पत्नी से परेशान होकर पति ने गलत कदम उठाया/अंजाम ठीक नहीं हुआ/ – News

पत्नी से परेशान होकर पति ने गलत कदम उठाया/अंजाम ठीक नहीं हुआ/

पत्नी से परेशान होकर पति ने गलत कदम उठाया/अंजाम ठीक नहीं हुआ/

पत्नी से परेशान होकर पति ने उठाया गलत कदम: उदयपुर का वो सच जिसने सबको हैरान कर दिया

प्रस्तावना: बावली गाँव का वैभव और अमरपाल सिंह का अतीत

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमाओं से सटे राजस्थान राज्य के खूबसूरत और ऐतिहासिक जिले उदयपुर की छटा देखते ही बनती है। उदयपुर जिले के अंतर्गत बसा हुआ एक प्राचीन और शांत गाँव है—बावली। बावली गाँव अपनी उपजाऊ कृषि भूमि, अरावली की पहाड़ियों की ओट में बसे लहलहाते खेतों और देहाती परंपराओं के लिए जाना जाता था। गाँव की सुबह पक्षियों के कलरव और भोर की पहली किरण के साथ शुरू होती थी, जहाँ किसान अपने बैलों और हल-ट्रैक्टरों के साथ खेतों की ओर निकल पड़ते थे।

इसी बावली गाँव का सबसे धनी, प्रतिष्ठित और प्रभावशाल व्यक्ति था अमरपाल सिंह। अमरपाल सिंह के पास गाँव में २६ एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि थी। उसके पास धन-दौलत, आलीशान पक्की हवेली, राजनीतिक पकड़ और सामाजिक रुतबा सब कुछ था। गाँव का कोई भी गरीब या ज़रूरतमंद व्यक्ति जब भी किसी मुसीबत में पड़ता, तो अमरपाल सिंह उसकी आर्थिक मदद करने में कभी पीछे नहीं हटता था। इसी कारण गाँव के सभी लोग अमरपाल सिंह का अत्यधिक आदर और सम्मान किया करते थे।

लेकिन वक्त का पहिया हमेशा एक सा नहीं रहता। कुछ वर्ष पूर्व अमरपाल सिंह की धर्मपत्नी का अचानक असाध्य बीमारी के कारण निधन हो गया। पत्नी के देहांत के बाद अमरपाल सिंह का जीवन पूरी तरह बदल गया। घर का अनुशासन छिन्न-भिन्न हो गया और अमरपाल सिंह अंदर से अकेला और उच्छृंखल होता चला गया।

पत्नी की मृत्यु के पश्चात अमरपाल सिंह का आचरण बुरी तरह भटक गया। वह अपनी मर्यादा भूलकर /श/रा/ब/, /क/बा/ब/ और /श/बा/ब/ का आदी हो गया। उसके जीवन में अब नैतिकता का कोई स्थान नहीं बचा था। वह गाँव की गरीब, बेबस और असहाय महिलाओं को पैसों का लालच देकर या उनकी मजबूरियों का नाजायज़ फायदा उठाकर अपने सुनसान खेतों की नलकूप (ट्यूबवेल) वाली कोठरी में ले जाता था। वहाँ वह उनके साथ /अ/नै/ति/क/ और /गं/दा/ /का/म/ किया करता था। गाँव के लोग उसके धन और रुतबे के डर से मुँह बंद रखने में ही अपनी भलाई समझते थे।

अमरपाल सिंह के परिवार में उसका केवल एक इकलौता बेटा था, जिसका नाम था रजनीश

अध्याय १: कर्मठ बेटा, सुंदर बहू और सालगिरह का विवाद

रजनीश स्वभाव से अपने पिता से बिल्कुल भिन्न था। वह एक बेहद मेहनती, सीधा-साधा, ईमानदार और सच्चा लड़का था। जब से रजनीश ने होश संभाला था, उसने अपने पिता की २६ एकड़ ज़मीन पर कोहलू के बैल की तरह दिन-रात पसीना बहाकर मेहनत करना शुरू कर दिया था। रजनीश सुबह ४:०० बजे खेत में पहुँच जाता और देर रात तक फ़सल की सिंचाई, बुवाई और कटाई में लगा रहता।

