दुकानदार ने भूखे लड़के को खाना खिलाया। – News

दुकानदार ने भूखे लड़के को खाना खिलाया।

दुकानदार ने भूखे लड़के को खाना खिलाया।

दोस्तों आज की जो कहानी मैं आप लोगों को सुनाने जा रहा हूं। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर में रहने वाली 32 साल की महिला सीमा की।

सीमा अपने पति मोहन के साथ रहती थी। दोनों पति-पत्नी मिलकर एक बहुत बड़ी किराने की दुकान चलाते थे। उनकी दुकान इतनी अच्छी चलती थी कि आसपास के कई गांव और मोहल्लों के लोग रोजमर्रा का सामान लेने वहीं आया करते थे।

दुकान के पीछे ही उनका छोटा सा लेकिन खूबसूरत घर बना हुआ था। सीमा बहुत जल्दी उठती। सबसे पहले घर का काम करती। फिर भगवान के सामने दीपक जलाती और दुकान खोलने चली जाती। मोहन भी उसका हाथ बढ़ाता था।

लेकिन मोहन की जिंदगी आसान नहीं थी। एक हादसे में उसके दोनों पैर खराब हो गए थे। वह व्हीलचेयर का सहारा लेता था। फिर भी मोहन ने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया। वह अक्सर सीमा से कहता था, “सीमा, भगवान ने मेरे पैर छीन लिए लेकिन हाथ तो दिए हैं। जब तक हाथ काम कर रहे हैं, मैं मेहनत करता रहूंगा।”

मोहन की यह बात सीमा को हमेशा हिम्मत देती थी। दोनों एक दूसरे का सहारा बनकर जिंदगी जी रहे थे।

पैसों की कोई कमी नहीं थी। घर अच्छा था, दुकान अच्छी चलती थी। समाज में उनकी इज्जत थी। लेकिन उनकी जिंदगी में एक बड़ी कमी थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। शादी को कई साल बीत चुके थे। शुरू में दोनों ने सोचा था कि समय सब ठीक कर देगा।

लेकिन साल गुजरते गए। सीमा ने कई डॉक्टरों से इलाज करवाया। दवाइयां ली। लेकिन हर बार निराशा ही हाथ लगी। रिश्तेदारों के घर जब बच्चे खेलते थे, सीमा मुस्कुरा देती थी लेकिन घर लौटते समय उसकी आंखें नम हो जाती थी।

एक दिन शाम को दुकान बंद करने के बाद दोनों बाहर बैठे थे। सामने एक पड़ोसी का छोटा बच्चा खेल रहा था। बच्चा अपनी मां को देखकर दौड़ता हुआ उसके पास आया और बोला, “मम्मी, मुझे भूख लगी है।”

सीमा यह देखकर चुप हो गई। मोहन ने उसकी आंखों में आंसू देख लिए। उसने धीरे से कहा, “सीमा… मुझे पता है तुम क्या सोच रही हो।”

सीमा ने आंसू पोछते हुए कुछ नहीं कहा। मोहन ने कहा, “शायद हमारे नसीब में बच्चा नहीं है।” सीमा तुरंत बोली, “ऐसा मत कहिए मोहन। जब तक सांस है, तब तक उम्मीद भी रहेगी। भगवान चाहेगा तो एक दिन हमारी गोद भी भर देगी।”

मोहन मुस्कुरा दिया और बोला, “ठीक है। तुम भगवान से उम्मीद मत छोड़ना। और मैं तुमसे उम्मीद नहीं छोड़ूंगा।”

उस दिन के बाद सीमा की भगवान के प्रति आस्था कम नहीं हुई। वह रोज सुबह पास के भगवान शिव के मंदिर जाने लगी। वह मंदिर की सीढ़ियों पर बैठकर हाथ जोड़ती और कहती, “भोलेनाथ, मैंने जिंदगी में आपसे कभी धन-दौलत नहीं मांगी। मेरे पास जितना चाहिए, उससे ज्यादा है। बस मेरी एक इच्छा पूरी कर दीजिए। मेरी सुनी गोद भर दीजिए। मुझे भी मां कहकर बुलाने वाला कोई दे दीजिए।”

कई महीनों तक उसकी यही प्रार्थना चलती रही।

फिर एक दिन सुबह कुछ ऐसा हुआ जिसने सीमा की पूरी जिंदगी बदल दी।

उस दिन भी सीमा हमेशा की तरह मंदिर पहुंची। सुबह का समय था। मंदिर में कुछ लोग पूजा कर रहे थे। सीमा ने जैसे ही मंदिर की सीढ़ियों पर पैर रखा, उसे किसी बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। उसने पीछे मुड़कर देखा।

सीढ़ियों के एक कोने में लगभग 3 साल का एक छोटा बच्चा बैठा हुआ था। बच्चा लगातार रो रहा था। उसके चेहरे पर आंसू थे। कपड़े धूल से भरे हुए थे।

सीमा कुछ पल उसे देखती रही। उसने सोचा शायद उसके माता-पति मंदिर के अंदर पूजा कर रहे होंगे। इसलिए वह बच्चे के पास नहीं गई। वह मंदिर के अंदर चली गई और भगवान शिव के सामने बैठकर पूजा करने लगी।

लेकिन पूजा करते समय भी उसका ध्यान बाहर बैठे उस बच्चे की तरफ जा रहा था। कुछ देर बाद सीमा पूजा करके बाहर निकली। बच्चा अभी भी वहीं बैठा था। अब वह पहले से भी ज्यादा जोर-जोर से रो रहा था।

सीमा ने चारों तरफ देखा। मंदिर के बाहर कोई उसे ढूंढता हुआ दिखाई नहीं दे रहा था।

सीमा बच्चे के पास गई और प्यार से बोली, “बेटा, तुम्हारी मम्मी कहां है?”

बच्चे ने रोते हुए मंदिर की तरफ देखा। वह कुछ बोल नहीं पाया। सीमा ने आसपास नजर दौड़ाई। कोई दिखाई नहीं दिया। उसने मंदिर की सीढ़ियों के नीचे भी देखा। फिर मंदिर के आसपास की जगह पर भी गई लेकिन बच्चे के माता-पति का कहीं पता नहीं चला।

करीब आधा घंटा बीत गया। अब सीमा को चिंता होने लगी। वह बच्चे को गोद में उठाकर मंदिर के पुजारी के पास गई। बोली, “बाबा, यह बच्चा काफी देर से बाहर अकेला बैठा रो रहा है। मैंने आसपास इसके मां-बाप को बहुत ढूंढा, लेकिन कोई नहीं मिला।”

पुजारी ने भी बच्चे को देखा। उन्होंने मंदिर के आसपास मौजूद लोगों से पूछताछ की, लेकिन किसी को उस बच्चे के बारे में कुछ पता नहीं था। पुजारी ने कहा, “बेटी, हो सकता है इसके माता-पति किसी काम से गए हों। तुम इसे थोड़ी देर यहीं बैठा दो। अगर इसके मां-बाप आसपास होंगे तो वापस आ जाएंगे।”

सीमा ने बच्चे को देखा। बच्चा अभी भी रो रहा था। उसका छोटा सा हाथ सीमा की साड़ी को पकड़े हुए था। सीमा का दिल भर आया। उसने पुजारी से कहा, “बाबा, अगर इसके मां-बाप इसे लेने वापस नहीं आए तो…”

पुजारी चुप हो गए। कुछ पल बाद बोले, “भगवान सब ठीक करेगा बेटी।”

सीमा ने बच्चे को अपनी गोद में और कसकर पकड़ लिया। फिर उसने धीरे से कहा, “बाबा, अगर मैं इसे अपने घर ले जाऊं तो…”

पुजारी ने सीमा की तरफ देखा। बोला, “अपने घर?”

सीमा बोली, “हां बाबा। जब तक इसके माता-पति का पता नहीं चलता, मैं इसे अपने पास रख लूंगी। इसे अकेला यहां कैसे छोड़ दूं।”

पुजारी सीमा को अच्छी तरह जानते थे। उन्हें पता था कि सीमा और मोहन की कोई संतान नहीं है। उन्होंने कुछ पल बच्चे को देखा और फिर बोले, “ठीक है बेटी। तुम इसे अपने घर ले जाओ। लेकिन अगर इसके माता-पति का पता चलता है तो बच्चा उन्हें सौंपना होगा।”

सीमा ने तुरंत कहा, “बिल्कुल बाबा।”

पुजारी ने बच्चे के सिर पर हाथ रखा और बोले, “और कौन जाने बेटी, भगवान शिव ने ही तुम्हारी प्रार्थना सुनकर इसे तुम्हारे पास भेजा हो।”

यह सुनते ही सीमा की आंखें भर आई। उसने भगवान शिव की मूर्ति की तरफ देखा। उसके होठ कांपने लगे। उसने मन ही मन कहा, “भोलेनाथ, अगर यह सच में आपकी दी हुई जिम्मेदारी है तो मैं इसे पूरी ईमानदारी से निभाऊंगी।”

फिर सीमा बच्चे को लेकर अपने घर चली गई। जब मोहन ने सीमा की गोद में बच्चे को देखा तो वह हैरान रह गया। उसने पूछा, “सीमा, यह बच्चा कौन है?”

