गोरखपुर हत्याकांड: एक रात, दो मौतें और रिश्तों के पीछे छिपा ऐसा राज जिसने पूरे शहर को हिला दिया
गोरखपुर हत्याकांड: एक रात, दो मौतें और रिश्तों के पीछे छिपा ऐसा राज जिसने पूरे शहर को हिला दिया
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश: एक मां के लिए उसका बच्चा पूरी दुनिया होता है और एक परिवार के लिए उसका घर सबसे सुरक्षित जगह। लेकिन जब उसी घर की चारदीवारी के भीतर पिता और चार साल के मासूम बेटे की हत्या हो जाए, तो सवाल सिर्फ अपराध का नहीं रहता—सवाल भरोसे, रिश्तों और उन फैसलों का भी होता है जो कभी-कभी पूरी जिंदगी बदल देते हैं।
जनवरी 2016 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में सामने आया ओम प्रकाश यादव हत्याकांड भी ऐसा ही मामला था। शुरुआत में पुलिस को लगा कि घर में लूट के इरादे से घुसे बदमाशों ने डॉक्टर और उनके बेटे की हत्या कर दी। लेकिन जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कहानी ने ऐसा मोड़ लिया जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
यह मामला बाद में अदालत तक पहुंचा और अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, हत्या के पीछे घर के अंदर के रिश्तों से जुड़ी साजिश सामने आई।
सुबह दरवाजा नहीं खुला और शुरू हुआ डर का सिलसिला
21 जनवरी 2016 की सुबह गोरखपुर के शाहपुर इलाके की अशोक नगर कॉलोनी में यादव परिवार के घर रोज की तरह मजदूर और मिस्त्री काम करने पहुंचे थे।
घर में मरम्मत का काम चल रहा था। परिवार के छोटे बेटे ओम प्रकाश यादव आंखों के डॉक्टर थे और पहली मंजिल पर अपनी पत्नी अर्चना यादव तथा चार साल के बेटे शिवा उर्फ नितिन के साथ रहते थे।
सुबह करीब नौ बजे कुछ मजदूरों को किसी सामान की जरूरत पड़ी। वे ओम प्रकाश के कमरे की ओर गए। दरवाजा खटखटाया गया, आवाज लगाई गई, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया।
यह बात असामान्य थी।
ओम प्रकाश डॉक्टर थे और उन्हें सुबह अपने क्लीनिक के लिए निकलना होता था। काफी देर तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने पर मजदूरों ने दरवाजा धक्का देकर खोला।
अंदर का दृश्य देखकर वहां मौजूद लोगों के होश उड़ गए।
बिस्तर पर ओम प्रकाश पड़े थे। उनके सिर से खून निकल चुका था। कमरे में खून के निशान थे। पास ही उनका चार साल का बेटा नितिन भी पड़ा था।
बच्चे में भी जीवन के कोई संकेत नहीं मिले।

बगल के कमरे में बंद थी अर्चना
घटना का एक और पहलू लोगों को परेशान कर रहा था।
पास के कमरे से एक महिला दरवाजा पीट रही थी और बाहर से दरवाजा खोलने के लिए आवाज लगा रही थी।
जब दरवाजा खोला गया तो अंदर ओम प्रकाश की पत्नी अर्चना मौजूद थीं।
पुलिस के पहुंचने से पहले परिवार के लोग और पड़ोसी मौके पर जमा हो चुके थे। घर में चीख-पुकार मच गई थी।
पुलिस ने घटनास्थल को सुरक्षित किया और पिता-पुत्र के शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।
शुरुआती तौर पर मामला लूटपाट का दिखाई दे रहा था। घर में सामान बिखरा हुआ था और अर्चना के कुछ गहने तथा मोबाइल फोन गायब बताए गए।
ऐसा लग रहा था कि लुटेरों ने घर में घुसकर वारदात की और फिर सामान लेकर फरार हो गए।
लेकिन पुलिस को जल्द ही कुछ ऐसे सवाल मिले जिनका जवाब लूट की कहानी में नहीं मिल रहा था।
मामला हाई-प्रोफाइल क्यों बन गया?
