गरीबी की बेटी मरियम — एक छोटी सी उम्मीद ने बदल दी पूरी जिंदगी – News

गरीबी की बेटी मरियम — एक छोटी सी उम्मीद ने बदल दी पूरी जिंदगी

गरीबी की बेटी मरियम — एक छोटी सी उम्मीद ने बदल दी पूरी जिंदगी

गरीबी की बेटी मरियम — एक छोटी सी उम्मीद ने बदल दी पूरी जिंदगी

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में मिट्टी की दीवारों वाला एक पुराना-सा घर था। घर छोटा था, लेकिन उसमें रहने वाले लोगों के सपने बहुत बड़े थे।

उस घर में रहती थी अठारह साल की मरियम

मरियम की आंखों में पढ़ने का सपना था, लेकिन उसके हाथों में हमेशा झाड़ू, लकड़ियां और पानी की बाल्टी रहती थी।

हर दिन उसकी सुबह सूरज निकलने से पहले होती थी।

उस दिन भी अंधेरा था।

दूर मस्जिद से फज्र की अजान की आवाज सुनाई दे रही थी।

तभी उसकी मां अमीना की तेज आवाज पूरे घर में गूंज उठी—

“मरियम! अरे ओ मरियम! अभी तक चूल्हा नहीं जला? तेरे अब्बा उठने वाले हैं। चाय का पानी चढ़ाया या अभी तक फर्श ही रगड़ रही है?”

मरियम ने हाथ रोककर धीरे से जवाब दिया—

“जी अम्मा… बस झाड़ू खत्म ही होने वाला है। रात को चूल्हे की राख जम गई थी, वही साफ कर रही थी। अभी लकड़ी सुलगाती हूं।”

अमीना ने गुस्से में कहा—

“बहाने मत बनाया कर। गांव की दूसरी लड़कियों को देखा है? फज्र की अजान से पहले उनका पूरा घर चमक जाता है। एक तू है, जैसे कछुए की चाल चलती है!”

मरियम ने कुछ नहीं कहा।

उसने झाड़ू एक तरफ रखी और चूल्हे में लकड़ियां लगाने लगी।

उसकी आंखों में नींद थी।

कमर में दर्द था।

लेकिन शिकायत करने का अधिकार जैसे उसने खुद को कभी दिया ही नहीं था।

कुछ देर बाद उसके पिता फारूक की आवाज आई—

“मरियम! गाय को चारा डाल दिया?”

“जी अब्बा, चारा काटकर नांद में डाल दिया है। बस दूध निकालने जा रही हूं।”

फारूक ने बाहर से कहा—

“सात बजने वाले हैं। मुझे शहर जाकर दूध बेचना है। अगर आज देर हुई और दूध वाले ने दाम कम लगाए, तो पूरे हफ्ते का राशन मुश्किल हो जाएगा।”

“जी अब्बा… दस मिनट में बाल्टी भर देती हूं।”

फारूक ने फिर कहा—

“और सुन! आज जमींदार के खेत के पीछे से सूखी लकड़ियां भी चुनकर लाना। घर का ईंधन खत्म हो रहा है।”

मरियम ने हिम्मत करके कहा—

“अब्बा… वो रास्ता बहुत दूर है।”

फारूक कुछ पल चुप रहा।

फिर कठोर आवाज में बोला—

“दूर है तो क्या हुआ? पैर तो सलामत हैं ना? काम से जी चुराना बंद कर। तेरी मां अकेली कितना करेगी?”

मरियम ने सिर झुका लिया।

“जी अब्बा।”

उसने बाल्टी उठाई और फिर काम में लग गई।

उसकी जिंदगी में हर दिन एक जैसा था।

सुबह पानी।

फिर गाय-भैंस।

फिर चूल्हा।

फिर रोटियां।

फिर कपड़े।

फिर लकड़ियां।

और रात को थका हुआ शरीर।

बस एक चीज अलग थी—

उसके दिल में छिपा एक छोटा-सा सपना।

पढ़ने का सपना।

लेकिन वह सपना भी उसे बहुत दूर दिखाई देता था।


एक दोपहर मरियम लकड़ियों का भारी गट्ठर सिर पर रखकर घर लौट रही थी।

रास्ते में उसकी बचपन की सहेली जैनब मिल गई।

जैनब स्कूल से वापस आ रही थी।

उसके हाथ में किताबें थीं।

उसने मरियम को देखते ही कहा—

“मरियम! रुको!”