जब से रजनीश ने खेती-बाड़ी का पूरा काम अपने हाथों में लिया था, तब से अमरपाल सिंह की पैदावार और कमाई दोगुनी हो चुकी थी। रजनीश ने अपनी कढ़ी मेहनत के बल पर घर में कभी पैसों की कमी नहीं होने दी। परंतु इसके बावजूद उसका पिता अमरपाल सिंह कभी अपने बेटे की प्रशंसा नहीं करता था। अमरपाल सिंह अपने बेटे को नौकरों की तरह समझता था। रजनीश जब भी अपने निजी खर्च या जेब खर्च के लिए अपने पिता से थोड़े-बहुत पैसे माँगता, तो अमरपाल सिंह उसे भरी सभा में डांट-डपटकर भगा देता था।

लगभग तीन साल पहले अमरपाल सिंह ने अपने बेटे रजनीश का विवाह पास के ही एक गाँव की बेहद सुंदर और आकर्षक युवती पूनम से करवाया था।

पूनम देखने में अप्सरा जैसी रूपवती, गोरे रंग और तीखे नैन-नक्श वाली महिला थी। घर आने के बाद पूनम झाड़ू-पोछा, चूल्हा-चौका और घर के बाकी कामों में व्यस्त रहती थी। परंतु पूनम अपने पति रजनीश को दिल से बिल्कुल भी पसंद नहीं करती थी। इसका मुख्य कारण यह था कि रजनीश का रंग अत्यधिक /का/ला/ था और वह एक सीधा-साधा देहाती किसान था। पूनम हमेशा अपने मन में यह सोचकर कुढ़ती रहती थी कि उसकी सुंदरता के सामने उसका पति बिल्कुल भी मेल नहीं खाता।

आगे चलकर यही पूनम अपने ससुर अमरपाल सिंह के साथ मिलकर कई बड़े-बड़े कांड करने वाली थी। परंतु पूनम के कांड करने से पहले ही उसका ससुर अमरपाल सिंह दो बड़े कांड कर बैठता है।

अध्याय २: २ जनवरी २०२६ — सालगिरह, सोने का हार और इनकार

दिन बीतते जा रहे थे कि तभी तारीख आई २ जनवरी २०२६

सुबह के लगभग ८:०० बजे का समय था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। रजनीश खेत में जाने के लिए तैयार हो रहा था कि तभी उसकी पत्नी पूनम उसके पास आई।

पूनम ने मुँह बनाकर रुखे स्वर में कहा, “देखो रजनीश! आज हमारी शादी की तीसरी सालगिरह है। पिछले दो-तीन सालों से मैं तुमसे लगातार कह रही हूँ कि मुझे एक सोने का नौलखा हार खरीद कर दे दो। गाँव की दूसरी औरतों के पास देखो कितने अच्छे-अच्छे गहने हैं, और एक मैं हूँ जो खाली हाथ घूमती हूँ।”

रजनीश ने बेबसी से अपनी पत्नी की तरफ देखा और नम्रता से कहा, “पूनम! तुम तो जानती हो कि खेती का सारा हिसाब-किताब और तिजोरी की चाबी पिताजी के पास रहती है। मेरे पास अपने खुद के पैसे नहीं हैं। सोने का हार खरीदने के लिए मुझे पिताजी से बात करनी पड़ेगी।”

पूनम ने झल्लाते हुए कहा, “तो जाओ न! अपने पिता से बात करो। आज हमारी सालगिरह है, क्या वह अपनी बहू के लिए इतना भी नहीं कर सकते?”

