विधवा औरत और चोर कि रात भर कि कहानी |
पहाड़ी रात की दास्तान: एक विधवा और चोर का अकल्पनीय संगम
भूमिका: सुदूर पहाड़ी गाँव और शीतकालीन नीरवता
उत्तर भारत के दूर-दराज़ पहाड़ी क्षेत्र में बसा एक छोटा सा गाँव था। उस गाँव में मुश्किल से 20-25 घर बने हुए थे। ऊँचे-नीचे टीलों और ढलानों के कारण गाँव के घर एक-दूसरे से काफी दूरी पर स्थित थे। पहाड़ियों पर समतल ज़मीन की बहुत कमी थी, इसलिए ग्रामीणों ने जहाँ-तहाँ थोड़ी-बहुत समतल जगह पाकर मिट्टी और पत्थरों से अपने छोटे-छोटे आशियाने बना लिए थे। पूरे गाँव को आपस में जोड़ने वाली एकमात्र चीज़ थी एक पतली सी पगडंडी, जो झाड़ियों और पत्थरों के बीच से होकर गुज़रती थी।
अक्टूबर-नवंबर का महीना चल रहा था। पहाड़ों पर ठंड ने अपने पैर पूरी तरह से पसार लिए थे। सूरज ढलते ही पूरा इलाका घने कोहरे की सफ़ेद चादर में लिपट जाता था। शाम के आठ बजते-बजते चारों तरफ़ सन्नाटा पसर जाता, और केवल ठंडी हवाओं के चलने की सरसराहट या दूर जंगल में सियार-कुत्तों के रोने की आवाज़ें ही सुनाई देती थीं। लोग अपने-अपने घरों के किवाड़ बंद करके आग के पास या रज़ाइयों में सिमट जाते थे। ऐसे शांत और अलग-थलग माहौल में किसी बाहरी व्यक्ति की आवाजाही की उम्मीद न के बराबर होती थी।
अध्याय 1: रात का सन्नाटा और /चो/र/ का प्रवेश
तारीख थी 15 नवंबर। रात के लगभग 1:30 बज रहे थे। घने कोहरे और कड़ाके की ठंड का फ़ायदा उठाकर पास के एक दूसरे गाँव से एक 24-25 वर्षीय युवक उस पहाड़ी गाँव की सीमा में दाखिल हुआ। उसका नाम मुकेश था। मुकेश कोई पेशेवर अपराधी या शातिर /चो/र/ नहीं था, बल्कि परिस्थितियों का मारा एक साधारण युवक था। कुछ समय पूर्व वह जुए और सट्टे की बुरी लत में फँस गया था, जिसके कारण उस पर बाज़ार के कुछ दबंग लोगों का भारी कर्ज़ हो गया था। लेनदार उसे रोज़ धमकाते थे और जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। हताशा और डर के मारे उसने अपनी ज़िंदगी में पहली बार /चो/री/ करने जैसा /अ/नै/ति/क/ कदम उठाने का फ़ैसला किया था।
मुकेश जानता था कि यह पहाड़ी गाँव अलग-थलग है और यहाँ सुरक्षा का कोई विशेष प्रबंध नहीं है। अपने चेहरे पर काला गमछा लपेटे, हाथ में एक छोटी टॉर्च और औज़ार लिए वह पगडंडी के सहारे गाँव के एक छोर पर स्थित मकान की तरफ़ बढ़ा।
गाँव के पहले मकान की कुंडी खोलकर वह बहुत सावधानी से अंदर घुसा। उस घर के लोग गहरी नींद में सो रहे थे। मुकेश ने वहाँ संदूक टटोला, अलमारी से लगभग ₹10,000 की नकदी, एक जोड़ी छोटे बच्चे की चाँदी की पायल और एक सोने की पतली अँगूठी /चो/री/ कर ली।
जब वह उस घर से बाहर निकला, तो उसने अपनी जेब में रखी घड़ी देखी। रात के 2:00 बज रहे थे। उसके मन में लालच का एक कीड़ा कुलबुलाया—”अभी तो पूरी रात बाकी है। पूरे गाँव में सन्नाटा है। क्यों न एक-दो और घरों में हाथ साफ़ कर लिया जाए? अगर थोड़ा और पैसा मिल गया, तो मेरा सारा कर्ज़ उतर जाएगा और मैं हमेशा के लिए इस दलदल से बाहर निकल जाऊँगा।”
इसी कुटिल सोच के साथ मुकेश पगडंडी पर आगे बढ़ा और थोड़े फ़ासले पर स्थित दो कमरों के एक छोटे से कच्चे-पक्के मकान के सामने जा खड़ा हुआ।
अध्याय 2: दो कमरों की कुटिया और एक स्तब्ध करने वाला दृश्य