मरियम रुक गई।

जैनब उसके पास आई और बोली—

“तुम इतनी थकी हुई क्यों लग रही हो? इतना भारी गट्ठर अकेले उठा रही हो? थोड़ा मुझे दे दो।”

मरियम मुस्कुराई।

“नहीं जैनब, रहने दो। तुम्हारे कपड़े गंदे हो जाएंगे।”

जैनब ने उसकी तरफ देखा।

“तुम कई महीनों से हमारे पास नहीं आई। कल हम सब तालाब के किनारे बैठे थे। सब तुम्हारे बारे में पूछ रही थीं।”

मरियम की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।

“जैनब… मेरे लिए वो सब किसी सपने जैसा है।”

“क्यों?”

“सुबह आंख खुलने से लेकर रात आंख बंद होने तक घर का काम खत्म ही नहीं होता। अम्मा मुझे जाने नहीं देतीं। और अगर अब्बा को पता चल गया कि मैं सहेलियों के साथ बैठी थी, तो बहुत डांटेंगे।”

जैनब ने दुखी होकर कहा—

“लेकिन मरियम, तुम अठारह साल की हो। तुम सिर्फ घर का काम करने के लिए पैदा नहीं हुई।”

मरियम ने धीमे से कहा—

“शायद मेरी किस्मत में यही लिखा है।”

जैनब कुछ कहना चाहती थी।

लेकिन मरियम ने जल्दी से गट्ठर संभाला।

“मुझे जाना होगा। देर हो गई तो अम्मा दरवाजे पर ही डांटेंगी।”

और वह चली गई।

जैनब उसे दूर तक देखती रही।


जब मरियम घर पहुंची तो अमीना दरवाजे पर खड़ी थी।

“इतनी देर क्यों लगा दी?”

“अम्मा, लकड़ियां गीली थीं। सूखी लकड़ियां ढूंढने में वक्त लग गया।”

“और रास्ते में?”

मरियम चुप रही।

अमीना ने तुरंत पूछा—

“किसी से बातें करने लगी थी?”

“नहीं अम्मा। बस जैनब रास्ते में मिल गई थी।”

अमीना का चेहरा सख्त हो गया।

“उस लड़की से दूर रहा कर। स्कूल जाती है तो खुद को बड़ी रानी समझती है। उसके चक्कर में तू भी काम से जाएगी।”

मरियम ने कुछ नहीं कहा।

उस रात वह देर तक बर्तन धोती रही।

उसकी उंगलियां पानी में गल चुकी थीं।

आंखें भारी थीं।

लेकिन वह चुप थी।


कुछ दिनों बाद एक शाम मरियम ने हिम्मत करके अपने पिता से कहा—

“अब्बा… क्या मैं गांव के सिलाई सेंटर जा सकती हूं?”

फारूक ने उसकी तरफ देखा।

“क्यों?”

“बस एक घंटे के लिए। गांव की कई लड़कियां जाती हैं। अगर मैं सिलाई सीख लूं तो घर के लिए कुछ पैसे भी कमा सकती हूं।”

फारूक ने तुरंत जवाब दिया—

“घर में काम कम है क्या? अब बाहर जाकर सिलाई भी सीखेगी?”

“अब्बा, मैं दोपहर में जाऊंगी। घर का काम खत्म करके।”

फारूक की आवाज कठोर हो गई।

“नहीं। बाहर जाने की कोई जरूरत नहीं। जो सीखना है, अपनी मां से सीख।”

मरियम की आंखें झुक गईं।

“जी अब्बा।”

उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि गरीब घर में सपने देखना भी शायद एक तरह की गलती होती है।


लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया।

शाम को फारूक शहर से लौटा।

उसके हाथ में एक छोटा-सा कागज का पैकेट था।

अमीना ने मरियम को आवाज दी—

“मरियम, इधर आ।”

मरियम भागकर आई।

“जी अम्मा?”

अमीना ने पैकेट उसकी तरफ बढ़ाया।

“तेरे अब्बा तेरे लिए लाए हैं।”

मरियम ने हैरानी से पूछा—

“मेरे लिए?”

“हां। खोलकर देख।”

मरियम ने कांपते हाथों से पैकेट खोला।

उसके अंदर रंग-बिरंगी चूड़ियां और लाल रिबन था।

मरियम की आंखें भर आईं।

“ये… मेरे लिए?”