रजनीश तुरंत अपनी हवेली के मुख्य बैठक में गया जहाँ उसके पिता अमरपाल सिंह हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। रजनीश ने हाथ जोड़कर संकोच के साथ कहा, “पिताजी! आज मेरी और पूनम की शादी की सालगिरह है। पूनम एक सोने का हार माँग रही है। मुझे थोड़े पैसों की ज़रूरत थी।”

अमरपाल सिंह ने जैसे ही सोने के हार की बात सुनी, उसका पारा चढ़ गया। उसने हुक्के की नली एक तरफ पटकी और गरजते हुए कहा, “क्या कहा? सोने का हार? तुम्हारी पत्नी पूनम के पास पहले से ही शादी के ढेर सारे गहने पड़े हैं! वह दिन-रात बेफिजूल खर्च करने के सपने देखती रहती है। मेरे पास कोई फालतू पैसा नहीं है कि मैं तुम्हारी पत्नी के शौक पूरे करने के लिए सोने के हार खरीदूँ! चुपचाप अपने काम पर जाओ!”

रजनीश नीची गर्दन किए चुपचाप वहाँ से हट गया। वह वापस अपने कमरे में आया और पूनम से कहा, “पूनम, पिताजी ने पैसे देने से साफ मना कर दिया है। वे कह रहे हैं कि अभी कोई नया हार नहीं बनेगा।”

पूनम का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने रजनीश को ताना मारते हुए कहा, “तुम पुरुष कहलाने लायक ही नहीं हो! अपने पिता के सामने एक शब्द बोल नहीं सकते। ना तुम्हारे पास रूप-रंग है और ना ही तुम्हारी कोई औकात है!”

रजनीश अपनी पत्नी के कड़वे बोल सुनकर अंदर तक आहत हो गया और उदास मन से कमरे के कोने में बैठ गया।

अध्याय ३: विधवा रूपा का आगमन और ५० हज़ार का सौदा

दोनों पति-पत्नी उदास और परेशान बैठे ही थे कि तभी उनके घर में पड़ोस की एक महिला ने प्रवेश किया। उस महिला का नाम था रूपा

रूपा उसी गाँव की एक गरीब विधवा महिला थी। कुछ साल पहले उसके पति की मृत्यु हो गई थी और उसके घर में कोई कमाने वाला नहीं था। रूपा देखने में काफी आकर्षक, गोरे रंग और छरहरे बदन वाली महिला थी।

रूपा जैसे ही घर के आंगन में दाखिल हुई, वहाँ बैठक में बैठे ससुर अमरपाल सिंह की नज़रें उस पर जा टिकीं। रूपा की ढली उम्र की सुंदरता को देखकर अमरपाल सिंह के अंदर का दानव और उसकी हवस हिलोरे मारने लगी। अमरपाल सिंह की आँखें रूपा के शरीर पर टिक गईं।

अमरपाल सिंह ने तुरंत अपनी बहू पूनम को आवाज़ लगाई, “पूनम! ज़रा जल्दी से रूपा के बैठने के लिए एक अच्छी सी कुर्सी लेकर आओ!”

पूनम तुरंत अंदर से एक लकड़ी की कुर्सी उठाकर लाई।

इसके बाद अमरपाल सिंह ने अपने बेटे रजनीश पर रौब झाड़ते हुए कहा, “रजनीश! देख क्या रहा है? जल्दी से इस कुर्सी को अपने साफ़ कपड़े से पोछकर साफ़ कर!”

रजनीश ने चुपचाप अपने गमछे से कुर्सी की धूल साफ़ कर दी। अमरपाल सिंह ने बड़े ही प्यार और मिठास भरे स्वर में रूपा से कहा, “आइए रूपा जी! इस कुर्सी पर बैठिए। बताइए आज हमारे घर कैसे आना हुआ?”

