एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर हँसने लगे… लेकिन उसके जवाब ने सबको चौंका दिया… – News

एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर हँसने लगे… लेकिन उसके जवाब ने सबको चौंका दिया…

एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर हँसने लगे… लेकिन उसके जवाब ने सबको चौंका दिया…

एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर हँसने लगे… लेकिन उसके जवाब ने सबको चौंका दिया…

.

एक छोटे से गाँव की तंग और पक्की पटरियों के बीच, जहाँ सुबह का सूरज अक्सर धूल और धुएँ के आवरण के पीछे से उगता था, एक मिट्टी और टिन की ढलती हुई छत वाला घर खामोशी से खड़ा था। यह घर गाँव के आख़िरी छोर पर था, जहाँ पहुँचते-पूँछते पक्की सड़कें भी पगडंडियों में बदल जाती थीं। उस मकान के कच्चे आँगन में उगी तुलसी के पास एक लकड़ी की पुरानी, चरमराती मेज़ रखी थी। उस मेज़ पर पीले पड़ चुके कागज़ों के बीच एक पत्र रखा था—आईएएस (IAS) साक्षात्कार का कॉल लेटर।

काव्या उसी मेज़ के किनारे बैठी थी। उसकी उम्र लगभग तेईस वर्ष रही होगी, पर उसकी आँखों में छाई गम्भीरता उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा परिपक्व लगती थी। चेहरे पर सादगी थी, पर उसकी पुतलियों में एक ऐसा अदम्य सपना तैर रहा था जो किसी भी तूफ़ान से टकराने का हौसला रखता था। उसके पिता गाँव के ही एक छोटे से सरकारी प्राथमिक विद्यालय में चपरासी थे। सालों पहले, जब काव्या बहुत छोटी थी, एक असाध्य बीमारी के चलते वे चल बसे। उनके जाने के बाद घर का सारा बोझ उसकी माँ, रामकली के कंधों पर आ गिरा। रामकली ने गाँव के बड़े ज़मींदारों और समृद्ध परिवारों के घरों में झाड़ू-पोछा और बर्तन मांझकर काव्या को पाला था।

रसोई के एक छोटे से कोने से उठते हुए धुएँ के बीच रामकली सूखी लकड़ियों को चूल्हे में झोंक रही थी। उसने अपनी मैली साड़ी के पल्लू से आँखों का धुआँ पोंछा और भारी आवाज़ में पूछा, “काव्या बेटी, आज ही जाना है ना शहर? सब तैयारी कर ली तूने?”

काव्या ने अपनी नज़रें उस कॉल लेटर से हटाईं और मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “हाँ माँ, आज निकलना ही होगा। आज मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दिन है। अगर आज मैं हार गई, तो हमारी यह ग़रीबी कभी ख़त्म नहीं होगी।”

रामकली ने चूल्हे से तवा हटाया और एक सूखी रोटी काव्या की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा, “कास तेरे बापू आज ज़िंदा होते। जब तू छोटी थी, तो वे अक्सर कहा करते थे कि मेरी बेटी एक दिन बड़े अफ़सरों वाली गाड़ी में बैठकर आएगी। आज वे होते तो सबसे ज़्यादा ख़ुश होते।”

काव्या की आँखें भर आईं। उसने अपनी जेब से कुछ मुड़े-तुड़े नोट निकाले और माँ की हथेली पर रखते हुए बोली, “माँ, बस इतने ही पैसे बचे हैं। तू इन पैसों से अपनी दवाई ले आना। पिछले कई दिनों से तेरी खाँसी बहुत बढ़ गई है। तू मुझसे छुपाती है, पर मैं सब जानती हूँ।”

रामकली ने उन नोटों को वापस काव्या की हथेली में दबा दिया और उसका माथा चूमते हुए बोली, “तू मेरी फ़िक्र मत कर। तू बस इंटरव्यू देकर आ जा, मेरी दवाई अपने आप आ जाएगी। मेरे पास अभी कुछ सिक्के पड़े हैं, उनसे काम चल जाएगा।”

काव्या जानती थी कि उसकी माँ झूठ बोल रही थी। घर में खाने को दाना नहीं था और माँ की बीमारी दिन-ब-दिन गहराती जा रही थी। पर ग़रीबी इंसान को अक्सर निशब्द कर देती है। काव्या ने अपने फटे हुए बैग में अपने सभी शैक्षणिक दस्तावेज़ रखे। उसने अपनी सबसे अच्छी पोशाक निकाली—एक पुरानी पीले रंग की सलवार-कमीज़, जो उसने दो साल पहले अपने कॉलेज के फेयरवेल में पहनी थी। कपड़े कई जगह से घिस चुके थे और दुपट्टे के कोने पर एक छोटा सा पैच लगा हुआ था।

जब वह बस स्टैंड की ओर पैदल चलने लगी, तो सुबह की ठंडी हवा के साथ-साथ गाँव वालों की तीखी नज़रें भी उसका पीछा कर रही थीं। रास्ते में चौपाल पर बैठे कुछ आदमियों ने उसे देखा। गाँव का एक ज़मींदार, जो अपने हाथ में हुक्का थामे बैठा था, ज़ोर से हँसा और बोला, “अरे ओ काव्या! कहाँ चली इतने सारे कागज़-पत्तर लेकर? कौन सी नौकरी का पर्चा मिला है?”

काव्या ने अपने कदम रोके बिना उत्तर दिया, “आईएएस का इंटरव्यू देने शहर जा रही हूँ, चाचा।”

यह सुनते ही वहाँ बैठे सभी लोग ठहाके मारकर हँसने लगे। एक दूसरा आदमी अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए ताना मारते हुए बोला, “वाह रे हमारा गाँव! अब हमारे चपरासी रामदीन की बेटी कलेक्टर बनेगी! पहले अपने कपड़े तो देख ले लड़की, जिसके पास नई चप्पल के पैसे नहीं हैं, वह हुकूमत चलाएगी!”