यह छोटा सा घर सीमा नाम की एक महिला का था। सीमा की उम्र लगभग 30 वर्ष थी। तीन साल पहले एक दुर्घटना में उसके पति का असामयिक निधन हो गया था। तब से वह इस घर में बिल्कुल अकेली रहती थी। सीमा का कोई बच्चा भी नहीं था। वह गाँव की अन्य महिलाओं से थोड़ी अलग, बेहद /सुं/द/र/, शालीन और शांत स्वभाव की औरत थी। उसकी घनी काली ज़ुल्फ़ें, गोरा रंग और सुडौल काया गाँव भर में चर्चा का विषय थी, किंतु पति की मृत्यु के बाद उसने खुद को अपने घर तक ही सीमित कर लिया था।
मुकेश ने बाहर का लकड़ी का दरवाज़ा धीरे से धक्का देकर देखा। कुंडी ढीली थी, और थोड़ा ज़ोर लगाने पर दरवाज़ा बिना किसी आवाज़ के खुल गया। मुकेश दबे पाँव अंदर दाखिल हुआ।
घर में कुल दो कमरे थे। मुकेश पहले कमरे में गया। वहाँ एक छोटा सा डिबरी (मिट्टी के तेल का दीया) जल रहा था, जिसकी मद्धिम पीली रोशनी पूरे कमरे में फैल रही थी। कमरे के एक कोने में एक पुरानी चारपाई बिछी हुई थी, जिस पर रज़ाई ओढ़कर सीमा बेखबर सो रही थी।
मुकेश /चो/री/ के इरादे से इधर-उधर नज़रें दौड़ाने लगा। लेकिन उस कमरे में उसे कोई अलमारी या लोहे की तिजोरी नज़र नहीं आई। केवल कुछ प्लास्टिक और टीन के डिब्बे कोने में रखे हुए थे। मुकेश ने एक-एक करके डिब्बों के ढक्कन हटाकर देखे—किसी में मक्के का आटा था, तो किसी में चावल और दाल।
इसके बाद वह चुपके से दूसरे कमरे में गया। वहाँ भी स्थिति अलग नहीं थी। दीवार पर खूँटियों पर कुछ सूती साड़ियाँ और पुराने कपड़े लटके हुए थे। घर की हालत देखकर साफ़ लग रहा था कि यहाँ किसी भी प्रकार की धन-दौलत या मूल्यवान आभूषण नहीं हैं।
मुकेश ने सोचा, “यहाँ /चो/री/ करने लायक कुछ नहीं है, मुझे यहाँ से निकल जाना चाहिए।”
लेकिन जैसे ही वह वापस जाने के लिए पहले कमरे में लौटा, उसकी नज़र चारपाई पर सोई हुई सीमा पर टिक गई। ठंड के कारण रज़ाई थोड़ी ढलक गई थी, जिससे सीमा का चेहरा और गर्दन मद्धिम रोशनी में साफ़ दिखाई दे रहे थे। 30 साल की नौजवान /वि/ध/वा/ की असीम /सुं/द/र/ता/ को देखकर मुकेश ठिठक गया।
अध्याय 3: भटकती नीयत और अनचाहा ढीलापन
मद्धिम उजाले में सीमा का शांत और नयनाभिराम चेहरा देखकर मुकेश की नीयत अचानक डोलने लगी। जिस /चो/री/ के काम के लिए वह आया था, उसे वह पल भर में भूल गया। उसके मन में वासना और /का/म/ना/ का एक तूफ़ान उठने लगा।
वह सोचने लगा, “यह पहाड़ी इलाका है। चारों तरफ़ कोहरा है और सन्नाटा है। इस पूरे घर में यह महिला बिल्कुल अकेली सो रही है। अगर मैं इसके साथ कुछ /अ/नै/ति/क/ काम कर भी लूँ, तो किसी को कानो-कान खबर नहीं होगी। यहाँ इसे बचाने वाला भी कोई नहीं आएगा।”
परंतु उसके भीतर के एक कोने ने उसे टोका—”ज़बरदस्ती करने से चीख-पुकार मच सकती है और गाँव वाले जाग सकते हैं। यदि रज़ामंदी या बिना शोर-शराबे के काम बन जाए, तो कितना अच्छा हो!”
पाप के उस भूत ने मुकेश के विवेक को पूरी तरह से ढक लिया था। वह सोचने-समझने की क्षमता खो चुका था। वह दबे पाँव चारपाई के बिल्कुल पास पहुँचा और घुटनों के बल बैठ गया। उसकी धड़कनें तेज़ चल रही थीं। उसने अपना काँपता हुआ हाथ बढ़ाया और सीमा के गालों तथा कपड़ों को धीरे से /स्प/र्श/ करने लगा। उसके मन में यह विचार था कि शायद इस हल्की छुअन से महिला जागेगी और वह उससे बात करके अपनी /का/म/ना/ पूरी करने का प्रयास करेगा।
लेकिन मुकेश की यह नादानी उस पर भारी पड़ने वाली थी।
अध्याय 4: जागृति, घबराहट और खाट के नीचे की शरण
सीमा गहरी नींद में थी, किंतु जैसे ही किसी अनजान व्यक्ति का ठंडा हाथ उसके शरीर पर लगा, उसे तुरंत अहसास हुआ कि कोई उसके साथ /अ/वै/ध/ हरकत करने की कोशिश कर रहा है।
सीमा ने अकुलाकर अपने हाथ-पैर फैलाए और एक झटके में आँखें खोलकर चारपाई पर उठकर बैठ गई!