सीमा ने उसे पूरी बात बताई। मोहन कुछ देर तक बच्चे को देखता रहा। बच्चा अब रोते-रोते थक चुका था और सीमा की गोद में चुपचाप बैठा था। मोहन की आंखों में भी नमी आ गई। उसने कहा, “शायद ऊपर वाले ने हमारी प्रार्थना सुन ली।”

सीमा बोली, “लेकिन हमें इसके मां-बाप को ढूंढना होगा।”

मोहन ने कहा, “हां, जरूर।”

दोनों ने तय किया कि वह बच्चे के माता-पिता को हर संभव तरीके से ढूंढेंगे। लेकिन तब तक बच्चा उनके साथ ही रहेगा।

उस दिन पहली बार सीमा ने उस बच्चे को अपने हाथ से खाना खिलाया। बच्चा खाना खाते हुए बीच-बीच में सीमा की तरफ देखता रहता। सीमा उसे देखकर मुस्कुराती।

रात में उसने बच्चे को अपने पास सुलाया।

कई साल बाद सीमा के घर में किसी बच्चे की सांसों की आवाज गूंज रही थी। वह पूरी रात बच्चे को देखती रही। कभी उसके सिर पर हाथ फेरती, कभी उसकी चादर ठीक करती और कभी उसकी मासूम शक्ल देखकर मुस्कुरा देती।

सुबह जब बच्चा उठकर बोला, “मुझे भूख लगी है,” तो सीमा की आंखों से आंसू निकल आए। उसने बच्चे को गले लगा लिया। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसके घर में वर्षों से बंद पड़ी खुशियों की खिड़की आज पहली बार खुली हो।

धीरे-धीरे एक महीना बीत गया। सीमा हर बार मंदिर जाती तो पुजारी से पूछती, “बाबा, बच्चे के माता-पति का कुछ पता चला?” पुजारी हर बार सिर हिलाकर कहते, “नहीं बेटी।”

धीरे-धीरे बच्चा सीमा और मोहन से घुल मिल गया। सीमा ने उसका नाम रखा आरव। आरव अब सीमा को देखकर दौड़ता हुआ उसके पास आता। मोहन के व्हीलचेयर के पास बैठता और दुकान में आने वाले ग्राहकों को देखकर उनसे भी घुलने लगा।

सीमा के चेहरे की उदासी जैसे कहीं खो गई थी।

एक दोपहर सीमा दुकान पर बैठी ग्राहकों को सामान दे रही थी। तभी उसकी नजर सड़क के किनारे खड़े एक लड़के पर पड़ी। लड़के की उम्र करीब 12 साल थी। वह काफी देर से दुकान की तरफ देख रहा था।

सीमा ने गौर किया तो उसके कपड़े पुराने और धूल से भरे हुए थे। चेहरा कमजोर था। आंखों में भूख साफ दिखाई दे रही थी।

सीमा ने हाथ के इशारे से उसे अपने पास बुलाया। लड़का धीरे-धीरे दुकान के सामने आया। सीमा ने पूछा, “बेटा, क्या हुआ?” लड़का चुप रहा।

सीमा ने फिर पूछा, “कहां रहते हो?” लड़के ने नीचे देखते हुए कहा, “कहीं नहीं।”

सीमा चौंक गई। बोली, “मत…”

लड़के की आंखों में आंसू आ गए। उसने धीमी आवाज में कहा, “मुझे बहुत भूख लगी है। दो दिन से मैंने कुछ नहीं खाया।”

सीमा का दिल बैठ गया। उसने तुरंत दुकान का काम छोड़ा और कहा, “अरे बेटा, पहले खाना खाओ, बाकी बातें बाद में करेंगे।”

वह दुकान के पीछे बने घर में गई। उसने एक थाली में दो रोटी, सब्जी और थोड़ा चावल रखा और लड़के के सामने रख दिया। लड़का खाना देखकर कुछ पल तक उसे देखता रहा। फिर उसने खाना ऐसे खाना शुरू किया जैसे कई दिनों से उसे इसी पल का इंतजार था।

सीमा चुपचाप उसे देखती रही। उसकी आंखों में आंसू आ गए। खाना खत्म करने के बाद सीमा ने पानी का गिलास दिया। फिर प्यार से पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”

लड़के ने कहा, “मेरा नाम राहुल है।”

सीमा ने पूछा, “तुम्हारे मां-बाप कहां हैं?”

राहुल कुछ देर चुप रहा। फिर उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कहा, “मेरे मां-बाप अब इस दुनिया में नहीं हैं।”

सीमा का चेहरा गंभीर हो गया। राहुल ने आगे कहा, “मेरी बुआ मुझे अपने घर ले गई थी लेकिन एक महीने पहले उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया। उन्होंने कहा कि जा यहां हमने तेरा ठेका नहीं रखा।”

सीमा के हाथ कांप गए। राहुल बोला, “उस दिन से मैं सड़कों पर घूम रहा हूं। कोई खाना दे देता है तो खा लेता हूं। जहां जगह मिलती है वहीं सो जाता हूं। लेकिन दो दिन से किसी ने कुछ नहीं दिया।”

सीमा की आंखों से आंसू बहने लगे।

उसी समय मोहन भी वहां आ गया। उसने राहुल की पूरी बात सुनी। कुछ पल तक वह चुप रहा। फिर उसने सीमा की तरफ देखा और कहा, “सीमा, देख रही हो?”

सीमा ने पूछा, “क्या?”

मोहन बोला, “हम इतने सालों से एक बच्चे के लिए तरसते रहे और जिनके पास बच्चे हैं, कुछ लोग उनकी कदर तक नहीं करते।”

राहुल चुपचाप दोनों को देख रहा था।

मोहन ने कहा, “अगर भगवान ने इसे हमारे सामने भेजा है, तो शायद इसके पीछे भी कोई वजह होगी।”

सीमा ने राहुल की तरफ देखा। उसके चेहरे पर भूख से ज्यादा अकेलापन था।

सीमा धीरे से उसके पास बैठ गई। उसने पूछा, “राहुल, अगर मैं तुमसे कहूं कि तुम हमारे साथ रह सकते हो तो…”

राहुल ने हैरानी से सीमा को देखा और बोला, “क्या मैं सच में यहां रह सकता हूं?”

सीमा ने सिर हिलाया।

राहुल ने पूछा, “लेकिन मैं काम करूंगा।”

सीमा ने उसके मुंह पर हाथ रखकर कहा, “तुम्हें अभी काम करने की जरूरत नहीं है। तुम्हें पढ़ने की जरूरत है।”

राहुल की आंखें भर आई। उसने पूछा, “आप मुझे रोज खाना देंगे?”

सीमा खुद को रोक नहीं पाई। उसने राहुल को गले लगा लिया और रोते हुए बोली, “हां बेटा, आज से मैं तुम्हारी मां हूं.”

राहुल कुछ पल तक बिल्कुल चुप रहा। फिर उसके मुंह से सिर्फ एक शब्द निकला, “मम्मी…”

सीमा ने जैसे ही यह शब्द सुना उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। कई सालों से वह जिस एक शब्द को सुनने के लिए तरस रही थी, आज वह शब्द उसके कानों में गूंज रहा था।

मोहन ने आसमान की तरफ देखकर कहा, “हे भगवान, तेरी लीला भी अपरंपार है। हम एक औलाद के लिए तरस रहे थे और तूने हमारी झोली में दो बेटे डाल दिए.”

सीमा ने आरव को अपनी एक तरफ और राहुल को दूसरी तरफ खड़ा कर लिया। उसने दोनों बच्चों के सिर पर हाथ रखा।

उसे नहीं पता था कि आने वाले समय में इन दोनों बच्चों की वजह से उसकी जिंदगी में कितने बड़े बदलाव आने वाले हैं।

दोस्तों, अब सीमा के घर में दो बच्चे थे। 3 साल का आरव और 12 साल का राहुल।

सीमा दोनों को अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहती थी। वह राहुल को नए कपड़े लेकर आई। उसके बाल कटवाए। उसके लिए चप्पल खरीदी और सबसे जरूरी बात उसने राहुल का स्कूल में दाखिला कराने का फैसला किया।

राहुल को जब यह बात पता चली तो वह बहुत खुश हुआ। लेकिन उसके अंदर एक डर भी था।

एक शाम वह चुपचाप दुकान के बाहर बैठा था। सीमा ने देखा तो उसके पास जाकर पूछा, “क्या हुआ बेटा? आज इतने चुप क्यों हो?”

राहुल ने कहा, “मम्मी, अगर मैं पढ़ाई में अच्छा नहीं कर पाया तो…”

सीमा मुस्कुराई। उसने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटा, तुमने जिंदगी में जो कुछ सहा है, उसके बाद तुम्हें किसी परीक्षा से डरने की जरूरत नहीं है.”

राहुल चुप रहा।

सीमा बोली, “तुम बस मेहनत करना, बाकी तुम्हारी मां देख लेगी.”

राहुल की आंखों में आंसू आ गए। वह बोला, “मुझे कभी किसी ने इस तरह नहीं समझाया.”

सीमा ने उसे गले लगा लिया।

उसी समय घर के अंदर से आरव की आवाज आई, “मम्मी, मम्मी…”

सीमा तुरंत उठी और अंदर चली गई। राहुल उसे देखता रहा। उसके चेहरे पर पहली बार ऐसा भाव था जैसे उसे सच में अपना परिवार मिल गया हो।

अगले दिन सीमा राहुल को स्कूल में दाखिला कराने लेकर गई। स्कूल के प्रधानाचार्य ने जब राहुल की स्थिति के बारे में सुना तो उन्होंने कुछ जरूरी कागजों के बारे में पूछा। राहुल के पास कोई कागज नहीं था।

सीमा ने कहा, “सर, अभी हमारे पास इसके पुराने कागज नहीं हैं लेकिन हम इन्हें बनवाने की कोशिश करेंगे.”

प्रधानाचार्य ने राहुल की तरफ देखा। फिर बोले, “बेटा, मन लगाकर पढ़ना, तुम्हें बहुत आगे जाना है.”

राहुल ने सिर हिलाया।

उस दिन से उसकी जिंदगी बदलने लगी।

सुबह वह स्कूल जाता। दोपहर को दुकान पर सीमा की मदद करता और शाम को मोहन के पास बैठकर पढ़ाई करता। मोहन खुद ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था। लेकिन उसे मेहनत और ईमानदारी की कीमत अच्छी तरह पता थी। वो राहुल से अक्सर कहता, “बेटा, जिंदगी में चाहे जितना बड़ा आदमी बन जाना लेकिन किसी गरीब या मजबूर इंसान को कभी छोटा मत समझना.”

