PART 3 4 साल बाद जब दामाद सास को देखने घर आया फिर
4 साल बाद जब दामाद सास के घर आया – भाग 3
नए जीवन की शुरुआत और बड़ी परीक्षा
अरवल में घटे उस दर्दनाक घटनाक्रम और सच्चे पश्चाताप के बाद मोहन और सुनीता दिल्ली वापस लौट आए थे। समय का पहिया तेज़ी से घूमता रहा और लगभग एक साल बीत गया। इस एक साल में मोहन और सुनीता ने अपने रिश्ते को फिर से सींचने और भरोसा बहाल करने में कड़ी मेहनत की थी। मोहन अब अपनी मर्यादाओं को लेकर बेहद सतर्क रहता था और अपनी पत्नी सुनीता को हर खुशी देने की कोशिश करता था।
उधर अरवल गाँव में, कमला भी अपने पापों का पश्चाताप करने के बाद धार्मिक कार्यों में मन लगाने लगी थी। उसने गाँव के मंदिर में सेवा करना शुरू कर दिया था ताकि उसके मन का भ/ट/का/व और अ/के/ला/प/न दूर हो सके।
सब कुछ ठीक चल रहा था कि तभी सुनीता के जीवन में एक बड़ी खुशखबरी आई। सुनीता ग/र्भ/व/ती थी और जल्द ही मोहन और सुनीता के घर एक छोटा नन्हा मेहमान आने वाला था। जब यह खबर मोहन के माता-पिता और कमला को मिली, तो पूरे परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई।
अरवल से आई नई खबर और बड़ा धर्मसंकट
जैसे-जैसे सुनीता के प्रसव (Delivery) का समय नज़दीक आने लगा, दिल्ली में मोहन के बूढ़े माता-पिता के लिए सुनीता की अकेले देखभाल करना थोड़ा कठिन होने लगा। मोहन दिन भर अपनी नौकरी में व्यस्त रहता था।
एक दिन मोहन के पिता ने कहा, “बेटा मोहन, सुनीता की हालत ऐसी है कि इस समय उसे अपनी माँ की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। हमें कमला समधिन जी को अरवल से दिल्ली बुला लेना चाहिए ताकि वह अपनी बेटी का ध्यान रख सके।”
यह सुनते ही मोहन और सुनीता दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया। पुरानी काली यादें, जिन्होंने उनके जीवन को तबाह कर दिया था, एक बार फिर उनकी आँखों के सामने तैरने लगीं।
मोहन ने हिचकिचाते हुए कहा, “पिताजी… क्या सासू माँ को यहाँ बुलाना सही रहेगा? हम खुद ही संभाल लेंगे।”
लेकिन मोहन के पिता नहीं माने और उन्होंने सीधे अरवल फोन करके कमला को दिल्ली आने का निमंत्रण दे दिया। कमला ने भी अपनी बेटी की इस नाज़ुक हालत में उसकी सेवा करने के लिए दिल्ली आने की सहमति दे दी।
दिल्ली का नया सवेरा और पुरानी यादों का इम्तिहान
कुछ दिनों बाद कमला दिल्ली आ पहुँची। जब कमला ने मोहन के घर में कदम रखा, तो उसके चेहरे पर संकोच और डर साफ़ दिख रहा था। मोहन ने अपनी सास के पैर छूकर आशीर्वाद लिया, लेकिन दोनों की आँखें एक-दूसरे से नज़रें मिलाने में कतरा रही थीं।
कमला ने सुनीता को गले लगाया और रोते हुए कहा, “बेटी, मुझे ईश्वर ने एक मौका दिया है कि मैं अपनी पिछली गलतियों का प्रायश्चित अपनी बेटी और होने वाले बच्चे की सेवा करके कर सकूँ।”
