चायवाला महिला को घर छोड़ने गया | प्रेरणादायक कहानी – News

चायवाला महिला को घर छोड़ने गया | प्रेरणादायक कहानी

चायवाला महिला को घर छोड़ने गया | प्रेरणादायक कहानी

चायवाला महिला को घर छोड़ने गया | प्रेरणादायक कहानी

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ईमानदारी का फल: अकेले जीवन की एक अनकही कहानी

दोस्तों, आज की यह कहानी बिहार की है। रात के दस बज रहे थे। सड़क लगभग सुनसान थी। दूर तक न कोई दुकान दिख रही थी और न ही कोई गाड़ी। सड़क के दोनों तरफ घने पेड़ थे और बीच में जंगल जैसा इलाका शुरू हो जाता था। उसी सड़क पर एक कार धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। कार के अंदर करीब बत्तीस साल की एक महिला बैठी थी। उसका नाम था सुमन। सुमन बार-बार अपनी घड़ी देख रही थी। उसके चेहरे पर चिंता साफ दिखाई दे रही थी। वह जल्दी से जल्दी अपने घर पहुंचना चाहती थी क्योंकि घर पर उसका पांच साल का बेटा आरव और उसका बीमार पति राकेश इंतजार कर रहे थे।

सुमन के पति राकेश पिछले कई महीनों से गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। उनकी दोनों किडनी खराब हो चुकी थीं। वह ठीक से चल भी नहीं पाते थे। डॉक्टर ने साफ कह दिया था कि अगर जल्द ही उन्हें किडनी नहीं मिली तो उनकी हालत और बिगड़ सकती है। सुमन के लिए हर दिन किसी परीक्षा से कम नहीं था। वह घर संभालती थी, बच्चे को संभालती थी और पति की दवाइयों का इंतजाम करती थी। उस रात भी वह राकेश की जरूरी दवा लेने शहर गई थी। दवा लेने में देर हो गई और अब वह किसी भी हालत में जल्दी घर पहुंचना चाहती थी।

लेकिन तभी अचानक कार को झटका लगा। सुमन ने तुरंत ब्रेक लगा दिए। उसने कार से उतर कर पीछे देखा तो उसके चेहरे का रंग उड़ गया। कार का पिछला टायर पूरी तरह पंचर हो चुका था। सुमन ने इधर-उधर देखा लेकिन आसपास कोई दिखाई नहीं दिया। उसने मोबाइल निकाला और नेटवर्क देखने लगी। मोबाइल में नेटवर्क बिल्कुल नहीं था। उसने परेशान होकर आसमान की तरफ देखा और फिर कार की तरफ। वह खुद से बोली, “हे भगवान, अब मैं क्या करूं?” सुमन ने आसपास नजर दौड़ाई। तभी उसे कुछ दूरी पर एक छोटी सी रोशनी दिखाई दी। पहले उसे लगा शायद कोई घर होगा। लेकिन जैसे-जैसे वह आगे बढ़ी उसे समझ आया कि वहां एक छोटा सा चाय का होटल था। होटल भी ऐसा था जो किसी बड़े बाजार की दुकान जैसा नहीं था। एक छोटे से घर के आगे टिन की छत डालकर चाय की दुकान बनाई गई थी। अंदर एक बल्ब जल रहा था। सुमन को थोड़ी उम्मीद जगी। वह तेजी से वहां पहुंची।

दुकान पर करीब अट्ठाईस साल का एक युवक बैठा था। उसका नाम था अरविंद। अरविंद उस छोटे से होटल को अकेले चलाता था। सुमन ने उसके पास जाकर कहा, “भैया, यहां आसपास कोई पंचर की दुकान है क्या?” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। उसने देखा कि महिला काफी परेशान थी। उसने पूछा, “क्या हुआ मैडम?” सुमन बोली, “मेरी कार का पिछला टायर पंचर हो गया है। मुझे घर जाना है लेकिन यहां आसपास कोई दुकान दिखाई नहीं दे रही।” अरविंद ने सड़क की तरफ देखा और बोला, “मैडम, यहां तो कोई पंचर की दुकान नहीं है।” सुमन के चेहरे पर फिर से चिंता आ गई। अरविंद ने कहा, “हां, एक दुकान है लेकिन वह यहां से काफी दूर है। पैदल जाएंगे तो काफी समय लग जाएगा।” सुमन ने अपनी घड़ी देखी। रात के दस बंधे पंद्रह हो चुके थे। वह बेंच पर बैठ गई। उसकी आंखों में चिंता साफ दिखाई दे रही थी।