राहुल हर बात ध्यान से सुनता। धीरे-धीरे घर में दोनों भाइयों के बीच भी प्यार बढ़ने लगा। आरव अभी छोटा था। वह राहुल को देखते ही उसके पीछे भागता। कभी उसकी किताब उठा लेता। कभी उसकी पेंसिल लेकर भाग जाता और कभी उसके पास बैठकर कहता, “भैया, मेरे साथ खेलो.”

राहुल उसे कभी डांटता नहीं था। वह अपनी पढ़ाई छोड़कर उसके साथ खेलने लगता।

सीमा दूर से दोनों को देखती तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती। वह सोचती, “भगवान ने मुझे एक नहीं दो खुशियां दी हैं.”

कुछ महीने ऐसे ही गुजर गए। घर में खुशियां थी। दुकान अच्छी चल रही थी। मोहन और सीमा बच्चों की परवरिश में लगे हुए थे।

लेकिन एक दिन दोपहर के समय अचानक उनकी दुकान के सामने एक अनजान आदमी आकर खड़ा हो गया। उसकी उम्र करीब 50 साल थी। उसने दुकान के अंदर नजर दौड़ाई। फिर उसकी नजर राहुल पर पड़ी। राहुल उस समय एक ग्राहक को सामान दे रहा था।

उस आदमी का चेहरा देखते ही बदल गया। वह कुछ कदम आगे बढ़ा। फिर अचानक रुक गया। उसकी आंखें राहुल पर टिक गई। उसने बहुत धीमी आवाज में कहा, “यह लड़का यहां कैसे?”

सीमा ने उसकी आवाज सुन ली। उसने पूछा, “आप किससे मिलना चाहते हैं?”

आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। वह लगातार राहुल को देखता रहा। राहुल ने भी उसकी तरफ देखा लेकिन शायद वह उसे पहचान नहीं पाया।

सीमा ने फिर पूछा, “भाई साहब, आपने कुछ कहा?”

आदमी ने तुरंत अपनी नजरें हटा ली। वह बोला, “नहीं, मैं तो सामान लेने आया था.” उसने जल्दी से कुछ सामान लिया और चला गया।

सीमा को उसका व्यवहार अजीब लगा। वह देर तक सड़क की तरफ देखती रही।

शाम को उसने राहुल से पूछा, “बेटा, आज दुकान पर एक आदमी आया था. क्या तुम उसे जानते हो?”

राहुल ने सिर हिलाया। बोला, “नहीं मम्मी.”

सीमा ने पूछा, “पक्का?” वो बोला, “हां मम्मी, मैंने उसे कभी नहीं देखा.”

सीमा ने बात वहीं छोड़ दी। लेकिन उसके मन में उस आदमी का चेहरा घूमता रहा।

अगले दिन वही आदमी फिर दुकान के आसपास दिखाई दिया। इस बार उसने दुकान के अंदर आने की बजाय सामने खड़े होकर राहुल को देखा।

सीमा ने उसे देख लिया। वह बाहर आई। बोली, “आप कल भी आए थे और आज भी यहां खड़े हैं. क्या बात है?”

आदमी घबरा गया। उसने कहा, “कुछ नहीं बहन जी.”

सीमा ने कहा, “अगर कोई बात है तो साफ-साफ बताइए.”

आदमी कुछ देर चुप रहा। फिर उसने पूछा, “क्या यह लड़का आपका बेटा है?”

सीमा ने बिना झिझक कहा, “हां.”

आदमी ने राहुल की तरफ देखा। फिर बोला, “आको पता है यह लड़का कौन है?”

सीमा के चेहरे पर चिंता आ गई। वो बोली, “क्या मतलब?”

आदमी बोला, “मैं इसके बारे में कुछ जानता हूं.”

सीमा ने कहा, “तो बताइए…”

वह आदमी अचानक वहां से चला गया। सीमा उसके पीछे कुछ कदम गई लेकिन वह तेजी से भीड़ में गायब हो गया।

उस दिन सीमा के मन में बेचैनी बढ़ गई।

रात में उसने मोहन को सारी बात बताई। मोहन कुछ देर सोचता रहा। फिर बोला, “हो सकता है वह राहुल के गांव या परिवार का कोई आदमी हो.”

सीमा बोली, “लेकिन अगर वह उसे जानता है तो उसने बताया क्यों नहीं.”

मोहन ने कहा, “कल अगर वह फिर आए तो उससे बात करेंगे.”

अगले दिन वह आदमी फिर आया। इस बार मोहन भी दुकान पर मौजूद था।

आदमी ने राहुल को देखा और जैसे ही वापस मुड़ने लगा, मोहन ने उसे आवाज दी। “भाई साहब, जरा रुकिए.”

आदमी रुक गया।

मोहन ने पूछा, “आप राहुल को जानते हैं?”

आदमी ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा, “हां.”

सीमा और मोहन दोनों एक दूसरे की तरफ देखने लगे।

मोहन ने पूछा, “कहां से?”

आदमी ने कहा, “स गांव में राहुल पहले रहता था, मैं उसी गांव का रहने वाला हूं.”

सीमा ने तुरंत पूछा, “तो उसके बारे में आपको क्या पता है?”

आदमी ने लंबी सांस ली। फिर बोला, “बहन जी, राहुल ने आपको जो बताया है वह पूरी कहानी नहीं है.”

सीमा के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने पूछा, “क्या मतलब?”

आदमी बोला, “राहुल के माता-पति की मौत जरूर हुई थी, लेकिन उसके बाद उसे उसकी बुआ के पास भेजा गया था.”

सीमा ने कहा, “यह बात तो राहुल ने भी बताई है.”

आदमी बोला, “लेकिन उसकी बुआ ने उसे सिर्फ घर से निकाला नहीं था बल्कि उन्होंने उसके पिता की एक पुरानी चीज भी अपने पास रख ली थी.”

मोहन ने पूछा, “क्या चीज?”

आदमी ने चारों तरफ देखा। फिर धैर्य से बोला, “एक जमीन के कागज.”

सीमा और मोहन दोनों चौंक गए।

आदमी ने बताया, “राहुल के पिता के नाम पर गांव में थोड़ी जमीन थी. उसके माता-पति के मरने के बाद वह जमीन राहुल के नाम होनी थी. लेकिन राहुल नाबालिग था. इसीलिए उसकी देखभाल का जिम्मा उसकी बुआ को मिला.”

मोहन ने पूछा, “फिर…”

आदमी बोला, “फिर गांव में खबर फैलने लगी कि राहुल के नाम जमीन है.”

सीमा समझने लगी कि मामला गंभीर है।

आदमी ने आगे कहा, “राहुल की बुआ ने कुछ लोगों के साथ मिलकर उस जमीन को अपने नाम करवाने की कोशिश की लेकिन कागज पूरे नहीं थे. इसीलिए राहुल उनके लिए परेशानी बन गया.”

सीमा के चेहरे पर गुस्सा आ गया। वह बोली, “तो इसीलिए उन्होंने उसे घर से निकाल दिया.”

आदमी ने सिर हिलाया। बोला, “शायद यही वजह थी.”

सीमा ने राहुल की तरफ देखा। राहुल दूर खड़ा यह सब सुन रहा था। उसकी आंखों में डर था।

सीमा तुरंत उसके पास गई। उसने राहुल का हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा, तुम डरना मत.”

राहुल ने पूछा, “मम्मी, क्या मेरी वजह से आपको परेशानी होगी?”

सीमा ने उसे गले लगाकर कहा, “तुम मेरी परेशानी नहीं हो. तुम मेरी जिम्मेदारी हो.”

मोहन ने भी कहा, “और बेटा, जिस घर में तुमने कदम रखा है वहां तुम्हें किसी से डरने की जरूरत नहीं है.”

राहुल रोने लगा लेकिन तभी वह आदमी बोला, “एक बात और है.”

मोहन ने पूछा, “क्या?”

आदमी बोला, “राहुल के पिता की मौत जिस हादसे में हुई थी वह हादसा सामान्य नहीं था.”

दुकान में अचानक सन्नाटा छा गया।

सीमा ने घबराकर पूछा, “क्या कहना चाहते हैं आप?”

आदमी बोला, “गांव में कई लोग मानते हैं कि वह सिर्फ सड़क दुर्घटना नहीं थी.”

मोहन ने गंभीर आवाज में पूछा, “तो फिर क्या था?”

आदमी ने सिर झुका लिया और बोला, “यह बात आज तक साबित नहीं हुई.”

सीमा ने राहुल की तरफ देखा। राहुल अब रो रहा था। उसे अपने माता-पति की मौत की पूरी सच्चाई शायद खुद भी नहीं पता थी।

उस रात सीमा ने राहुल को अपने पास बुलाया सुलाया। लेकिन वह खुद पूरी रात सो नहीं सकी। उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था। आखिर राहुल के माता-पति के साथ क्या हुआ था और उसकी बुआ ने उसे घर से क्यों निकाला था?

सुबह होते ही सीमा ने फैसला किया कि वह इस मामले की सच्चाई पता करेगी।

लेकिन उससे पहले एक और समस्या उनके सामने आ गई।

अगली सुबह दुकान खोलते ही एक आदमी वहां आया और उसने सीमा से कहा, “आप राहुल को अपने पास नहीं रख सकती.”

सीमा ने हैरानी से पूछा, “आप कौन होते हैं? यह कहने वाले?”

आदमी ने जेब से कुछ कागज निकाले और बोला, “मेरे पास इसके बारे में कानूनी कागज है.”

सीमा के हाथ से सामान की पर्ची गिर गई। मोहन भी अपनी व्हीलचेयर से आगे आया।

आदमी ने कागज मेज पर रखे और बोला, “राहुल को मेरे साथ भेजना होगा.”

राहुल डर कर सीमा के पीछे छिप गया।

सीमा ने कागजों की तरफ देखा। उसके मन में एक ही बात थी कि जिस बच्चे ने उसे मां कहकर पुकारा है, उसे वह दोबारा किसी के हाथों में नहीं जाने देगी।

सीमा ने उस आदमी से कहा, “आप पहले यह बताइए कि आप हैं कौन? और राहुल को अपने साथ क्यों ले जाना चाहते हैं?”