काव्या ने उन बातों का कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपने होंठ भींचे और अपनी चाल तेज़ कर दी। उसका दिल जानता था कि ज़ुबान से दिया गया जवाब अक्सर बेकार चला जाता है, असली जवाब तो वक़्त देता है।

बस स्टैंड पर पहुँचकर वह एक खचाखच भरी हुई बस में चढ़ गई। बस में पैर रखने तक की जगह नहीं थी। वह पूरे पाँच घंटे के सफ़र के दौरान बस के एक कोने में खड़ी रही। बस में मौजूद शहर के कुछ लड़के-लड़कियाँ उसके पुराने कपड़ों और फटे हुए बैग को देखकर आपस में खुसर-फुसर कर रहे थे। एक लड़की ने अपनी सहेली की कोहनी मारते हुए धीमे से कहा, “देखो तो, लगता है किसी दूर-दराज़ के गाँव से सीधी चली आ रही है। शायद शहर में किसी के घर झाड़ू-पोछा ढूँढने जा रही है।”

काव्या ने अपनी आँखें बंद कर लीं और खिड़की से बाहर उड़ती हुई धूल को देखने लगी। वह अपमान सहने की आदी हो चुकी थी। बचपन से लेकर अब तक, ग़रीबी ने उसे हर मोड़ पर यह अहसास कराया था कि उसके पास आत्मसम्मान बचाने का केवल एक ही रास्ता है—सफलता।

शहर पहुँचते-पूँछते दोपहर हो चुकी थी। ऊँची-ऊँची इमारतें, चमचमाती गाड़ियाँ और लोगों की अंधी दौड़ देखकर काव्या कुछ पलों के लिए सहम गई। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी में इतना बड़ा और तेज़ शहर नहीं देखा था। सड़क पार करते समय अचानक उसकी एक चप्पल का फ़ीता टूट गया। वह घबराकर सड़क किनारे बैठ गई। उसने अपने बैग से एक सेफ्टी पिन निकाली और किसी तरह टूटी चप्पल को जोड़ने की कोशिश करने लगी। लोग उसके पास से गुज़र रहे थे, कुछ उसे हसरत से देख रहे थे तो कुछ उपेक्षा से, पर किसी ने रुककर यह नहीं पूछा कि उसे कोई मदद चाहिए या नहीं।

किसी तरह लँगड़ाते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के विशाल भवन के सामने पहुँची। भवन का विशाल लोहे का गेट और उसके ऊपर फहराता राष्ट्रध्वज देखकर उसके रोंगटे खड़े हो गए। अंदर का नज़ारा देखकर उसके कदम कुछ देर के लिए ठिठक गए। वहाँ देश के कोने-कोने से आए बेहतरीन उम्मीदवार मौजूद थे। कोई महंगे सूट में था, तो कोई ब्रांडेड सलवार-सूट में। कोई अँग्रेज़ी के बड़े-बड़े शब्दों का इस्तेमाल कर रहा था, तो कोई अपने बड़े कॉलेजों के अनुभव बाँट रहा था। हर किसी के चेहरे पर एक अजीब सा अभिजात आत्मविश्वास था।

जैसे ही काव्या ने उस भव्य प्रांगण में प्रवेश किया, वहाँ मौजूद कई लोगों की नज़रें उसकी घिसी हुई कमीज़ और पिन लगी चप्पल पर टिक गईं। एक उम्मीदवार ने अपने साथी से कहा, “यह भी इंटरव्यू देने आई है? शायद रास्ता भूल गई है, इसे किसी छोटे-मोटे दफ़्तर में क्लर्क का पर्चा भरना चाहिए था।”

एक दूसरे युवक ने व्यंग्य करते हुए कहा, “बेस्ट ऑफ़ लक, कलेक्टर मैडम! ज़रा संभलकर चलिएगा, कहीं आपकी चप्पल फिर से न टूट जाए।”

काव्या का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, पर उसने अपने चेहरे के भावों को टूटने नहीं दिया। वह एक कोने में रखी लकड़ी की बेंच पर बैठ गई और अपने काँपते हाथों से अपने पिता की एक छोटी सी, धुँधली तस्वीर निकाली। उसने तस्वीर को अपने माथे से लगाया और मन ही मन बुदबुदाई, “बापू, आज मेरे साथ रहना। मुझे हिम्मत देना ताकि मैं इस दुनिया के तानों के आगे न झुकूँ।”

तभी लाउडस्पीकर पर एक आवाज़ गूँजी, “उम्मीदवार क्रमांक 42, काव्या चौधरी। कमरा नंबर 3 में आएं।”

काव्या ने एक गहरी साँस ली, अपनी कमीज़ को ठीक किया और काँपते पैरों से कमरा नंबर 3 के दरवाज़े की ओर बढ़ गई। उसने दरवाज़ा थोड़ा सा ढकेला और विनीत आवाज़ में पूछा, “क्या मैं अंदर आ सकती हूँ, सर?”

कमरे के अंदर एक विशाल ओक की मेज़ के पीछे पाँच वरिष्ठ अधिकारी बैठे थे। मेज़ के केंद्र में बैठे अध्यक्ष ने अपना चश्मा उतारा और काव्या को ऊपर से नीचे तक देखा। उनकी अनुभवी आँखों ने तुरंत उसकी चप्पल पर लगी पिन और उसकी कमीज़ के पैच को ताड़ लिया।

एक महिला अधिकारी ने अपनी फ़ाइल पलटते हुए बहुत धीमे स्वर में पूछा, “आप आईएएस इंटरव्यू के लिए आई हैं? बैठिए।”

काव्या ने झुककर प्रणाम किया और कुर्सी पर बैठ गई, “जी सर। जी मैम। धन्यवाद।”

कमरे में कुछ सेकंड तक गम्भीर सन्नाटा छाया रहा। अध्यक्ष ने काव्या के दस्तावेज़ों पर नज़र डालते हुए पूछा, “काव्या जी, आपने अपनी शुरुआती पढ़ाई कहाँ से की है? आपके बायोडाटा में किसी बड़े कोचिंग संस्थान का नाम नहीं दिख रहा है।”

काव्या ने पूरी निडरता और स्पष्टता से उत्तर दिया, “सर, मैंने अपने गाँव के ही सरकारी प्राथमिक विद्यालय से पढ़ाई शुरू की थी। इसके बाद ज़िला कॉलेज से पत्राचार के माध्यम से अपना ग्रेजुएशन पूरा किया। मेरे पास किसी बड़े कोचिंग संस्थान में जाने के साधन नहीं थे, इसलिए मैंने स्वयं ही पढ़ाई की है।”

अध्यक्ष के चेहरे पर कौतूहल के भाव उभरे, “दिलचस्प है! बिना किसी मार्गदर्शन के आपने यह मुकाम हासिल किया। आपके पिता क्या करते थे?”