घर के एक ही छत के नीचे रहने के कारण मोहन और कमला का आमना-सामना होना स्वाभाविक था। लेकिन इस बार स्थितियाँ पूरी तरह अलग थीं।
मोहन ने अपने मन में प्रतिज्ञा कर ली थी कि वह अपनी मर्यादा की रेखा को कभी नहीं लांघेगा। जब भी कमला खाना परोसने आती या मोहन को चाय देती, तो मोहन केवल “धन्यवाद सासू माँ” कहकर दूर हट जाता। वह कभी भी कमला के साथ अकेले कमरे में नहीं रुकता था।
कमला ने भी अपने मन से हर प्रकार की काम-वासना और अ/ंत/रं/ग इच्छाओं को हमेशा-हमेशा के लिए मिटा दिया था। वह केवल अपनी बेटी की देख-रेख और ईश्वर के ध्यान में लीन रहती थी।
मर्यादा की जीत और सच्चा आत्मसमर्पण
एक रात, सुनीता को अचानक तेज़ दर्द महसूस हुआ। मोहन और कमला तुरंत उसे अस्पताल ले गए। अस्पताल के प्रतीक्षालय (Waiting Area) में मोहन बहुत घबराया हुआ बाहर टहल रहा था।
कमला ने मोहन के सिर पर हाथ रखा और कहा, “दामाद जी, घबराइए मत। ईश्वर सब ठीक करेंगे। आज मुझे आप पर बहुत गर्व हो रहा है कि आपने एक सच्चे पति और ज़िम्मेदार दामाद का धर्म निभाया है।”
मोहन ने आँखों में आँसू भरकर कहा, “सासू माँ, इंसान से गलतियाँ हो जाती हैं, लेकिन सही समय पर संभल जाना ही इंसानियत है। आपने और मैंने जो पा/प किया था, उसका दाग मिटने में समय लगा, लेकिन आज हम अपनी-अपनी मर्यादा में रहकर खुश हैं।”
कुछ ही घंटों बाद डॉक्टर ने बाहर आकर खुशखबरी दी कि सुनीता ने एक बहुत ही सुंदर और स्वस्थ बेटे को जन्म दिया है।
जब बच्चे को मोहन और कमला के हाथों में दिया गया, तो कमला की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उसने अपने नाती को अपनी गोद में लिया और ईश्वर का शुक्रिया अदा किया कि उसने उसके परिवार को बिखरने से बचा लिया।
निष्कर्ष और अंतिम सीख
अगले कुछ हफ़्तों तक कमला ने दिल्ली में रहकर अपनी बेटी सुनीता और नवजात बच्चे की निस्वार्थ भाव से सेवा की। अब उन तीनों के बीच किसी भी प्रकार की शंका, झिझक या अनुचित संबंध का नामो-निशान नहीं था।
जब कमला वापस अरवल लौटने लगी, तो सुनीता ने अपनी माँ के पैर छूकर कहा, “माँ, आज मुझे अहसास हुआ कि जब इंसान अपने भीतर की बुराई और अ/ंधे आकर्षण को मारकर सच के रास्ते पर चलता है, तो भगवान भी उसे माफ़ कर देते हैं।”
मोहन ने भी कमला के हाथ जोड़कर विदाई दी और कहा, “सासू माँ, आप हमेशा हमारे लिए पूज्य रहेंगी।”
कहानी की अंतिम सीख: यह कहानी हमें यह बहुत बड़ी सीख देती है कि क्षणिक अ/ंत/रं/ग वासना और श/री/र के बहकावे में आकर बनाए गए अनुचित संबंध केवल तबाही और ग्लानि लाते हैं। लेकिन यदि इंसान सच्चे दिल से पश्चाताप करे, अपनी मर्यादा की सीमाओं को समझे और अपने पवित्र रिश्तों की रक्षा करे, तो बड़े से बड़ा पा/प भी धुँधला पड़ जाता है और जीवन में पुनः शांति, पवित्रता और खुशहाली लौट आती है।