अरविंद ने कुछ नहीं पूछा। वह चुपचाप चूल्हे के पास गया और एक कप चाय बनाने लगा। कुछ देर बाद उसने चाय का कप सुमन के सामने रखते हुए कहा, “मैडम, यह चाय पी लीजिए। ज्यादा परेशान मत होइए। कोई ना कोई रास्ता जरूर निकलेगा।” सुमन ने चाय की तरफ देखा। फिर अरविंद की तरफ देखकर बोली, “धन्यवाद भैया।” उसने चाय का एक घूंट लिया। चाय सच में काफी कड़क थी। लेकिन उस समय उस चाय में उसे केवल स्वाद नहीं बल्कि किसी अपने की मदद का एहसास हो रहा था। सुमन ने धीरे से कहा, “मुझे अपने बेटे की बहुत चिंता हो रही है।” अरविंद ने पूछा, “आपके साथ कोई और नहीं है। आपके घर पर कौन-कौन है?” सुमन कुछ पल चुप रही। फिर बोली, “मेरा पांच साल का बेटा है और मेरे पति।” अरविंद ने पूछा, “आपके पति घर पर अकेले हैं?” सुमन की आंखें भर आईं। वह बोली, “नहीं, मेरा बेटा उनके पास है। लेकिन मेरे पति की तबीयत ठीक नहीं रहती।”

अरविंद ने चिंता से पूछा, “क्या हुआ है उन्हें?” सुमन ने गहरी सांस ली और बोली, “उनकी दोनों किडनियां खराब हो चुकी हैं।” अरविंद कुछ पल के लिए बिल्कुल शांत हो गया। सुमन बोली, “मैं आज उन्हीं की दवा लेने शहर गई थी। लेकिन दवा लेने में देर हो गई। अब गाड़ी भी पंचर हो गई। पता नहीं कब घर पहुंच पाऊंगी। फिर उसने मोबाइल देखा और कहा, ‘ऊपर से यहां नेटवर्क भी नहीं आ रहा। मैं अपने बेटे से बात भी नहीं कर पा रही। पता नहीं वह परेशान हो रहा होगा या नहीं।’” अरविंद ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला। उसने कहा, “मैडम, आप मेरे फोन से बात कर लीजिए। मेरे फोन में नेटवर्क आ रहा है।” सुमन ने हैरानी से उसकी तरफ देखा। बोली, “सच में?” वह बोला, “हां मैडम।” फिर उसने फोन सुमन को दे दिया। सुमन ने तुरंत अपने बेटे को फोन किया। कुछ सेकंड बाद फोन उठ गया।

दूसरी तरफ से बच्चे की आवाज आई, “मम्मी, आप अभी तक आई नहीं।” सुमन की आंखों में आंसू आ गए। वह मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली, “बेटा, तुम परेशान मत होना। मम्मी को आने में थोड़ा समय लगेगा।” बच्चा बोला, “पापा पूछ रहे थे आप कब आओगी?” सुमन ने अपने आंसू पोंछे और बोली, “पापा को दवा देना और खाना खाकर सो जाना। मम्मी जल्दी आ जाएगी।” वह बोला, “ठीक है।” मम्मी, फोन कट गया। सुमन ने मोबाइल अरविंद को वापस कर दिया। अरविंद ने पूछा, “आपका घर यहां से कितनी दूर है?” सुमन बोली, “बस करीब दस किलोमीटर।” अरविंद ने कहा, “फिर तो बहुत ज्यादा दूर नहीं है। कोई ना कोई गाड़ी मिल जाएगी।” सुमन बोली, “इस समय शायद कोई गाड़ी मिले भी नहीं।” फिर अचानक सुमन की आंखों में आंसू आ गए। वह बोली, “सबसे बड़ी दिक्कत तो मेरे पति की है।” अरविंद ने पूछा, “उनको क्या हुआ है?” सुमन ने कहा, “जैसा मैंने बताया, उनकी दोनों किडनियां खराब हैं। डॉक्टर कह रहे हैं कि अगर कोई उन्हें किडनी डोनेट कर दे तो उनकी जिंदगी बच सकती है।”

अरविंद ध्यान से सुन रहा था। सुमन ने कहा, “लेकिन किडनी मिल नहीं रही। डॉक्टर ने कहा है कि अब हमारे पास ज्यादा समय नहीं है।” इतना कहते ही सुमन रोने लगी। अरविंद ने तुरंत पानी का गिलास उसके सामने रख दिया। बोला, “मैडम, आप हिम्मत रखिए। रोने से परेशानी कम नहीं होगी। भगवान सब ठीक करेंगे।” सुमन ने आंसू पोंछे। कुछ देर बाद अरविंद ने उसकी कार की तरफ देखा। फिर बोला, “आप एक काम कीजिए।” सुमन ने उसकी तरफ देखा। बोला, “अगर आपको बुरा ना लगे तो आप मेरे साथ बाइक पर चलिए। मैं आपको घर छोड़ देता हूं।” सुमन अचानक चुप हो गई। रात का समय था। सामने एक अनजान युवक था। उसके साथ बाइक पर जाना आसान फैसला नहीं था। अरविंद उसकी परेशानी समझ गया। वो बोला, “आपको मुझ पर भरोसा करने में परेशानी हो रही हो तो कोई बात नहीं। मैं समझ सकता हूं।” सुमन कुछ नहीं बोली। अरविंद ने कहा, “आप ऐसा कीजिए, कार की चाबी मुझे दे दीजिए। मैं सुबह पंचर बनवाकर आपकी कार आपके घर पहुंचा दूंगा। आप चाहे तो मेरा फोन नंबर रख लीजिए।”

सुमन ने उसकी तरफ देखा। उसके चेहरे पर कोई लालच नहीं था। बस मदद करने की सच्ची कोशिश दिखाई दे रही थी। काफी सोचने के बाद सुमन ने कार की चाबी अरविंद को दे दी। फिर वह उसकी बाइक पर बैठ गई। अरविंद ने बाइक स्टार्ट की। कुछ ही देर में दोनों उन सुनसान सड़क से आगे निकल गए। रास्ते भर सुमन चुप रही और अरविंद भी बिना किसी बेवजह की बात के बाइक चलाता रहा। करीब आधे घंटे बाद वे सुमन के घर पहुंच गए। घर देखकर अरविंद हैरान रह गया। जिस महिला को वह कुछ देर पहले एक परेशान यात्री समझ रहा था, उसका घर काफी बड़ा था। सुमन ने दरवाजा खोला। अंदर जाते ही करीब पांच साल का बच्चा दौड़ता हुआ आया और अपनी मां से लिपट गया। बोला, “मम्मी!” सुमन ने उसे कसकर गले लगा लिया। उसकी आंखों में आंसू थे। फिर वह तुरंत अपने पति के कमरे में गई। राकेश बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनकी हालत काफी गंभीर थी। उन्होंने मुश्किल से अपनी आंखें खोलीं। सुमन उनके पास बैठ गई और बोली, “मैं आ गई।”

राकेश ने धीरे से पूछा, “बहुत देर हो गई।” सुमन बोली, “रास्ते में गाड़ी पंचर हो गई थी। फिर उसने अरविंद की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘इन भैया ने मेरी बहुत मदद की। इनकी वजह से मैं घर पहुंच पाई।’” राकेश ने अरविंद की तरफ देखा। उन्होंने हाथ उठाने की कोशिश की, लेकिन कमजोरी के कारण हाथ ठीक से उठ नहीं पाया। अरविंद तुरंत उनके पास गया। राकेश ने धीमी आवाज में कहा, “भैया, आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।” अरविंद बोला, “अरे भाई साहब, इसमें शुक्रिया की क्या बात है? मैंने तो बस इंसान होने का फर्ज निभाया है।” राकेश कुछ पल उसे देखते रहे। फिर बोले, “बैठो।” अरविंद बैठ गया। कुछ देर बातचीत होती रही। फिर अरविंद ने घड़ी देखी। रात के करीब बारह बज चुके थे। वह उठकर बोला, “अच्छा भाई साहब, अब मैं चलता हूं। काफी रात हो गई है।”