“सर, वे गाँव के उसी सरकारी स्कूल में चपरासी थे, जहाँ मैंने पढ़ाई की,” काव्या की आवाज़ में थोड़ा कंपन आया, “और अब… अब वे इस दुनिया में नहीं हैं।”

महिला अधिकारी ने सहानुभूति से देखते हुए पूछा, “काव्या, यदि आपको किसी बेहद पिछड़े और ग़रीब ज़िले का प्रशासन संभालने की ज़िम्मेदारी दी जाए, जहाँ बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव हो, तो आपकी सबसे पहली प्राथमिकता क्या होगी?”

काव्या ने एक पल के लिए सोचा और फिर आत्मविश्वास से भरी आँखों से अधिकारी की ओर देखा, “मैम, मेरी सबसे पहली प्राथमिकता शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की होगी। मेरा मानना है कि ग़रीबी का सबसे बड़ा कारण अवसरों की कमी है। जब एक ग़रीब बच्चे को अच्छी शिक्षा और स्वस्थ शरीर मिलता है, तो वह स्वयं अपने भाग्य का निर्माण करने में सक्षम हो जाता है। अगर हम शिक्षा और स्वास्थ्य सुधार दें, तो आधी ग़रीबी अपने आप ख़त्म हो जाएगी।”

एक अन्य पुरुष अधिकारी ने थोड़ा आगे झुकते हुए पूछा, “आप स्वयं एक बेहद निर्धन परिवार से आती हैं। आपने अभावों को बहुत करीब से देखा है। यदि आज आपको इतनी बड़ी और शक्तिशाली पोस्ट मिल जाती है, तो क्या आप बदल नहीं जाएँगी? क्या सत्ता का अहंकार आपको भी प्रभावित नहीं करेगा?”

काव्या ने बहुत ही सहजता से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सर, ग़रीबी इंसान की सोच नहीं बदलती, वह सिर्फ़ उसके हालात बताती है। मैंने अभावों में जीना सीखा है, इसलिए मुझे पता है कि एक रोटी की क्या कीमत होती है। सत्ता मेरे लिए अधिकार नहीं, बल्कि एक ज़िम्मेदारी होगी ताकि मैं दूसरों को उस अंधकार से बाहर निकाल सकूँ जिससे मैं खुद गुज़री हूँ।”

अध्यक्ष ने उसके उत्तर पर संतोष व्यक्त करते हुए अगला प्रश्न पूछा, “आपकी सबसे बड़ी ताकत क्या है, काव्या? और आपकी सबसे बड़ी कमजोरी?”

“सर, मेरी सबसे बड़ी ताकत है—हार न मानना,” काव्या ने बिना किसी झिझक के कहा, “और मेरी सबसे बड़ी कमजोरी… मेरी माँ हैं।”

“मतलब?” अध्यक्ष ने उत्सुकता से पूछा।

“मतलब यह सर, कि जब मेरी माँ बीमार होती हैं या रोती हैं, तो मैं अंदर से हिल जाती हूँ। मैं उनके दर्द के सामने कमज़ोर पड़ जाती हूँ,” काव्या की आँखें छलक आईं।

अध्यक्ष ने कुछ क्षण सोचते हुए अंतिम प्रश्न दागा, “और मान लीजिए, अगर आज आपका चयन इस परीक्षा में नहीं होता है, तो आप क्या करेंगी?”

काव्या ने अपनी पलकें झपकाईं और अपनी आवाज़ को दृढ़ करते हुए कहा, “तो मैं फिर से कोशिश करूँगी सर। मैं तब तक प्रयास करती रहूँगी जब तक मैं सफल न हो जाऊँ, क्योंकि मेरे जैसे इंसान के पास हार मानने की सुविधा नहीं होती। मेरे पास पीछे मुड़कर देखने का कोई विकल्प नहीं है।”

बोर्ड के सभी सदस्यों ने एक-दूसरे की ओर देखा। अध्यक्ष ने मुस्कुराते हुए अपनी फ़ाइल बंद की और कहा, “थैंक यू, काव्या। आप जा सकती हैं।”

जब काव्या कमरे से बाहर निकली, तो उसका दिल भारी था। इंटरव्यू बहुत जल्दी ख़त्म हो गया था। उसे लगा कि शायद उसके कपड़े, उसकी पृष्ठभूमि और उसकी सादगी अधिकारियों को पसंद नहीं आई। उसे लगा कि उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है।

उधर इंटरव्यू रूम के अंदर, काव्या के बाहर निकलते ही महिला अधिकारी ने अध्यक्ष की ओर देखकर कहा, “उस लड़की में कुछ बहुत अलग है, सर। उसके कपड़े भले ही ग़रीब हो सकते हैं, पर उसकी सोच बहुत अमीर और स्पष्ट है। हमें ऐसे ही अधिकारियों की ज़रूरत है जो ज़मीन से जुड़े हों।”

शहर की सड़कों पर शाम ढलने लगी थी। ऊँची इमारतों की बत्तियों की चमक सड़कों पर दौड़ती गाड़ियों की लाइटों से मिलकर एक अजीब सी चकाचौंध पैदा कर रही थी। काव्या बस स्टैंड की ओर अकेली चल रही थी। उसकी जेब में अब केवल बीस रुपये बचे थे। सुबह से उसने अन्न का एक दाना भी नहीं खाया था। पेट में मरोड़ उठ रहे थे। उसने सड़क किनारे एक वृद्ध व्यक्ति की ठेली से दो समोसे खरीदे और पास ही बनी एक सीमेंट की बेंच पर बैठ गई।

