देवर ने भाभी संग कर दिया बड़ा कां**ड/भाभी की हुई मौ**त/
देवर ने भाभी संग कर दिया बड़ा कां**ड/भाभी की हुई मौ**त/
एक खौफनाक रात: लालच, वासना और विश्वासघात की कहानी
उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में बसा रसूलपुर एक साधारण सा गांव है। बाहर से देखने पर यह गांव बिल्कुल शांत और सामान्य लगता है, लेकिन इसी गांव की एक चारदीवारी के पीछे एक ऐसी खौफनाक और दिल दहला देने वाली कहानी ने जन्म लिया, जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। यह कहानी है गायत्री देवी की, एक ऐसी बेबस महिला जिसकी जिंदगी संघर्षों से शुरू होकर एक दर्दनाक अंत पर खत्म हुई।
गायत्री देवी एक बेहद गरीब और सीधी-सादी महिला थी। उसकी जिंदगी में दुखों का पहाड़ तब टूटा था, जब उसके पति अरविंद कुमार की जहरीली शराब पीने के कारण दर्दनाक मौत हो गई थी। अरविंद की मौत ने न सिर्फ गायत्री का सुहाग छीना, बल्कि उसके कंधों पर पूरे परिवार के भरण-पोषण की भारी जिम्मेदारी भी डाल दी। पति की चिता की आग अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि समाज की कड़वी सच्चाई गायत्री के सामने आ खड़ी हुई। गायत्री के परिवार में अब सिर्फ दो लोग बचे थे—उसकी सात साल की मासूम बेटी रूबी और उसका देवर रितेश।
रूबी कक्षा दो में पढ़ती थी। वह पढ़ाई-लिखाई में बहुत तेज और होशियार थी। गायत्री जब भी अपनी बेटी का मासूम चेहरा देखती, तो उसे अपने दर्द सहने की एक नई वजह मिल जाती। वह चाहती थी कि उसकी बेटी पढ़-लिखकर एक अच्छी जिंदगी जिए और उस गरीबी के दलदल से बाहर निकले जिसने उनके परिवार को जकड़ रखा था। घर का खर्च चलाने के लिए गायत्री ने गांव के ही कुछ जमींदारों से कर्ज लिया और अपने छोटे से कच्चे-पक्के घर के एक हिस्से में एक छोटा सा ब्यूटी पार्लर खोल लिया। लेकिन गांव में ब्यूटी पार्लर का काम कुछ खास नहीं चलता था। पूरे दिन इंतजार करने के बाद भी बमुश्किल कुछ ही रुपये हाथ आते थे।
गायत्री की परेशानियों का सबब सिर्फ गरीबी नहीं थी, बल्कि उसका देवर रितेश भी था। रितेश 12वीं कक्षा की परीक्षा में तीन बार फेल हो चुका था और उसने पढ़ाई-लिखाई से पूरी तरह नाता तोड़ लिया था। शुरुआत में उसने कुछ दिन मेहनत-मजदूरी का काम किया, लेकिन जल्द ही वह बुरी संगति में पड़ गया। उसे नशे की भयानक लत लग गई। वह दिन भर जो भी मजदूरी करके कमाता, उसे शाम ढलते ही शराब, जुए और अन्य नशों में उड़ा देता। गायत्री एक बड़ी बहन और मां की तरह उसे हमेशा समझाती थी, “रितेश, तू यह जुआ खेलना और नशा करना बंद कर दे। अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आगे चलकर तेरा भविष्य बर्बाद हो जाएगा, कोई अपनी बेटी भी तुझे नहीं देगा।” लेकिन रितेश पर इन बातों का कोई असर नहीं होता था। वह गायत्री की बातों को एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता।