आदमी ने कहा, “मेरा नाम महेश है. मैं राहुल के पिता का दूर का रिश्तेदार हूं. राहुल के माता-पति की मौत के बाद उसकी जिम्मेदारी हमारे परिवार की थी.”

सीमा ने तुरंत कहा, “अगर जिम्मेदारी आपकी थी तो जब यह बच्चा सड़कों पर भूखा घूम रहा था, तब आप कहां थे?”

महेश के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

मोहन ने भी गंभीर आवाज में कहा, “जिस बच्चे को आपने अकेला छोड़ दिया, आज जब उसे घर और परिवार मिल गया है, तो अचानक आपको उसकी चिंता क्यों होने लगी?”

महेश कुछ पल चुप रहा। फिर उसने कहा, “आप लोग मेरी बात समझ नहीं रहे हैं. यह बच्चा आपके पास कानूनी रूप से नहीं रह सकता.”

सीमा बोली, “कानून की बात आप बाद में करना. पहले यह बताओ कि इन कागजों में क्या लिखा है.”

महेश ने कागज आगे कर दिए।

सीमा ज्यादा पढ़ी लिखी नहीं थी. इसीलिए उसने कागज मोहन को दे दिए।

मोहन ने ध्यान से कागज देखे। कुछ देर बाद उसने कहा, “इन कागजों में कहीं भी यह नहीं लिखा कि राहुल की जिम्मेदारी आपको दी गई है.”

महेश घबरा गया। बोला, “लेकिन…”

मोहन ने बात काटते हुए कहा, “अगर आपके पास सच में कानूनी अधिकार हैं तो किसी वकील को लेकर आइए. हम भी कानून के हिसाब से ही चलेंगे.”

महेश ने राहुल की तरफ देखा। राहुल सीमा का हाथ पकड़े खड़ा था।

महेश ने कहा, “आपको नहीं पता आप किस मुसीबत में पड़ रहे हैं.”

सीमा ने शांत आवाज में कहा, “मुझे सिर्फ इतना पता है कि यह बच्चा अब अकेला नहीं है.”

महेश वहां से चला गया। लेकिन जाते-जाते उसने कहा, “आपको जल्द ही सब पता चल जाएगा.”

उसके जाने के बाद सीमा काफी देर तक चुप रही।

राहुल उसके पास आया और बोला, “मम्मी, क्या वह मुझे ले जाएगा?”

सीमा ने उसे गले लगाते हुए कहा, “नहीं बेटा, जब तक हम हैं, तुम्हें किसी बात से डरने की जरूरत नहीं है.”

लेकिन सीमा के मन में भी डर था। वह समझ चुकी थी कि बात सिर्फ राहुल को अपने पास रखने की नहीं है. राहुल के अतीत में कोई ऐसी बात जरूर थी जिसे कुछ लोग छिपाना चाहते थे।

उसी रात सीमा और मोहन ने बैठकर फैसला किया कि वे राहुल के माता-पति के बारे में पूरी जानकारी निकालेंगे.

अगली सुबह मोहन ने गांव के एक पुराने परिचित को फोन किया. उसका नाम था श्यामलाल. श्यामलाल उसी गांव में रहता था जहां राहुल के माता-पति रहते थे.

मोहन ने उससे पूछा, “भाई, राहुल के माता-पति के बारे में हमें कुछ जानकारी चाहिए.”

श्यामलाल कुछ देर चुप रहा. फिर बोला, “भाई, यह मामला थोड़ा पुराना है लेकिन मैं जितना जानता हूं आपको बताऊंगा.”

मोहन ने कहा, “हमें सिर्फ सच्चाई जाननी है.”

श्यामलाल ने बताया कि राहुल के पिता का नाम सुरेश था. वह बहुत ईमानदार आदमी था. उसके पास गांव में कुछ जमीन थी और वह खेती करता था. उसकी पत्नी राधा घर संभालती थी. दोनों अपने बेटे राहुल से बहुत प्यार करते थे.

सीमा ध्यान से सब सुन रही थी.

श्यामलाल ने आगे कहा, “सुरेश की मौत के कुछ समय पहले उसने गांव में किसी को बताया था कि उसकी जमीन के कागजों को लेकर उसे कुछ लोगों पर शक है.”

मोहन ने पूछा, “किस पर?”

श्यामलाल ने कहा, “उसने नाम नहीं बताया था.”

फिर उसने एक ऐसी बात बताई जिसने सीमा को सोचने पर मजबूर कर दिया. वह बोला, “सुरेश ने मुझसे कहा था कि अगर उसके साथ कभी कुछ गलत हो जाए तो उसके घर की पुरानी संदूक में रखे कागज राहुल के काम आएंगे.”

मोहन ने पूछा, “क्या वह संदूक अभी भी उसके घर में है?”

श्यामलाल बोला, “मुझे नहीं पता. उसके मरने के बाद घर का ज्यादातर सामान उसकी बुआ के पास चला गया था.”

सीमा ने तुरंत कहा, “यही वजह हो सकती है.”

मोहन ने पूछा, “किस बात की?”

सीमा बोली, “शायद उन लोगों को पता था कि जमीन के कागज राहुल के नाम है. इसीलिए उन्होंने राहुल को घर से निकाल दिया.”

मोहन कुछ नहीं बोला. दोनों को अब लगने लगा था कि मामला साधारण नहीं है.

उसी दिन सीमा ने एक वकील से मिलने का फैसला किया. वकील ने सारी बात ध्यान से सुनी. फिर उसने कहा, “अगर बच्चा वास्तव में अनाथ है और उसके माता-पति की मृत्यु हो चुकी है तो उसकी देखभाल और अभिभावकता का मामला कानूनी प्रक्रिया से तय होगा. सिर्फ कोई कागज दिखा देने से बच्चा किसी को नहीं दिया जा सकता.”

सीमा ने पूछा, “तो हमें क्या करना होगा?”

वकील ने कहा, “सबसे पहले बच्चे के माता-पति के मृत्यु प्रमाण पत्र, उसकी पहचान और उसके रिश्तेदारों की जानकारी जुटानी होगी. फिर बच्चे की सुरक्षा और अभिभावकता के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी.”

सीमा ने कहा, “मैं हर प्रक्रिया पूरी करूंगी. बस राहुल को मुझसे अलग मत होने दीजिए.”

वकील ने कहा, “आप चिंता मत कीजिए. कानून बच्चे के हित को ध्यान में रखकर फैसला करता है.”

सीमा को थोड़ी राहत मिली.

लेकिन उसी शाम एक और घटना हुई.

राहुल स्कूल से लौट रहा था. रास्ते में एक आदमी ने उसे रोक लिया. आदमी ने कहा, “तुम राहुल हो?”

राहुल डर गया. उसने कुछ नहीं कहा.

आदमी बोला, “तुम्हारी बुआ तुम्हें वापस बुला रही हैं.”

राहुल ने तुरंत कहा, “मैं उनके पास नहीं जाऊंगा.”

आदमी ने कहा, “अगर तुम नहीं गए, तो तुम्हें पछताना पड़ेगा.”

राहुल दौड़ता हुआ घर पहुंचा.

सीमा ने उसे घबराया हुआ देखा तो पूछा, “क्या हुआ बेटा?”

राहुल ने सारी बात बताई.

सीमा ने उसे अपने पास बैठाया और बोली, “तुम डरना मत.”

राहुल बोला, “मम्मी, मैं आपके पास ही रहना चाहता हूं.”

सीमा ने कहा, “तुम हमेशा हमारे साथ रहोगे लेकिन हमें सब कुछ कानून के हिसाब से करना होगा.”

राहुल ने पूछा, “क्या मैं आपका बेटा नहीं हूं?”

सीमा की आंखों में आंसू आ गए. उसने कहा, “तुम मेरे बेटे हो. कागज चाहे जो कहे, मेरे दिल में तुम्हारी जगह कोई नहीं बदल सकता.”

राहुल ने सीमा को गले लगा लिया.

कुछ दूरी पर खड़ा मोहन यह सब देख रहा था. उसकी आंखों में भी आंसू थे. उसने मन ही मन भगवान से कहा, “हे भगवान, हमने इस बच्चे को अपनाया है. अब इसकी रक्षा भी आप ही करना.”

समय बीतता गया.

राहुल की पढ़ाई अच्छी चल रही थी. आरव और राहुल की दोस्ती और गहरी होती जा रही थी. आरव स्कूल से आने के बाद राहुल घर आता. जैसे ही राहुल घर आता, आरव दौड़कर उससे लिपट जाता.

एक दिन आरव ने मासूमियत से पूछा, “भैया, आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगे?”

राहुल कुछ पल चुप रहा. उसने आरव को गले लगाया और कहा, “कभी नहीं.”

सीमा दूर से दोनों को देख रही थी. उसे लग रहा था जैसे उसके घर की दीवारों ने आखिरकार बच्चों की आवाजें पहचान ली है.

लेकिन इसी बीच दुकान का काम अचानक कम होने लगा. कुछ पुराने ग्राहक सामान लेना बंद करने लगे.

फिर एक दिन एक ग्राहक ने सीमा से कहा, “बहन जी, बाजार में लोग आपके बारे में बातें कर रहे हैं.”

सीमा ने पूछा, “कैसी बातें?”

ग्राहक ने कहा, “लोग कह रहे हैं कि आपने किसी अनाथ बच्चे को उसके परिवार से छीन लिया है.”

सीमा हैरान रह गई. उसे समझ आ गया कि कोई जानबूझकर उसके खिलाफ बातें फैला रहा है.

उसने मोहन को बताया. मोहन ने कहा, “सच्चाई हमारे साथ है. हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं.”

लेकिन अफवाहें बढ़ती गई.

