PART 2 दामाद ऐसा करेगा सोचा नहीं था।
दामाद ऐसा करेगा सोचा नहीं था (भाग 2)
भाग 1: अगली सुबह की कड़वी सच्चाई और पछतावा
उस काली रा/त के बीत जाने के बाद जब अगली सुबह सूरज की पहली किरण पड़ी, तो सरिता के लिए बिस्तर से उठना भी दूभर हो गया था। दामाद की अत्यधिक श/ा/री/रि/क ताकत और बर्बरता के कारण सरिता का पूरा जि/स्/म टूट चुका था। उसके अंदर उठने-बैठने और चलने-फिरने की हिम्मत तक नहीं बची थी।
उधर दूसरी तरफ, तेज असर वाली नीं/द क/ी गो/लि/यों के भारी प्रभाव से जब बेटी लवली सुबह लगभग 10 बजे सोकर उठी, तो उसका सिर बहुत भारी हो रहा था और आंखों में गहरा धुंधलापन था। जब लवली अपने कमरे से बाहर आई और उसने अपनी मां सरिता को दर्द से कराहते और बिस्तर पर बेसुध पड़े देखा, तो वह घबरा गई।
लवली ने अपनी मां के पास जाकर पूछा— “मां, तुम्हें क्या हुआ है? तुम्हारी तबियत इतनी खराब कैसे हो गई? तुम्हारे चेहरे पर इतना पसीना और शरीर में इतनी लाचारी क्यों है?”
सरिता अपनी ही सगी बेटी की नजरों से आंखें मिलाने में असमर्थ थी। अपनी घटिया वा/स/ना और अ/नै/ति/क क/ृत्य पर उसे भारी ग्लानि हो रही थी। उसने नजरें चुराते हुए बहाना बनाया— “कुछ नहीं बेटी, रात को अचानक पेट में बहुत तेज दर्द और चक्कर आने लगे थे, इसीलिए मुझसे उठा नहीं जा रहा है।”
भाग 2: दामाद की बढ़ती नीयत और ब्लैकमेलिंग
सरिता को लगा था कि यह पाप सिर्फ एक रा/त की बात थी और अब सब कुछ शांत हो जाएगा। लेकिन दामाद प्रमोद की सोच बिल्कुल अलग थी। एक बार अपनी ही सास के साथ अ/ं/त/रं/ग स/म्बंध बनाने के बाद उसके मन से सामाजिक मर्यादा और लोक-लाज का डर पूरी तरह से खत्म हो चुका था। अब उसके मन में सास के प्रति ह/व/स और लालच और ज्यादा बढ़ गया था।
दोपहर के समय जब लवली रसोई में खाना बनाने गई, तो प्रमोद मौका देखकर अपनी सास सरिता के कमरे में दाखिल हुआ। प्रमोद के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान थी। उसने सरिता के करीब आकर अ/म/र्या/दि/त भाषा में कहा— “सासू मां, कल रा/त का कार्यक्रम तो बहुत जबरदस्त रहा। मुझे आपके साथ बहुत आनंद आया। अब आज रा/त को भी हम फिर से वही नीं/द क/ी गो/ली लवली को देकर अलग कमरे में मिलेंगे।”
सरिता यह सुनकर कांप उठी। उसने रोते हुए हाथ जोड़े और कहा— “दामाद जी, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने अपनी सगी बेटी के साथ विश्वासघात किया है। अब यह पाप दोबारा मत करवाओ, नहीं तो भगवान भी मुझे माफ नहीं करेगा।”
लेकिन प्रमोद पर तो वासना का भूत सवार था। उसने सरिता को आंखें दिखाते हुए धमकाया— “अगर तुमने आज रा/त मेरी बात नहीं मानी या दूर भागने की कोशिश की, तो मैं लवली और पूरे गांव के सामने यह ढिंढोरा पीट दूंगा कि तुमने ही मुझे बहकाकर अपने कमरे में बुलाया था। फिर देखना समाज में तुम्हारी क्या इज्जत रह जाएगी।”
भाग 3: नीं/द क/ी गो/ली का भं/डा/फो/ड़
सरिता अब अपने ही बुने हुए जाल में पूरी तरह फंस चुकी थी। उसे अहसास हुआ कि उसने जिस दामाद के लिए अपनी मर्यादा बेची थी, वह अब एक खौफनाक ब्लैकमेलर बन चुका है।