जैसे ही उसने समोसे का पहला टुकड़ा अपने मुँह में डाला, उसे अपनी माँ का चेहरा याद आ गया। सुबह उसकी माँ ने स्वयं भूखी रहकर अपनी दवाई के पैसे उसे दिए थे। काव्या के हाथों से समोसा छूटने लगा और उसकी आँखों से लगातार आँसू टपककर ज़मीन पर गिरने लगे।

उधर गाँव में, रामकली अपने कच्चे घर के दरवाज़े पर बैठी शून्य में ताक रही थी। रात का अँधेरा घिर आया था। तभी पड़ोस की कुछ औरतें वहाँ से गुज़रीं और ताना मारते हुए बोलीं, “क्या हुआ रामकली भाभी? कलेक्टर बिटिया वापस आ गई क्या? अरे, इतने बड़े-बड़े सपने ग़रीब लोग देखते हैं तो ऐसा ही होता है! शहर के अफ़सर क्या तुम्हारी बेटी के कपड़े देखकर उसे कुर्सी दे देंगे?”

रामकली ने उन औरतों की ओर देखा भी नहीं। उसने बस अपने दोनों हाथ जोड़े और आसमान की तरफ़ देखकर मन ही मन कहा, “हे भगवान, मेरी बेटी की मेहनत को मत नकारना। उसने अपनी पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ किताबों में जला दी है।”

शहर के बस स्टैंड पर जब काव्या पहुँची, तो पता चला कि उसके गाँव की ओर जाने वाली आख़िरी बस निकल चुकी थी। रात के बारह बज रहे थे। ठंडी हवाएँ शरीर में चुभने लगी थीं। काव्या के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह किसी होटल या रैनबसेरे में कमरा ले सके। उसने अपने बैग को अपने सीने से कसकर चिपकाया और बस स्टैंड के एक ठंडे कोने में ज़मीन पर ही सिकुड़कर बैठ गई।

उसके आसपास कई संदिग्ध किस्म के लोग घूम रहे थे। काव्या डर से काँप रही थी, पर उसने अपनी हिम्मत बनाए रखी। तभी एक वृद्ध महिला, जो बस स्टैंड पर झाड़ू लगाती थी, उसके पास आई और बोली, “बेटी, इतनी रात को यहाँ अकेले क्यों बैठी हो? कहाँ जाना है तुम्हें?”

“मुझे मुजफ्फरपुर के पास वाले गाँव जाना है, माँ जी। पर बस छूट गई,” काव्या ने थरथराते हुए कहा।

वृद्ध महिला ने अपनी फटी हुई शॉल का आधा हिस्सा काव्या के कंधों पर डालते हुए कहा, “आज की रात यहीं गुज़ार लो। सुबह चार बजे पहली बस आती है। डरना मत, मैं यहीं पास में हूँ।”

काव्या ने उस अजनबी वृद्धा के चेहरे में अपनी माँ का रूप देखा। उस कड़कड़ाती ठंड में उस फटी शॉल की गर्मी ने काव्या को यह अहसास कराया कि इंसानियत अभी भी ज़िंदा है।

अगली सुबह, पहली बस से काव्या अपने गाँव वापस पहुँची। जब वह पहुँची, तो सूरज की लालिमा कच्चे घरों पर बिखर रही थी। रामकली दरवाज़े पर ही सोई हुई थी, जैसे वह पूरी रात जागी हो। काव्या को देखते ही वह हड़बड़ाकर उठी और अपनी बेटी को गले से लगा लिया, “आ गई मेरी बेटी! कैसा हुआ तेरा इंटरव्यू?”

“अच्छा हुआ माँ, पर वहाँ बहुत बड़े-बड़े लोग आए थे। मुझे नहीं लगता कि मेरा चयन होगा,” काव्या ने अपनी माँ के आँचल में अपना मुँह छुपाते हुए कहा।

“तू चिंता मत कर बेटी,” रामकली ने उसका माथा चूमते हुए कहा, “तेरी मेहनत कभी बेकार नहीं जाएगी। मेरी बेटी किसी से कम नहीं है।”

गाँव के जीवन की दिनचर्या फिर से शुरू हो गई। काव्या ने निराश होने के बजाय गाँव के छोटे-छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया ताकि घर में दो वक़्त की रोटी का इंतज़ाम हो सके। वह रोज़ सुबह बच्चों को पढ़ाती और रात में ढिबरी (मिट्टी के तेल के दीये) की रोशनी में अपनी पढ़ाई जारी रखती।

लेकिन एक रात, एक भयानक घटना घटी।

काव्या पढ़ाई कर रही थी कि अचानक रसोई से बहुत तेज़ खाँसी की आवाज़ आई। वह दौड़कर अंदर गई तो देखा कि रामकली ज़मीन पर पड़ी तड़प रही थी और उसके मुँह से ख़ून निकल रहा था। काव्या का कलेजा मुँह को आ गया। वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और पड़ोसियों को पुकारने लगी, पर कोई आगे नहीं आया।

आखिरकार, गाँव के एक बूढ़े मास्टर जी, जो काव्या के पिता के समय से उन्हें जानते थे, अपनी बैलगाड़ी लेकर आए। काव्या अपनी माँ को लेकर ज़िला अस्पताल पहुँची। अस्पताल का दृश्य भयावह था—सड़े हुए स्ट्रेचर, जगह-जगह फैली गंदगी, फ़र्श पर पड़े कराहते हुए मरीज़ और डॉक्टरों की घोर लापरवाही।

घंटों तक लाइन में खड़े रहने के बाद डॉक्टर ने रामकली की जाँच की और गम्भीरता से कहा, “इनके फेफड़ों में बहुत गम्भीर इन्फेक्शन हो चुका है। इन्हें तुरंत दाख़िल करना होगा। दवाइयाँ बहुत महँगी हैं, बाहर से लानी होंगी।”

काव्या के पाँव तले ज़मीन खिसक गई। डॉक्टर ने जो पर्चा थमाया था, उसमें हज़ारों रुपयों की दवाइयाँ लिखी थीं।