एक दिन दुकान के बाहर कुछ लोग खड़े होकर बातें करने लगे. सीमा ने उन्हें नजरअंदाज किया. वह जानती थी कि अगर उसने अपना ध्यान इन बातों पर लगा दिया तो राहुल और आरव का भविष्य प्रभावित होगा.

उसने दुकान का काम जारी रखा.

रात को उसने राहुल की किताबें देखी. उसकी गणित की कॉपी में अच्छे अंक थे. सीमा मुस्कुराई. बोली, “मेरा बेटा बहुत आगे जाएगा.”

राहुल ने पूछा, “मम्मी, आप सच में मुझे अपना बेटा मानती हैं?”

सीमा ने कहा, “यह सवाल दोबारा मत पूछना.”

राहुल ने पूछा, “लेकिन अगर मेरे असली रिश्तेदार मुझे वापस लेने आए तो…”

सीमा कुछ पल चुप रही. फिर बोली, “बेटा, रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते. रिश्ते प्यार और जिम्मेदारी से भी बनते हैं.”

राहुल की आंखें भर आई. उसने सीमा के पैर छू लिए.

सीमा ने उसे रोक कर गले लगा लिया.

उसी रात सीमा को मंदिर की याद आई. वह अगली सुबह भगवान शिव के मंदिर गई. वही मंदिर जहां उसे आरव मिला था. वही सीढ़ियां जहां एक दिन एक मासूम बच्चा अकेला बैठा रो रहा था.

सीमा ने भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर कहा, “भोलेनाथ, उस दिन मैंने आपसे सिर्फ एक बच्चा मांगा था. आपने मुझे दो बेटे दिए दिए. अब मैं आपसे बस एक ही चीज मांगती हूं. इन दोनों बच्चों की जिंदगी में कभी अंधेरा मत आने देना.”

मंदिर के पुजारी ने सीमा को देखा. उन्होंने पूछा, “क्या हुआ बेटी? आज बहुत परेशान लग रही हो.”

सीमा ने पूरी बात बता दी.

पुजारी कुछ देर चुप रहे. फिर बोले, “बेटी, जब इंसान किसी बच्चे का हाथ पकड़ता है तो उसे सिर्फ उसके आज की चिंता नहीं करनी चाहिए. उसके कल की जिम्मेदारी भी उठानी चाहिए.”

सीमा ने कहा, “मैं पीछे नहीं हटूंगी बाबा.”

पुजारी ने कहा, “तो भगवान तुम्हें शक्ति देगा.”

सीमा मंदिर से बाहर निकलने लगी. तभी उसकी नजर मंदिर के एक पुराने कमरे पर पड़ी. उसे अचानक याद आया कि जिस दिन वह आरव को लेकर यहां आई थी उस दिन पुजारी ने बताया था कि बच्चे के बारे में किसी ने कुछ पूछा था.

सीमा रुक गई.

उसने पुजारी से पूछा, “बाबा, जिस दिन मुझे आरव मिला था, क्या उस दिन कोई और आदमी भी मंदिर आया था?”

पुजारी ने कुछ सोचते हुए कहा, “हां बेटी, एक आदमी आया था.”

सीमा ने पूछा, “कैसा आदमी?”

पुजारी बोले, “करीब 40 साल का होगा. वो मंदिर की सीढ़ियों के आसपास काफी देर घूम रहा था. फिर अचानक चला गया.”

सीमा के मन में एक सवाल उठा. वह बोली, “क्या उसने बच्चे के बारे में कुछ पूछा था?”

पुजारी ने कहा, “अब याद आया, उसने मुझसे पूछा था कि यहां कोई बच्चा मिला है क्या.”

सीमा के चेहरे पर रंग उड़ गया. बोली, “बाबा, आपने मुझे यह बात पहले क्यों नहीं बताई?”

पुजारी बोले, “बेटी, उस समय मुझे लगा वह भी बच्चे का रिश्तेदार होगा.”

सीमा ने पूछा, “क्या आपको उसका चेहरा याद है?”

पुजारी ने सिर हिलाया, बोले, “हां.”

सीमा के मन में अचानक एक आशंका पैदा हुई. क्या आरव को मंदिर की सीढ़ियों पर छोड़ना भी किसी योजना का हिस्सा था? क्या कोई जानबूझकर उसे वहां छोड़कर गया था? और अगर ऐसा था तो क्यों?

सीमा तेजी से घर लौट आई. लेकिन घर पहुंचते ही उसे एक और बड़ा झटका लगा.

मोहन ने उसे देखते ही कहा, “सीमा, राहुल के स्कूल से फोन आया था.”

सीमा ने पूछा, “क्या हुआ?”

मोहन ने गंभीर आवाज में कहा, “राहुल के नाम से किसी ने स्कूल में एक शिकायत दी है कि उसे जबरदस्ती हमारे घर में रखा गया है.”

सीमा कुछ पल तक उसे देखती रही. फिर बोली, “मतलब अब वे स्कूल तक पहुंच गए.”

मोहन ने कहा, “हां.”

सीमा ने गहरी सांस ली. उसने दोनों बच्चों को देखा. एक तरफ छोटा आरव खेल रहा था. दूसरी तरफ राहुल अपनी किताब खोलकर बैठा था.

सीमा ने मन ही मन फैसला कर लिया कि अब वह सिर्फ मां बनकर नहीं बल्कि इन दोनों बच्चों की ढाल बनकर खड़ी होगी.

अगली सुबह सीमा दुकान खोलने ही वाली थी कि उसका फोन बजा. फोन श्यामलाल का था.

सीमा ने फोन उठाया.

श्यामलाल ने कहा, “बहन जी, मुझे आपसे जरूरी बात करनी है.”

सीमा ने पूछा, “क्या हुआ?”

श्यामलाल बोला, “मुझे राहुल के पिता के घर की पुरानी संदूक मिल गई है.”

सीमा कुछ पल के लिए चुप हो गई. फिर उसने कहा, “क्या उसमें कोई कागज है?”

श्यामलाल बोला, “हां, कुछ पुराने कागज और एक डायरी भी है.”

सीमा ने तुरंत कहा, “भैया, आप उसे संभाल कर रखिए. मैं आज ही आती हूं.”

मोहन ने जब यह बात सुनी तो उसने भी साथ चलने का फैसला किया.

दोनों कुछ देर बाद श्यामलाल के गांव पहुंच गए.

श्यामलाल उन्हें अपने घर के एक कमरे में ले गया. वहां एक पुरानी लोहे की संदूक रखी थी. उस पर धूल जमी हुई थी. श्यामलाल ने कहा, “यह संदूक राहुल के पिता सुरेश की थी. उनके घर से सामान हटाते समय यह मेरे पास रह गई थी. मैं इसे इसलिए नहीं खोल पाया क्योंकि इसकी चाबी मेरे पास नहीं थी. लेकिन कल पुराने सामान में चाबी मिल गई.”

उसने संदूक खोली. अंदर कुछ पुराने कपड़े, जमीन के कागज और एक छोटी सी डायरी रखी थी.

मोहन ने जमीन के कागज उठाए. उसने ध्यान से देखा. कागजों में जमीन का मालिक सुरेश लिखा था और वह वारिस के रूप में राहुल का नाम दर्ज था.

सीमा ने कहा, “तो राहुल की जमीन सच में उसके नाम थी.”

मोहन ने सिर हिलाया लेकिन डायरी देखकर श्यामलाल ने कहा, “इसमें शायद ज्यादा महत्वपूर्ण बात है.”

मोहन ने डायरी खोली.

डायरी के शुरुआती पन्नों में खेती और घर के खर्च का हिसाब लिखा था. लेकिन आखिरी कुछ पन्नों में सुरेश ने कुछ अलग बातें लिखी थी.

एक जगह लिखा था कि कुछ लोग उसकी जमीन के कागजों के बारे में लगातार पूछताछ कर रहे हैं.

दूसरे पन्ने पर लिखा था कि उसे अपने एक रिश्तेदार पर शक है लेकिन नाम साफ नहीं था.

आखिरी पन्ने पर सिर्फ एक वाक्य लिखा था, “अगर मेरे साथ कुछ हो जाए तो राहुल को अकेला मत छोड़ना.”

सीमा की आंखें भर आई. उसने डायरी को अपने सीने से लगा लिया. वह बोली, “इस आदमी को शायद पहले से खतरे का अंदाजा था.”

मोहन ने कहा, “हें, यह डायरी पुलिस को दिखानी चाहिए.”

श्यामलाल ने सिर हिलाया. बोला, “हां, यही सही रहेगा.”

तीनों ने तय किया कि वह पुलिस से संपर्क करेंगे.

लेकिन तभी सीमा की नजर संदूक में रखी एक छोटी सी तस्वीर पर पड़ी. यह राहुल के माता-पति की तस्वीर थी. तस्वीर के पीछे कुछ लिखा हुआ था.

सीमा ने तस्वीर पलटी. पीछे लिखा था, “हमारे बेटे राहुल के लिए.”

सीमा की आंखों से आंसू बहने लगे. उसने तस्वीर को संभालकर अपने बैग में रख लिया.

जब वह वापस लौट रहे थे तो रास्ते में सीमा ने मोहन से कहा, “अब मुझे समझ आ रहा है कि राहुल को घर से क्यों निकाला गया.”

मोहन ने कहा, “लेकिन अभी हमें किसी पर आरोप नहीं लगाना चाहिए. जब तक सबूत पूरा ना हो, हमें इंतजार करना होगा.”

सीमा ने कहा, “मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि राहुल को उसका हक मिले.”

उधर घर पर राहुल और आरव उनका इंतजार कर रहे थे. जैसे ही सीमा घर पहुंची, आरव दौड़कर उसकी गोद में चढ़ गया. राहुल भी उसके पास आया.

सीमा ने दोनों को देखा और मुस्कुराई. उसने सोचा, “एक बेटा मुझे भगवान के मंदिर से मिला और दूसरा मेरी दुकान के सामने. शायद भगवान ने सच में मेरी प्रार्थना सुन ली थी.”