उधर लवली का ध्यान घर की सफाई करते वक्त कचरे के डिब्बे पर गया। वहां उसे शहर के मेडिकल स्टोर से लाई गई तेज असर वाली नीं/द क/ी गो/लि/यों का खाली रैपर (स्ट्रिप) मिला। लवली का माथा ठनका। उसे याद आया कि पिछले दो दिनों से रात को खाना खाते ही उसे असामान्य रूप से गहरी और बेसुध करने वाली नींद क्यों आ रही थी।
लवली ने तुरंत वह दवाई का पर्चा और खाली स्ट्रिप उठाई और समझ गई कि खाने में कुछ न कुछ मिलाया जा रहा था। जब उसने प्रमोद के कमरे की तलाशी ली, तो उसे प्रमोद की जेब से बची हुई पावर टेबलेट्स और नीं/द क/ी गो/लि/यां भी मिल गईं। लवली का शक अब यकीन में बदलने लगा था कि उसकी मां और पति उसके पीछे कोई बहुत बड़ा और गंदा खेल खेल रहे हैं।
भाग 4: सच्चाई का महा-संग्राम और आत्मग्लानि
शाम के समय जब तीनों घर में मौजूद थे, तब लवली ने हिम्मत जुटाकर वह दवाई की खाली स्ट्रिप और गोलियां टेबल पर फेंक दीं।
लवली ने चीखते हुए पूछा— “मां! और प्रमोद! तुम दोनों मुझे बताओ कि यह नीं/द क/ी गो/लि/यां घर में कहां से आईं? और रोज रात को खाना खाने के बाद मैं अचानक बेसुध क्यों हो जाती थी? तुम लोग मेरे पीछे क्या कर रहे हो?”
बेटी के हाथों में सबूत देखकर सरिता के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसका बचा-कुचा ढांचा भी ढह गया। भारी पछतावे और डर के मारे सरिता फूट-फूटकर रोने लगी। वह दौड़कर अपनी बेटी लवली के कदमों में गिर पड़ी और बिलखते हुए बोली— “मुझे माफ कर दे बेटी! मैं वासना के अंधेपन में अंधी हो गई थी। तेरे इस पति ने और मैंने मिलकर तुझे नीं/द क/ी गो/ली दी और पिछले दो दिनों से हम दोनों अ/नै/ति/क स/म्बंध बना रहे थे।”
सरिता के मुंह से यह खौफनाक सच सुनते ही लवली पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिस मां ने उसे जन्म दिया, उसी ने उसके दांपत्य जीवन का सौदा कर दिया था, और जिस पति पर उसने भरोसा किया, वह उसकी सगी मां का ही श/ो/ष/ण कर रहा था।
भाग 5: अंतिम फैसला और सामाजिक संदेश
जब प्रमोद ने देखा कि उसकी पोल पूरी तरह खुल चुकी है, तो उसने निर्लज्जता की सारी हदें पार करते हुए उल्टा सरिता पर ही आरोप लगाना शुरू कर दिया। प्रमोद बोला— “लवली, इसमें मेरी कोई गलती नहीं है। तुम्हारी मां ही अकेली रहती थी और यही मुझे बार-बार फोन करके अपने पास बुलाती थी।”
लेकिन लवली अब सब समझ चुकी थी। उसने अपने इस चरित्रहीन और धोखेबाज पति प्रमोद के मुंह पर जोरदार थप्पड़ जड़ा और कहा— “तुम जैसा इंसान पति कहलाने के लायक नहीं है जो अपनी ही सास पर गंदी नजर रखता हो।” लवली ने उसी वक्त प्रमोद से रिश्ता तोड़ दिया और उसे अपने घर से धक्का देकर बाहर निकाल दिया।
इसके बाद लवली ने अपनी मां सरिता की तरफ देखा, जो जमीन पर पड़ी गिड़गिड़ा रही थी। लवली ने रोते हुए कहा— “मां, तुमने एक बेटी के भरोसे का क/त्/ल किया है। अब मैं तुम्हारे साथ कभी नहीं रह सकती।” लवली अपना सामान बांधकर हमेशा के लिए उस घर से दूर चली गई।
अब उस सूने घर में सरिता बिल्कुल अकेली रह गई थी। दामाद की है व ा न ि य त और अपनी खुद की चरित्रहीनता के कारण सरिता का जीवन पूरी तरह तबाह हो चुका था। समाज में थू-थू होने के डर और अपनी बेटी का घर उजाड़ने के अपराधबोध में वह दिन-रात पछतावे के आंसू बहाने लगी।