कमरे में डिबरी की पीली रोशनी में उसने अपने बिस्तर के पास एक नकाबपोश पुरुष की परछाईं देखी। वह पूरी तरह हक्की-बक्की रह गई।
उधर, जैसे ही सीमा जागी और उठकर बैठी, मुकेश के होश उड़ गए। भय का एक प्रचंड झटका उसे लगा। उसे लगा कि यदि यह महिला चीख पड़ी, तो गाँव वाले लाठी-डंडे लेकर आ जाएँगे और उसे मार-मारकर अधमरा कर देंगे। घबराहट में उसे भागने का कोई रास्ता नहीं सूझा। दरवाज़ा दूर था और उसकी टाँगें काँप रही थीं।
बिना सोचे-समझे मुकेश वहीं ज़मीन पर लेटा और सरककर सीमा की चारपाई (खाट) के नीचे छुप गया!
सीमा हक्की-बक्की अपनी चारपाई पर बैठी रही। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। उसने कमरे में चारों तरफ़ देखा, पर धुंधली रोशनी में उसे कोई खड़ा नज़र नहीं आया। उसने सोचा, “शायद मैंने कोई भयानक सपना देखा है… या फिर ठंड के कारण मुझे ऐसा भ्रम हुआ है।”
सीमा उठी, उसने चारपाई के पास रखे लोटे से पानी पिया और कमरे का मुख्य दरवाज़ा जाकर चेक किया। दरवाज़ा हल्का सा खुला हुआ था। उसने मन में सोचा कि शायद हवा के झोंके से किवाड़ खुल गया होगा। उसने दरवाज़े की कुंडी अंदर से अच्छी तरह बंद कर दी।
फिर वह वापस आकर अपनी चारपाई पर लेट गई और रज़ाई ओढ़ ली।
उधर, चारपाई के नीचे दबा बैठा मुकेश डर के मारे थर-थर काँप रहा था। उसे लगा कि महिला अभी पुलिस या गाँव वालों को बुलाएगी। पर जब उसने देखा कि सीमा वापस लेट गई है, तो उसने राहत की साँस ली।
रात का समय था, कड़ाके की ठंड थी और मुकेश रात भर भाग-दौड़ करके बुरी तरह थक चुका था। चारपाई के नीचे पड़े-पड़े, डर के माहौल में भी उसकी आँखें भारी होने लगीं। समय बीतता गया—रात के 3:00 बजे, फिर 3:30 बज गए। और आखिरकार मुकेश को चारपाई के नीचे ही इतनी गहरी नींद आ गई कि वह बेसुध हो गया।
अध्याय 5: भोर की किरणें और गाँव में मचता हड़कंप
सुबह के लगभग 5:30 बज रहे थे। पहाड़ियों के पीछे से सूर्य की हल्की लालिमा फूटने लगी थी, यद्यपि कोहरा अभी भी घना था।
सीमा की आँख खुली। उसकी दिनचर्या सुबह जल्दी उठकर घर की सफ़ाई करने की थी। उसने अपना सूती शॉल ओढ़ा, कमरे का ताला-कुंडी खोला और हाथ में झाड़ू लेकर घर के आँगन और बाहर की पगडंडी को साफ करने निकली।
तभी उसने देखा कि गाँव की तीन-चार महिलाएँ हाथ में लोटा और टॉर्च लिए पहाड़ी की तरफ़ जा रही थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह-सुबह महिलाएँ शौच आदि के लिए खेतों या पहाड़ियों का रुख करती थीं।
सीमा को देखकर पड़ोस की एक महिला रुक गई और बोली, “अरे सीमा! तुम्हें कुछ पता चला क्या?”
सीमा ने अचरज से पूछा, “क्या बात है चाची? किस बात का पता?”
महिला ने आसपास देखते हुए फुसफुसाकर कहा, “अरे! रात को गाँव में बहुत बड़ा कांड हो गया है! नीचे वाले टोले में रामू के घर में रात को कोई /चो/र/ घुसा था। सुना है कि वह 1 लाख रुपये नकद और सोने-चाँदी के गहने /चो/र/कर ले गया है! पूरे गाँव में हड़कंप मचा हुआ है। सभी पुरुष लाठी-डंडे लेकर /चो/र/ को ढूँढ रहे हैं। तुम भी ज़रा ध्यान रखना, अपने घर के किवाड़ बंद रखना!”
यह सुनते ही सीमा का खून जम गया! उसके दिमाग में बीती रात की घटना कौंध गई—”रात को मेरे कमरे में कोई आया था! मुझे लगा था कि वह कोई सपना था, लेकिन क्या वह वही /चो/र/ था? क्या वह अभी भी मेरे घर में ही है?”