कुछ समय बाद, रितेश की नशे की लत इतनी बढ़ गई कि लोगों ने उसे मजदूरी पर बुलाना भी बंद कर दिया। जब घर में दाने-दाने के लाले पड़ने लगे और रितेश को अपनी गलती का थोड़ा एहसास हुआ, तो उसने एक दिन गायत्री के सामने हाथ जोड़कर कहा, “भाभी, मुझे माफ कर दो। आज के बाद मैं किसी भी प्रकार का कोई नशा नहीं करूंगा। मैं मन लगाकर मजदूरी करूंगा और घर का सारा खर्च उठाऊंगा।” गायत्री का दिल पसीज गया। उसने एक बार फिर अपने देवर पर विश्वास कर लिया, यह सोचकर कि शायद अब उनके अच्छे दिन आने वाले हैं।
समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा था। एक दिन सुबह के करीब आठ बज रहे थे। रितेश हमेशा की तरह मजदूरी की तलाश में घर से बाहर गया हुआ था और गायत्री घर के कामकाज में व्यस्त थी। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। गायत्री ने जब दरवाजा खोला, तो सामने गांव का एक रसूखदार और अमीर सेठ ऋषिपाल खड़ा था। ऋषिपाल की नजर जैसे ही गायत्री पर पड़ी, उसकी नियत डोल गई। गायत्री भले ही गरीब थी, लेकिन उसकी सुंदरता किसी से छिपी नहीं थी। ऋषिपाल की हवस भरी नजरें गायत्री के शरीर को ऊपर से नीचे तक घूरने लगीं।
गायत्री ने असहज होते हुए पूछा, “सेठ जी, आप यहां सुबह-सुबह? क्या कोई जरूरी काम था?” ऋषिपाल ने अपनी गंदी नजरों को छिपाने की कोशिश करते हुए कहा, “हां गायत्री, मेरे पास कपड़े की दो दुकानें हैं। एक दुकान मैं खुद संभालता हूं और दूसरी मेरी पत्नी ऋतू संभालती है। मेरी दुकान पर तो नौकर हैं, लेकिन ऋतू की दुकान के लिए मुझे एक भरोसेमंद नौकर की जरूरत है। मुझे तुम्हारे हालात पता हैं, इसलिए सोचा कि तुम्हारी मदद कर दूं।”
गायत्री यह सुनकर खुश हो गई। उसने सेठ को आदर के साथ घर के अंदर बुलाया और कहा, “सेठ जी, यह तो बहुत अच्छी बात है। मेरा देवर रितेश अभी काम पर गया है। वह आजकल काम की तलाश में है। अगर आप उसे अपनी दुकान पर रख लें, तो हमारे परिवार की बहुत मदद हो जाएगी।” ऋषिपाल, जिसका असली मकसद तो गायत्री को अपने जाल में फंसाना था, तुरंत मान गया। उसने कहा, “ठीक है, शाम को रितेश को मेरे घर भेज देना। मैं उससे बात कर लूंगा।” यह कहकर ऋषिपाल वहां से चला गया, लेकिन उसकी आंखों में गायत्री को लेकर पनप रही गंदी सोच साफ झलक रही थी।
सेठ के जाने के कुछ घंटों बाद, दोपहर के समय गायत्री नहाने के लिए बाथरूम में गई। उसने दरवाजा बंद किया, लेकिन दरवाजे की कुंडी काफी कमजोर थी। ठीक पांच-छह मिनट बाद, रितेश कहीं से नशा करके घर वापस लौटा। उसकी आदतें सुधरी नहीं थीं, वह सिर्फ दिखावा कर रहा था। घर में सन्नाटा देखकर उसे समझ आ गया कि भाभी बाथरूम में है। रितेश की नजरें हमेशा से अपनी भाभी पर खराब थीं। आज उसने अपनी हदें पार करते हुए जानबूझकर बाथरूम के कमजोर दरवाजे को जोर से खींचा। कुंडी टूट गई और दरवाजा खुल गया।
सामने अपनी भाभी को उस अवस्था में देखकर रितेश हक्का-बक्का रह गया। उसकी आंखों में वासना की आग जल उठी। गायत्री ने जैसे ही रितेश को वहां खड़ा देखा, उसके होश उड़ गए। उसने तुरंत खुद को ढका और गुस्से से आगबबूला होकर चिल्लाई, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई? तुम हमेशा ऐसी गंदी और नीच हरकतें करते हो। तुम्हें शर्म नहीं आती अपनी भाभी के साथ ऐसा करते हुए?” रितेश बिना कुछ कहे वहां से हट गया, लेकिन उसके दिमाग में गंदगी भर चुकी थी।