रूपा कुर्सी पर बैठ गई और संकोच करते हुए बोली, “जमींदार साहब! आप तो जानते हैं कि मैं एक अकेली विधवा औरत हूँ। मेरे घर में कोई कमाने वाला नहीं है। मुझे अपने घर के लिए एक वाशिंग मशीन और एक छोटा फ्रिज खरीदना है। इसके लिए मुझे ₹५०,००० की बहुत सख्त ज़रूरत है। अगर आप मुझे उधार दे दें, तो मैं धीरे-धीरे करके चुका दूँगी।”

जैसे ही ₹५०,००० की बात सामने आई, अमरपाल सिंह के चेहरे पर एक शैतानी मुस्कान तैर गई।

अमरपाल सिंह ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए कहा, “अरे रूपा जी! ₹५०,००० की क्या बात करती हैं? मैं आपको ₹५०,००० दे दूँगा, आपको किसी बात की फिक्र करने की ज़रूरत नहीं है। लेकिन… मैं यह पैसे आज रात के समय खुद आपके घर लेकर आऊँगा। तब बैठकर इत्मीनान से बात करेंगे।”

रात के समय घर आने की बात सुनते ही विधवा रूपा तुरंत समझ गई कि यह अय्याश जमींदार अमरपाल सिंह ₹५०,००० के बदले उससे क्या चाहता है।

रूपा ने अपनी आँखें मटकाते हुए मुस्कुराकर कहा, “ठीक है जमींदार साहब! मैं आज रात आपके आने का बेसब्री से इंतज़ार करूँगी। आप ज़रूर आइएगा।”

इतना कहकर रूपा मुस्कुराते हुए घर से बाहर निकल गई।

अध्याय ४: पूनम के मन का षड्यंत्र और पहली /अ/वै/ध/ रात

दूसरी तरफ, कमरे के दरवाजे के पीछे खड़ी बहू पूनम यह सब कुछ देख और सुन रही थी।

पूनम के मन में विचारों का बवंडर उठने लगा। पूनम सोचने लगी, ‘यह ससुर भी कितना बड़ा ठरकी और रंगीन मिज़ाज आदमी है! अपने सगे बेटे और बहू को एक सोने का हार दिलवाने के लिए इसके पास पैसे नहीं हैं, लेकिन पड़ोस की इस रंडी-विधवा औरत को एक रात के लिए ₹५०,००० नकद देने को तुरंत तैयार हो गया! इसके पास पैसों और ज़मीन की कोई कमी नहीं है, बस इसे औरत की भूख है।’

पूनम के दिमाग में लालच और हवस का एक घिनौना प्लान पकने लगा। उसने मन ही मन सोचा कि अगर वह अपने सीधे-साधे /का/ले/ पति रजनीश के भरोसे बैठी रही, तो जिंदगी भर कंगाली और सादगी में ही सड़ती रहेगी। लेकिन अगर उसने अपने इस अय्याश ससुर अमरपाल सिंह को अपने रूप के जाल में फाँस लिया, तो घर की तिजोरी की चाबी और सारे गहने उसके कदमों में होंगे।

रात के करीब १०:०० बजे का समय हो चुका था। गाँव में सन्नाटा पसर गया था।

अमरपाल सिंह ने जेब में ₹५०,००० नकद रखे, अपनी शाल ओढ़ी और चुपचाप हवेली से निकलकर विधवा रूपा के घर की ओर चल दिया।

रूपा के घर का दरवाजा अंदर से हल्का सा खुला था। अमरपाल सिंह जैसे ही अंदर गया, रूपा ने दरवाजा बंद कर लिया। उस रात बंद कमरे में ५५ वर्षीय जमींदार अमरपाल सिंह और विधवा रूपा के बीच आपसी रजामंदी से /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ /स/म्बंध/ स्थापित हुए। अमरपाल सिंह ने अपनी हवस पूरी की और बदले में ₹५०,००० नकद रूपा की हथेली पर रख दिए।

तड़के ३:०० बजे अमरपाल सिंह वापस अपनी हवेली लौटा। लेकिन उसे अंदाज़ा नहीं था कि छत की मुंडेर से पूनम उसे देख रही थी।

अध्याय ५: ससुर और बहू का /अ/नै/ति/क/ मिलन

अगले ही दिन, ३ जनवरी २०२६ की रात को एक नया घटनाक्रम शुरू हुआ।

रजनीश रोज़ की तरह कड़ाके की ठंड में अपने खेतों में गन्ने की फसल की सिंचाई (पानी लगाने) के लिए रात की पाली में चला गया। घर पर केवल ससुर अमरपाल सिंह और बहू पूनम अकेले थे।