लेकिन उसी रात एक और घटना हुई.

रात करीब 10:00 बजे दुकान बंद करने के बाद सभी घर के अंदर जा चुके थे. अचानक बाहर किसी के कदमों की आवाज आई. मोहन ने पूछा, “कौन है?” कोई जवाब नहीं आया.

कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक हुई. सीमा ने दरवाजा खोला. बाहर कोई नहीं था. लेकिन दरवाजे के पास एक लिफाफा पड़ा था.

सीमा ने उसे उठाया. अंदर एक कागज था. उस पर लिखा था, “राहुल के मामले में ज्यादा आगे मत बढ़ो.”

सीमा के हाथ कांपने लगे. मोहन ने कागज देखा. उसने कहा, “अब मामला गंभीर है.”

सीमा बोली, “क्या हमें पुलिस को बताना चाहिए?”

मोहन ने कहा, “हां. अब बिल्कुल देर नहीं करनी चाहिए.”

अगले दिन वे पुलिस थाने गए. उन्होंने डायरी, जमीन के कागज और धमकी वाला पत्र पुलिस को दिया.

पुलिस अधिकारी ने सारी बात सुनी. फिर उन्होंने कहा, “आपने सही किया कि यह सबूत लेकर आए. हम इसकी जांच करेंगे.”

सीमा ने पूछा, “क्या राहुल को कोई खतरा है?”

अधिकारी ने कहा, “फिलहाल आप बच्चों को अकेला ना छोड़ें और अगर कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखाई दे, तुरंत हमें बताएं.”

सीमा ने सिर हिलाया. उसे थोड़ी राहत मिली.

लेकिन कहानी में अभी एक और बड़ा रहस्य बाकी था.

आरव वही बच्चा जिसे सीमा ने मंदिर की सीढ़ियों से उठाया था. सीमा के मन में पुजारी की बात घूम रही थी. उस आदमी ने मंदिर में आकर पूछा था कि कोई बच्चा मिला है या नहीं. आखिर वह आदमी कौन था?

एक दिन सीमा फिर मंदिर गई. उसने पुजारी से पूछा, “बाबा, क्या आपको उस आदमी का चेहरा याद है?”

पुजारी ने कहा, “हां बेटी, लेकिन मैं उसका नाम नहीं जानता.”

सीमा ने पूछा, “अगर वह दोबारा यहां आए, तो क्या आप उसे पहचान लेंगे?”

पुजारी ने कहा, “हां.”

सीमा मंदिर से बाहर निकल रही थी कि तभी उसकी नजर सामने खड़े एक व्यक्ति पर पड़ी. वह आदमी कुछ देर मंदिर को देख रहा था.

सीमा का दिल अचानक तेज धड़कने लगा. उसे लगा कि शायद उसने उस आदमी को कहीं देखा है. वह कुछ कदम आगे बढ़ी. आदमी ने जैसे ही सीमा को देखा वह तुरंत दूसरी तरफ मुड़ गया. सीमा ने उसे आवाज दी. “भाई साहब…”

आदमी रुका नहीं. सीमा उसके पीछे कुछ दूर तक गई लेकिन वह भीड़ में गायब हो गया.

सीमा वापस मंदिर आई. पुजारी ने उसे देखते ही कहा, “बेटी, क्या हुआ?”

सीमा बोली, “बाबा, मुझे लगता है वही आदमी था.”

पुजारी ने पूछा, “कौन?”

सीमा ने कहा, “जिसने उस दिन आरव के बारे में पूछा था.”

पुजारी ने गंभीर होकर कहा, “अगर ऐसा है तो हमें पुलिस को बताना चाहिए.”

सीमा ने सिर हिलाया.

उसी समय मंदिर के बाहर एक बुजुर्ग व्यक्ति खड़े थे. उन्होंने सीमा की बात सुन ली थी. उन्होंने धीरे से कहा, “बेटी, अगर तुम उस आदमी को ढूंढ रही हो तो शायद मैं उसकी मदद कर सकता हूं.”

सीमा ने हैरानी से पूछा, “आप उसे जानते हैं?”

बुजुर्ग ने कहा, “नाम तो नहीं जानता लेकिन कुछ महीने पहले मैंने उसे इसी मंदिर के आसपास देखा था.”

सीमा ने पूछा, “वह यहां क्या करता था?”

बुजुर्ग बोले, “वह अक्सर मंदिर के बाहर बैठकर लोगों को देखता रहता था. एक दिन मैंने उससे पूछा भी था कि किसका इंतजार कर रहे हो? उसने कहा था कि किसी अपने का.”

सीमा के मन में सवाल और बढ़ गया.

क्या वह आदमी आरव के परिवार का था? क्या आरव को किसी मजबूरी में मंदिर पर छोड़ा गया था? या फिर उसके पीछे भी कोई ऐसी कहानी थी जिसे कोई छिपाना चाहता था?

इसी बीच घर से मोहन का फोन आया. सीमा जल्दी घर आओ. सीमा घबरा गई. बोली, “क्या हुआ?”

मोहन ने कहा, “आरव को तेज बुखार है.”

सीमा तुरंत घर लौट आई. आरव बिस्तर पर पड़ा था. उसका शरीर गर्म था. सीमा ने उसे गोद में उठाया. बोली, “बेटा, आंखें खोलो.”

आरव ने कमजोर आवाज में कहा, “मम्मी…”

सीमा की आंखों में आंसू आ गए. वह उसे तुरंत डॉक्टर के पास लेकर गई.

डॉक्टर ने जांच करके कहा, “घबराने की जरूरत नहीं है. वायरल बुखार है. दवा दीजिए और आराम कराइए.”

सीमा ने राहत की सांस ली. वह पूरी रात आरव के पास बैठी रही. राहुल भी उसके पास बैठा था. उसने धीरे से कहा, “मम्मी, आप सो जाइए. मैं आरव के पास बैठता हूं.”

सीमा ने राहुल की तरफ देखा. उसे लगा जैसे यह बच्चा सिर्फ उसका बेटा नहीं बल्कि उसका सहारा भी बन चुका है. उसने कहा, “बेटा, तुम भी आराम करो.”

राहुल बोला, “मम्मी, आपने मुझे सड़क से उठाकर घर दिया है. अब अगर मैं अपने छोटे भाई के लिए रात भर नहीं जाग सकता तो फिर मैं कैसा बेटा?”

सीमा की आंखें भर आई. उसने राहुल के सिर पर हाथ रखा. उस रात पहली बार सीमा को लगा कि उसने उसके दोनों बच्चे एक दूसरे के लिए भी परिवार बन चुके हैं.

कुछ दिन बाद आरव पूरी तरह ठीक हो गया.

लेकिन इसी दौरान पुलिस ने सीमा को थाने बुलाया. अधिकारी ने कहा, “हमें राहुल के मामले में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी मिली है.”

सीमा ने पूछा, “क्या पता चला?”

अधिकारी ने कहा, “राहुल की बुआ से पूछताछ की गई है. उन्होंने माना है कि जमीन के कागज उनके पास थे.”

सीमा ने कहा, “तो क्या उन्होंने राहुल को इसीलिए घर से निकाला था?”

अधिकारी बोले, “वह इस बात से इंकार कर रही है. लेकिन जांच अभी जारी है.”

फिर अधिकारी ने मेज पर एक फोटो रखी. सीमा ने फोटो देखते ही पहचान लिया. बोली, “यह वही आदमी था जो कई बार उनकी दुकान के आसपास दिखाई दिया था.”

सीमा ने कहा, “यही आदमी है.”

अधिकारी ने बताया, “इसका नाम महेश है. यह राहुल के परिवार का रिश्तेदार है.”

सीमा चौंक गई. बोली, “क्या यही राहुल को मेरे घर से ले जाना चाहता था?”

अधिकारी ने कहा, “हां. लेकिन हमें अभी यह पता लगाना है कि उसका असली मकसद क्या है.”

सीमा ने पूछा, “क्या वह राहुल के माता-पति की मौत के बारे में भी कुछ जानता है?”

अधिकारी ने कहा, “संभव है.”

फिर अधिकारी ने एक और कागज सीमा के सामने रखा. यह राहुल के पिता के फोन रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी है. सीमा ने कागज देखा, उसमें एक नंबर बार-बार दिखाई दे रहा था.

अधिकारी बोले, “यह नंबर उनके हादसे से कुछ दिन पहले लगातार उनके संपर्क में था.”

सीमा ने पूछा, “किसका नंबर है?”

अधिकारी ने कहा, “अभी हम इसकी पुष्टि कर रहे हैं.”

सीमा की धड़कन तेज हो गई. वह घर लौट आई. लेकिन रास्ते भर उसके मन में यही सवाल था. क्या राहुल के माता-पति की मौत के पीछे सचमुच कोई राज था और अगर था तो क्या महेश उस राज को जानता था?

घर पहुंचने पर उसने राहुल को देखा. वह आरव के साथ बैठकर पढ़ रहा था. दोनों भाई एक ही किताब में झुककर कुछ देख रहे थे.

सीमा कुछ पल दरवाजे पर खड़ी होकर उन्हें देखती रही. फिर उसके मन में एक दृढ़ संकल्प पैदा हुआ. उसने तय किया कि वह सिर्फ राहुल को अपने घर में जगह देकर नहीं रुकेगी. वह उसके अतीत का सच सामने लाएगी और अगर किसी ने उसके माता-पति के साथ अन्याय किया है तो वह कानून के रास्ते से राहुल को उसका अधिकार दिलाने की पूरी कोशिश करेगी.

लेकिन उसी रात जब पूरा परिवार सो रहा था. सीमा के फोन पर एक अनजान नंबर से संदेश आया. संदेश में सिर्फ इतना लिखा था, “अगर तुम राहुल के अतीत की सच्चाई जानना चाहती हो तो कल शाम पुराने शिव मंदिर के पीछे अकेली आना.”