सीमा के हाथ से झाड़ू छूटते-छूटते बची। उसने किसी तरह अपनी घबराहट पर काबू पाया और कहा, “अच्छा चाची… ठीक है, मैं ध्यान रखूँगी।”
अध्याय 6: झाड़ू की सुगबुगाहट और धर्मसंकट की घड़ी
महिलाएँ पहाड़ी की तरफ़ बढ़ गईं। सीमा बदहवास हालत में अपने घर के भीतर भागी। उसने तुरंत मुख्य दरवाज़ा बंद किया और सीधे अपने सोने वाले कमरे में पहुँची।
उसकी नज़र चारपाई पर गई। कमरे में अब सुबह का पर्याप्त उजाला फैल चुका था। उसने जब झुककर चारपाई के नीचे देखा, तो उसके होश उड़ गए!
चारपाई के नीचे एक नवयुवक मुँह पर गमछा लपेटे बेखबर सो रहा था! वह इतनी गहरी नींद में था कि उसे भोर होने का भी पता नहीं चला था।
सीमा का पूरा शरीर काँपने लगा। उसके मन में पहला विचार आया कि वह तुरंत बाहर भागे, चिल्लाए और गाँव वालों को इकट्ठा करके इस /चो/र/ को पकड़वा दे।
लेकिन तभी उसके मन में एक दूसरा विचार आया, जिसने उसके कदम रोक दिए।
“यदि मैं बाहर जाकर शोर मचाऊँगी, तो पूरे गाँव के उग्र लोग लाठी, कुल्हाड़ी और डंडे लेकर आ जाएँगे। दो महीने पहले भी गाँव वालों ने एक संदिग्ध व्यक्ति को पकड़कर इतना मारा था कि उसकी मौत हो गई थी। अगर यह पकड़ा गया, तो गाँव वाले इसे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे। और सबसे बड़ी बात… लोग मुझसे सवाल करेंगे कि यह रात भर मेरे ही कमरे में, मेरी ही खाट के नीचे क्या कर रहा था? गाँव के लोग तरह-तरह की गंदी बातें बनाएँगे। मेरी इज़्ज़त की धज्जियाँ उड़ जाएँगी। लोग कहेंगे कि एक /वि/ध/वा/ औरत के कमरे में रात भर कोई गैर-पुरुष छुपा हुआ था।”
अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और उस युवक की जान बचाने के धर्मसंकट में फँसकर सीमा ने एक कठोर निर्णय लिया।
उसने कोने से झाड़ू उठाई और चारपाई के नीचे सो रहे मुकेश के पैरों पर ज़ोर-ज़ोर से झाड़ू से कचने (मारने) लगी।
अध्याय 7: दरवाज़े पर जमावड़ा और झूठी तसल्ली
झाड़ू की मार पड़ते ही मुकेश हड़बड़ाकर जागा। उसने आँखें मलीं और जब देखा कि दिन निकल आया है और घर की मालकिन हाथ में झाड़ू लिए गुस्से में खड़ी है, तो उसके प्राण सूख गए।
वह गिरता-पड़ता खाट के नीचे से बाहर निकला। उसने गमछा चेहरे से हटाया, हाथ जोड़े और गिड़गिड़ाने लगा, “मुझे माफ़ कर दो बहन! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई! मुझे गाँव वालों के हवाले मत करो, वे मुझे मार डालेंगे!”
सीमा ने तल्ख आवाज़ में कहा, “तुम अभी के अभी मेरे घर से दफ़ा हो जाओ! तुमने मेरी रात की नींद हराम की, अगर गाँव वालों को पता चला तो मेरी बदनामी हो जाएगी!”
मुकेश ने तुरंत मुख्य दरवाज़े की कुंडी खोली और बाहर भागने के लिए जैसे ही कदम बढ़ाया, वह ठिठक गया।
उसने दरवाज़े की दरार से देखा कि सामने पगडंडी पर गाँव के 8-10 पुरुष हाथों में लाठियाँ, छुरियाँ और टॉर्च लिए उसी के घर की तरफ़ आ रहे थे। उनके चेहरे पर भयानक गुस्सा था।
मुकेश उल्टा पाँव वापस अंदर भागा और रोने की सी आवाज़ में बोला, “बाहर मत भेजो! गाँव वाले लाठियाँ लेकर आ रहे हैं, वे मुझे देखते ही जान से मार देंगे! भगवान के लिए मुझे कहीं छुपा लो!”
सीमा ने घबराकर दरवाज़े की दरार से बाहर देखा। वास्तव में गाँव के लोग उसके घर के आँगन तक पहुँच चुके थे।
सीमा ने झट से मुख्य दरवाज़ा बंद किया और मुकेश से कहा, “तुम चुपचाप खड़े रहो, एक शब्द भी मत बोलना!”