रामकली ने काव्या का काँपता हुआ हाथ पकड़ा और रोते हुए कहा, “बेटी, तू मुझे घर ले चल। मुझे कोई दवाई नहीं चाहिए। मेरे पीछे तू अपने आप को क़र्ज़ में मत डुबा।”

“नहीं माँ! मैं तुझे कुछ नहीं होने दूंगी,” काव्या ने रोते हुए कहा।

काव्या भागती हुई अपने घर आई। उसने पूरे घर का कोना-कोना छान मारा, पर केवल कुछ ही रुपये मिले। अंत में उसकी नज़र अलमारी के कोने में रखी एक पुरानी, पीतल की घड़ी पर पड़ी। यह घड़ी उसके पिता की इकलौती निशानी थी, जिसे उन्होंने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था। काव्या ने उस घड़ी को चूमा, अपनी आँखों से लगाया और दौड़कर बाज़ार जाकर उसे एक सुनार को ओने-पौने दामों में बेच दिया।

उन पैसों से उसने अपनी माँ के लिए दवाइयाँ खरीदीं। माँ की हालत थोड़ी स्थिर हुई, पर डॉक्टर ने साफ़ कह दिया था कि इन्हें लंबे इलाज और अच्छे वातावरण की ज़रूरत है।

दिन बीतते गए। ज़िला अस्पताल से रामकली को छुट्टी मिल गई और काव्या उसे वापस गाँव ले आई।

उधर, देश की राजधानी दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) के मुख्यालय में एक अंतिम बैठक चल रही थी। साक्षात्कार मंडल के अध्यक्ष और अन्य सदस्य मेज़ के चारों ओर बैठे थे।

अध्यक्ष ने एक फ़ाइल उठाई और कहा, “इस वर्ष के नतीजों में एक ऐसा नाम है, जो हम सभी के लिए विशेष विचारणीय है। उम्मीदवार का नाम है—काव्या चौधरी।”

महिला अधिकारी ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, “जी सर, मैंने उनकी फ़ाइल को दोबारा पढ़ा है। बिना किसी कोचिंग के, एक छोटे से गाँव के सरकारी स्कूल से पढ़कर इस लड़की ने लिखित परीक्षा में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए हैं। और साक्षात्कार में उसकी ईमानदारी और विचारों की स्पष्टता अद्वितीय थी।”

अध्यक्ष ने चश्मा पहनते हुए कहा, “उसके पास भले ही अंग्रेज़ी का प्रवाह न हो या महँगे कपड़े न हों, लेकिन उसके पास वह दृष्टि और संवेदनशीलता है जिसकी इस देश के प्रशासनिक ढाँचे को सख्त ज़रूरत है। ऐसे ही लोग वास्तव में ज़मीनी बदलाव ला सकते हैं।”

परिणाम घोषित होने का दिन आ गया। गाँव में सुबह से ही एक अजीब सा सन्नाटा था। काव्या अपने घर के आँगन में बैठी अपनी माँ के सिर में तेल लगा रही थी। उसके दिल की धड़कनें बहुत तेज़ थीं।

तभी गाँव की पक्की सड़क पर डाकिया की साइकिल की घंटी बजी। डाकिया ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता हुआ आ रहा था, “काव्या! ओ काव्या बेटी! दिल्ली से चिट्ठी आई है!”

यह सुनते ही पूरे गाँव में हलचल मच गई। ताने मारने वाले, नफ़रत करने वाले और मज़ाक उड़ाने वाले—सब के सब काव्या के घर के आँगन में इकट्ठा होने लगे।

काव्या काँपते हुए हाथों से बाहर आई। डाकिया ने एक बड़ा सा लिफ़ाफ़ा उसकी ओर बढ़ाया जिसके ऊपर लाल अक्षरों में लिखा था—’संघ लोक सेवा आयोग, भारत सरकार’।

रामकली भी दीवार का सहारा लेकर बाहर आ गई। उसकी आँखें अपनी बेटी पर टिकी थीं। पूरा गाँव बिल्कुल खामोश था। केवल हवा के चलने की आवाज़ आ रही थी।

काव्या ने धीरे-धीरे लिफ़ाफ़े को फाड़ा। अंदर से एक मोटा, अधिकारिक कागज़ निकला। काव्या की आँखें उस कागज़ पर लिखे अँग्रेज़ी के शब्दों को पढ़ने लगीं:

“Directives for Civil Services Examination… Candidates Selected for Indian Administrative Service (IAS)… Rank 12… Kavya Choudhary…”

काव्या के हाथ से कागज़ छूटते-छूटते बचा। उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। वह कुछ बोल नहीं पा रही थी। उसका गला पूरी तरह रुँध चुका था।

रामकली ने घबराकर पूछा, “क्या हुआ बेटी? कुछ बोल ना! क्या लिखा है इसमें?”

काव्या अपनी माँ के कदमों में गिर गई और फूट-फूट कर रोते हुए बोली, “माँ… तेरा सपना पूरा हो गया… मैं… मैं कलेक्टर बन गई हूँ माँ! मेरा चयन आईएएस में हो गया है!”

पूरा आँगन कुछ पलों के लिए स्तब्ध रह गया। गाँव के लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। जिन लोगों ने काव्या के कपड़ों का मज़ाक उड़ाया था, उनके चेहरे ज़मीन में गड़ गए।

रामकली ज़मीन पर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से काव्या का चेहरा ढँककर रोने लगी, “मेरी बेटी अफ़सर बन गई! मेरे रामदीन का सपना पूरा हो गया!”

गाँव के छोटे-छोटे बच्चे, जिन्हें काव्या ट्यूशन पढ़ाती थी, ख़ुशी से नाचने लगे। मास्टर जी ने आगे बढ़कर काव्या के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, तूने आज इस पूरे गाँव का माथा गर्व से ऊँचा कर दिया!”