ओम प्रकाश का परिवार प्रभावशाली माना जाता था। उनके बड़े भाई पुलिस विभाग में इंस्पेक्टर थे। वहीं अर्चना के पिता भी पीएसी में वरिष्ठ अधिकारी बताए गए थे और उनकी ड्यूटी मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा में लगी थी।
घटना की जानकारी मिलते ही वरिष्ठ अधिकारियों तक मामला पहुंचा।
पुलिस पर जल्दी से जल्दी हत्यारों को पकड़ने का दबाव बढ़ गया। फॉरेंसिक टीम को बुलाया गया और घर के हर हिस्से की जांच शुरू हुई।
यहीं से जांच की दिशा बदलने लगी।
पुलिस ने देखा कि घर के कुछ दरवाजों की कुंडी बाहर से नहीं बल्कि अंदर की तरफ से टूटने के निशान दे रही थी।
सवाल उठा—अगर बाहर से लुटेरे आए थे, तो दरवाजा अंदर से तोड़े जाने जैसा क्यों दिख रहा था?
दूसरा सवाल था कि अगर घर में हथौड़े से हमला हुआ, तो बाकी लोगों को शोर क्यों नहीं सुनाई दिया?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल था—अगर लुटेरे आए थे, तो अर्चना को अलग कमरे में बंद करने की जरूरत क्यों पड़ी?
पोस्टमार्टम ने भी खड़े किए कई सवाल
पोस्टमार्टम रिपोर्ट से जांचकर्ताओं को पता चला कि ओम प्रकाश के सिर पर किसी भारी वस्तु से वार किया गया था।
उनके शरीर पर संघर्ष के बहुत ज्यादा निशान नहीं थे।
बच्चे की मौत भी सामान्य नहीं थी। उसके गले पर दबाव के निशान पाए गए।
अब पुलिस के सामने एक कठिन सवाल था।
क्या यह वास्तव में बाहर से आए बदमाशों का हमला था?
या फिर हत्या की कहानी के पीछे घर के भीतर कोई और राज छिपा था?
पुलिस की नजर पत्नी पर क्यों गई?
जांच के दौरान परिवार के सदस्यों से पूछताछ की गई। इसी दौरान ओम प्रकाश की मां ने पुलिस को बताया कि पिछले कुछ समय से उनके बेटे और बहू के रिश्तों में तनाव था।
बताया गया कि अर्चना काफी समय मोबाइल फोन पर बिताती थीं।
पति-पत्नी के बीच मोबाइल को लेकर विवाद भी होते थे। दिसंबर 2015 के आसपास दोनों के सोने की व्यवस्था भी अलग हो गई थी।
पुलिस ने अर्चना का मोबाइल जांच के लिए लिया।
कॉल डिटेल और सोशल मीडिया गतिविधियों की जांच में एक व्यक्ति का नंबर बार-बार सामने आया।
उस व्यक्ति का नाम अजय यादव बताया गया।
पुलिस के अनुसार, अर्चना और अजय के बीच लंबे समय तक फोन कॉल और सोशल मीडिया पर बातचीत होती थी।
इसके बाद जांच का पूरा फोकस बदल गया।
फेसबुक की दोस्ती से शुरू हुई कहानी
जांच में सामने आई पुलिस की कहानी के अनुसार, अर्चना और अजय की पहचान सोशल मीडिया के माध्यम से हुई थी।
बताया गया कि दोनों के बीच फेसबुक पर बातचीत शुरू हुई और धीरे-धीरे यह बातचीत लगातार फोन कॉल तथा व्हाट्सऐप चैट तक पहुंच गई।
पुलिस के अनुसार, दोनों के बीच भावनात्मक संबंध बन गए थे।
जांचकर्ताओं का दावा था कि दोनों कई बार मिले भी थे।
अर्चना के पति को इस संबंध पर शक हुआ और उन्होंने कथित तौर पर अजय से संपर्क रखने का विरोध किया।
लेकिन पुलिस के मुताबिक, इसके बाद भी दोनों के बीच बातचीत जारी रही।
यहीं से जांचकर्ताओं ने हत्या की साजिश की आशंका जताई।
20 जनवरी की रात बनी वारदात की तारीख
20 जनवरी 2016 की रात परिवार के कई सदस्य एक परिचित के यहां शादी की सालगिरह के कार्यक्रम में गए थे।
अर्चना ने तबीयत खराब होने की बात कहकर कार्यक्रम में जाने से इनकार कर दिया था।
बाद में ओम प्रकाश अपने बेटे को लेकर घर लौट आए।
अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, इसी दौरान अजय पहले से घर में मौजूद था और उसे छिपा दिया गया था।
रात बीतने के बाद जब ओम प्रकाश सो गए, तब कथित तौर पर अजय को कमरे में बुलाया गया।