सीमा बाहर आई और दरवाज़ा आधा खोलकर खड़ी हो गई। गाँव के एक बुज़ुर्ग और दो-तीन नौजवानों ने कहा, “सीमा बहू! रात को गाँव में बड़ी भारी /चो/री/ हुई है। रामू के घर से 1 लाख रुपये का माल साफ़ हो गया है। हमें शक है कि /चो/र/ इसी टोले की तरफ़ भागा है। मुख्य पगडंडी के एंट्री पॉइंट पर जो सीसीटीवी कैमरा लगा है, उसमें /चो/र/ आते हुए तो दिख रहा है पर बाहर जाते हुए नहीं दिखा। इसका मतलब वह यहीं पहाड़ियों या किसी घर के आसपास छुपा हुआ है। तुमने किसी अजनबी को देखा क्या?”
सीमा ने अपने चेहरे पर सामान्य भाव लाते हुए कहा, “नहीं भैया, मैं तो अभी सोकर उठी हूँ। मेरे घर में तो कोई नहीं आया। अगर आया भी होगा तो पहाड़ियों के जंगल की तरफ़ भाग गया होगा।”
गाँव के एक युवक ने कहा, “आज अगर वह हरामज़ादा मिल गया न, तो हम उसे ज़िंदा नहीं गाड़ेंगे! बहू, तुम अंदर से कुंडी बंद रखो। अगर कोई संदिग्ध दिखे तो तुरंत चिल्लाना।”
सीमा ने सिर हिलाया, “जी भैया, मैं ध्यान रखूँगी।”
गाँव वाले लाठियाँ पटकते हुए आगे की पहाड़ियों की ओर बढ़ गए।
अध्याय 8: कमरे की तालाबंदी और डर की परछाईं
गाँव वालों के जाते ही सीमा अंदर आई और उसने मुख्य दरवाज़ा बंद करके साँकल चढ़ा दी।
मुकेश अंदर पसीने से तर-बतर खड़ा था। कड़ाके की ठंड में भी उसके माथे से पसीने की बूँदें टपक रही थीं। वह सीमा के पैरों में गिरने लगा, “आपने मेरी जान बचा ली! आप मेरे लिए देवी बनकर आई हैं, वरना आज मेरी हत्या हो जाती।”
सीमा ने उसे डाँटते हुए कहा, “पाखंड मत करो! तुम जैसे /चो/र/ ही समाज का नाम ख़राब करते हैं। तुमने दूसरों के घर में /चो/री/ की और फिर मेरे घर में घुसकर गंदी नीयत दिखाई!”
मुकेश ने काँपते हुए कहा, “नहीं मालिक! मैं कोई पेशेवर /चो/र/ नहीं हूँ। मैं मजबूरी में फँसकर यह /अप/रा/ध/ कर बैठा।”
सीमा ने सोचा कि दिन के उजाले में इसे बाहर निकालना खतरे से खाली नहीं है। गाँव वाले जगह-जगह पहरा दे रहे हैं। यदि कोई इसे सीमा के घर से निकलते देख लेगा, तो बात और बिगड़ेगी।
सीमा के घर में जो दूसरा कमरा था, उसमें केवल पुराने कपड़े और कुछ बेकार सामान रखा रहता था।
सीमा ने मुकेश से कहा, “सुनो! तुम इस दूसरे कमरे के अंदर जाओ। मैं बाहर से ताला लगा देती हूँ। दिन भर तुम यहीं रहोगे। रात को जब अंधेरा और घना कोहरा छा जाएगा, तब तुम यहाँ से चुपचाप निकल जाना।”
मुकेश के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था। वह चुपचाप उस दूसरे कमरे में चला गया। सीमा ने बाहर से लोहे का कुंडा लगाया और बड़ा सा ताला जड़ दिया, ताकि यदि कोई पड़ोसी घर में आए भी, तो उसे लगे कि यह कमरा तो बंद रहता है।
अध्याय 9: दोपहर की नीरवता और भोजन का कटोरा
ताला लगाने के बाद सीमा अपने घरेलू कामों में जुट गई। पर उसका मन अशांत था। वह बार-बार बंद कमरे के दरवाज़े की ओर देखती।
सुबह के 9:00 बज चुके थे। सीमा ने अपने लिए चाय बनाई और रोटियाँ पकाईं। खाना बनाते समय उसके मन में ख्याल आया, “यह लड़का भी इंसान ही है। डर के मारे रात से भूखा-प्यासा बंद है।”
सीमा ने अपनी मानवीयता का परिचय दिया। उसने चारों तरफ़ देखा कि आसपास कोई पड़ोसी तो नहीं आ रहा है। फिर उसने ताला खोला और एक थाली में दो रोटियाँ, सब्जी और गरम चाय लेकर अंदर गई।
