गरीब दामाद का बदला — 5 साल बाद अरबपति बनकर लौटा अमर
गरीब दामाद का बदला — 5 साल बाद अरबपति बनकर लौटा अमर
शहर के सबसे बड़े कारोबारी परिवार की आलीशान कोठी में उस दिन एक ऐसा तूफान उठने वाला था, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
दरवाजे पर खड़ा था एक साधारण-सा युवक—पुराने कपड़े, धूल से भरे जूते और चेहरे पर थकान।
उसका नाम था अमर।
वह इसी घर का दामाद था।
लेकिन आज उसके पास न बड़ी गाड़ी थी, न महंगे कपड़े और न ही बैंक बैलेंस।
वह सिर्फ अपनी पत्नी से मिलने आया था।
जैसे ही अमर ने दरवाजे पर कदम रखा, घर के नौकर ने उसे रोक दिया।
“कहां जा रहे हो?”
अमर ने शांत आवाज में कहा, “मुझे प्रिया से मिलना है। वह मेरी पत्नी है।”
नौकर कुछ कहता, उससे पहले अंदर से प्रिया की मां की आवाज आई—
“इसे अंदर किसने आने दिया?”
वह तेजी से बाहर आईं। अमर को ऊपर से नीचे तक देखा और ताना मारते हुए बोलीं,
“तुम्हें शर्म नहीं आती? मेरे बेटे की कंपनी और इस घर में तुम्हारे जैसे गरीब आदमी की कोई जगह नहीं है।”
अमर ने सिर झुका लिया।
“मांजी, मैं यहां किसी से पैसे मांगने नहीं आया। मैं सिर्फ अपनी पत्नी से मिलने आया हूं।”
“पत्नी?”
वह हंस पड़ीं।
“मेरी बेटी इस घर की बहू है। अब वह तुम्हारी गरीबी में नहीं रहेगी।”
तभी प्रिया दौड़ती हुई बाहर आई।
“मां! बस कीजिए। ये मेरे पति हैं।”
उसकी मां गुस्से में चिल्लाईं—
“चुप! तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यही थी कि तुमने इस गरीब लड़के से शादी की। तुम्हारे पिता ने कितना समझाया था, लेकिन तुमने हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी।”
प्रिया की आंखों में आंसू आ गए।
अमर ने उसकी तरफ देखा।
“प्रिया, मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें यहां से ले जाने आया हूं।”
प्रिया कुछ बोल नहीं पाई।
उसके पीछे उसका पूरा परिवार खड़ा था।
उसके पिता ने कठोर आवाज में कहा,
“गार्ड!”

दो गार्ड आगे आए।
“इस आदमी को बाहर निकालो।”
प्रिया चीख उठी—
“पिताजी, ऐसा मत कीजिए!”
उसकी मां ने उसे रोकते हुए कहा,
“तुम्हारे पास सिर्फ दो रास्ते हैं। या तो इस गरीब आदमी को भूल जाओ, या फिर इस घर से बाहर निकल जाओ।”
प्रिया टूट गई।
अमर ने उसकी आंखों में देखा और धीमी आवाज में कहा,
“प्रिया, फैसला तुम्हें करना है। लेकिन मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूंगा।”
कुछ पल तक दोनों एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर अमर ने कहा,
“याद रखना, आज मैं गरीब हूं। लेकिन हमेशा गरीब नहीं रहूंगा। एक दिन मैं इतना बड़ा बनकर लौटूंगा कि यही लोग मुझे पहचानने के लिए मजबूर होंगे।”
प्रिया रोते हुए बोली,
“अमर… मुझे माफ कर दो।”
अमर के चेहरे पर दर्द भरी मुस्कान आई।
“तुम मजबूर नहीं हो प्रिया… तुम कमजोर हो।”
इतना कहकर वह मुड़ गया।
पीछे से प्रिया दौड़ती हुई आई।
“अमर! रुको!”
लेकिन तब तक दरवाजा बंद हो चुका था।
अमर उस घर से हमेशा के लिए निकल गया।
पांच साल पहले…
शहर से दूर एक छोटे से गांव में अमर एक बूढ़े काका के सामने बैठा था।
उसकी आंखों में नींद नहीं थी।
काका ने पूछा,
“बेटा, अब क्या करेगा?”
अमर ने मुट्ठी बांध ली।
“काका, मेरे पास पैसे नहीं हैं। नौकरी नहीं है। कोई सहारा नहीं है।”
कुछ पल रुककर उसने कहा,
“लेकिन मेरे पास मेहनत करने की ताकत है।”
काका मुस्कुराए।
“तो फिर मेहनत कर।”
अमर ने गांव की एक छोटी-सी जमीन खरीद ली।
लोग उसका मजाक उड़ाने लगे।
“शहर का लड़का खेती करेगा?”
“इसे खेती का क्या पता?”
“दो महीने में भाग जाएगा।”
लेकिन अमर ने किसी की बात नहीं सुनी।
उसने इंटरनेट, किताबों और किसानों से सीखना शुरू किया।
एक दिन उसे ऑर्गेनिक मशरूम की खेती का विचार आया।
उसने काका से कहा,
“मैं ऐसी मशरूम उगाऊंगा जिसकी गुणवत्ता शहर के बड़े होटलों में बिके।”
काका ने उसका साथ दिया।
शुरुआत में अमर के पास सिर्फ कुछ हजार रुपये थे।
पहली