सीमा ने संदेश पढ़ा. उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा. वह सोचने लगी कि आखिर वह कौन है जो राहुल के अतीत के बारे में जानता है और वह उसे अकेले मंदिर के पीछे क्यों बुला रहा है. क्या यह सच बताने वाला कोई व्यक्ति है या सीमा और उसके परिवार के लिए कोई नया खतरा आने वाला है?

सीमा ने फोन मोहन को दिखाया. मोहन ने कहा, “तुम अकेली कहीं नहीं जाओगी. अगर जाना है तो हम दोनों साथ जाएंगे और पुलिस को भी बताएंगे.”

अगले दिन शाम को सीमा और मोहन पुलिस को पूरी जानकारी देकर मंदिर पहुंचे. पुलिस ने भी कुछ दूरी पर रहकर नजर रखने का फैसला किया. मंदिर के पीछे का इलाका काफी शांत था. पेड़ों की छाया जमीन पर पड़ रही थी. सीमा और मोहन कुछ देर इंतजार करते रहे. करीब 10 मिनट बाद एक बुजुर्ग आदमी वहां आया. उसके हाथ में एक पुराना कपड़े का थैला था. वह सीमा के पास आकर रुक गया. उसने पूछा, “आप सीमा हैं.”

सीमा ने कहा, “हां, आप कौन?”

बुजुर्ग ने कहा, “मेरा नाम हरिदास है. मैं उसी गांव का रहने वाला हूं जहां राहुल के माता-पति रहते थे.”

सीमा चौंक गई. बोली, “आपको राहुल के बारे में क्या पता है?”

हरिदास ने थैले से एक पुराना कागज निकाला और बोले, “यह राहुल के पिता सुरेश ने मुझे कई साल पहले दिया था.”

सीमा ने कागज हाथ में लिया. उसमें सुरेश ने लिखा था कि अगर कभी उसके साथ कुछ हो जाए तो उसके बेटे राहुल को उसके अधिकार से वंचित ना किया जाए. साथ ही जमीन के कागजों और कुछ पुराने लेनदेन की जानकारी भी उसमें थी.

हरिदास ने कहा, “सुरेश को शक था कि उसके कुछ रिश्तेदार उसकी जमीन हड़पना चाहते हैं.”

मोहन ने पूछा, “क्या आपको पता है कि उसकी मौत कैसे हुई?”

हरिदास कुछ देर चुप रहा. फिर बोला, “मुझे पूरी सच्चाई नहीं पता. लेकिन हादसे से कुछ दिन पहले सुरेश मेरे पास आया था. उसने कहा था कि अगर वह सुरक्षित नहीं रहा तो उसके बेटे का ध्यान रखना.”

सीमा की आंखों में आंसू आ गए. वो बोली, “फिर आपने राहुल की मदद क्यों नहीं की?”

हरिदास ने सिर झुका लिया. बोले, “बेटी, मैंने बहुत कोशिश की थी लेकिन उस समय मेरे पास कोई सबूत नहीं था और राहुल की बुआ ने मुझे भी बीच में पड़ने से मना कर दिया था.”

मोहन ने पूछा, “अब इतने साल बाद आप हमारे पास क्यों आए हैं?”

हरिदास ने कहा, “क्योंकि जब मुझे पता चला कि राहुल को सड़क से उठाकर किसी ने अपने घर में रखा है तो मुझे लगा कि शायद अब उसके लिए भगवान ने सही लोग भेज दिए हैं.”

सीमा की आंखें भर आई.

लेकिन तभी हरिदास ने कहा, “और एक बात है जो आपको जरूर जाननी जरूरी है.”

सीमा ने पूछा, “क्या?”

हरिदास बोले, “जिस दिन राहुल के पिता की मौत हुई थी उसी दिन मंदिर के पास एक महिला को भी देखा गया था. वह महिला एक छोटे बच्चे को लेकर परेशान थी.”

सीमा ने कहा, “कौन सा बच्चा?”

हरिदास ने कहा, “मुझे नहीं पता. लेकिन कुछ समय बाद वही बच्चा मंदिर के पास मिला था.”

सीमा का दिल तेजी से धड़कने लगा.

उसने पूछा, “क्या आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं? आरव की.”

हरिदास ने धीरे से सिर हिलाया. बोले, “शायद.”

सीमा कुछ पल तक उसे देखती रही. फिर बोली, “आपको क्या लगता है कि आरव का राहुल से कोई संबंध है?”

हरिदास ने कहा, “मुझे पक्का नहीं पता. लेकिन जिस आदमी को आपने मंदिर के आसपास देखा था, वह भी उसी इलाके का रहने वाला था.”

सीमा ने तुरंत पुलिस को यह जानकारी दी. पुलिस ने उस आदमी को तलाशना शुरू किया.

कुछ दिनों बाद पुलिस को वह आदमी मिल गया. उससे पूछताछ हुई. पहले उसने कुछ बताने से इंकार किया. लेकिन जब पुलिस ने उसके सामने पुराने रिकॉर्ड रखे तो उसने आखिरकार सच्चाई बतानी शुरू की.

उसका नाम था रमेश. रमेश ने बताया कि आरव को मंदिर की सीढ़ियों पर किसी ने छोड़ा था लेकिन वह उसे वहां छोड़ने वाला व्यक्ति नहीं था. वह सिर्फ उस व्यक्ति को पहचानता था.

सीमा ने पूछा, “कौन था वह?”

रमेश ने कहा, “एक महिला.”

सीमा चौंक गई. बोली, “कौन महिला?”

रमेश ने कहा, “उसने अपना नाम नहीं बताया था. वह बच्चे को लेकर मंदिर आई थी. वह बहुत परेशान थी.”

सीमा ने पूछा, “फिर क्या हुआ था?”

रमेश बोला, “वह कुछ देर बच्चे के पास बैठी रही. बच्चे को प्यार करती रही. फिर उसने मंदिर के पुजारी से बात की और वहां से चली गई.”

सीमा बोली, “उसने बच्चे को वहीं क्यों छोड़ दिया.”

रमेश ने कहा, “शायद वह मजबूर थी.”

पुलिस ने आगे जांच की. कई दिनों की खोजबीन के बाद उस महिला के बारे में जानकारी मिली. उसका नाम सुनीता था.

सुनीता को पुलिस के सामने बुलाया गया. वह सीमा के सामने आई तो उसकी आंखों में शर्म और पछतावा था.

सीमा ने पूछा, “क्या आरव आपका बेटा है?”

सुनीता रोते हुए बोली, “हां.”

सीमा के हाथ कांप गए.

सुनीता ने कहा, “मैंने उसे छोड़ा नहीं था. मैंने उसे भगवान के भरोसे छोड़ा था.”

सीमा कुछ समझ नहीं पाई.

सुनीता ने बताया कि उसके पति की मौत हो चुकी थी और वह खुद गंभीर आर्थिक संकट में थी. उसका एक छोटा बच्चा था. वह उसे पालना चाहती थी लेकिन उसके पास घर चलाने तक के पैसे नहीं थे. एक दिन वह काम की तलाश में निकली थी. उसके पास बच्चे को सुरक्षित रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी. वह मंदिर पहुंची. वहां उसने बहुत देर तक भगवान से प्रार्थना की. उसने सोचा कि शायद कोई अच्छा परिवार उसके बच्चे को अपना ले. लेकिन वह वापस आने वाली थी. उसे उम्मीद थी कि थोड़ी व्यवस्था होने के बाद वह अपने बच्चे को वापस ले जाएगी. लेकिन परिस्थितियां उसके नियंत्रण से बाहर हो गई. वह शहर से बाहर काम की तलاش में चली गई. उधर मंदिर में सीमा को आरव मिल गया.

सीमा की आंखों में आंसू आ गए. उसने सुनीता से पूछा, “तुमने इतने महीनों तक अपने बच्चों को ढूंढने की कोशिश क्यों नहीं की?”

सुनीता रोते हुए बोली, “मैंने की थी लेकिन मुझे पता नहीं था कि वह किसके पास है. मेरे पास फोन नहीं था. मैं दूसरे शहर में मजदूरी कर रही थी.”

पुलिस ने उसकी बात की जांच की. काफी जानकारी उसके बयान से मेल खा रही थी.

लेकिन सीमा के लिए सबसे मुश्किल पल अब सामने था क्योंकि आरव की मां उसके सामने खड़ी थी. वही बच्चा जिसे सीमा ने इतने महीनों से अपने बेटे की तरह पाला था. वह बच्चा जिसे वह अपनी जिंदगी का हिस्सा समझ चुकी थी.

रात को सीमा ने मोहन से कहा, “अगर आरव की मां सच बोल रही है तो हमें क्या करना चाहिए?”

मोहन ने कहा, “जो बच्चे के हित में होगा वही करना चाहिए.”

सीमा रोते हुए बोली, “लेकिन मैं उसे कैसे छोड़ दूं?”

मोहन ने कहा, “मां बनना सिर्फ बच्चे को अपने पास रखना नहीं है. मां बनना यह भी है कि बच्चे के लिए सही फैसला किया जाए.”

सीमा ने पूरी रात सोचा. अगले दिन वह सुनीता से मिली.

सीमा ने कहा, “मैं तुम्हारे बच्चे को तुमसे छीनना छीनना नहीं चाहती.”

सुनीता रोने लगी.

सीमा बोली, “लेकिन मैं चाहती हूं कि आरव की जिंदगी खराब ना हो.”

सुनीता ने कहा, “मेरे पास उसे पालने के साधन नहीं है.”

सीमा ने उसका हाथ पकड़ लिया. बोली, “तुम्हें अकेले पालने की जरूरत नहीं है.”

सुनीता ने हैरानी से पूछा, “क्या मतलब?”

सीमा ने कहा, “आरव तुम्हारा बेटा है. मैं यह रिश्ता तुमसे नहीं छीन सकती लेकिन मैं उसकी मां बन चुकी हूं. इसलिए अगर तुम चाहो तो हम मिलकर उसकी जिंदगी संवार सकते हैं.”

सुनीता की आंखों से आंसू बहने लगे.