अमीना मुस्कुरा दी।

“तेरे अब्बा ने बाजार में देखा कि गांव की लड़कियां नए कपड़े और चूड़ियां पहनकर घूम रही थीं। उन्हें तेरी याद आ गई।”

तभी पीछे से फारूक की आवाज आई—

“बेटी, हमेशा पुराने कपड़ों में ही घूमती रहती है। सोचा, मेरी बेटी भी कभी खुश हो ले।”

मरियम कुछ बोल नहीं पाई।

उसने अपने पिता की तरफ देखा।

जिस आदमी को वह हमेशा गुस्से वाला समझती थी, आज उसी आदमी ने उसकी खुशी के लिए कुछ खरीदा था।

उसने धीरे से कहा—

“शुक्रिया, अब्बा।”

फारूक ने नजरें फेर लीं।

“शुक्रिया की क्या बात है? बाजार में पैसे ज्यादा मिल गए थे। सोचा खाली हाथ क्या जाऊं।”

लेकिन उसकी आंखों में छिपा प्यार मरियम देख चुकी थी।

उस रात उसने पहली बार रिबन अपने बालों में बांधा।

चूड़ियां पहनीं।

और चूल्हे के पास बैठकर अपने हाथों को देखने लगी।

चूड़ियों की हल्की-सी छनकार सुनकर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उसने खुद से कहा—

“शायद अब्बा मुझसे नफरत नहीं करते…”

उसकी मां पास खड़ी थी।

अमीना बोली—

“बेटी, गरीब आदमी का प्यार अक्सर शब्दों में नहीं होता। कभी रोटी बनकर आता है, कभी दवा बनकर… और कभी ऐसी छोटी-सी चूड़ियों में।”

मरियम की आंखों से आंसू निकल आए।

“अम्मा… क्या मैं कभी जैनब के साथ थोड़ी देर बैठ सकती हूं?”

अमीना ने तुरंत कहा—

“फिर वही बात!”

मरियम चुप हो गई।

लेकिन उसके चेहरे की खुशी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।

क्योंकि उस दिन उसे एक नई बात समझ आई थी—

उसके मां-बाप कठोर थे, लेकिन उसके दुश्मन नहीं थे।


कुछ ही सप्ताह बाद एक सुबह फारूक घर लौटा तो उसके चेहरे पर अजीब-सी खुशी थी।

वह जोर-जोर से सांस ले रहा था।

अमीना घबरा गई।

“क्या हुआ? इतनी जल्दी शहर से वापस क्यों आ गए?”

फारूक ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अल्लाह ने हमारी सुन ली।”

मरियम दौड़कर आई।

“क्या हुआ अब्बा?”

फारूक ने कहा—

“मुझे शहर की अनाज मंडी में पक्की नौकरी मिल गई है।”

“पक्की नौकरी?”

“हां बेटी। अब मुझे रोज गांव-गांव दूध बेचने नहीं जाना पड़ेगा। हर महीने तय तनख्वाह मिलेगी।”

अमीना की आंखों में आंसू आ गए।

“सच?”

“हां।”

घर में पहली बार भविष्य की उम्मीद पैदा हुई।

कुछ दिनों बाद फारूक ने गांव के पशु व्यापारी को अपनी गाय और भैंसें बेच दीं।

मरियम ने जब आखिरी बार उन्हें जाते देखा तो उसकी आंखें नम थीं।

लेकिन उसके दिल में एक राहत भी थी।

अब उसे हर सुबह अंधेरे में उठकर दूध नहीं निकालना पड़ेगा।

अब उसे गोबर नहीं उठाना पड़ेगा।

अब उसके पास शायद थोड़ा समय होगा।

लेकिन उसे पता नहीं था कि उसके अब्बा ने उसके लिए इससे भी बड़ा फैसला कर लिया है।


अगली सुबह फारूक ने कहा—

“मरियम, जल्दी तैयार हो जा।”

“कहां जाना है?”

“स्कूल।”

मरियम ने सोचा उसने गलत सुना है।

“स्कूल?”

“हां। आज तेरा दाखिला करवाने जा रहा हूं।”

मरियम की आंखें फैल गईं।

“अब्बा… मैं?”

फारूक मुस्कुराया।

“हां मेरी बेटी। तू।”

मरियम की आंखों से आंसू बहने लगे।

“लेकिन लोग क्या कहेंगे?”

