दरिया में धकेली गई पत्नी — लेकिन उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई – News

दरिया में धकेली गई पत्नी — लेकिन उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई

दरिया में धकेली गई पत्नी — लेकिन उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई

दरिया में धकेली गई पत्नी — लेकिन उसकी कहानी वहीं खत्म नहीं हुई

रात का अंधेरा गहरा था। ट्रेन तेज़ रफ्तार से नदी के ऊपर बने लंबे पुल को पार कर रही थी। खिड़की के बाहर सिर्फ काला आसमान, पानी की गहराई और दूर-दूर तक चमकती कुछ रोशनियां दिखाई दे रही थीं।

सफ़िया खिड़की के पास बैठी अपनी दोनों बेटियों की तस्वीर फोन में देख रही थी।

आयज़ा आठ साल की थी और लीबा सिर्फ पांच साल की।

उसने तस्वीर को देखते हुए धीमे से मुस्कुराया।

“मेरी बच्चियां…”

तभी उसके सामने बैठे यासिर ने अचानक अपना फोन जेब में रखा।

उसका चेहरा कई मिनटों से गुस्से से तना हुआ था।

सफ़िया ने डरते हुए पूछा,

“यहां क्यों बुलाया? अंदर बैठकर बात करते हैं। आयज़ा का फोन आया था। वो पूछ रही थी कि हम कब पहुंचेंगे। आपने कहा था मायके छोड़कर शाम तक वापस आ जाएंगे।”

यासिर ने उसकी तरफ देखा।

“आठ साल में एक बेटा नहीं दिया और अब मुझे सिखाओगी कि कहां खड़ा होना है?”

सफ़िया चुप हो गई।

“वो आपकी भी बच्चियां हैं।”

“बस!”

यासिर की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि पास बैठे कुछ यात्रियों ने उनकी तरफ देखा।

“मैं थक गया हूं तुम्हारी रोती हुई शक्ल से। मेरा घर सिर्फ तुम्हारी बच्चियों का घर नहीं है।”

सफ़िया की आंखों में आंसू आ गए।

“लीबा आपके जूते रोज़ सीधा रखती है। आयज़ा आपकी दुकान की कॉपी पर लिखना सीखती है। उन्हें बेटा न होने की सजा क्यों देते हैं?”

यासिर ने कोई जवाब नहीं दिया।

उसने सिर्फ इतना कहा,

“मैंने फैसला कर लिया है।”

सफ़िया के दिल में अचानक अजीब-सा डर पैदा हुआ।

“कैसा फैसला?”

यासिर खड़ा हो गया।

“तुम्हारी वजह से मेरी जिंदगी रुक गई है। अब मैं अपना रास्ता खुद खोलूंगा।”

सफ़िया ने उसका हाथ पकड़ना चाहा।

“यासिर…”

लेकिन अगले ही पल ट्रेन पुल के बीचों-बीच थी।

एक चीख गूंजी।

फिर किसी के गिरने की आवाज़ आई।

और उसके बाद—

पानी की भयानक आवाज़।

एक मुसाफिर खिड़की से बाहर देखने लगा।

“कोई पानी में गिरा है!”

कुछ लोग दौड़कर दरवाजे की तरफ गए।

“जल्दी! रेस्क्यू वालों को खबर करो!”

ट्रेन आगे निकल गई।

लेकिन नदी के काले पानी में एक औरत हाथ-पैर मार रही थी।

वो ज़िंदा थी।


अस्पताल में

कुछ देर बाद बचाव दल ने उसे बाहर निकाला।

उसकी सांस बहुत कमजोर थी।

कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे।

एक डॉक्टर ने तुरंत कहा,

“पहले इलाज। सवाल बाद में।”

जब उसे होश आया तो उसके होंठ कांप रहे थे।

“मेरी… बच्चियां…”

एक नर्स उसके पास झुकी।

“आपका नाम क्या है?”

औरत ने बड़ी मुश्किल से कहा,

“सफ़िया…”

“सफ़िया, आपकी बच्चियां कहां हैं?”

उसकी आंखों से आंसू बह निकले।

“घर में…”

फिर उसने कांपती आवाज़ में कहा,

“मेरे शौहर ने मुझे धक्का दिया।”

कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

नर्स रुकैया ने उसका हाथ थाम लिया।

“आपको हर बात बार-बार बताने की जरूरत नहीं। अभी आप सुरक्षित हैं।”

सफ़िया ने तुरंत कहा,

“उसे यहां मत बुलाना।”

“किसे?”

“यासिर को।”

उसका शरीर डर से कांपने लगा।

“वो कहेगा मैं झूठ बोल रही हूं। घर में भी जब मैं चीखती थी तो कहता था—मोहल्ला क्या कहेगा?”

रुकैया ने धीरे से कहा,

“आपकी लोकेशन आपकी इजाजत के बिना किसी को नहीं दी जाएगी।”

सफ़िया ने आंखें बंद कर लीं।

“मेरी बच्चियों को बता देना… मैं उन्हें छोड़कर नहीं गई।”


घर में एक और कहानी

उधर घर में आयज़ा दरवाजे पर बैठी थी।

“अब्बू, अम्मी कब आएंगी?”

यासिर ने नजरें चुरा लीं।

“तुम्हारी अम्मी मायके गई हैं।”

“लेकिन उन्होंने कहा था शाम को वापस आएंगी।”

“फोन की बैटरी खत्म हो गई होगी।”

लीबा ने मासूमियत से पूछा,

“फिर उनके कपड़े आपके पास क्यों हैं?”

यासिर कुछ पल चुप रहा।

“जाकर अपना होमवर्क करो।”

आयज़ा ने धीरे से कहा,

“मैंने अम्मी के लिए रोटी बचाई है।”

यासिर का चेहरा कठोर हो गया।

“मैंने कहा ना, वो कुछ दिन बाहर रहेंगी।”

लेकिन घर की औरतों को उसकी कहानी पर भरोसा नहीं था।

एक ने पूछा,

“आपने पहले कहा था सफ़िया मायके गई है। फिर कहा खाला के पास गई है। आखिर वो है कहां?”

यासिर झल्ला उठा।

“तुम लोग हर बात में शक क्यों करती हो?”

“क्योंकि आपकी कोई बात दूसरी बात से मिल नहीं रही।”

यासिर ने गुस्से में दरवाजा बंद किया और दुकान चला गया।

लेकिन उसे नहीं पता था कि सच अब उसके पीछे चल पड़ा था।


पहला सुराग

रेस्क्यू टीम के एक सदस्य ने पुलिस को बताया कि एक मुसाफिर ने पूरी घटना के आसपास का वीडियो रिकॉर्ड किया था।

उसने नदी का दृश्य रिकॉर्ड किया था।

बाद में जब उसने वीडियो देखा, तो फ्रेम के किनारे एक हलचल दिखाई दी।

पुलिस ने वीडियो की जांच शुरू की।

मुसाफिर ने बताया,

“मैंने पहले चीख सुनी थी। फिर एक आदमी अंदर आया। थोड़ी देर बाद वो औरत दिखाई नहीं दी।”

“क्या आपने धक्का देखा?”

“सीधे नहीं। मैंने सिर्फ उसे पानी में गिरते देखा।”

“और उसके बाद?”

“मैंने उस आदमी से पूछा कि उसके साथ जो महिला थी, वो कहां है।”

पुलिस ने पूछा,

“उसने क्या जवाब दिया?”

मुसाफिर ने कहा,

“पहले बोला—रिश्तेदार से मिलने गई है।”

“फिर?”

“फिर बोला—उसे चक्कर आ रहे थे, शायद वॉशरूम की तरफ गई है।”

पुलिस अधिकारी ने नोटबुक बंद की।

“हर बयान और हर रिकॉर्ड अलग-अलग जांचा जाएगा।”


सफ़िया की एक और सच्चाई

अस्पताल में सफ़िया धीरे-धीरे ठीक हो रही थी।

लेकिन उसके घाव सिर्फ शरीर पर नहीं थे।

पानी का गिलास उठाते ही उसे नदी याद आती।

ट्रेन की आवाज़ सुनकर उसका दिल तेज़ धड़कने लगता।

रात में उसे वही पल बार-बार दिखाई देता।

रुकैया उससे कहती,

“डरना कमजोरी नहीं है।”

सफ़िया चुप रहती।

एक दिन उसने कहा,

“मैं अपनी बेटियों के पास वापस जाना चाहती हूं।”

“जाओगी।”

“लेकिन यासिर के घर नहीं।”

“वह फैसला तुम्हारा होगा।”

सफ़िया ने पहली बार लंबे समय बाद सिर उठाकर कहा,

“मेरा घर सिर्फ वो पीला दरवाजा नहीं है।”


फिर खुला पुराना राज़

एक दिन अस्पताल में एक सोलह साल की लड़की सफ़िया से मिलने आई।

उसका नाम समर था।

सफ़िया उसे देखकर कुछ पल के लिए जम गई।

लड़की की आंखें उसे जानी-पहचानी लगीं।

सफ़िया ने पूछा,

“तुम्हारी मां का नाम?”

लड़की ने कहा,

“रुकैया।”

सफ़िया का चेहरा बदल गया।

“और तुम्हारे पिता?”

“यासिर।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

रुकैया सफ़िया की तरफ देखने लगी।

फिर धीरे से बोली,

“मैं उसकी पहली पत्नी थी।”

सफ़िया की आंखों में आंसू भर आए।

“उसने कहा था उसकी पहली बीवी मर गई थी।”

रुकैया ने सिर झुका लिया।

“मैं मरी नहीं थी।”

उसने एक पुरानी फाइल निकाली।

“हमारा रिश्ता खत्म हो गया था। मैं अपनी बेटी को लेकर अलग रहने लगी। लेकिन उसने लोगों से कहा कि मैं मर चुकी हूं।”

सफ़िया ने कांपते हुए पूछा,

“क्यों?”

रुकैया ने कहा,

“क्योंकि उसे सवालों से बचना था।”

फिर उसने एक और बात बताई।

“उसने तुम्हें भी वही कहा जो मुझे कहा था—बेटा नहीं हुआ तो घर अधूरा है।”

सफ़िया की आंखों से आंसू बहने लगे।

उसे पहली बार समझ आया कि समस्या उसके अंदर नहीं थी।

समस्या उस सोच में थी जो बेटियों को कम और बेटे को वारिस समझती थी।


यासिर की मां

जब यासिर की मां शाहीन को पता चला कि सफ़िया ज़िंदा है, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

“क्या सफ़िया सच में ज़िंदा है?”

उसे जवाब मिला,

“हां। मैंने उसकी आवाज़ सुनी है।”

शाहीन की आंखों में आंसू आ गए।

“मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता।”

फिर कुछ देर बाद वह खुद ही बोली,

“लेकिन…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मैंने ही तो हमेशा उससे कहा था कि उसे एक बेटा चाहिए।”

उसकी बेटी ने जवाब दिया,

“आपकी ख्वाहिश अलग बात है। उसने जो किया, उसकी जिम्मेदारी उसकी है।”

शाहीन ने सिर झुका लिया।

“मैंने एक और गलती की थी।”

“क्या?”

“मैंने रुकैया के बारे में लोगों से झूठ बोलने दिया।”

उसने पुरानी फाइल बेटी को दी।

“मैंने एक जिंदा औरत को लोगों की नजर में मर जाने दिया।”


मां और बेटियों की मुलाकात

कई दिनों बाद सफ़िया को अपनी बेटियों से मिलने की इजाजत मिली।

आयज़ा कमरे में दाखिल हुई।

कुछ सेकंड तक वह सिर्फ अपनी मां को देखती रही।

फिर बोली,

“अम्मी…”

सफ़िया ने हाथ फैलाए।

आयज़ा दौड़कर उसके पास आई।

लीबा पीछे खड़ी रो रही थी।

“आओ बेटा।”

लीबा ने पूछा,

“आप हमें छोड़कर क्यों चली गई थीं?”

सफ़िया ने उसे सीने से लगा लिया।

“मैं तुम्हें छोड़कर नहीं गई थी।”

आयज़ा ने पूछा,

“अब्बू ने कहा था आप अपनी मर्जी से गई थीं।”

सफ़िया ने कुछ पल आंखें बंद कीं।

“तुम्हें किसी को गलत साबित करने की जरूरत नहीं। बस इतना जानो कि तुम्हारी अम्मी तुम्हें छोड़ना नहीं चाहती थी।”

आयज़ा रोते हुए बोली,

“मैं आपसे नाराज हूं।”

सफ़िया मुस्कुराई।

“नाराज हो सकती हो।”

“लेकिन मुझे आपकी बहुत याद आई।”

“मुझे भी।”

तीनों एक-दूसरे से लिपट गईं।


आमना-सामना

कुछ समय बाद यासिर को सफ़िया के सामने लाया गया।

यासिर ने उसे देखा तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

“तुम… जिंदा हो?”