सुमन बोली, “भैया, अब सुबह चले जाइए।” अरविंद ने कहा, “नहीं मैडम, मैं चला जाऊंगा।” सुमन बोली, “रास्ता जंगल से होकर जाता है। इतनी रात में अकेले जाना ठीक नहीं है।” अरविंद कुछ सोचने लगा। सुमन ने कहा, “आपने हमारी इतनी मदद की है। रात में यहां रुक जाइए। सुबह चले जाइएगा।” अरविंद ने धीरे से सिर हिलाया और बोला, “ठीक है।” लेकिन तभी सुमन ने कहा, “आप अपने घर फोन करके बता दीजिए कि आज रात यहीं रुकेंगे ताकि उन्हें चिंता ना हो।” यह सुनते ही अरविंद बिल्कुल शांत हो गया। उसके चेहरे का भाव अचानक बदल गया। सुमन ने पूछा, “क्या हुआ भैया?” अरविंद ने कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहीं दिया। फिर उसकी आंखों में आंसू आ गए। वो बोला, “मैडम, अब मेरा कोई नहीं है।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया। राकेश ने भी उसकी तरफ देखा। अरविंद ने धीरे-धीरे कहना शुरू किया। वह बोला, “मैं इस दुनिया में बिल्कुल अकेला हूं। मेरी एक छोटी सी बेटी थी, सिर्फ तीन साल की। उसकी आवाज कांपने लगी। बोला, और मेरी पत्नी वह आगे बोल नहीं पा रहा था।” राकेश ने पूछा, “क्या हुआ था?” अरविंद ने अपनी आंखें पछीं और कहा, “रक्षाबंधन का दिन था। मेरी पत्नी हमारी बेटी को लेकर अपने मायके जा रही थी। जिस ऑटो में दोनों बैठी थी उसे पीछे से एक ट्रक ने टक्कर मार दी।” अरविंद की आंखों से आंसू निकल पड़े। उस हादसे में मेरी पत्नी और मेरी तीन साल की बेटी दोनों मुझे छोड़कर चली गईं। कमरे में बैठे तीनों लोग कुछ नहीं बोल पाए। अरविंद ने कहा, “उस दिन के बाद से मेरे घर में कोई मेरा इंतजार करने वाला नहीं है। इसीलिए जब आपने कहा कि घर फोन करके बताइए तो मुझे याद आया कि मेरा इंतजार करने वाला अब कोई है ही नहीं।” सुमन की आंखों से आंसू बहने लगे। राकेश ने कमजोर आवाज में कहा, “भाई, आज से तुम अकेले नहीं हो।”

अरविंद ने उनकी तरफ देखा। उसे शायद उम्मीद नहीं थी कि कोई ऐसा कहेगा। उस रात पहली बार अरविंद को लगा कि शायद उसकी जिंदगी में अभी भी कोई अपना हो सकता है। सुमन ने उसके लिए राकेश के कमरे के पास ही एक चारपाई लगा दी। अरविंद वहीं लेट गया। लेकिन उस रात कमरे में सोने वाला शायद ही कोई था। सुमन अपने पति की तरफ देख रही थी। राकेश छत की तरफ देख रहे थे और अरविंद अपनी खोई पत्नी और बेटी को याद कर रहा था। किसी को नहीं पता था कि यह रात उनकी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ लेकर आई है जिसके बाद तीनों की जिंदगी हमेशा के लिए बदलने वाली थी।

सुबह जब सूरज की रोशनी खिड़की से कमरे के अंदर आने लगी तब अरविंद की आंख खुली। कुछ पल तक उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहां है। फिर उसे पिछली रात की सारी बातें याद आ गई। वह उठकर बैठा और सामने देखा। राकेश अभी भी बिस्तर पर लेटे हुए थे। उनकी आंखें बंद थीं और पास में उनका पांच साल का बेटा आरव सो रहा था। अरविंद धीरे से चारपाई से उठा और कमरे से बाहर निकल गया। बाहर सुमन चाय बना रही थी। अरविंद को देखते ही वह बोली, “भैया, आपकी नींद ठीक से हुई?” अरविंद मुस्कुराकर बोला, “हां मैडम, बिल्कुल ठीक हुई। आप बताइए, आपने आराम किया या नहीं?” सुमन कुछ नहीं बोली। बस हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई। वह बोली, “बीमार इंसान के घर में रात को नींद कहां आती है?”

अरविंद ने उसकी बात सुनी और चुप हो गया। तभी आरव भी उठकर आ गया। वह अरविंद को देखकर बोला, “चाय वाले अंकल?” अरविंद हंस पड़ा। बोला, “हां बेटा।” बच्चा बोला, “आप कल मम्मी को लेकर आए थे ना?” वह बोला, “हां।” बच्चा बोला, “आप आज भी रहोगे?” अरविंद ने बच्चे की तरफ देखा। फिर बोला, “नहीं बेटा, आज मुझे अपनी दुकान पर जाना है।” बच्चे का चेहरा थोड़ा उदास हो गया। सुमन ने कहा, “बेटा, अंकल को काम करना है।” अरविंद ने बच्चे के सिर पर हाथ रखा और कहा, “लेकिन मैं फिर आऊंगा।” बच्चे ने तुरंत पूछा, “पक्का?” अरविंद ने मुस्कुराकर कहा, “पक्का।”

नाश्ता करने के बाद अरविंद वहां से निकलने लगा। सुमन ने उसे कार की चाबी दी। लेकिन अरविंद बोला, “मैडम, कार मैं दोपहर तक ठीक करवाकर भेज दूंगा।” सुमन बोली, “आपको इतनी परेशानी करने की जरूरत नहीं है। मैं किसी को भेज दूंगी।” अरविंद ने कहा, “नहीं मैडम, मैंने आपसे वादा किया है। आप चिंता मत कीजिए।” उसने बाइक स्टार्ट की और वहां से चला गया। उस दिन उसने अपनी दुकान देर से खोली। लेकिन उसका ध्यान-बार सुमन के परिवार की तरफ जा रहा था। उसे राकेश की कमजोर हालत याद आ रही थी। उसे आरव की मासूम बातें याद आ रही थी और उसे वह बात भी याद आ रही थी जो राकेश ने पिछली रात कही थी। “आज से तुम अकेले नहीं हो।” अरविंद के जीवन में लंबे समय बाद किसी ने उसे अपनापन दिया था।

शाम को वह कार ठीक करवाकर सुमन के घर पहुंच गया। सुमन ने दरवाजा खोला। उसे देखकर आरव दौड़ता हुआ आया। बोला, “चाय वाले अंकल आ गए।” अरविंद हंसते हुए बोला, “हां बेटा, तुम्हारी कार लेकर।” आरव ने कहा, “मेरी नहीं, मम्मी की।” अरविंद हंस पड़ा। सुमन भी पहली बार खुलकर मुस्कुराई। कुछ देर बाद अरविंद राकेश के कमरे में गया। राकेश ने उसे देखकर कहा, “आ गए भाई?” वह बोला, “हां भाई साहब, आपकी कार ठीक करवा कर दे दी।” राकेश ने कहा, “तुमने बहुत मदद की है हमारी।” अरविंद बोला, “भाई साहब, आप बार-बार शुक्रिया मत कहिए।” राकेश ने कहा, “तुम्हारे जैसे लोग आज भी हैं। इसीलिए शायद दुनिया में इंसानियत बची हुई है।” अरविंद ने बात बदलते हुए पूछा, “अब तबीयत कैसी है?” राकेश ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस चल रही है.”

अरविंद समझ गया कि वह अपनी तकलीफ छिपा रहे हैं। उसके बाद अरविंद रोज तो नहीं लेकिन दो-तीन दिन में एक बार राकेश का हाल पूछने उनके घर आने लगा। कभी फल लेकर आता, कभी दवा लेने में लाने में मदद करता। कभी आरव के लिए कोई छोटी सी चीज ले आता। धीरे-धीरे आरव उससे बहुत घुल मिल गया। एक दिन अरविंद दुकान बंद करके सुमन के घर पहुंचा। आरव बाहर खेल रहा था। उसने अरविंद को देखते ही कहा, “अंकल, आज मेरे लिए क्या लाएं?” अरविंद ने जेब से एक छोटी सी खिलौना कार निकाली। आरव खुशी से उछल पड़ा। बोला, “वाह!” सुमन दरवाजे के पास खड़ी यह सब देख रही थी। वह बोली, “भैया, आप बच्चे को इतना सामान मत दिया कीजिए।” अरविंद ने कहा, “मैडम, बच्चा है। इसे देखकर मुझे अपनी बेटी याद आती है।” इतना कहते ही उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई। सुमन समझ गई कि उसने अनजाने में उसकी पुरानी चोट छेड़ दी है। वह धीरे से बोली, “माफ कीजिए भैया।” अरविंद ने सिर हिलाया। बोला, “नहीं मैडम, आपकी कोई गलती नहीं है।”

फिर वह राकेश के पास जाकर बैठ गया। राकेश ने अरविंद की तरफ देखते हुए कहा, “तुम आरव को बहुत पसंद करते हो।” अरविंद मुस्कुराया। बोला, “हां भाई साहब।” राकेश कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “अगर बुरा ना मानो तो एक बात पूछूं?” वो बोला, “पूछिए।” उन्होंने कहा, “तुमने दोबारा शादी क्यों नहीं की?” अरविंद कुछ देर शांत रहा। फिर बोला, “भाई साहब, जिस दिन मेरी पत्नी और बेटी गई उसी दिन मेरी जिंदगी भी जैसे रुक गई। फिर शादी के बारे में सोचने का मन ही नहीं हुआ।” राकेश ने कहा, “जिंदगी किसी के जाने से खत्म नहीं होती।” भाई, अरविंद ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “आप सही कह रहे हैं। लेकिन कुछ खाली जगह ऐसी होती हैं जिन्हें कोई भर नहीं सकता।” राकेश उसकी बात समझ रहे थे। कुछ देर बाद राकेश बोले, “लेकिन जिंदगी में कभी कोई अच्छा इंसान मिल जाए तो उसे सिर्फ इसलिए दूर मत करना कि तुम्हारे अतीत में दुख था।” अरविंद ने उनकी तरफ देखा लेकिन कुछ बोला नहीं। उस दिन दोनों की यह बातचीत अरविंद के मन में रह गई।

समय बीतता गया लेकिन राकेश की हालत में सुधार नहीं हो रहा था। सुमन उन्हें नियमित अस्पताल ले जाती। डॉक्टर बार-बार यही कहते, “किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत है।” सुमन हर जगह कोशिश कर रही थी। रिश्तेदारों से बात की, जान पहचान वालों से बात की लेकिन कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक दिन अस्पताल से लौटते समय सुमन कार में बिल्कुल चुप थी। राकेश ने पूछा, “क्या हुआ?” सुमन ने कहा, “कुछ नहीं।” राकेश बोले, “मुझसे झूठ मत बोलो।” सुमन की आंखों में आंसू आ गए। वह बोली, “डॉक्टर ने कहा है कि अब ज्यादा इंतजार नहीं किया जा सकता।” राकेश ने खिड़की के बाहर देखा। कुछ पल बाद बोले, “सुमन, अगर मेरे लिए इतना सब करके भी मुझे बचाया नहीं जा सका तो खुद को दोष मत देना।” सुमन रोते हुए बोली, “ऐसी बातें मत कीजिए, आपको कुछ नहीं होगा।” राकेश ने उसकी तरफ देखा बोला, “काश ऐसा ही हो।” उस रात राकेश की तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी।