फारूक ने गंभीर होकर कहा—

“जब हमारे घर में गरीबी थी, तब गांव के किसी आदमी ने आकर तेरे हाथ से गोबर नहीं उठाया था। किसी ने लकड़ियां नहीं चुनी थीं। किसी ने हमारे घर का राशन नहीं दिया था।”

वह कुछ पल रुका।

“तो अब लोग क्या कहते हैं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।”

मरियम ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया।

“अब्बा… मैं आपको कभी शर्मिंदा नहीं करूंगी।”

फारूक ने कहा—

“बस एक बात याद रखना। घर का काम करना, लेकिन अपने सपने को कभी मत मारना।”


उस दिन मरियम पहली बार स्कूल पहुंची।

उसने पुराना- दी, तो वह किताब को ऐसे देखसा दुपट्टा ठीक किया।

बालों में वही लाल रिबन था।

हाथों में वही चूड़ियां थीं।

जैनब ने उसे देखते ही दौड़कर गले लगा लिया।

“मरियम! तुम सच में आ गई!”

मरियम हंसते हुए रो पड़ी।

“हां जैनब… अब मैं भी पढ़ूंगी।”

पहले दिन जब मास्टर जी ने उसे तख्ती और किताब दी, तो वह किताब को ऐसे देख रही थी जैसे उसके हाथ में कोई खजाना आ गया हो।

अक्षर उसके लिए नए थे।

लेकिन उसकी मेहनत पुरानी थी।

वह सुबह घर का काम करती।

फिर स्कूल जाती।

दोपहर में लौटकर खाना बनाती।

शाम को बर्तन साफ करती।

और रात में चूल्हे की बुझती आग के पास बैठकर पढ़ती।

धीरे-धीरे अक्षर शब्द बनने लगे।

शब्द वाक्य बनने लगे।

और एक दिन उसने अपने पिता की अनाज मंडी की रसीद खुद पढ़ ली।

उसने कागज उठाकर कहा—

“अब्बा… यहां पांच सौ रुपये लिखे हैं।”

फारूक कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा।

फिर उसकी आंखें भर आईं।

“मेरी बेटी पढ़ना सीख गई…”

अमीना मुस्कुराई।

“मैंने कहा था ना, हमारी मरियम बहुत होशियार है।”

फारूक ने रसीद वापस ली।

“अब मुझे शहर में किसी के सामने हिसाब पूछने के लिए हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। मेरी बेटी खुद पढ़कर बता दिया करेगी।”

मरियम ने मुस्कुराकर कहा—

“अब्बा, मास्टर जी कहते हैं कि अगर मैं ऐसे ही मेहनत करती रही तो अगले साल बड़ी जमात की परीक्षा दे सकती हूं।”

फारूक ने तुरंत कहा—

“देगी। जरूर देगी।”

फिर उसने हंसकर कहा—

“बस घर का काम समय पर कर देना।”

मरियम भी हंस पड़ी।

“जी अब्बा!”

उस रात पूरा परिवार पहली बार एक साथ बैठकर खाना खा रहा था।

चूल्हे की आग धीमी थी।

घर अब भी मिट्टी का था।

गरीबी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी।

लेकिन उस घर में अब एक नई चीज आ चुकी थी—

उम्मीद।

मरियम ने अपनी कलाई की चूड़ियों को देखा।

फिर अपने पास रखी किताब को देखा।

उसने धीरे से खुद से कहा—

“एक दिन मैं इस घर की हालत बदलूंगी।”

अमीना ने सुन लिया।

“क्या कहा?”

मरियम मुस्कुराई।

“कुछ नहीं अम्मा।”

लेकिन इस बार उसकी आंखों में सपना नहीं था।

इरादा था।

और शायद जिंदगी बदलने के लिए इतना ही काफी होता है।

क्योंकि कभी-कभी एक गरीब लड़की की जिंदगी बदलने के लिए महल नहीं चाहिए होता…

बस एक पिता का भरोसा,

एक मां की दुआ,

एक किताब,

और अपने सपने को जिंदा रखने की हिम्मत चाहिए होती है।

और जिस दिन किसी गरीब बच्चे के हाथ में मजदूरी की जगह किताब आ जाती है, उस दिन सिर्फ एक जिंदगी नहीं बदलती… पूरी आने वाली पीढ़ी बदल सकती है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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