रात के लगभग ११:०० बज रहे थे। ससुर अमरपाल सिंह अपने कमरे में /श/रा/ब/ के पैग लगा रहा था।

तभी पूनम ने एक पारदर्शी, सुंदर साड़ी पहनी, हल्का श्रृंगार किया और अपने बाल खोलकर सीधे अपने ससुर के कमरे में दाखिल हो गई। उसके हाथ में गरम दूध का गिलास था।

अमरपाल सिंह ने जब अपनी नवविवाहिता बहू को इस रूप में रात के ११:०० बजे अपने कमरे में देखा, तो उसकी शराब से धुंधली आँखें फटी की फटी रह गईं। पूनम का गोरा बदन और उसकी कातिल अदाएं देखकर अमरपाल सिंह के मुँह से लार टपकने लगी।

पूनम ने बड़े ही कामुक और लच्छेदार स्वर में कहा, “पिताजी! आप इतनी देर रात तक शराब पीते हैं और अपना ध्यान नहीं रखते। मैं आपके लिए गरम दूध लाई हूँ।”

अमरपाल सिंह ने पूनम की कलाई थाम ली और कांपते स्वर में कहा, “पूनम! तुम रात के इस पहर में मेरे कमरे में…?”

पूनम ने बिना किसी हिचकिचाहट के ससुर की गोद में बैठते हुए कहा, “पिताजी, मैं जानती हूँ कि आप अंदर से बहुत अकेले हैं। आपका बेटा रजनीश तो बिल्कुल /का/ला/ और गँवार है, उसे तो औरत को खुश करने का तरीका भी नहीं आता। अगर आप मुझे खुश रखेंगे, तो मैं आपकी हर इच्छा पूरी करूँगी।”

अमरपाल सिंह का जमीर तो पहले ही मर चुका था। अपनी सगी बहू के मुँह से ऐसा खुला प्रस्ताव सुनकर उसका बचा-कुचा संयम भी टूट गया।

अमरपाल सिंह ने तुरंत अपनी लोहे की तिजोरी खोली और उसमें से सोने की दो भारी चूड़ियाँ और ५० हजार रुपये नकद निकालकर पूनम के हाथों में थमा दिए।

इसके बाद, उस हवेली के बंद कमरे में ससुर अमरपाल सिंह और बहू पूनम के बीच सभी नैतिक मर्यादाओं को तार-तार करते हुए /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ /स/म्बंध/ कायम हुए। दोनों अपनी हवस और लालच की आग में जलते रहे।

अब यह रोज का नियम बन गया। जब भी रजनीश रात को खेत में पानी लगाने जाता, पीछे से ससुर अमरपाल सिंह और बहू पूनम एक-दूसरे के साथ रात बिताते। अमरपाल सिंह अपनी बहू को रोज़ नए-नए गहने, महंगे कपड़े और पैसे देता रहा।

अध्याय ६: रजनीश का शक और पूनम का बदला हुआ रूप

दिन बीतते गए, लेकिन पाप का घड़ा छुपाए नहीं छुपता।

रजनीश ने ध्यान देना शुरू किया कि उसकी पत्नी पूनम के पास अचानक नए-नए सोने के गहने कहाँ से आने लगे हैं। पूनम का व्यवहार अपने पति के प्रति और भी ज़्यादा जहरीला और अपमानजनक हो चुका था। वह अब रजनीश को छूने तक नहीं देती थी और बात-बात पर उसे “काला कलूटा”, “गँवार” और “दरिद्र” कहकर ताने मारती थी।

इतना ही नहीं, रजनीश जब भी दिन में थका-हारा घर लौटता, तो वह देखता कि उसकी पत्नी पूनम उसके पिता अमरपाल सिंह के साथ बहुत ही अश्लील और बेझिझक मज़ाक करती रहती थी। दोनों की आँखों में एक-दूसरे के प्रति एक अजीब सा अनैतिक खिंचाव साफ दिखता था।

