इंदौर के जानकी वृद्धाश्रम में चार बेटों की मांग की मौत अंतिम संस्कार कराने भी नहीं आए चारों बेटे! – News

इंदौर के जानकी वृद्धाश्रम में चार बेटों की मांग की मौत अंतिम संस्कार कराने भी नहीं आए चारों बेटे!

इंदौर के जानकी वृद्धाश्रम में चार बेटों की मांग की मौत अंतिम संस्कार कराने भी नहीं आए चारों बेटे!

1. तड़के सुबह का कॉल और ठंडे दिल

14 सितंबर 2026 की सुबह लगभग 6:00 बजे का वक्त हो रहा था। चारों तरफ अभी धुंध छाई हुई थी और कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। लगभग 23 साल का एक युवक चारपाई के पास घुटनों पर सिर टिकाए बैठा था। उसकी आंखों में बेबसी और उदासी साफ झलक रही थी। उसके ठीक बगल में एक बुजुर्ग महिला लेटी हुई थीं, जिन्होंने अपनी आखिरी सांस ले ली थी और उनका शरीर धीरे-धीरे ठंडा पड़ रहा था।

कांपते हाथों से उसने अपना फोन उठाया और एक नंबर डायल किया। फोन की घंटी बजने लगी—’टून… टून…’ यह आवाज सन्नाटे को चीर रही थी। दूसरी तरफ से आवाज आई: — “हेलो?”

युवक ने भारी मन से कहा: — “मैं अजय नागदा बात कर रहा हूं, प्रियो फाउंडेशन से। क्या मेरी बात लता दीदी के बेटे से हो रही है?”

“हां, मैं ही बोल रहा हूं। क्या बात है?” — दूसरी तरफ से बेहद रूखा जवाब आया।

“आपकी मां… अब इस दुनिया में नहीं रहीं।”

अजय ने सोचा था कि दूसरी तरफ से चीख-पुकार, रोने की आवाज या कम से कम एक गहरा सदमा सुनाई देगा। लेकिन जवाब में जो मिला, उसने अजय को अंदर तक झकझोर कर रख दिया: — “तो उनका अंतिम संस्कार कर देना। जो भी खर्चा होगा, मैं पैसे भेज दूंगा।”

यह शब्द इतने बेरुखे थे कि अजय सन्न रह गया। उसने गुस्से और उद्वेग में तुरंत फोन काट दिया।

2. बेरुखी का सिलसिला

अजय ने हिम्मत नहीं हारी और दूसरे बेटे का नंबर मिलाया। मां के गुजर जाने की खबर सुनकर उसने सारा जिम्मा बड़े भाई पर डाल दिया: — “जैसा बड़े भैया कहेंगे, वैसा होगा। जब वो ही नहीं आ रहे, तो मैं आकर क्या करूंगा?”

तीसरे बेटे को फोन किया गया, तो उसने पूरी बात सुने बिना ही टाल दिया: — “मैं चेन्नई में हूं, बहुत दूर हूं और आ नहीं सकता। आपको जो सही लगे, कर लीजिए।”

चौथे बेटे को अजय ने लगातार तीन बार फोन लगाया, लेकिन फोन बजता रहा और किसी ने नहीं उठाया।

70 साल की लताबाई की मौत वृद्धाश्रम में हुई थी। अजय ने सोचा कि बेटे दुनिया के किसी भी कोने में हों, 3 दिन के अंदर अपनी मां के अंतिम दर्शन के लिए तो जरूर आ जाएंगे। उसने अंतिम संस्कार रोककर इंतजार करने का फैसला किया।

1 दिन, 2 दिन, फिर 3 दिन बीत गए… लेकिन कोई नहीं आया।

3. एक साधारण लड़के का असाधारण सफर

23 साल के इस लड़के के कंधों पर इतना बड़ा जिम्मा कैसे आया, यह जानने के लिए जुलाई 2021 में चलना होगा। मध्य प्रदेश के सिहोर जिले के कोटिया नाला गांव का रहने वाला 17 साल का अजय नागदा बी-फार्मेसी की पढ़ाई करने इंदौर आया था।

एक शाम, एमवाई हॉस्पिटल के बस स्टैंड के पास अजय ने एक बुजुर्ग को लावारिस हालत में पड़ा देखा। वे बेहद कमजोर थे और 7-8 दिनों से भूखे-प्यासे थे। अजय ने हिम्मत जुटाई और लोगों की मदद से उन्हें अस्पताल के अंदर भर्ती कराया और रात 9 बजे तक वहीं रुका रहा।

अगली सुबह पुलिस का फोन आया कि उन बुजुर्ग की मौत हो गई है और उनका कोई वारिस नहीं है। अजय ने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा, “जब ये मुझे मिले थे, तब से मैं ही इनका बेटा हूं। इनका अंतिम संस्कार मैं करूंगा।”

उस दिन के बाद अजय की जिंदगी बदल गई। उसने ‘प्रियो फाउंडेशन’ की शुरुआत की और बेसहारा बुजुर्गों के लिए ‘जानकी वृद्धाश्रम’ बनाया। अपनी फीस न भर पाने के कारण अजय की पढ़ाई छूट गई, लेकिन उसने सेवा का रास्ता नहीं छोड़ा। 2021 से 2026 के बीच अजय ने 2,000 से ज्यादा लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कराया और 250 से ज्यादा बिछड़े हुए बुजुर्गों को उनके परिवार से मिलवाया।

4. चार बेटों का कड़वा सच

जनवरी 2026 में अजय की मुलाकात एमवाई अस्पताल के लावारिस वार्ड में लताबाई से हुई। वे लिवर की बीमारी से पीड़ित थीं और हर 8वें दिन उनके पेट से पानी निकालना पड़ता था।

शुरुआत में तो वे कुछ नहीं बताती थीं, लेकिन अजय की सेवा देखकर उन्होंने रोते हुए सच बताया: उनके पति थे, घर था और 4 बेटे थे। पति की मौत के बाद बेटों ने उनका घर छीन लिया और उन्हें बेघर कर दिया। वे 2 साल से सड़कों पर भटक रही थीं।

13-14 सितंबर 2026 की दरमियानी रात लताबाई की तबीयत बिगड़ी और उन्होंने दम तोड़ दिया। अजय ने उनके बेटों के नंबर जुटाए थे, लेकिन उनका जो जवाब मिला, उसने मानवता को शर्मसार कर दिया।

5. समाज के लिए एक संदेश

16 सितंबर 2026 की शाम को मुक्तिधाम में अजय नागदा और उनके साथियों ने लताबाई का अंतिम संस्कार किया। उस समय वहां उनका कोई अपना खून मौजूद नहीं था।

बेटे से हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और लोगों का गुस्सा फूट पड़ा। अजय के पास चारों बेटों के नाम, पते और तस्वीरें थीं, लेकिन उसने मीडिया में उन्हें उजागर नहीं किया।

अजय ने कहा:

“मैं किसी को बदनाम नहीं करना चाहता। मैं बस समाज को यह संदेश देना चाहता हूं कि कोई भी बेटा अपने मां-बाप के साथ ऐसा न करे। कम से कम उनके अंतिम समय में तो उनके पास आ जाना चाहिए। अगर हर बेटा अपना फर्ज निभाए, तो इस देश में वृद्धाश्रमों की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।”

चित्राग्नि शांत हो गई और राख हवा में विलीन हो गई। लताबाई की यह कहानी सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि आधुनिक समाज, रिश्तों के खोखलेपन और औलाद की बेरुखी पर एक करारा तमाचा है।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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