स्नान करने के बाद गायत्री बाहर आई। वह बहुत डरी हुई और गुस्से में थी, लेकिन घर की मजबूरी ने उसे शांत रहने पर मजबूर कर दिया। उसने रितेश से कहा, “आज गांव के सेठ ऋषिपाल आए थे। उनकी पत्नी की दुकान पर नौकर की जरूरत है। तुम शाम को उनके घर चले जाना, शायद तुम्हें नौकरी मिल जाए।” नशे में धुत रितेश ने कहा, “मैं अभी चला जाता हूं।” लेकिन गायत्री ने उसे रोका और कहा, “शाम को जाना, तब तक तुम्हारा नशा भी उतर जाएगा।”
शाम को छह बजे के करीब रितेश तैयार होकर ऋषिपाल के घर पहुंचा। ऋषिपाल उस वक्त दुकान पर था, और घर में उसकी पत्नी ऋतू देवी अकेली थी। ऋतू देवी देखने में बेहद खूबसूरत थी, लेकिन उसका चरित्र बहुत ही दागदार था। वह अक्सर अपनी दुकान पर काम करने वाले नौकरों के साथ अवैध संबंध बनाती थी। जैसे ही रितेश ने घर के अंदर कदम रखा और ऋतू की नजर उस जवान और कसरती शरीर वाले लड़के पर पड़ी, वह मुस्कुरा उठी।
रितेश भी ऋतू की खूबसूरती देखकर मंत्रमुग्ध हो गया। उसने झिझकते हुए कहा, “मुझे सेठ जी ने काम के सिलसिले में बुलाया था।” ऋतू ने अपनी अदाएं दिखाते हुए कहा, “ऋषिपाल ने तुम्हें जरूर बुलाया था, लेकिन तुम्हें काम मेरी दुकान पर करना होगा। तुम कल से ही आ जाना, मैं तुम्हें हर महीने तेरह हजार रुपये दूंगी।” 13,000 रुपये की बात सुनकर रितेश खुशी से उछल पड़ा। वह तुरंत राजी हो गया और घर आकर अपनी भाभी को यह खुशखबरी दी। गायत्री थोड़ी खुश हुई, लेकिन उसे अपने देवर की गंदी नजर और आदतों का पता था, इसलिए वह मन ही मन डरी हुई भी थी।
अगले दिन से रितेश ने ऋतू की दुकान पर काम करना शुरू कर दिया। सुबह 8 बजे जाता और रात को लौटता। सब कुछ ठीक चल रहा था, लगभग 20 दिन बीत गए। फिर 20 अगस्त 2026 की वह मनहूस सुबह आई। ऋषिपाल ने अपनी पत्नी ऋतू से कहा, “दुकान का माल खत्म हो गया है, मैं कपड़ा खरीदने के लिए दो दिन के लिए दिल्ली जा रहा हूं।” ऋतू अंदर ही अंदर बहुत खुश हुई। उसने मुस्कुराकर पति को विदा किया।
ऋषिपाल के जाते ही ऋतू अपनी दुकान पर पहुंची, जहां रितेश पहले से मौजूद था। ऋतू ने रितेश को पास बुलाकर कहा, “रितेश, मेरे पति दो दिन के लिए दिल्ली गए हैं। मैं चाहती हूं कि तुम ये दो रातें मेरे साथ गुजारो। इसके बदले मैं तुम्हें बहुत सारे पैसे दूंगी।” रितेश एक पल के लिए घबराया, लेकिन पैसों के लालच और वासना ने उसकी मति भ्रष्ट कर दी। वह तुरंत इस गंदे काम के लिए तैयार हो गया।
उस रात 9:30 बजे दुकान बंद करने के बाद ऋतू ने रितेश से कहा, “रात 11 बजे चुपके से मेरे घर आ जाना।” रितेश घर पहुंचा, जल्दी से खाना खाया और सोने का नाटक करने लगा। रात 11 बजते ही वह दबे पांव घर से निकला। गायत्री ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन उसने सोचा कि शायद वह अपने किसी दोस्त से मिलने जा रहा होगा।