मुकेश कोने में ज़मीन पर बैठा हुआ था। सीमा ने थाली उसके सामने रखी और कड़े शब्दों में कहा, “लो, यह खा लो और चाय पी लो। और शांत बैठकर पड़े रहो, कोई आवाज़ बाहर नहीं आनी चाहिए।”
मुकेश ने अचरज से सीमा की ओर देखा। उसकी आँखों में कृतज्ञता के आँसू आ गए। जिस औरत के साथ उसने रात में /अ/नै/ति/क/ हरकत करने का प्रयास किया था, वही औरत आज उसकी ढाल बनी हुई थी और उसे भोजन दे रही थी।
मुकेश ने हाथ जोड़कर कहा, “आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।”
सीमा ताला वापस लगाकर बाहर आ गई। दोपहर भर गाँव में सन्नाटा रहा, पर रह-रहकर पुलिस की गाड़ियों के हूटर और गाँव वालों की चिल्लाने की आवाज़ें दूर पहाड़ियों से आती रहीं।
अध्याय 10: शाम की पंचायत और पड़ोसियों के ताने
शाम के लगभग 4:30 बज रहे थे। सूर्य ढलने लगा था और ठंड फिर से अपने शबाब पर आ रही थी।
गाँव की दो-तीन महिलाएँ, जो सीमा की पड़ोसिनें थीं, उसके घर के आँगन में आकर बैठ गईं। ग्रामीण जीवन में शाम को महिलाओं का एक जगह एकत्र होकर बतियाना आम बात थी।
एक महिला ने कहा, “अरे सीमा! आज तूने उस दूसरे कमरे में ताला क्यों लगा रखा है? पहले तो वह खुला रहता था?”
यह सुनकर सीमा का दिल धड़कने लगा। उसकी साँसें अटक गईं। उसने तुरंत अपना दिमाग दौड़ाया और बोली, “अरे चाची! जब से सुना है कि गाँव में /चो/र/ आया है और वह यहीं कहीं छुपा है, मुझे डर लगने लगा। उस कमरे में मेरी सास के ज़माने के कुछ बर्तन और कपड़े रखे हैं। मैंने सोचा कि कहीं /चो/र/ पीछे के रास्ते से आकर सामान न उठा ले, इसलिए ताला मार दिया।”
दूसरी महिला हँसकर बोली, “अरे सीमा! /चो/र/ तेरे पुराने कपड़ों का क्या करेगा? लेकिन बात तो सही है, तू ठहरी अकेली ज़वान /वि/ध/वा/ औरत! रात-बिरात कोई तेरे घर में घुसकर कुछ /अ/नै/ति/क/ काम कर दे, तो तेरी तो ज़िंदगी तबाह हो जाएगी। अच्छा किया जो ताला मार दिया।”
महिलाएँ काफी देर तक /चो/री/ की घटना पर चर्चा करती रहीं। एक ने कहा, “रामू बता रहा था कि उसके घर से 1 लाख रुपये नकद और महँगे गहने चले गए।”
अंदर कमरे में बैठा मुकेश ताक-झाँक करके सब सुन रहा था। वह मन ही मन हैरान हो रहा था कि उसने तो केवल ₹10,000 और छोटे बच्चे की एक चाँदी की पायल उठाई थी, पर गृहस्वामी 1 लाख रुपये की झूठी /चो/री/ का ढिंढोरा पीट रहा था!
लगभग 7:00 बजे अंधेरा गहराने पर महिलाएँ अपने-अपने घर चली गईं।
अध्याय 11: आधी रात का इक़रार और अतीत की परतें
रात के 8:30 बज चुके थे। पूरा गाँव घने कोहरे में छिप गया था। सन्नाटा इतना गहरा था कि अपनी ही धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
सीमा ने घर का मुख्य दरवाज़ा बंद किया। अब मुकेश को बाहर निकालने का समय आ गया था। उसने दूसरे कमरे का ताला खोला और मुकेश को बाहर आने को कहा।
मुकेश बाहर आया। सीमा ने रसोई में उसके लिए खाना परोसा। मुकेश ने शांति से खाना खाया।
खाना खाने के बाद सीमा ने कुर्सी पर बैठते हुए सीधे मुकेश की आँखों में देखा और पूछा, “अब सच-सच बताओ मुकेश! तुम कौन हो? इतने बड़े /अप/रा/ध/ की दुनिया में क्यों कदम रखा? और रात में मेरी खाट के पास आकर तुमने मुझे /स्प/र्श/ करने की हिम्मत कैसे की?”