रजनीश के मन में शक का कीड़ा रेंगने लगा। उसे अपने ही पिता और अपनी ही पत्नी पर घिनौना संदेह होने लगा।

तारीख आ गई ८ जनवरी २०२६

शाम के समय रजनीश ने अपने पिता से कहा, “पिताजी, आज रात मैं खेत पर सिंचाई करने जा रहा हूँ, शायद सुबह ६:०० बजे तक लौटूँ।”

अमरपाल सिंह ने खुश होकर कहा, “हाँ-हाँ बेटा! बेफिक्र होकर जाओ, खेत का काम बहुत ज़रूरी है।”

लेकिन यह रजनीश का एक जाल था। रजनीश खेत पर जाने का नाटक करके गाँव के ही अपने एक दोस्त के घर रुक गया।

रात के करीब १२:०० बजे, कड़ाके की ठंड और घने कोहरे के बीच रजनीश चुपचाप दबे पाँव अपनी हवेली के पीछे वाले दरवाज़े से अंदर दाखिल हुआ। हवेली में पूरी तरह सन्नाटा छाया हुआ था।

रजनीश रेंगते हुए अपने पिता अमरपाल सिंह के कमरे की खिड़की के पास पहुँचा। खिड़की के परदे थोड़े हटे हुए थे और अंदर की लाइट जल रही थी।

जब रजनीश ने खिड़की के अंदर झाँका, तो जो नज़ारा उसकी आँखों ने देखा, उसे देखकर उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई! उसके शरीर का सारा खून जैसे जम गया!

कमरे के अंदर उसका सगा पिता अमरपाल सिंह और उसकी सगी पत्नी पूनम बिना कपड़ों के एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ /स/म्बंध/ बना रहे थे! पूनम अपने ससुर के सीने से लगी हुई हँस रही थी और रजनीश के काले रंग का मज़ाक उड़ा रही थी।

रजनीश का दिल पूरी तरह टूटकर बिख़र गया। जिस पिता की उसने दिन-रात गुलामी की, जिस पत्नी को उसने अपनी पलकों पर बैठाया, वे दोनों मिलकर उसकी पीठ में इतना बड़ा छुरा घोंप रहे थे!

रजनीश के सिर पर खून सवार हो गया। लेकिन उसने उस वक्त कोई हंगामा नहीं किया। वह दबे पाँव बाहर निकल आया और खेत की ओर चला गया। पूरी रात वह कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे बैठकर रोता रहा और घुटता रहा। उसके मन में अपने पिता और अपनी पत्नी के प्रति केवल और केवल खौफनाक नफ़रत और प्रतिशोध की ज्वाला जल रही थी।

अध्याय ७: १० जनवरी २०२६ — खौफनाक षड्यंत्र और कुल्हाड़ी का तांडव

रजनीश का जमीर अब मर चुका था। अत्यधिक अपमान, पत्नी की बेवफ़ाई और पिता के विश्वासघात ने सीधे-साधे रजनीश को एक खौफनाक दरिंदे में बदल दिया था। उसने तय कर लिया था कि वह इन दोनों को कभी माफ़ नहीं करेगा और इस पाप की लीला का अंत अपने हाथों से करेगा।

तारीख आई १० जनवरी २०२६

दिनभर रजनीश ने अपने चेहरे पर बिल्कुल सामान्य भाव रखे। उसने किसी को आभास नहीं होने दिया कि उसे सब सच पता चल चुका है।

रात के लगभग ९:०० बजे, रजनीश ने खाना खाया। उसने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मेरी तबीयत थोड़ी खराब लग रही है, मैं आज ऊपर वाले कमरे में सोने जा रहा हूँ।”

अमरपाल सिंह और पूनम मन ही मन खुश हुए कि आज रात भी उन्हें एकांत मिल जाएगा।

रात के ११:३० बज चुके थे। हवेली में गहरा सन्नाटा छाया हुआ था।

रजनीश ऊपर वाले कमरे से चुपचाप नीचे उतरा। उसके हाथ में लकड़ी काटने वाली लोहे की बेहद तेज और भारी कुल्हाड़ी (Axe) थी। रजनीश की आँखें गुस्से से लाल थीं और उसका पूरा शरीर कांप रहा था।

रजनीश दबे पाँव अपने पिता के कमरे के दरवाजे पर पहुँचा। दरवाजा हल्का सा अटका हुआ था।

रजनीश ने धीरे से दरवाजा धकेला और अंदर दाखिल हुआ। कमरे में डिम लाइट जल रही थी। बिस्तर पर उसका पिता अमरपाल सिंह और उसकी पत्नी पूनम एक ही रज़ाई के अंदर बेसुध सो रहे थे। दोनों एक-दूसरे की बाहों में जकड़े हुए थे।

इस नज़ारे को देखते ही रजनीश का दिमाग पूरी तरह सनक गया। उसकी सहने की क्षमता खत्म हो चुकी थी।

रजनीश ने दोनों हाथों से भारी कुल्हाड़ी को ऊपर उठाया और पूरी ताकत लगाकर सोए हुए ससुर/पिता अमरपाल सिंह की गर्दन पर पहला वार कर दिया!

“छपाक!”

एक ही वार में अमरपाल सिंह की गर्दन आधी कट गई और खून का फव्वारा सीधे छत तक उछला! अमरपाल सिंह की चीख भी गले में ही दबकर रह गई और उसने तड़प-तड़पकर मौके पर ही दम तोड़ दिया।

खून के छींटे पड़ते ही पास सो रही पूनम की आँख खुल गई। जब उसने अपने ससुर को खून से लथपथ तड़पते देखा और सामने हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी लिए अपने पति रजनीश को खड़ा देखा, तो उसकी रूह काँप गई!

पूनम चीखते हुए बिस्तर से उठी और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगी, “रजनीश! मुझे माफ़ कर दो! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई! मुझे मत मारो, मैं तुम्हारी दासी बनकर रहूँगी!”

लेकिन रजनीश पर अब किसी दया या याचना का असर होने वाला नहीं था।

रजनीश ने गर्जना करते हुए कहा, “राक्षसी! तूने मेरी वफ़ा का यह सिला दिया? तूने मुझे मेरे ही घर में ज़लील किया!”

पूनम भागकर कमरे के कोने में पहुँची, लेकिन रजनीश ने लपककर उसके बालों को पकड़ा और उसे ज़मीन पर पटक दिया। रजनीश ने बिना एक पल गँवाए कुल्हाड़ी का धारदार वार सीधे पूनम के चेहरे और गर्दन पर कर दिया!

“धाड़! धाड़!”

रजनीश ने हैवान बनकर अपनी पत्नी पूनम पर कुल्हाड़ी से एक के बाद एक दर्जनों वार किए। उसने अपनी ही पत्नी के शरीर के कई /टु/क/ड़े-टु/क/ड़े/ कर डाले! कमरे की दीवारें, फर्श और बिस्तर पूरी तरह खून से पट गए।

महज़ ५ मिनट के भीतर रजनीश ने अपने पिता अमरपाल सिंह और अपनी पत्नी पूनम दोनों को मौत के घाट उतार दिया था। डबल /ह/त्या/ कांड को अंजाम देने के बाद कमरे में केवल सन्नाटा और खून की बदबू बची थी।

अध्याय ८: आत्मसमर्पण, पुलिस जाँच और गाँव में सन्नाटा

हत्याकांड को अंजाम देने के बाद रजनीश ने कुल्हाड़ी ज़मीन पर फेंक दी। उसके कपड़े, चेहरा और हाथ पूरी तरह खून से सने हुए थे। लेकिन उसके चेहरे पर न तो कोई डर था और न ही कोई पछतावा। वह शांत भाव से अपने कमरे में गया, पानी से अपना मुँह धोया और सीधे पैदल चलते हुए बावली गाँव के निकटतम पुलिस स्टेशन की ओर निकल पड़ा।

