन सवार हो चुका था। उसने एक के बाद एक कु/ल्हाड़ी से रीटा की गर्दन और चेहरे पर तीन-चार वार किए। रीटा का सिर धड़ से लगभग अलग हो गया और बिस्तर खू/न से पूरी तरह लाल हो गया। कुछ ही सेकंड में रीटा के प्राण पखेरू उड़ गए। वह ला/श में तब्दील हो चुकी थी।

कमरे में हुई चीख-पुकार और धड़ाम की आवाज सुनकर पड़ोसी और पास के कमरे में सो रहे ससुर ज्ञान भूषण की नींद खुल गई। ज्ञान भूषण बदहवास हालत में भागे हुए बहू के कमरे के बाहर पहुंचे।

ज्ञान भूषण ने दरवाजा खटखटाया: “विवेक! रीटा! क्या हुआ बेटा? दरवाजा खोलो!”

अंदर से कोई आवाज नहीं आई। ज्ञान भूषण ने जब खिड़की से अंदर झांका, तो उनके होश उड़ गए।

अंदर का मंजर खौफनाक था। रीटा की खू/न से लथपथ ला/श बिस्तर पर पड़ी थी। पूरा फर्श खू/न से भरा था। और उनका बेटा विवेक हाथ में खू/न से सनी कु/ल्हाड़ी लिए ला/श के पास शांत खड़ा था।

ज्ञान भूषण चीखने-चिल्लाने लगे: “अरे बचाओ! मेरे बेटे ने अपनी बहु को मार दिया! बचाओ!”

चीख-पुकार सुनकर आसपास के पड़ोसी दौड़कर ज्ञान भूषण के घर जमा हो गए। पड़ोसियों ने हिम्मत करके बेडरूम का दरवाजा बाहर से धक्का देकर तोड़ा और विवेक के हाथ से कु/ल्हाड़ी छीनकर उसे पकड़ लिया। ज्ञान भूषण ने कांपते हाथों से तुरंत खाजूवाला पुलिस स्टेशन को फोन मिलाया।

घटना की सूचना मिलते ही खाजूवाला थाना प्रभारी (SHO) अपनी पुलिस टीम और फॉरेंसिक टीम के साथ लगभग एक घंटे के भीतर मौके पर पहुंचे।

पुलिस ने कमरे का मुआयना किया, खू/न से सनी कु/ल्हाड़ी को अपने कब्जे में लिया, साक्ष्य जुटाए और रीटा के श/व (ला/श) को पंचनामा करके बीकानेर सरकारी अस्पताल के मोर्चरी में पोस्टमार्टम के लिए भिजवाया।

पुलिस ने मौके से ही आरोपी पति विवेक को ह/त्या के आरोप में गिरफ्तार (Handcuff) कर लिया और उसे गाड़ी में बैठाकर पुलिस स्टेशन ले आई।

अध्याय 18: पुलिस के उड़े होश और अंतिम परिदृश्य

पुलिस स्टेशन के लॉकअप के भीतर जब थाना प्रभारी और जांच अधिकारियों ने विवेक से कड़ाई से पूछताछ शुरू की, तो विवेक के चेहरे पर न तो कोई खौफ था और न ही अपनी पत्नी को मारने का कोई पछतावा।

जांच अधिकारी ने पूछा: “विवेक, तुमने अपनी ही पत्नी की इतनी बेरहमी से कु/ल्हाड़ी से काटकर ह/त्या क्यों की? वह भी तब जब उसने सात दिन पहले ही एक बच्चे को जन्म दिया था?”

विवेक ने ठंडे स्वर में पुलिस के सामने पूरी दास्तान बयान करना शुरू किया। उसने अपनी शादी के तीन साल बाद संतान न होने, शहर के डॉक्टर द्वारा अपनी नपुंसकता (0% स्पर्म) की रिपोर्ट मिलने, दिल्ली जाने, ससुर द्वारा नौकर रजनीश को रखने, रीटा के गर्/भवती होने, गोरे बच्चे के जन्म लेने और रात में कु/ल्हाड़ी की नोक पर रीटा द्वारा रजनीश व संजय के साथ अ/वैध संबंधों के कबूलनामे की पूरी कहानी सच-सच बता दी।

जब पुलिस अधिकारियों ने विवेक के इस पूरे बयान को सुना और उसके द्वारा पेश की गई डॉक्टर की मेडिकल रिपोर्ट देखी, तो पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ गए।

जांच अधिकारी दंग रह गए कि कैसे एक निर्दोष दिखने वाले नौकर और व्यभिचारी पत्नी के अ/वैध संबंधों ने एक हँसते-खेलते परिवार को पूरी तरह तबाह कर दिया।

पुलिस ने विवेक के बयान के आधार पर तुरंत कार्रवाई करते हुए दुकान के नौकर रजनीश और उसके दोस्त संजय को भी जांच के दायरे में लिया। पुलिस ने आरोपी विवेक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की गंभीर धाराओं के तहत ह/त्या (Section for Murder) का मामला दर्ज कर चार्जशीट (आरोप पत्र) अदालत में दाखिल कर दी है।

निष्कर्ष और विचारणीय प्रश्न

आज विवेक जेल की सलाखों के पीछे अपनी सजा का इंतजार कर रहा है। ज्ञान भूषण का हँसता-खेलता परिवार पूरी तरह उजड़ चुका है। वह नवजात मासूम बच्चा, जो अपनी मां की ममता से वंचित हो गया और जिसका पिता जेल में है, अब अपने बूढ़े दादा ज्ञान भूषण के साए में अनिश्चित भविष्य की ओर देख रहा है।

दोस्तों, राजस्थान के बीकानेर जिले के खाजूवाला गांव में घटी यह सत्य घटनाओं पर आधारित कहानी हमें समाज के कई काले पहलुओं से रूबरू कराती है:

    अविश्वास और व्यभिचार: कैसे क्षणिक वासना और अ/वैध संबंध हंसते-खेलते परिवारों को श्मशान बना देते हैं।
    सत्य को छुपाना: अगर विवेक ने अपनी मेडिकल रिपोर्ट का सच शुरुआत में ही अपनी पत्नी और पिता को बता दिया होता, तो शायद यह नौबत न आती।
    कानून को हाथ में लेना: पत्नी का चरित्र चाहे जैसा भी था, विवेक को कानून का सहारा लेना चाहिए था। कु/ल्हाड़ी उठाकर ह/त्या करना किसी समस्या का हल नहीं था।

इस पूरे घटनाक्रम के बारे में आपकी क्या राय है? क्या विवेक द्वारा अपनी पत्नी के साथ किए गए इस का/ंड को आप सही मानते हैं या गलत? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

जय हिंद, वंदे मातरम!

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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