रितेश सीधा ऋतू के घर पहुंचा। ऋतू ने दरवाजा खोला और उसे अंदर खींच लिया। उसने रितेश को 2000 रुपये दिए और कहा, “आज रात हम पूरी मौज करेंगे।” दोनों ने सारी रात जिस्मानी हवस का खेल खेला। रात एक बजे के करीब रितेश चुपके से अपने घर वापस आ गया और सो गया।
अगले दिन जब ऋतू दुकान पर आई, तो उसने रितेश से कहा कि आज रात भी उसे घर आना होगा। रितेश तो जैसे इसी ताक में था। रात हुई, और 10:30 बजे रितेश फिर दबे पांव घर से निकला। लेकिन आज गायत्री सोई नहीं थी। उसके मन में शक पैदा हो गया था। उसने फैसला किया कि वह रितेश का पीछा करेगी। गायत्री चुपके-चुपके रितेश के पीछे गई और उसने देखा कि रितेश सीधा सेठानी ऋतू देवी के घर के अंदर गया।
गायत्री को समझते देर नहीं लगी कि क्या चल रहा है। गुस्से से तमतमाई गायत्री सीधे ऋतू के दरवाजे पर पहुंची और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगी। ऋतू ने घबराकर दरवाजा खोला तो सामने गायत्री खड़ी थी। गायत्री ने ऋतू को लताड़ते हुए कहा, “मेरे देवर को अभी बाहर निकाल! अगर तूने दोबारा उसे अपने घर या दुकान पर बुलाया, तो मैं कल ही जाकर पुलिस में तेरी शिकायत करूंगी और तेरे पति को भी सब बता दूंगी।”
यह सुनकर ऋतू के होश उड़ गए। उसने तुरंत रितेश को घर से बाहर निकाला और गायत्री से कहा, “आज के बाद मैं इसे अपनी दुकान पर भी नहीं रखूंगी, मैंने इसे नौकरी से निकाल दिया है।” गायत्री अपने देवर का हाथ पकड़कर उसे घसीटते हुए घर ले आई। उसने रितेश को बहुत फटकार लगाई, “तू पागल हो गया है? अगर सेठ को पता चला तो वह तुझे जान से मार देगा। वह औरत गलत है, तुझे फंसा देगी।” लेकिन रितेश की आंखों पर पट्टी बंधी थी। उसे अपनी भाभी पर बेहद गुस्सा आ रहा था कि उसने उसके मजे में खलल डाला और उसकी नौकरी भी छिनवा दी।
नौकरी छूटने के बाद रितेश फिर से पुराने ढर्रे पर लौट आया। उसने दोबारा नशा करना शुरू कर दिया। 2 सितंबर 2026 की सुबह, रितेश ने गायत्री से 1000 रुपये मांगे। गायत्री ने बेबसी से कहा, “मेरे पास पैसे नहीं हैं। ब्यूटी पार्लर से इतनी कमाई नहीं होती कि मैं तुम्हारी नशे की लत पूरी कर सकूं।” रितेश गुस्से में घर से बाहर निकल गया।
वह अपने नशेड़ी दोस्त बिट्टू के पास पहुंचा। बिट्टू को उस दिन मजदूरी के पैसे मिले थे। दोनों ने मिलकर नशा खरीदा और खेतों में जाकर पूरा दिन शराब और गांजे के नशे में धुत्त रहे। शाम होने पर बिट्टू अपने घर चला गया। रितेश, जो नशे में पूरी तरह अंधा हो चुका था, सीधा ऋतू के घर पहुंचा। उसने दरवाजा खटखटाया। ऋतू ने दरवाजा खोला और रितेश को नशे में धुत देखकर डर गई। उसने कहा, “मेरा पति अंदर है, तुरंत यहां से भाग जा, और दोबारा शक्ल मत दिखाना।” उसने रितेश को धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।
रात के करीब 10 बज चुके थे। अपमानित, बेरोजगार और नशे में धुत्त रितेश लड़खड़ाता हुआ अपने घर पहुंचा। घर का दरवाजा खुला था। वह सीधे अपनी भाभी के कमरे में गया। गायत्री अपनी सात साल की बेटी रूबी के साथ गहरी नींद में सो रही थी। गायत्री की खूबसूरती को देखकर उस हैवान रितेश के दिमाग में एक खौफनाक विचार कौंधा। उसने सोचा, “इस औरत ने मेरी नौकरी छुड़वाई, मेरे मजे छीने, आज मैं इसी के साथ अपनी प्यास बुझाऊंगा।”