सीमा ने आगे कहा, “तुम हमारे घर आ सकती हो. आरव को तुमसे मिलने से कोई नहीं रोकेगा. उसकी पढ़ाई, इलाज और जरूरतों की जिम्मेदारी हम उठाएंगे.”

सुनीता ने सीमा के पैर पकड़ लिए. बोली, “बहन, तुम जैसी मां मैंने कभी नहीं देखी.”

सीमा ने उसे उठाया. बोली, “मां होने के लिए बच्चे को जन्म देना जरूरी नहीं और किसी बच्चे को जन्म देने वाली मां से उसका बच्चा भी छीनना भी सही नहीं.”

यह बात सुनकर मोहन की आंखें भी नम हो गई.

कानूनी प्रक्रिया के बाद यह तय हुआ कि आरव अपनी जन्म देने वाली मां सुनीता के संपर्क में रहेगा और उसकी देखभवल व भविष्य के लिए सीमा और मोहन आर्थिक और पारिवारिक सहायता करेंगे.

अब सीमा के घर में एक नया रिश्ता बन चुका था. सुनीता भी कभी-कभी आरव से मिलने आने लगी. आरव अपनी मां को देखकर खुश होता और सीमा को मम्मी कहकर बुलाता. दोनों महिलाएं समझ चुकी थीं कि एक बच्चे को प्यार देने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए.

लेकिन कहानी में अभी राहुल का मामला बाकी था.

पुलिस की जांच आगे बढ़ी. जमीन के कागजों और पुराने रिकॉर्ड की जांच हुई. राहुल की बुआ से दोबारा पूछताछ हुई. आखिरकार यह साफ हो गया कि राहुल के पिता की जमीन पर कुछ लोगों की नजर थी और राहुल को उसके अधिकार से वंचित करने की कोशिश की गई थी. कानूनी प्रक्रिया के जरिए राहुल के अधिकार सुरक्षित किए गए.

महेश द्वारा राहुल को अपने साथ ले जाने की कोशिश भी जांच के दायरे में आई. राहुल अब पहले से ज्यादा सुरक्षित था.

लेकिन इस पूरे मामले के बाद सीमा और मोहन ने एक फैसला लिया. उन्होंने राहुल से कहा, “बेटा, तुम्हारे पास जो भी अधिकार है वह तुम्हारा है. लेकिन तुम्हें अपने माता-पति की तरह ईमानदार और मेहनती इंसान बनना है.”

राहुल ने कहा, “मम्मी, मैं बड़ा होकर ऐसा आदमी बनूंगा जिस पर आपको गर्व होगा.”

सीमा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मुझे तुम पर अभी से गर्व है.”

समय बीतता गया. राहुल पढ़ाई में मेहनत करने लगा. वह हर परीक्षा में अच्छे अंक लाने लगा. आरव भी बैठ बड़ा होने लगा. दोनों भाई हमेशा साथ रहते. राहुल आरव को स्कूल का काम करवाता. आरव अपने भैया के लिए पानी लेकर आता. मोहन दुकान संभालता. सीमा घर और दुकान दोनों की जिम्मेदारी संभालती.

कुछ सालों बाद उनकी दुकान सबसे पहले से भी बड़ी हो गई. लेकिन सीमा ने कभी यह नहीं भुलाया कि उसके पास जो कुछ है उसमें समाज का भी हिस्सा है. उसने अपनी दुकान के बाहर एक छोटा सा बोर्ड लगवाया. उस पर लिखा था, “जिस बच्चे के पास घर नहीं है उसके लिए यहां खाना जरूर मिलेगा.”

हर दिन कोई ना कोई जरूरतमंद बच्चा वहां आता. सीमा उसे खाना खिलाती. किसी के पास किताबें नहीं होती तो किताबें देती. किसी बच्चे के पास चप्पल नहीं थी तो चप्पल दिलाती.

मोहन अक्सर मुस्कुराकर कहता, “सीमा, तुम्हारी दुकान अब सिर्फ किराने की दुकान नहीं रही.”

सीमा पूछती, “फिर क्या बन गई?”

मोहन कहता, “यह लोगों के लिए उम्मीद की जगह है.”

सीमा मुस्कुरा देती.

कई साल बाद राहुल ने अपनी पढ़ाई पूरी की. उसने समाज सेवा से जुड़ा काम शुरू किया. एक दिन वह घर आया और बोला, “मम्मी पापा, मैं एक संस्था शुरू करना चाहता हूं.”

मोहन ने पूछा, “किसके लिए?”

राहुल ने कहा, “उन बच्चों के लिए जिनके माता-पिता नहीं है या जो अपने परिवार से दूर हो गए हैं.”

सीमा की आंखें भर आई. उसने पूछा, “इतना बड़ा फैसला क्यों?”

राहुल मुस्कुराया और बोला, “क्योंकि जब मैं सड़क पर अकेला था तब मुझे भी किसी ने खाना दिया था. किसी ने मुझे यह नहीं पूछा कि मैं किसका बेटा हूं. उसने बस मुझे इंसान समझकर खाना दिया था. वह सीमा की तरफ देखकर बोला, ‘और फिर आपने मुझे अपना बेटा बना लिया. अब मैं चाहता हूं कि कोई दूसरा बच्चा खुद को अकेला महसूस ना करे.’”

सीमा ने राहुल को गले लगा लिया. उसी समय आरव भी वहां आ गया. उसने कहा, “भैया, मैं भी आपके साथ काम करूंगा.”

राहुल हंस पड़ा. बोला, “तू तो अभी छोटा है.”

आरव बोला, “मैं बड़ा होकर जरूर करूंगा.”

मोहन ने दोनों बच्चों को देखा. उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे. वह भगवान शिव की तस्वीर के सामने हाथ जोड़कर बोला, “भोलेनाथ, उस दिन मेरी पत्नी मंदिर गई थी तो उसकी गोद खाली थी. आज हमारा घर दो बेटों की आवाजों से भरा भरा हुआ है. आपने हमारी जिंदगी बदल दी.”

सीमा भी भगवान की तस्वीर के सामने खड़ी हो गई. उसने कहा, “मैंने आपसे एक बच्चे की मांग की थी. आपने मुझे दो बेटों का प्यार दिया. लेकिन अब समझ आया कि आपकी कृपा सिर्फ हमारी गोद भरने में नहीं थी बल्कि हमारे दिल को इतना बड़ा करने में थी कि हम दूसरों के बच्चों का दर्द भी समझ सके.”

दोस्तों, जिंदगी में कई बार हम जिस चीज के पीछे भागते हैं वह हमें उसी रूप में नहीं मिलती. हम सोचते हैं कि खुशी पैसा मिलने से आएगी. कभी सोचते हैं कि घर बड़ा हो जाए तो खुशी आएगी. कभी सोचते हैं कि हमारी सारी इच्छाएं पूरी हो जाए तो हम खुश हो जाएंगे. लेकिन असली खुशी तब आती है जब हमारे पास किसी दूसरे के आंसू पोछने का मौका होता है.

सीमा के पास पहले भी पैसा था, घर था, दुकान थी, सम्मान था. लेकिन उसे मां कहलने कहलाने की खुशी नहीं मिली थी. फिर उसकी जिंदगी में एक बच्चा आया. उसने उसे जन्म नहीं दिया था. लेकिन उसे अपना लिया. फिर एक दूसरा बच्चा उसकी दुकान के सामने आया. उसने भी उसे अपना लिया. और धीरे-धीरे सीमा को समझ आया कि मां बनने का अर्थ सिर्फ बच्चे को जन्म देना नहीं है. बल्कि मां बनने का अर्थ है जब कोई बच्चा डर जाए तो उसे हिम्मत देना. जब कोई भूखा हो तो उसे खाना देना. जब कोई अकेला हो तो उसका हाथ पकड़ना और जब दुनिया उसे ठुकरा दे तो उससे कहना, “तुम अकेले नहीं हो. मैं तुम्हारे साथ हूं.”

राहुल ने भी अपनी जिंदगी से एक बड़ा सबक सीखा. जिस बच्चे ने कभी सड़क पर भूखे दिन बिताए थे वही आगे चलकर जरूरतमंद बच्चों के लिए सहारा बना. इसीलिए दोस्तों किसी इंसान की शुरुआत देखकर उसकी पूरी जिंदगी का फैसला मत कीजिए. आज कोई बच्चा गरीब है तो जरूरी नहीं है कि वह जिंदगी भर गरीब रहे. आज कोई बच्चा अनाथ है तो जरूरी नहीं कि उसका भविष्य भी अनाथ हो. कभी-कभी एक इंसान का छोटा सा सहारा किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है और शायद इसी को इंसानियत कहते हैं.

दोस्तों, अगर आपके आसपास भी कोई जरूरतमंद बच्चा, बुजुर्ग या मजबूर इंसान दिखाई दे तो अपनी क्षमता के अनुसार उनकी मदद जरूर कीजिए क्योंकि हम नहीं जानते कि हमारे द्वारा की गई छोटी सी मदद किसी की जिंदगी में कितनी बड़ी रोशनी ला सकती है. और अंत में बस इतना याद रखिए भगवान से खुशियां मांगना अच्छी बात है. लेकिन अगर भगवान किसी जरूरतमंद की मदद करने का मौका दे दें तो उसे पहचानना उससे भी बड़ी बात है. क्योंकि कभी-कभी हमारी प्रार्थना का जवाब मंदिर की घंटियों में नहीं बल्कि किसी मासूम की आंखों में छिपा होता है और सीमा की कहानी भी हमें यही सिखाती है कि रिश्ता हमेशा खून से नहीं बनता. कुछ रिश्ते इंसानियत, प्यार और जिम्मेदारी से बनते हैं.

तो दोस्तों, यहां पर कहानी का अंत होता है और यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट में जरूर बताइएगा और हमारे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कर लीजिएगा क्योंकि मैं आप लोगों के लिए एक से बढ़कर एक कहानियां लेकर आता रहता हूं. धन्यवाद.

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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