लेकिन उसी पत्र के निचले हिस्से में एक और पंक्ति लिखी हुई थी, जिसे पढ़कर काव्या के चेहरे की ख़ुशी एक पल में लुप्त हो गई। पत्र में लिखा था कि चयनित उम्मीदवारों को आगामी पंद्रह दिनों के भीतर लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA), मसूरी में प्रशिक्षण के लिए रिपोर्ट करना अनिवार्य है।

मसूरी जाने का किराया, वहाँ के शुरुआती ख़र्च और सबसे बढ़कर—माँ की बिगड़ती सेहत! काव्या को समझ नहीं आ रहा था कि वह इतनी बड़ी ख़ुशी के बीच इस नए पहाड़ जैसे संकट से कैसे निपटेगी।

अगले ही दिन, गाँव में ज़िले के कुछ स्थानीय पत्रकार पहुँचे। काव्या के घर के बाहर कैमरों की लाइटें चमकने लगीं। एक पत्रकार ने माइक काव्या के मुँह के आगे करते हुए पूछा, “काव्या जी, एक चपरासी की बेटी होकर, इतने अभावों में रहकर आपने देश की सबसे कठिन परीक्षा में 12वाँ स्थान हासिल किया है। इस सफलता का रहस्य क्या है?”

काव्या ने शांत आवाज़ में उत्तर दिया, “जब आपके पास खोने के लिए कुछ भी न बचा हो, तो आपकी भूख ही आपकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती है। मेरे सपने बड़े थे, इसलिए रास्ते की मुश्किलें मुझे छोटी लगती रहीं।”

पत्रकार ने दूसरा सवाल पूछा, “जब लोग आपका और आपकी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाते थे, तो आपको कैसा लगता था?”

काव्या ने भीड़ में खड़े उन गाँव वालों की ओर देखा जो कल तक उसका मज़ाक उड़ाते थे और आज ताली बजा रहे थे। उसने कहा, “ग़रीब इंसान का सपना इस समाज को अक्सर एक मज़ाक ही लगता है। लेकिन अगर आप अपने सपने पर टिके रहें, तो वही समाज एक दिन आपके सामने सिर झुकाता है।”

पत्रकार चले गए। मास्टर जी ने गाँव के कुछ संवेदनशील लोगों के साथ मिलकर काव्या के मसूरी जाने के किराए का इंतज़ाम किया।

रामकली ने काव्या के हाथों को थामकर कहा, “तू जा बेटी। तू अपनी ट्रेनिंग के लिए जा। मेरी चिंता मत कर, मैं अस्पताल की दवाओं से बिल्कुल ठीक हो जाऊंगी। तू देश की सेवा कर।”

काव्या भारी मन से मसूरी के लिए रवाना हुई। जब वह मसूरी की ठंडी वादियों में स्थित अकादमी (LBSNAA) पहुँची, तो वहाँ का दृश्य उसके लिए बिल्कुल नया था।

अकादमी का भव्य परिसर, चारों ओर फैली हरियाली और देश के सबसे होनहार युवा अधिकारियों का जमावड़ा। हर कोई महंगे सार्टोरियल सूट, ब्रांडेड जूते और फर्राटेदार अँग्रेज़ी में बात कर रहा था। काव्या के पास केवल दो जोड़ी साधारण सलवार-कमीज थे—एक वही पीली कमीज़ और दूसरी एक नीली कमीज़ जो उसकी माँ ने पड़ोस की एक महिला से पैसे उधार लेकर सिलवाई थी।

ट्रेनिंग के पहले दिन, ओरिएंटेशन हॉल में सभी नए अधिकारियों का परिचय सत्र शुरू हुआ।

एक लम्बा, रोबीला युवक स्टेज पर गया और बोला, “मायसेल्फ़ आरव मेहता। आई हैव डन माय ग्रेजुएशन फ्रॉम सेंट स्टीफ़न्स, दिल्ली।”

एक युवती आगे बढ़ी, “आई एम रिद्धिमा, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से पोस्ट ग्रेजुएट हूँ।”

जब काव्या की बारी आई, तो वह धीरे से स्टेज पर पहुँची। उसकी सादगी और साधारण कपड़ों को देखकर हॉल में हलकी सी खुसर-फुसर शुरू हो गई।

काव्या ने माइक थामा और हिंदी में कहा, “मेरा नाम काव्या चौधरी है। मैं बिहार के एक छोटे से गाँव से हूँ। मेरी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूलों से हुई है।”

पीछे बैठे दो अधिकारियों ने दबी ज़बान में हँसते हुए कहा, “अरे, यह वही लड़की है न, जिसकी ख़बर अँग्रेज़ी अख़बार में छपी थी—’फटे कपड़ों वाली आईएएस’!”

उनकी यह बात हॉल में गूँज गई। काव्या ने उन दोनों की ओर देखा। उसकी आँखों में इस बार कोई डर नहीं था। उसने माइक को और कसकर पकड़ा और गम्भीर आवाज़ में कहा:

“हाँ, मैं वही लड़की हूँ। मेरे कपड़े ज़रूर फटे थे, लेकिन मेरे सपने कभी नहीं फटे! और इस अकादमी में हम सब अपनी पृष्ठभूमि के कारण नहीं, बल्कि अपनी योग्यता के कारण खड़े हैं।”

पूरा हॉल एक पल के लिए सन्न रह गया। अगले ही पल, मुख्य प्रशिक्षण अधिकारी (Director) ने खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजानी शुरू कर दीं। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उस दिन काव्या ने साबित कर दिया कि भाषा और पहनावा किसी की प्रतिभा का पैमाना नहीं हो सकते।

दिन बीतते गए। अकादमी का प्रशिक्षण बेहद कठोर था। सुबह चार बजे की पीटी, लंबी दौड़, दिनभर की कक्षाएं, केस स्टडीज और प्रेजेंटेशन। काव्या हर दिन देर रात तक लाइब्रेरी में बैठकर पढ़ाई करती और अपनी अँग्रेज़ी सुधारने का प्रयास करती।

लेकिन एक रात, जब काव्या अपने हॉस्टल के कमरे में बैठी प्रेजेंटेशन तैयार कर रही थी, उसके फ़ोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर मास्टर जी का नाम चमक रहा था।

काव्या ने तुरंत फ़ोन उठाया, “प्रणाम मास्टर जी! सब ठीक है न?”