वह दबे पांव रसोई में गया और वहां से एक जंग लगा, धारदार चाकू उठा लाया। वह वापस कमरे में आया और उसने वह चाकू सोती हुई गायत्री की गर्दन पर रख दिया। ठंडे लोहे के स्पर्श से गायत्री की आंख खुली। सामने अपने देवर को आंखों में खून और हाथ में चाकू लिए देखकर उसकी रूह कांप गई। रितेश ने फुसफुसाते हुए कहा, “चुपचाप मेरे कमरे में चल, वरना तेरा और तेरी बेटी का गला यहीं रेत दूंगा।”
बेटी की जान के डर से बेबस गायत्री को उस हैवान के साथ उसके कमरे में जाना पड़ा। कमरे में पहुंचते ही रितेश ने दरवाजा बंद कर दिया। उसने एक चुन्नी से गायत्री के हाथ-पैर बांध दिए और उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि वह चीख न सके। गायत्री रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, हाथ जोड़ती रही, लेकिन उस शैतान के दिल में कोई रहम नहीं आया। रितेश ने अपनी ही भाभी के साथ बर्बरता पूर्वक बलात्कार किया।
अपनी हवस पूरी करने के बाद उसने गायत्री के बालों को पकड़कर कहा, “अगर यह बात तूने किसी को बताई, पुलिस को या पड़ोसियों को, तो मैं तुझे और तेरी उस बेटी को जिंदा गाड़ दूंगा। मुझे अब कोई फर्क नहीं पड़ता।” गायत्री खून के आंसू रोते हुए अपने कमरे में वापस आ गई। वह पूरी तरह टूट चुकी थी। उसे पता था कि नशे की हालत में रितेश सच में उसकी बेटी को मार सकता है। समाज के डर और बेटी की जान की खातिर उसने घूंट पीकर खामोश रहना ही बेहतर समझा।
इसके बाद तो रितेश बेलगाम हो गया। जब भी उसका मन करता, वह गायत्री को डरा-धमका कर अपने कमरे में बुलाता और उसके शरीर को नोचता। गायत्री एक जिंदा लाश बन चुकी थी। वह अंदर ही अंदर घुट रही थी, लेकिन उसकी मजबूरी का कोई अंत नजर नहीं आ रहा था।
16 सितंबर 2026 की शाम। रितेश ने फिर से गायत्री से नशे के लिए पैसे मांगे। गायत्री ने साफ इंकार कर दिया, “मेरे पास एक फूटी कौड़ी नहीं है, कहीं से उधार मांग ले।” रितेश गुस्से में पैर पटकता हुआ बाहर चला गया। उसने फिर से अपने दोस्त बिट्टू को फोन किया और दोनों नदी के किनारे बैठकर नशा करने लगे। रात के 9 बज गए। दोनों बहुत ज्यादा नशे में थे। बिट्टू अपने घर चला गया और रितेश अपने घर लौट आया।
घर आकर रितेश ने देखा कि गायत्री सो चुकी है। उसने गायत्री को झकझोर कर उठाया और कहा, “चल मेरे कमरे में।” गायत्री के सब्र का बांध अब टूट चुका था। वह रोज-रोज घुट कर मरने से थक चुकी थी। उसने सोच लिया था कि आज या तो वह रहेगी या यह शैतान।
गायत्री चुपचाप उठी, लेकिन कमरे में जाने से पहले उसने रसोई से एक तेज धार वाला चाकू अपनी साड़ी के पल्लू में छिपा लिया। वह रितेश के कमरे में पहुंची। रितेश ने जैसे ही दरवाजा बंद करके गायत्री की तरफ पीठ की, गायत्री ने पूरी ताकत से वह चाकू रितेश की कमर में घोंप दिया।
