PART 3 ससुर के साथ मिलकर कर दिया करनामा/ससुर की हुई मौ*त/
ससुर के साथ मिलकर कर दिया करनामा / भाग ३: पश्चाताप और हवेली का अंत
प्रस्तावना:
नमस्कार दोस्तों, मैं कुलदीप राणा। बेडला गाँव के उस चर्चित खूनी ह/त्याकांड के बाद जहाँ एक ओर उदयपुर की सत्र अदालत ने अजय को उम्रकैद (आजीवन कारावास) की सजा सुनाई, वहीं दूसरी ओर इस घटना के दूरगामी परिणाम पूरे गाँव और परिवार पर देखने को मिले। इस तीसरे भाग में हम देखेंगे कि जे/ल* के भीतर अजय की ज़िंदगी का क्या हुआ, उस २८ एकड़ ज़मीन और आलीशान हवेली का क्या हश्र हुआ और इस कांड में शामिल अन्य लोगों का क्या अंजाम हुआ।
१. उदयपुर केंद्रीय जे/ल* में अजय का पश्चाताप
अदालत के फैसले के बाद अजय को उदयपुर के केंद्रीय जे/ल* की सलाखों के पीछे भेज दिया गया। जे/ल* में नियमित दिनचर्या और न/शे से दूर रहने के कारण अजय का न/शा पूरी तरह उतर चुका था।
शांत दिमाग से जब वह अपने अतीत के बारे में सोचता, तो उसका दिल दहल उठता। रात के सन्नाटे में उसे अपनी पत्नी पिंकी देवी की चीखें और अपने पिता वेद प्रकाश का खू*न से लथपथ चेहरा सपने में दिखाई देता।
अजय जे/ल* की कालकोठरी में सिर पकड़कर रोता और खुद से कहता, “काश! मैंने उस रात श/राब न पी होती। काश! मैंने अपने पिता और पत्नी पर कु/ल्हाड़ी चलाने के बजाय कानून और पुलिस का सहारा लिया होता, तो आज मेरा परिवार तबाह होने से बच जाता।”
लेकिन अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत। न/शे और क्षणिक गुस्से ने अजय का जीवन सदा के लिए अंधकार में धकेल दिया था।
२. बहन सुमन से जे/ल* में अंतिम मुलाकात
सजा होने के कुछ महीनों बाद अजय की बहन सुमन उससे जे/ल* की मुलाकात कक्ष में मिलने पहुँची। सुमन को देखकर अजय फूट-फूटकर रोने लगा।
सुमन की आँखों में भी आँसू थे। उसने भाई से कहा, “अजय! श/राब और गुस्से ने सब कुछ भस्म कर दिया। पिता जी चले गए, भाभी की ह/त्या* हो गई और तू जीवन भर के लिए जे/ल* की सलाखों के पीछे बंद हो गया। हमारा पूरा परिवार हँसी-खुशी उजाड़ में बदल गया।”*
अजय ने रोते हुए अपनी बहन से अपनी २८ एकड़ ज़मीन और हवेली के बारे में पूछा। सुमन ने भारी मन से जवाब दिया, “भैया! उस पाप और र/क्त से सनी संपत्ति को कोई हाथ भी नहीं लगाना चाहता। गाँव में उस हवेली को अब सब ‘श्रापित हवेली’ कहने लगे हैं।”*
३. ‘श्रापित हवेली’ और बेडला गाँव का सन्नाटा
बेडला गाँव में वेद प्रकाश की वह विशाल बैठक और आलीशान हवेली अब पूरी तरह सुनसान और वीरान हो चुकी थी। दरवाजों पर बड़े-बड़े ताले लटके थे और चारों ओर झाड़-झंखाड़ उग आए थे।
गाँव के लोग शाम ढलते ही उस हवेली के पास से गुजरने में भी कतराते थे। ग्रामीणों का मानना था कि जहाँ अ/नै/तिक सं/बंधों, धोखे और नृशंस ह/त्या* जैसी घटनाएँ हुई हों, वहाँ केवल तबाही की परछाई ही बचती है।
वेद प्रकाश की २८ एकड़ उपजाऊ ज़मीन लावारिस पड़ी रही। जिस धन-दौलत और पावर का घमंड जमींदार को था, वह मिट्टी में मिल चुकी थी।
४. रजनी देवी और मुकुल नौकर का अंजाम
इस दोहरे ह/त्याकांड का प्रभाव उन लोगों पर भी पड़ा जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस अ/नै/तिकता के भागीदार थे:
- रजनी देवी: पुलिस पूछताछ और अदालत में गवाही के बाद रजनी देवी का सच पूरे गाँव के सामने आ चुका था। उसके पति ने सच्चाई जानने के बाद उसे हमेशा के लिए छोड़ दिया। पैसों के लालच में अनैतिक राह चुनने वाली रजनी का सामाजिक रूप से पूरी तरह बहिष्कार (Boycott) कर दिया गया और उसे दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर होना पड़ा।
- नौकर मुकुल: जमींदार वेद प्रकाश के यहाँ रहकर रोज़ श/राब मँगवाने और अ/नै/तिक काम देखने वाले नौकर मुकुल को गहरा मानसिक धक्का लगा। उसने इस घटना के बाद श/रा*ब और न/शे से पूरी तरह तौबा कर ली और गाँव छोड़कर दूसरे शहर में मेहनत-मजदूरी करने चला गया।
५. राजस्थान उच्च न्यायालय (High Court) में याचिका और फैसला
अजय के वकील ने उदयपुर सत्र अदालत के उम्रकैद के फैसले के खिलाफ जोधपुर उच्च न्यायालय (High Court) में अपील याचिका दायर की। वकील का तर्क था कि अजय को उकसावे (Provocation) के तहत कम सजा मिलनी चाहिए।
उच्च न्यायालय के दो जजों की पीठ ने मामले की पुनरीक्षा की। अदालत ने कहा: “यद्यपि पीड़ित पक्षों का आचरण मर्यादा के विपरीत था, परंतु जिस निर्ममता से अभियुक्त ने कु/ल्हाड़ी से दो-दो ह/त्याओं को अंजाम दिया और श/व के टुकड़े किए, वह अत्यधिक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कानून किसी भी व्यक्ति को स्वयंभू न्यायाधीश बनने की अनुमति नहीं देता।”
उच्च न्यायालय ने सत्र अदालत के उम्रकैद के फैसले को बरकरार रखा और अजय की अपील खारिज कर दी।
६. गाँव के लिए सीख और निष्कर्ष
इस पूरे घटनाक्रम (भाग १, भाग २ और भाग ३) ने बेडला गाँव के साथ-साथ आसपास के पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। गाँव की पंचायत ने इस घटना से सबक लेते हुए गाँव में अवैध श/रा*ब के ठेकों और न/शे की बिक्री पर कड़े प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया।
निष्कर्ष:
दोस्तों! बेडला गाँव की यह खू*नी दास्तान हमें तीन सबसे महत्वपूर्ण जीवन की सीख देती है:
१. न/शा जीवन का दुश्मन है: न/शा इंसान की सोचने-समझने की शक्ति छीन लेता है और उसे हैवान बना देता है। २. अ/नै/ति*कता का अंत तबाही है: चरित्रहीनता और लालच का अंतिम मार्ग केवल विनाश की ओर जाता है। ३. क्रोध और हिंसा समाधान नहीं: क्षणिक आवेश में उठाया गया गलत कदम पूरे जीवन के पछतावे का कारण बनता है।
अजय आज भी जे/ल* की सलाखों के पीछे अपनी जिंदगी के गँवाए हुए पलों और उस खू*नी रात को याद करके रोता है।
आप सभी दर्शकों को इस पूरे तीन भागों के घटनाक्रम से क्या सीख मिली? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।
मिलते हैं दोस्तों किसी नई सत्य घटना व प्रेरणादायक कहानी के साथ, तब तक के लिए—जय हिंद, वंदे मातरम!