PART 4 देवर और भाभी दोनों के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/वजह जानकर पुलिस के होश उड़ गए/
देवर और भाभी का कांड (भाग 4): 15 साल बाद रिहाई, खंडहर गाँव और प्रायश्चित का अंतिम मार्ग
भाग 3 में आपने देखा कि किस तरह हाईकोर्ट से अपील खारिज होने के बाद सुशील ने जेल की सलाखों के पीछे अध्यात्म और नशा-विरोधी संदेशों के जरिए प्रायश्चित की राह चुनी।
भाग 4 में पढ़ें 15 साल बाद सुशील की जेल से रिहाई, सलेमपुर गाँव में उसकी वापसी, पुराने खंडहर मकान का दर्दनाक सच और जीवन के अंतिम दिनों में समाज सेवा का संकल्प।
1. 15 साल बाद समय से पूर्व रिहाई (Remission)
कानपुर सेंट्रल जेल में 15 सालों तक लगातार सुधरते व्यवहार, जेल कारखाने में निस्वार्थ काम और अन्य कैदियों को श/राब छोड़ने के लिए प्रेरित करने के कारण सुशील कुमार के नाम की सिफारिश राज्य सरकार की रिहाई समिति (Remission Board) को भेजी गई।
- अदालत और जेल प्रशासन की रिपोर्ट: जेल अधीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि सुशील का मानसिक संतुलन और आचरण पूरी तरह बदल चुका है। उसने अपने किए गए गंभीर अ/पराध का दिल से पश्चाताप कर लिया है।
- रिहाई का आदेश: राज्यपाल की स्वीकृति के बाद 15 साल की सजा काटने के बाद सुशील कुमार को जेल से रिहा कर दिया गया। जब वह जेल के मुख्य दरवाजे से बाहर निकला, तो उसकी उम्र 50 वर्ष के पार हो चुकी थी, बाल सफेद हो चुके थे और आँखों में जीवन भर का दर्द समाया हुआ था।
2. सलेमपुर गाँव में वापसी: वीरान रास्ता और खंडहर घर
जेल से बाहर आने के बाद सुशील सीधी बस पकड़कर अपने पुराने गाँव सलेमपुर पहुँचा। 15 सालों में गाँव का नक्शा तो थोड़ा बदल चुका था, लेकिन उसके घर की गली आज भी वैसी ही वीरान थी।
- भूतहा खंडहर: जिस घर में कभी भाई गौरव की हंसी और पत्नी अक्षरा की मौजूदगी थी, वह घर अब पूरी तरह ढह चुका था। छत गिर चुकी थी और दीवारों पर झाड़-झंकार उग आए थे।
- गाँव वालों का रवैया: गाँव के पुराने बुजुर्गों ने सुशील को पहचान लिया। लोगों के मन से पुराना गुस्सा तो कम हो चुका था, लेकिन उस खौ/फ़नाक दोहरे ह/त्याकांड की यादें आज भी लोगों के जेहन में ताजा थीं। गाँव के युवाओं के लिए सुशील एक चेतावनी जैसा उदाहरण बन चुका था।
3. भाई और पत्नी की याद में प्रार्थना और अश्रुपात
गाँव पहुँचकर सुशील सबसे पहले अपने पुराने ढहे हुए घर के उसी कोने में गया जहाँ 15 साल पहले ख़ू/न से लथपथ ला/शें पड़ी थीं।
- अश्रुपूर्ण पश्चाताप: सुशील वहीं जमीन पर बैठकर फूट-फूटकर रोने लगा। उसने हाथ जोड़कर ईश्वर से और अपने मृत भाई व पत्नी की आत्मा से क्षमा मांगी।
- साधु जैसा जीवन: उसने तय किया कि वह अब अपनी बाकी बची जिंदगी गाँव के बाहर एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर रहेगा और किसी से भी कोई शिकायत नहीं करेगा।
4. जीवन का अंतिम संकल्प: नशा-मुक्ति अभियान
सुशील ने अपनी बाकी बची जिंदगी को समाज के भले के लिए समर्पित करने का निर्णय लिया। उसने आसपास के गाँवों में घूम-घूमकर श/राब के खिलाफ अभियान चलाना शुरू किया।
- आपबीती का संदेश: वह चौपालों और पंचायतों में बैठकर युवाओं को अपनी दुखद दास्तान सुनाता और कहता:
“एक घूंट श/राब और एक सेकंड का अनियंत्रित गुस्सा इंसान से उसका भाई, उसकी पत्नी, उसकी इज्जत और पूरी जिंदगी छीन लेता है। मेरी इस बदहाल जिंदगी को देखो और कसम खाओ कि कभी श/राब को हाथ नहीं लगाओगे।”
- युवाओं पर असर: सुशील की इस पहल से सलेमपुर और आसपास के कई गाँवों के दर्जनों युवाओं ने श/राब और जुए जैसी बुरी आदतों को हमेशा के लिए छोड़ दिया।
5. अंतिम उपसंहार: प्रायश्चित और न्याय का अंतिम सत्य
सलेमपुर की यह कहानी यहाँ आकर पूरी होती है। यह घटना हमें सिखाती है कि:
- कानून का शिकंजा: अ/पराध कितना भी तीव्र गुस्से में किया गया हो, कानून की सजा से कोई नहीं बच सकता।
- प्रायश्चित की शक्ति: भले ही अतीत को बदला नहीं जा सकता, लेकिन इंसान सच्चे दिल से पश्चाताप करके समाज को एक नई दिशा दे सकता है।
- पारिवारिक मर्यादा: अनैतिक सं/बंध और धो/खा हमेशा विनाश ही लाते हैं, जबकि संयम और विश्वास ही परिवार को जोड़े रखता है।