मुकेश ने शर्म से अपना सिर झुका लिया। उसने हताश स्वर में अपनी पूरी आपबीती सुनाई:
“मालिक! मैं पास के गाँव का रहने वाला हूँ। मेरे पिता का साया बचपन में ही उठ गया था। कुछ समय पहले संगति बिगड़ने के कारण मैं जुए और सट्टे में फँस गया। मुझ पर लगभग ₹50,000 का कर्ज़ हो गया था। लेनदार रोज़ मेरे घर आकर मेरी बूढ़ी माँ को गाली-गलौज करते थे और मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे थे। कोई दूसरा रास्ता न देखकर मैंने पहली बार /चो/री/ करने का फ़ैसला किया।”
मुकेश ने आगे कहा, “रामू के घर से मुझे केवल ₹10,000 नकद और यह छोटी सी पायल मिली थी। वह 1 लाख रुपये की बात झूठ बोल रहा है। फिर जब मैं आपके घर में घुसा, तो मुझे यहाँ कोई धन-दौलत नहीं मिली। पर जब मेरी नज़र आप पर पड़ी… तो आपकी /सुं/द/र/ता/ और एकांत देखकर मेरा ईमान डिग गया। मेरे दिमाग पर शैतान सवार हो गया था। पर जैसे ही आपने आँखें खोलीं, मैं अपनी नीचता पर काँप उठा। मैं कसम खाकर कहता हूँ, मैंने आज तक किसी स्त्री के साथ कोई /अ/वै/ध/ काम नहीं किया है। वह मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल थी।”
सीमा मुकेश की बातें सुनती रही। उसके चेहरे पर गुस्से की जगह अब एक सहानुभूति का भाव था।
सीमा ने एक ठंडी साँस भरी और कहा, “तुम्हें लगता है कि तुम परेशान हो? मेरी ज़िंदगी देखो! 3 साल पहले मेरे पति मुझे छोड़कर चले गए। तब से इस दो कमरों की कुटिया में अकेली घुट-घुटकर जी रही हूँ। समाज की गंदी नज़रें हमेशा एक /वि/ध/वा/ पर टिकी रहती हैं। पर मैंने कभी अपना ईमान नहीं खोया। गलत रास्ता चुनकर तुम अपने कर्ज़ से मुक्ति तो पा लोगे, पर अपनी आत्मा को कभी साफ़ नहीं कर पाओगे।”
मुकेश सीमा के इन शब्दों से भीतर तक हिल गया। उसे अपने किए पर बेहद ग्लानि महसूस हुई।
अध्याय 12: विदाई का क्षण और लौटती हुई गूँज
रात के 1:00 बज चुके थे। बाहर कोहरा इतना घना था कि दो हाथ आगे का भी कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। यह गाँव से चुपचाप निकलने का सबसे सही समय था।
सीमा ने कहा, “अब रास्ता साफ़ है। गाँव वाले सो चुके हैं और कोहरा बहुत गहरा है। तुम जंगल के रास्ते से अपने गाँव निकल जाओ।”
मुकेश ने अपनी जेब से वह ₹10,000 नकद, चाँदी की पायल और सोने की अँगूठी निकाली और सीमा की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “यह वही माल है जो मैंने रात को चुराया था। मैं इसे अपने साथ नहीं ले जाऊँगा। आप इसे रख लीजिए।”
सीमा ने कड़े शब्दों में उसका हाथ पीछे धकेल दिया, “मुझे पाप की यह कमाई नहीं चाहिए! इसे ले जाओ और जिस घर से चुराया है, वहीं चुपचाप फेंक देना। मेहनत की कमाई से कर्ज़ चुकाओ, /चो/री/ से नहीं।”
मुकेश ने सीमा के पैरों को छूने के लिए हाथ बढ़ाया, पर सीमा पीछे हट गई। मुकेश की आँखों में आँसू थे। उसने कहा, “आपने न केवल मेरी जान बचाई, बल्कि मुझे एक इंसान बनने का अवसर दिया। मैं आपका यह एहसान अपनी आखिरी साँस तक नहीं भूलूँगा।”
मुकेश ने अपने चेहरे पर गमछा बाँधा और रात के सन्नाटे में, घने कोहरे को चीरता हुआ जंगल के पगडंडी वाले रास्ते से ओझल हो गया।
अगले दिन सुबह गाँव में फिर एक नई चर्चा छिड़ गई। रामू के घर के आँगन में वही ₹10,000 और चाँदी की पायल पड़ी हुई मिली थी! लोग हैरान थे कि /चो/र/ सामान वापस फेंककर क्यों चला गया। सीमा जब यह सुन रही थी, तो उसके चेहरे पर एक गुपचुप मुस्कान आ गई। वह समझ गई कि मुकेश ने उसकी बात मान ली थी।
अध्याय 13: साल भर की प्रतीक्षा और गाँव का बदला माहौल
समय पंख लगाकर उड़ता गया। दिन बीते, हफ़्ते बीते और महीने बीतते चले गए।
उस घटना को पूरा एक साल बीत चुका था। अगला शीतकाल फिर से आ गया था। नवंबर का महीना था और पहाड़ियों पर फिर से कोहरा और ठंड लौटने लगी थी।
सीमा की ज़िंदगी अपनी पुरानी ढर्रे पर चल रही थी। पर इस एक साल के दौरान उसके मन के भीतर एक अजीब सा बदलाव आया था। वह अक्सर रात को अपनी चारपाई पर लेटे-लेटे उस /चो/र/ यानी मुकेश के बारे में सोचने लगती थी।
वह सोचती—”क्या वह सही-सलामत होगा? क्या उसने गलत रास्ता छोड़ दिया होगा? क्या उसने अपना कर्ज़ चुका दिया होगा?”
वह मान चुकी थी कि मुकेश उसकी ज़िंदगी में आया एक ऐसा तूफ़ान था जो गुज़र गया, और अब वह उससे कभी नहीं मिल पाएगी।
तभी एक दोपहर, जब हल्की धूप खिली हुई थी और सीमा अपने आँगन में बैठी मक्के के दाने सुखा रही थी, उसने देखा कि मुख्य पगडंडी से एक सुगठित, साफ़-सुथरे कपड़ों में एक युवक चला आ रहा है। उसके हाथ में एक बड़ा सा बैग था।
जैसे-जैसे वह युवक नज़दीक आया, सीमा की आँखें फटी की फटी रह गईं!
वह और कोई नहीं, मुकेश ही था!
पर आज का मुकेश एक साल पहले वाले डरे-सहमे, फटेहाली में घूमते /चो/र/ से बिल्कुल अलग था। उसका चेहरा खिला हुआ था, आँखों में आत्मविश्वास था और उसके चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान थी।
सीमा अपनी जगह पर खड़ी हो गई। उसके दिल की धड़कनें अचानक तेज़ हो गईं। खुशी और अचरज के मिश्रित भाव से उसका गला रूँध गया।
अध्याय 14: नया सवेरा, नया जीवन और अटूट बंधन
मुकेश ने आँगन में कदम रखा और सीमा के सामने आकर हाथ जोड़कर प्रणाम किया।
सीमा ने खुद को सँभालते हुए कहा, “तुम… तुम यहाँ? एक साल बाद? तुम्हें डर नहीं लगता कि गाँव वाले तुम्हें पहचान लेंगे?”
मुकेश हँसते हुए बोला, “अब मुझे किसी का डर नहीं है सीमा जी! मैं अब कोई /चो/र/ या भगोड़ा नहीं हूँ।”
सीमा ने पूछा, “इस एक साल में तुम कहाँ थे?”
मुकेश ने बैग ज़मीन पर रखा और बताने लगा, “उस रात आपके घर से निकलने के बाद मैं सीधे शहर चला गया। वहाँ मैंने एक कंस्ट्रक्शन कंपनी में कड़ी मेहनत से मजदूरी का काम शुरू किया। मैंने दिन-रात एक करके पसीना बहाया। धीरे-धीरे मुझे मुकादम (ठेकेदार) का काम मिल गया। मैंने अपनी ईमानदारी की कमाई से अपना पूरा कर्ज़ ब्याज सहित चुका दिया। आज मैं पूरी तरह से कर्ज़मुक्त हूँ और शहर में मेरा एक छोटा सा काम भी शुरू हो गया है।”
मुकेश ने सीमा की आँखों में झाँकते हुए कहा, “मैं इस पूरे एक साल में हर दिन, हर पल सिर्फ आपके बारे में सोचता था। आपने मुझे जो नई ज़िंदगी दी थी, उसी का नतीजा है कि मैं आज एक सम्मानित इंसान बन पाया हूँ। मैं आज सिर्फ आपसे यह पूछने आया हूँ… क्या आप एक सुधरे हुए इंसान को अपनी ज़िंदगी में जगह देंगी?”
सीमा मुकेश के शब्दों में सच्चाई और निष्ठा देखकर भावुक हो गई। एक /वि/ध/वा/ के रूप में उसने सालों से जिस एकांत और तिरस्कार को झेला था, वह सब मुकेश के इस निश्छल प्रेम और सम्मान के सामने बह गया।
सीमा की आँखों से खुशी के आँसू छलक पड़े। उसने बिना कुछ बोले मुस्कुराते हुए अपना सिर सहमति में हिला दिया।
मुकेश ने आगे बढ़कर सीमा के आँसू पोंछे और दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। उस पहाड़ी कुटिया के आँगन में, जहाँ कभी भय और /अ/नै/ति/क/ वासना की परछाईं पड़ी थी, आज वहाँ सच्चे प्रेम, सम्मान और विश्वास का नया सवेरा हो चुका था।
दो महीने बाद, मुकेश और सीमा ने सादगी से मंदिर में विवाह कर लिया और शहर में एक नए, खुशहाल जीवन की शुरुआत की।
उपसंहार: कहानी का सार
सीमा और मुकेश की यह कहानी इस बात का जीवंत प्रमाण है कि परिस्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, यदि इंसान को सही मार्गदर्शन और सुधार का अवसर मिले, तो वह पाप और /अप/रा/ध/ के अंधकार से निकलकर अच्छाई के मार्ग पर चल सकता है। सीमा की करुणा और मुकेश के आत्म-सुधार ने दो बिखरी हुई ज़िंदगी को समेटकर एक अटूट प्रेम-बंधन में पिरो दिया।