दूसरी ओर से मास्टर जी की काँपती हुई आवाज़ आई, “काव्या… बेटी… तुम जितनी जल्दी हो सके गाँव आ जाओ…”

काव्या का दिल बैठ गया, “क्या हुआ मास्टर जी? माँ कैसी है?”

एक भयानक सन्नाटे के बाद मास्टर जी रोते हुए बोले, “तेरी माँ की हालत बहुत बिगड़ गई है। वह ज़िला अस्पताल के आईसीयू में है… डॉक्टर कह रहे हैं कि उनके पास वक़्त बहुत कम है…”

काव्या के हाथ से फ़ोन छूटकर फ़र्श पर गिर गया। उसकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया।

वह बिना एक पल गँवाए, उसी रात मसूरी से गाँव के लिए निकल पड़ी। पूरे रास्ते वह बस भगवान से यही मनाती रही कि उसकी माँ को कुछ न हो। उसने मन ही मन कहा, “हे ईश्वर, तूने मुझे सब कुछ दिया, पर मेरी माँ से उसका सुख मत छीन।”

जब वह तड़के ज़िला अस्पताल पहुँची, तो आईसीयू के बाहर सन्नाटा था। काव्या भागती हुई अंदर गई। रामकली ऑक्सीजन मास्क के सहारे साँसें ले रही थी। उसका शरीर बेहद क्षीण हो चुका था।

काव्या ने अपनी माँ का ठंडा पड़ता हुआ हाथ अपने हाथों में ले लिया और रोते हुए पुकारा, “माँ! देख माँ, तेरी अफ़सर बेटी आ गई! आँखें खोल माँ!”

रामकली ने बहुत मुश्किल से अपनी भारी पलकें उठाईं। अपनी बेटी को सामने देखकर उसके सूखे होंठों पर एक बहुत ही हल्की, आत्मिक मुस्कान तैर गई। उसने अपना मास्क थोड़ा सा खिसकाया और बहुत ही क्षीण आवाज़ में कहा, “मेरी… मेरी कलेक्टर बिटिया आ गई…”

“माँ, तू ठीक हो जाएगी! मैं तुझे दिल्ली ले जाऊंगी, बड़े डॉक्टर को दिखाऊंगी!” काव्या बिलख-बिलख कर रो रही थी।

रामकली ने बहुत मुश्किल से अपना काँपता हुआ हाथ काव्या के सिर पर रखा और बोली, “नहीं बेटी… मेरा वक़्त आ गया है… तेरे बापू मुझे बुला रहे हैं… आज मैं बहुत ख़ुश हूँ… मेरी बेटी ने… मेरा सिर ऊँचा कर दिया…”

तभी मॉनिटर पर लगी हृदय गति की लकीरें सीधी होने लगीं। बीप की तेज़ आवाज़ पूरे कमरे में गूँज उठी।

डॉक्टर दौड़ते हुए अंदर आए और उन्होंने काव्या को बाहर कर दिया। कुछ मिनटों के बाद, डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने अफ़सोस से अपना सिर झुका लिया, “आई एम सॉरी… हम इन्हें बचा नहीं सके।”

काव्या अस्पताल के ठंडे फ़र्श पर गिर पड़ी। उसकी चीख पूरे अस्पताल के गलियारे में गूँज गई।

जिस माँ ने उसे पेट काट-काटकर पढ़ाया था, जिसने समाज के हर ताने को अपने सीने पर सहा था, आज जब उसकी बेटी सच में उस मुकाम पर पहुँची जहाँ वह उसे दुनिया की हर ख़ुशी दे सकती थी, तब वह माँ उसे छोड़कर जा चुकी थी।

गाँव के श्मशान घाट पर जब रामकली की देह को अग्नि दी जा रही थी, तो काव्या चुपचाप खड़ी धुएँ को उड़ते हुए देख रही थी। उसकी आँखों के आँसू सूख चुके थे। गाँव का हर आदमी वहाँ मौजूद था, और हर आँख नम थी। जिन लोगों ने रामकली का मज़ाक उड़ाया था, वे आज अपनी नीचता पर शर्मिंदा थे।

अंतिम संस्कार के बाद, काव्या अपने उसी टूटे हुए घर के आँगन में बैठी रही। घर बिल्कुल ख़ाली था। हर कोने से उसकी माँ की आवाज़ें गूँज रही थीं।

मास्टर जी ने काव्या के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटी, रो ले। अपने दर्द को बाहर निकलने दे।”

काव्या ने अपनी आँखें उठाईं और शांत आवाज़ में कहा, “मास्टर जी, अब रोने का वक़्त नहीं है। मेरी माँ ने मुझे रोने के लिए नहीं, बल्कि इस समाज के आँसू पोंछने के लिए अफ़सर बनाया है। मैं अपनी माँ के सपने को कभी मरने नहीं दूंगी।”

कुछ दिनों बाद, काव्या वापस मसूरी लौट आई। अब वह पहले जैसी सहमी हुई लड़की नहीं थी। उसके चेहरे पर एक कठोर संकल्प था। उसने दिन-रात एक करके अपनी ट्रेनिंग पूरी की।

महीनों की कठोर ट्रेनिंग के बाद आखिरकार पासिंग आउट परेड का ऐतिहासिक दिन आ गया।

अकादमी का विशाल परेड ग्राउंड तिरंगे झंडों और फूलों से सजा हुआ था। सभी नए युवा अधिकारी अपनी पूर्ण प्रशासनिक पोशाक (Uniform) में गर्व से मार्च कर रहे थे।

जब लाउडस्पीकर पर नाम गूँजा: “काव्या चौधरी—सर्वश्रेष्ठ ऑल-राउंडर ट्रेनी, स्वर्ण पदक विजेता!”