इसके बाद ओम प्रकाश के सिर पर भारी वस्तु से हमला किया गया।
लेकिन इस घटना का सबसे दर्दनाक हिस्सा इसके बाद सामने आया।
चार साल का बच्चा बना सबसे बड़ा गवाह
अभियोजन पक्ष के अनुसार, हमले के दौरान चार साल का नितिन जाग गया था।
वह अपनी मां के पास गया और उसने घटना देख ली थी।
जांच में सामने आई कहानी के मुताबिक, बच्चे को भी इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि वह घटना का गवाह बन चुका था।
अजय ने कथित तौर पर बच्चे को मारने से इनकार किया, लेकिन अभियोजन पक्ष के अनुसार बाद में अर्चना ने स्वयं बच्चे का गला दबाया।
कुछ ही देर में चार साल के नितिन की भी मौत हो गई।
इसके बाद घटना को लूटपाट जैसा दिखाने की कोशिश की गई। कमरे का सामान अस्त-व्यस्त किया गया और कुछ गहने तथा मोबाइल फोन गायब कर दिए गए।
अर्चना को दूसरे कमरे में बंद कर दिया गया ताकि पुलिस के सामने यह कहानी रखी जा सके कि बदमाश घर में आए थे।
24 घंटे के भीतर पुलिस ने खोला राज
पुलिस ने अजय यादव को हिरासत में लेकर पूछताछ की।
पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान अजय ने कथित तौर पर पूरी साजिश के बारे में जानकारी दी।
इसके बाद जांचकर्ताओं ने कथित तौर पर हत्या में इस्तेमाल हथौड़ा, मोबाइल फोन और कुछ गहने बरामद किए।
अजय को अर्चना के सामने लाया गया तो जांच की दिशा और स्पष्ट हो गई।
पुलिस ने दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की और मामले में गिरफ्तारी की।
इस तरह जिस घटना को शुरुआत में एक सामान्य लूट और हत्या माना जा रहा था, वह पुलिस जांच के अनुसार आपसी संबंधों और कथित साजिश से जुड़ा मामला बन गया।
अदालत में पहुंचा मामला
पुलिस ने मामले में चार्जशीट दाखिल की और मुकदमा अदालत में चला।
आपके दिए गए विवरण के अनुसार, 17 अक्टूबर 2020 को गोरखपुर की अपर सेशन कोर्ट ने अर्चना यादव और अजय यादव को उम्रकैद की सजा सुनाई तथा दोनों पर ₹65,000 का जुर्माना लगाया।
यह अदालत का निर्णय था और मामले में दोषसिद्धि न्यायिक प्रक्रिया के बाद हुई।
इस कहानी का सबसे दर्दनाक सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ यह नहीं है कि हत्या क्यों हुई।
सबसे बड़ा सवाल उस चार साल के बच्चे को लेकर है जिसने दुनिया को समझना भी ठीक से शुरू नहीं किया था।
एक बच्चा अपने माता-पिता को ही अपनी पूरी दुनिया मानता है। उसे यह अंदाजा भी नहीं होता कि जिस घर में वह सुरक्षित महसूस करता है, वहीं उसकी जिंदगी का सबसे भयावह पल आने वाला है।
यह घटना यह भी दिखाती है कि किसी भी रिश्ते में तनाव हो सकता है, मतभेद हो सकते हैं और रिश्ते टूट भी सकते हैं। लेकिन हिंसा का रास्ता किसी समस्या का समाधान नहीं है।
किसी रिश्ते में साथ रहना संभव न हो तो अलग होना, कानूनी रास्ता अपनाना और परिवार या विशेषज्ञों से मदद लेना जैसे विकल्प मौजूद होते हैं।
एक गलत फैसला कई जिंदगियों को प्रभावित कर सकता है।
गोरखपुर का यह मामला वर्षों बाद भी इसलिए याद किया जाता है क्योंकि इसकी शुरुआत एक सामान्य घरेलू घटना की तरह हुई थी, लेकिन जांच के दौरान सामने आई कहानी ने हर किसी को झकझोर दिया।
एक डॉक्टर, उसका मासूम बेटा, एक परिवार और भरोसे से जुड़े रिश्ते—इन सबके बीच हुई इस त्रासदी ने यह सवाल जरूर छोड़ दिया कि आखिर किसी इंसान को उस सीमा तक पहुंचने से पहले रोकने के लिए समाज और परिवार क्या कर सकते हैं?
क्योंकि अपराध होने के बाद सजा मिल सकती है, लेकिन जो जिंदगी चली जाती है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता।