स्कूल टीचर ने मां और बेटी दोनों के साथ कर दिया कारनामा/दोनों के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/
स्कूल टीचर ने मां और बेटी दोनों के साथ कर दिया कारनामा/दोनों के साथ हुआ बहुत बड़ा हादसा/
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सच्ची घटना: माता-पिता और बेटी की चरित्रहीनता से भरी परिभ्रमित परिवार की कहानी – भरतपुर के चिकसाना गांव में हुई एक भयानक घटना
राजस्थान के भरतपुर जिले में चिकसाना नाम का एक छोटा सा गांव है। यह गांव शांतिपूर्वक जीवन-यापन कर रहा था, लेकिन कुछ परिवारों की चरित्रहीनता ने उस शांति को हमेशा के लिए बिगाड़ दिया। वेद प्रकाश नाम का एक पुलिस अधिकारी यहां रहता था। वह हेड कांस्टेबल का पद संभालता था और लोगों से मोटी-मोटी रिश्वत लेने का शौकीन था। बिना रिश्वत दिए उसके काम नहीं चलते थे। वह शराब, कबाब और शराब की चीजों का दीवाना था। उसके परिवार में धर्मपत्नी मीनू देवी थी, जो चाल-चलन और चरित्र में कुछ ठीक नहीं थी। लेकिन वेद प्रकाश इस बात से अनजान था।

परिवार में दो बेटियां थीं – बड़ी बेटी कोमल और छोटी बेटी अनीता। कोमल दो साल पहले गांव के लड़के रितेश के साथ भागकर शादी कर चुकी थी। वह रितेश के साथ अपना जीवन बिता रही थी। छोटी बेटी अनीता दसवीं कक्षा में पढ़ रही थी। अनीता की पढ़ाई-लिखाई में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी। एक बार दसवीं में फेल हो चुकी थी। तब से उसकी मां मीनू देवी अनीता पर ज्यादा ध्यान देने लगी थी। वह सोचने लगी थी कि कहीं मेरी छोटी बेटी भी किसी गलत कदम पर न पड़ जाए। लेकिन मां और बेटी दोनों बाद में गलतियां कर बैठीं।
अनीता रोज सुबह आठ बजे स्कूल जाती और शाम चार बजे घर लौटती। स्कूल के पास ही एक सरकारी विद्यालय था। वहां गणित का टीचर चंद्रभान रहता था। वह पिछले एक साल से कमरे किराए पर लेकर रह रहा था। चंद्रभान टीचर हमेशा स्कूल की सभी महिला टीचरों को गंदी नजर से देखता था। वह उनसे मजाक भी करता था और पसंद भी करता था। लेकिन असली समस्या अनीता और उसके मां मीनू देवी से जुड़ी थी।
तीन दिसंबर दो हजार पच्चीस की सुबह। अनीता स्कूल पहुंच चुकी थी। कक्षा दस में चंद्रभान टीचर पढ़ा रहे थे। अनीता अपनी सहेली से बात कर रही थी। टीचर की नजर अनीता पर पड़ी तो वह गुस्सा हो गया। वह अनीता के पास आया और बोला, “मुझे अपनी कॉपी दिखाओ।” अनीता ने कॉपी दी। चंद्रभान ने देखा और आंखें फटी रह गईं। एक पेज पर लिखा था – “आई लव यू सर चंद्रभान”। टीचर मन में सोचने लगा कि यह लड़की मुझे पसंद करती है। क्यों न फायदा उठा लूं।
उस दिन स्कूल खत्म हुआ। अनीता घर लौटी और मां मीनू को बताया, “मां, एक टीचर ने स्कूल में बुलाया है। कल आ जाना।” मीनू देवी ने हंसकर कहा, “कोई बात नहीं बेटी, कल स्कूल जाऊंगी।” अगली सुबह अनीता स्कूल पहुंची। डेढ़ घंटे बाद मां भी आई। प्रिंसिपल से मिली और टीचर चंद्रभान के पास गई। टीचर की नजर मीनू देवी की खूबसूरती पर पड़ी तो वह स्तब्ध रह गया। वह ऊपर से नीचे तक मीनू को देखने लगा। मन में सोचा – मेरी बेटी अनीता तो कम खूबसूरत है। बल्कि इसकी मां तो काफी खूबसूरत है।
मीनू ने पूछा, “मुझे स्कूल में क्यों बुलाया है?” चंद्रभान ने जवाब दिया, “तुम्हारी बेटी गणित में कमजोर है। एक बार फेल हो चुकी है। इसकी ट्यूशन रखवा दो।” मीनू बोली, “हमारे गांव में आपसे अच्छा कोई टीचर नहीं है। आप ही मेरी बेटी को घर पर ट्यूशन दें। जो फीस बनेगी, हम हर महीने दे देंगे।” चंद्रभान खुश हो गया।
इस तरह से चंद्रभान हर रोज मीनू के घर आता और अनीता को गणित पढ़ाता। पंद्रह दिन बाद मीनू इस टीचर के आसपास मंडराने लगी। कभी चाय के बहाने, कभी पानी के बहाने। दोनों बातें करने लगे। मोबाइल नंबर एक्सचेंज कर लिया। घंटों बातें होने लगीं। प्रेम की बातें शुरू हुईं। दोनों नजदीकियां बढ़ती गईं। लेकिन मौका नहीं मिलता था।
तीस दिसंबर दो हजार पच्चीस की शाम। अनीता घर में काम कर रही थी। सहेली तमन्ना ने फोन किया, “आज मेरा जन्मदिन है, आ जाना।” अनीता मां को बताया, “मां, आज टीचर नहीं आना। मैं सहेली के घर जाती हूं।” मीनू बोली, “बेटी, टीचर का समय है।” अनीता बोली, “आज टीचर नहीं पढ़ाना। मैं सहेली के घर जाती हूं।” अनीता चली गई।
पांच बजे चंद्रभान मीनू के दरवाजे पर दस्तक दिया। मीनू ने दरवाजा खोला। चंद्रभान अंदर आया और बोला, “अनीता कहां है?” मीनू बोली, “वो सहेली के घर पर गई है, जन्मदिन मनाने। रात होने से पहले नहीं आएगी।” चंद्रभान बोला, “मुझे फोन करके पूछ लो।” मीनू ने अनीता को फोन किया। अनीता बोली, “मां, आज टीचर को बोल दो कि घर चला जाए।” फोन काट दिया गया।
मीनू बोली, “मेरी बेटी का मन नहीं है।” चंद्रभान बोला, “तो मैं घर चलता हूं।” मीनू का चाल-चलन ढीला था। उसने चंद्रभान का हाथ पकड़ लिया और बोली, “कहीं भी जाने की जरूरत नहीं।” चंद्रभान समझ गया। मीनू ने घर का मुख्य दरवाजा बंद कर दिया। दोनों कमरे में गए और गलत रिश्ते कायम हो गए। दोनों ने सारी मर्यादा तोड़ दी। जब काम पूरा हुआ तो मीनू बोली, “तुम मेरे घर आते रहो। जब मौका मिले, काम कर लेना।” चंद्रभान खुश हो गया।
यह प्रेम प्रसंग चलता रहा। मीनू पति के आने पर चुप रहती। चंद्रभान हर मौके पर आ जाता। दोनों सुख-दुख बांटते। लेकिन धीरे-धीरे नजदीकियां बढ़ती गईं।
दस जनवरी दो हजार छब्बीस। स्कूल की छुट्टियां शुरू हो गईं। मीनू बोली, “बेटी, मैं शहर कपड़े खरीदने जाऊंगी।” अनीता बोली, “मां, टीचर शाम पांच बजे आते हैं। मैं पढ़ाई करूंगी।” मीनू बोली, “कोई बात नहीं, मैं शहर जाऊंगी।” मीनू शहर चली गई।
पांच बजे अनीता अकेली थी। दरवाजे पर दस्तक हुई। अनीता ने दरवाजा खोला। चंद्रभान अंदर आया। अनीता बोली, “मां शहर में कपड़े खरीदने गई है।” चंद्रभान मन में सोचा – आज अच्छा मौका है। अनीता बोली, “सर, पढ़ाई शुरू करें।” चंद्रभान ने अनीता को छूना शुरू कर दिया। अनीता ने विरोध नहीं किया। चंद्रभान ने घर का दरवाजा बंद कर दिया। दोनों कमरे में गए और सारी हदें पार कर ली गईं।
घंटा भर बाद टीचर ने अनीता को समझाया, “यह बात किसी को मत बताना।” अनीता बोली, “मैं नहीं बताऊंगी।” चंद्रभान बाहर निकल गया। अब चंद्रभान अनीता के साथ गलत काम करता। अनीता भी मां को धोखा दे रही थी। दोनों अनजान थे कि आगे क्या होने वाला है।
तीस जनवरी दो हजार छब्बीस की सुबह। अनीता ने पिता वेद प्रकाश को फोन किया, “पिताजी, आज मेरा जन्मदिन है। जल्दी घर आ जाना।” वेद प्रकाश बोला, “बेटी, मैं जन्मदिन मनाने आऊंगा।” अनीता खुश थी।
मीनू ने चंद्रभान को फोन किया, “आज अनीता का जन्मदिन है। शाम को जरूर आना।” चंद्रभान बोला, “मैं पूरे दिन रहूंगा।” मीनू बोली, “मेरा पति और बेटी भी रहती हैं। रात में क्या होगा?” चंद्रभान बोला, “मुझ पर छोड़ दो। मैं संभाल लूंगा।” फोन काट दिया गया।
चंद्रभान ने घर से नींद की दवाइयां खरीदीं। शाम सात बजे वेद प्रकाश और अनीता घर लौटे। पूरा परिवार जन्मदिन मनाया। चंद्रभान ने मीनू को एकांत में ले जाकर नशीली दवाइयां दीं। बोला, “खाना में मिला देना। जब नींद आएगी तो मैं फिर आऊंगा।” जन्मदिन मन गया। चंद्रभान ने वेद प्रकाश को कहा, “मैं घर चलता हूं।” वेद प्रकाश और अनीता खाना खाते-खाते गहरी नींद में सो गए।
मीनू ने चंद्रभान को फोन किया, “पति और बेटी नींद में सो चुके हैं। रास्ता साफ है।” चंद्रभान आया। दोनों कमरे में गए और गलत काम शुरू हुआ। काम पूरा होने पर मीनू बोली, “अब हर रात टीचर आना। मैं पति और बेटी को नींद की दवाइयां दे दूंगी।” चंद्रभान खुश हो गया।
पांच फरवरी दो हजार छब्बीस की शाम। मीनू और अनीता काम कर रही थीं। दरवाजे पर दस्तक हुई। चंद्रभान अंदर आया। अनीता को ट्यूशन देना शुरू किया। मीनू ने चाय दी। चंद्रभान चाय पीने लगा। पड़ोसन सुदेश देवी का फोन आया, “मीनू, जल्दी आ जाना। जरूरी बात है।” मीनू बोली, “पंद्रह मिनट में वापस आती हूं।” मीनू बाहर गई।
चंद्रभान ने घर का दरवाजा बंद कर दिया। अनीता को कहा, “आज मौका मिल गया है।” दोनों कमरे में गए और गलत काम शुरू हुआ।
सुदेश ने मीनू को फोन पर कहा, “तुम्हारे घर का टीचर चंद्रभान तुम्हारी बेटी से ज्यादा घुल मिल रहा है। प्रेम प्रसंग चल रहा है।” मीनू गुस्सा हो गई। सुदेश को डांटा, “तू हमारे घर में आग लगा रही है।” पड़ोसियों ने बीच बचा लिया। मीनू सुदेश से झगड़ा कर अपने घर लौटी। दरवाजा अंदर से बंद था। मीनू ने पीटा, लेकिन कोई नहीं खुला। सुदेश की बात सही थी।
मीनू ने दरवाजा खोला। चंद्रभान ने कहा, “मुझे जल्दी निकलना है।” वह चला गया। मीनू ने अनीता को डांटा, “तूने गलत रास्ता चुना। सुदेश ने बताया।” अनीता भड़क गई, “मां, मैंने कई बार देखा है। रात को तुम टीचर को बुलाती हो।” मीनू गुस्सा हो गई।
मीनू रसोई गई। धारदार चाकू उठाया। अनीता के पेट में बार-बार चाकू मारा। अनीता चीखी। पड़ोसी आए, लेकिन मीनू काम खत्म कर चुकी थी। अनीता की जान चली गई। पुलिस आई। अनीता का शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया। मीनू को गिरफ्तार किया गया। पुलिस स्टेशन में पूछताछ हुई। मीनू ने अपना पूरा जुर्म कबूल कर लिया। पुलिस ने चार्जशीट दायर कर दी।
टीचर चंद्रभान पर भी कई धाराएं लगाई गईं। वह जेल में बंद है।
दोस्तों, यह कहानी किसी के दिल दुखाने के लिए नहीं है। बल्कि जागरूकता के लिए है। मां-बेटी का चरित्रहीन होना कितना बड़ा खतरा है। परिवार की चुप्पी कितनी खतरनाक हो सकती है। सावधान रहो, परिवार की बातें किसी से छुपाओ मत। सच्चाई हमेशा सामने आती है।
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