सफ़िया ने शांत आवाज़ में कहा,

“हां। जिंदा हूं।”

यासिर बोला,

“मैंने तुम्हें धक्का नहीं दिया।”

सफ़िया ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा,

“तुमने मुझे बेटा न देने का इल्जाम लगाया था।”

“मैं गुस्से में था।”

“तुम्हारा गुस्सा मेरी जान से बड़ा नहीं था।”

यासिर ने सफाई देने की कोशिश की।

“ट्रेन में बहस हुई थी। तुम खुद बाहर चली गई थीं।”

सफ़िया ने सिर हिलाया।

“मैं अपना बयान दे चुकी हूं।”

फिर रुकैया आगे आई।

“और तुमने मुझे भी लोगों के सामने मरा हुआ बताया था।”

यासिर चुप हो गया।

उसकी मां शाहीन ने पहली बार बेटे की तरफ देखकर कहा,

“तुम्हारा धक्का तुम्हारा है।”

“लेकिन अम्मी…”

“नहीं।”

शाहीन की आंखों में आंसू थे।

“मैंने पोते की ख्वाहिश में बेटियों को कम समझा। उसकी गलती का जवाब मैं अपने सिर नहीं लूंगी।”


सफ़िया ने नई जिंदगी चुनी

सफ़िया वापस उस घर में नहीं गई।

उसने अपनी बेटियों के साथ एक सुरक्षित जगह पर रहना शुरू किया।

लेकिन उसके सामने एक और सवाल था—

“अब आगे क्या?”

वह कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया करती थी।

एक दिन उसने कहा,

“मैं फिर पढ़ाना चाहती हूं।”

उसे एक छोटे स्कूल में काम का मौका मिला।

पहले दिन उसकी आवाज़ थोड़ी कांपी।

एक बच्ची ने गलत जवाब दिया।

बाकी बच्चे हंसने लगे।

सफ़िया मुस्कुराई और बोली,

“गलत जवाब देने से डरना नहीं चाहिए।”

फिर उसने अपनी कॉपी बंद की।

“क्योंकि कभी-कभी गलत जवाब हमें सही सवाल तक पहुंचाता है।”

बच्चे ध्यान से उसे सुनने लगे।

उस दिन सफ़िया ने महसूस किया—

वह सिर्फ बची नहीं थी।

वह फिर से जी रही थी।


आखिरी सफर

एक दिन आयज़ा ने पूछा,

“अम्मी, क्या हम ट्रेन से जाएंगे?”

सफ़िया कुछ पल चुप रही।

उसे नदी याद आई।

वही पुल।

वही अंधेरा।

वही चीख।

फिर उसने बेटी का हाथ पकड़ा।

“आज नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि सफर डर को हराने के लिए नहीं किया जाता।”

“तो?”

“जब दिल तैयार हो, तब अपनी मर्जी से सफर करना चाहिए।”

आयज़ा मुस्कुराई।

“आज बस से चलेंगे?”

सफ़िया हंस पड़ी।

“हां।”

लीबा ने तुरंत कहा,

“और स्टेशन का बिस्किट?”

“वो भी मिलेगा।”

तीनों हंसने लगीं।

कुछ महीने पहले जिस नदी ने उसकी जिंदगी खत्म करने की कोशिश की थी, उसी नदी के किनारे से गुजरते हुए सफ़िया ने अपनी बेटी की कॉपी खोली।

आयज़ा ने लिखा—

“उसने मेरी मां को नदी में धकेला था।”

फिर उसने अगली लाइन लिखी—

“लेकिन मेरी मां की कहानी वहीं खत्म नहीं हुई।”

सफ़िया ने बेटी की कॉपी देखी।

उसकी आंखें नम हो गईं।

“एक और लाइन लिखोगी?”

आयज़ा ने पूछा,

“क्या?”

सफ़िया ने मुस्कुराकर कहा,

“लिखो—मेरी मां ने मुझे अपना नाम लिखना सिखाया।”

आयज़ा ने लिखा।

और उस दिन सफ़िया को समझ आया कि जिंदगी कभी-कभी हमें वहीं से दोबारा शुरू करनी पड़ती है, जहां किसी ने सोचा था कि हमारी कहानी खत्म हो चुकी है।

नदी पीछे रह गई थी।

ट्रेन पीछे रह गई थी।

यासिर की आवाज़ पीछे रह गई थी।

लेकिन सफ़िया आगे बढ़ रही थी।

अपनी बेटियों के साथ।

अपनी आवाज़ के साथ।

और सबसे बढ़कर—

अपनी मर्जी से।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

Related Articles