पूरा स्टेडियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। काव्या पूरे आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ी। देश के गृह मंत्री ने उसके सीने पर स्वर्ण पदक लगाया और हाथ मिलाते हुए कहा, “देश को आप जैसे अधिकारियों पर गर्व है, काव्या जी।”

काव्या ने सैल्यूट किया और आसमान की ओर देखा। नीले आसमान में तैरते बादलों के बीच उसे अपनी माँ और पिता की मुस्कुराती हुई छवियाँ दिखाई दीं।

काव्या की पहली पोस्टिंग एक बेहद पिछड़े और उग्रवाद प्रभावित ज़िले में बतौर असिस्टेंट कलेक्टर (SDM) हुई।

जब उसकी नीली बत्ती वाली सरकारी गाड़ी पहली बार उसके अपने गाँव से गुज़री, तो वहाँ का नज़ारा पूरी तरह बदल चुका था। वही सड़क जहाँ कभी उस पर ताने कसे जाते थे, आज सड़क के दोनों ओर गाँव के लोग हाथ जोड़े सम्मान में खड़े थे। गाँव का ज़मींदार भी अपने हाथ जोड़कर झुका हुआ था।

लेकिन काव्या ने किसी तामझाम पर ध्यान नहीं दिया। उसकी गाड़ी सीधे उसी सरकारी प्राथमिक विद्यालय के सामने जाकर रुकी जहाँ उसके पिता कभी चपरासी थे।

काव्या गाड़ी से उतरी। उसने अपनी वर्दी ठीक की और स्कूल के अंदर गई। स्कूल की इमारत आज भी जर्जर थी। उसने तुरंत अपने साथ आए ज़िला शिक्षा अधिकारी और इंजीनियरों को बुलाया।

काव्या की आवाज़ में एक कड़क प्रशासनिक आदेश था, “अगले एक महीने के अंदर इस स्कूल की इमारत का पुनर्निर्माण होना चाहिए। यहाँ एक आधुनिक डिजिटल लाइब्रेरी, साफ़ पीने का पानी और बच्चों के लिए नए खेल का मैदान बनना चाहिए। यदि काम में एक भी दिन की देरी हुई या भ्रष्टाचार की गंध आई, तो ज़िम्मेदार अधिकारी को सस्पेंड कर दिया जाएगा।”

अधिकारी काँपते हुए बोले, “जी मैम! बिल्कुल ऐसा ही होगा!”

इसके बाद, काव्या ने अपने ज़िले में एक विशेष अभियान शुरू किया—’मिशन शिक्षा और स्वास्थ्य’। उसने ज़िले के हर सरकारी अस्पताल की स्थिति सुधारने के लिए औचक निरीक्षण किए। भ्रष्ट डॉक्टरों और लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की गई। निर्धन बच्चों के लिए विशेष छात्रवृत्ति योजनाएँ शुरू की गईं ताकि पैसों की कमी के कारण किसी बच्चे को अपनी पढ़ाई न छोड़नी पड़े।

एक दिन, काव्या अपने ज़िलाधिकारी कार्यालय में बैठी फ़ाइलों का अवलोकन कर रही थी। तभी उसका चपरासी अंदर आया और बोला, “मैम, बाहर एक बहुत ही वृद्ध व्यक्ति आपसे मिलने की ज़िद कर रहे हैं। उनके पास कोई अपॉइंटमेंट नहीं है।”

काव्या ने कहा, “उन्हें तुरंत अंदर लाओ।”

जब वह वृद्ध व्यक्ति अंदर आया, तो काव्या अपनी कुर्सी से चौंककर खड़ी हो गई। वह वही समोसे बेचने वाला वृद्ध आदमी था, जिसने शहर के बस स्टैंड पर काव्या को खाना खिलाया था जब उसके पास पैसे ख़त्म हो गए थे।

वृद्ध आदमी अपनी फटी टोपी हाथ में लिए काँप रहा था। काव्या तुरंत अपनी मेज़ से बाहर आई और उसने उस वृद्ध व्यक्ति के पाँव छू लिए।

वृद्ध आदमी की आँखों से आँसू बह निकले, “अरे-अरे मैडम! यह आप क्या कर रही हैं? आप इतनी बड़ी अफ़सर हैं!”

काव्या ने उन्हें अपनी कुर्सी पर बिठाया और पानी का गिलास बढ़ाते हुए कहा, “बाबा, अगर उस रात आपने मुझे वह दो समोसे न खिलाए होते और मुझे ढाढ़स न बँधाया होता, तो शायद मैं आज इस कुर्सी पर न होती। आप मेरे लिए आदरणीय हैं।”

काव्या ने उस वृद्ध व्यक्ति के गाँव में एक पक्का घर बनवाया और उनके पोते की पढ़ाई का पूरा ख़र्च उठाने की ज़िम्मेदारी ली।

सालों बीत गए। काव्या का नाम अब पूरे राज्य में एक ईमानदार, निडर और संवेदनशील अधिकारी के रूप में जाना जाने लगा था।

एक शांत शाम को, काव्या अपने ज़िला बंगले के विशाल आँगन में टहल रही थी। ठंडी हवा चल रही थी। उसने अपनी जेब से अपने पिता की वह पुरानी, बेची हुई पीतल की घड़ी निकाली—जिसे उसने अफ़सर बनने के बाद उस सुनार से दस गुना दाम देकर वापस खरीद लिया था।

उसने घड़ी को देखा और फिर खुले, तारों भरे आसमान की ओर निहारा।

उसे ऐसा अहसास हुआ जैसे हवा के हर झोंके में उसकी माँ की वही पुरानी, वात्सल्यमयी आवाज़ गूँज रही हो: “मेरी बेटी किसी से कम नहीं है… तेरा सपना कभी अधूरा नहीं रहेगा।”

काव्या की आँखों के कोने में एक बूँद आँसू छलका, पर उसके चेहरे पर एक अटूट, अटल मुस्कान थी। उसने आसमान के सबसे चमकदार तारे को देखते हुए बहुत ही धीमे, पर दृढ़ स्वर में कहा:

“हाँ माँ… ग़रीब के कपड़े फटे हो सकते हैं, पर उसके सपने कभी फटे नहीं हो सकते!”

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

Related Articles

Chưa phân loại 1 minute ago

एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर हँसने लगे… लेकिन उसके जवाब ने सबको चौंका दिया…

एक लड़की फटे हुए कपड़ों में अपना IAS इंटरव्यू देने पहुँची, और लोग उस पर…