रितेश दर्द से बिलबिला उठा। उसे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि गायत्री ऐसा कुछ कर सकती है। चाकू लगने के बावजूद रितेश का शरीर विशाल और ताकतवर था। उसने पलटकर गायत्री को जोर का धक्का मारा। गायत्री जमीन पर गिर पड़ी। रितेश ने उसकी साड़ी से वह चाकू छीन लिया। उसकी आंखों में मौत का तांडव नाच रहा था।
रितेश ने गायत्री को जमीन पर दबा लिया, एक हाथ से उसका मुंह जोर से भींच लिया ताकि वह आवाज न निकाल सके, और दूसरे हाथ से चाकू गायत्री के पेट में उतार दिया। खून का फव्वारा फूट पड़ा। गायत्री की आंखें फटी रह गईं। लेकिन रितेश यहीं नहीं रुका, उसने उसी चाकू से बेरहमी से गायत्री का गला रेत दिया। फर्श खून से लाल हो गया। गायत्री ने तड़पते हुए दम तोड़ दिया।
लेकिन इस खौफनाक रात की सबसे घिनौनी हकीकत अभी बाकी थी। रितेश इतना बड़ा पिशाच बन चुका था कि अपनी भाभी की हत्या करने के बाद, उसके खून से सने मृत शरीर के साथ भी उसने मुंह काला किया। वह दरिंदा उस लाश को तब तक नोंचता रहा जब तक उसकी गंदी हवस शांत नहीं हो गई।
उसी वक्त, दूसरे कमरे में सो रही सात साल की मासूम रूबी की आंख खुल गई। मां को बिस्तर पर न पाकर वह घबराते हुए रितेश के कमरे की तरफ गई। दरवाजा आधा खुला था। रूबी ने जो दृश्य देखा, उसने उस छोटी सी बच्ची की रूह कंपा दी। उसकी मां खून से लथपथ निर्वस्त्र पड़ी थी और उसका चाचा वहां मौजूद था।
रूबी जोर-जोर से चीखने लगी, “बचाओ! मेरी मां को मार दिया!” उसकी दिल दहला देने वाली चीखें रात के सन्नाटे को चीरते हुए पड़ोसियों के कानों तक पहुंचीं। कुछ ही मिनटों में गांव के लोग गायत्री के घर के बाहर इकट्ठा हो गए। जब लोग अंदर घुसे, तो वहां का दृश्य देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। गायत्री की लाश अर्धनग्न अवस्था में खून के तालाब में पड़ी थी। और रितेश हाथ में खून से सना चाकू लिए, नशे और पागलपन की हालत में कमरे के एक कोने में बैठा था।
पड़ोसियों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। लगभग दो घंटे बाद पुलिस की टीम वहां पहुंची। पुलिस ने देखा कि रितेश अभी भी उसी हालत में चाकू लिए बैठा है। पुलिस ने भारी मशक्कत के बाद उसे काबू किया और गिरफ्तार कर लिया। गायत्री के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया।
जब पुलिस ने रितेश को हिरासत में लेकर कड़ाई से पूछताछ की, तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। उसने शुरू से लेकर अंत तक की पूरी खौफनाक दास्तान पुलिस के सामने उगल दी। पुलिस ने उसके खिलाफ हत्या, बलात्कार और अन्य संगीन धाराओं में मामला दर्ज कर लिया।
रितेश अब सलाखों के पीछे है, अपने किए की सजा भुगत रहा है। अदालत में मुकदमा चलेगा और तय होगा कि उसे क्या सजा मिलेगी। लेकिन इस पूरी घटना ने उस मासूम रूबी की जिंदगी को हमेशा के लिए अंधेरे में धकेल दिया, जिसने अपनी आंखों के सामने अपनी मां को इस खौफनाक तरीके से मरते देखा। यह घटना समाज के उस काले सच को उजागर करती है, जहां लालच, नशा और वासना एक इंसान को हैवान बना देते हैं, और जिसका खामियाजा अक्सर बेगुनाहों को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है।