रात के लगभग १:०० बजे, खून से लथपथ रजनीश पुलिस थाने में दाखिल हुआ।

थाने में ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी आधी रात को इस खौफनाक मंज़र को देखकर घबरा गए और अपनी बंदूकें संभाल लीं।

रजनीश ने बड़े ही शांत और ठंडे स्वर में अपने दोनों हाथ आगे बढ़ा दिए और कहा, “साहब! मुझे गिरफ्तार कर लीजिए। मैंने अपने सगे पिता अमरपाल सिंह और अपनी पत्नी पूनम की कुल्हाड़ी से काटकर /ह/त्या/ कर दी है। दोनों की /ला/शें/ हमारी हवेली के नीचे वाले कमरे में पड़ी हैं।”

थानेदार तुरंत हरकत में आए। पुलिस की एक भारी टीम गाड़ियों के साथ अमरपाल सिंह की हवेली पहुँची। जब पुलिस ने कमरे का दरवाजा खोला, तो अंदर का खौफनाक और विभत्स दृश्य देखकर कठोर से कठोर पुलिसवालों की भी रूह काँप गई। चारों तरफ खून का पोखरा बना हुआ था और दो शव बुरी तरह कटे-फटे पड़े थे।

पुलिस ने मौके से खून से सनी कुल्हाड़ी बरामद की, फॉरेंसिक टीम ने साक्ष्य जुटाए और दोनों शवों को सील करके पोस्टमार्टम के लिए उदयपुर जिला अस्पताल भेज दिया।

पूरे बावली गाँव और उदयपुर जिले में यह खबर आग की तरह फैल गई। जो अमरपाल सिंह गाँव का सबसे धनी और सम्मानित व्यक्ति माना जाता था, उसका और उसकी बहू का ऐसा खौफनाक अंत सुनकर हर कोई हैरान रह गया।

उपसंहार: न्याय, पछतावा और सामाजिक सीख

पुलिस ने रजनीश को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा १०३ (हत्या) के तहत गिरफ्तार करके अदालत में पेश किया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया।

जेल की सलाखों के पीछे बैठा रजनीश आज अपने किए पर नहीं, बल्कि अपनी किस्मत पर रोता है। एक हंसता-खेलता परिवार, २६ एकड़ ज़मीन और अकूत संपत्ति सब कुछ पल भर में अनैतिकता, हवस, लालच और बेवफ़ाई की बलि चढ़ गया।

कहानी से मिलने वाली सामाजिक सीख:

यह खौफनाक सत्य घटना समाज के सामने कई कड़े और गंभीर सवाल खड़े करती है:

१. अनैतिकता का अंत केवल विनाश है: अमरपाल सिंह का अपनी बहू के साथ /अ/नै/ति/क/ आचरण और हवस ही उसके भयानक अंत का कारण बनी। धन और शक्ति कभी भी पाप को छुपा नहीं सकती। २. वैवाहिक जीवन में वफ़ादारी: पूनम ने बाहरी चमक-धमक, गहनों और हवस के लालच में आकर अपने पति के साथ विश्वासघात किया, जिसकी कीमत उसे अपनी दर्दनाक मौत देकर चुकानी पड़ी। ३. क्रोध और प्रतिशोध की तबाही: रजनीश ने कानून को हाथ में लेकर जो गलत कदम उठाया, उसने उसकी अपनी जिंदगी भी पूरी तरह बर्बाद कर दी।

आज अमरपाल सिंह की वह आलीशान हवेली सुनसान और वीरान पड़ी है। गाँव के लोग जब भी उस हवेली के पास से गुज़रते हैं, तो उन्हें उस खौफनाक रात की याद आ जाती है जो इंसान के नैतिक पतन और हवस की अंतिम परिणति की गवाही देती है।

विशेष सचेतक संदेश: अनैतिकता, लालच और व्यभिचार केवल तबाही और मौत के रास्ते खोलते हैं। हमेशा नैतिक मूल्यों, मर्यादा और कानून का पालन करें।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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