सुमन घबरा गई। उसने तुरंत डॉक्टर को फोन किया। डॉक्टर ने कहा, “उन्हें तुरंत अस्पताल लेकर आइए।” सुमन ने पड़ोसियों की मदद से राकेश को गाड़ी में बैठाया। लेकिन उसी समय उसे अरविंद की याद आई। उसने उसे फोन किया। बोली, “भैया, जल्दी आइए। राकेश की तबीयत बहुत खराब हो गई है।” अरविंद ने बिना कोई सवाल किए कहा, “आप चिंता मत कीजिए, मैं अभी आता हूं।” कुछ ही मिनटों में अरविंद वहां पहुंच गया। उसने राकेश को गाड़ी में बैठाने में मदद की। फिर तीनों अस्पताल की तरफ निकल पड़े। अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टरों ने राकेश को अंदर ले लिया। सुमन बाहर खड़ी होकर रो रही थी। आरव अपनी मां का हाथ पकड़े हुए था। अरविंद कुछ दूरी पर खड़ा था। करीब आधे घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। सुमन तुरंत उनके पास पहुंची और बोली, “डॉक्टर साहब, मेरे पति कैसे हैं?” डॉक्टर ने कहा, “अभी हमने उनकी हालत संभाल ली है।” लेकिन सुमन ने पूछा, “लेकिन क्या डॉक्टर?” बोले, “उनकी हालत बहुत गंभीर है। अब हमें ज्यादा समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। किडनी ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया जल्द से जल्द शुरू करनी होगी।” सुमन की आंखों से आंसू निकल पड़े। वो बोली, “डॉक्टर साहब, आप कोई रास्ता निकालिए।” डॉक्टर बोले, “रास्ता है लेकिन डोनर चाहिए।” सुमन ने कहा, “हम कोशिश कर रहे हैं।” डॉक्टर ने कहा, “कोशिश नहीं, अब जल्दी फैसला करना होगा।” डॉक्टर अंदर चले गए। सुमन वहीं कुर्सी पर बैठकर रोने लगी।

अरविंद उसके पास आया। बोला, “मैडम, हिम्मत रखिए।” सुमन बोली, “भैया, मैं क्या करूं? मैं अपने पति को अपनी आंखों के सामने खत्म होते हुए नहीं देख सकती।” अरविंद के पास कोई जवाब नहीं था। वह बस चुपचाप उसके पास खड़ा रहा। कुछ देर बाद अस्पताल की नर्स बाहर आई। उसने कहा, “राकेश जी, आपको बुला रहे हैं।” सुमन तुरंत अंदर चली गई। अरविंद बाहर ही रुक गया। अंदर राकेश बहुत कमजोर हालत में पड़े थे। उन्होंने सुमन का हाथ पकड़ा और धीमी आवाज में कहा, “सुमन, अगर मुझे कुछ हो जाए…” सुमन ने तुरंत उनके मुंह पर हाथ रख दिया। बोली, “चुप कीजिए। ऐसी बातें मत कीजिए।” राकेश ने कहा, “मेरी बात सुनो।” सुमन रोने लगी। राकेश बोले, “आरव का ख्याल रखना।” वह बोली, “आपको कुछ नहीं होगा। आप खुद उसका ख्याल रखेंगे।” राकेश ने उसकी तरफ देखा। बोला, “और अगर मैं नहीं रख पाया तो…” सुमन के आंसू रुक नहीं रहे थे। राकेश कुछ कहने ही वाले थे कि अचानक उनकी हालत फिर बिगड़ गई। मॉनिटर पर आवाज तेज होने लगी। नर्स और डॉक्टर तुरंत दौड़कर अंदर आए। सुमन को बाहर भेज दिया गया। अरविंद ने देखा कि सुमन के चेहरे पर डर था। करीब बीस मिनट तक डॉक्टर राकेश का इलाज करते रहे। आखिरकार उनकी हालत कुछ स्थिर हुई। लेकिन उस रात डॉक्टर ने परिवार से साफ कह दिया कि अब वक्त बहुत कम है। अरविंद अस्पताल के बाहर बैठा रहा। रात बढ़ती जा रही थी। सुमन अपने बेटे को सीने से लगाए रो रही थी और तभी अरविंद के मन में एक ऐसा विचार आया जिसने उसकी पूरी जिंदगी बदलने वाली थी।

उसने पहली बार सोचा, “अगर मैं…” लेकिन वह अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया। उसके सामने अपनी तीन साल की बेटी का चेहरा आ गया। वह उठकर अस्पताल के गलियारे में अकेला चला गया। उसकी आंखों में आंसू थे। वह खुद से पूछ रहा था, “क्या मैं सच में ऐसा कर सकता हूं?” लेकिन अगले ही पल उसने राकेश की हालत याद की और उसके मन में एक फैसला धीरे-धीरे आकार लेने लगा। उसे नहीं पता था कि यह फैसला उसकी अपनी जिंदगी को भी एक ऐसे मोड़ पर ले जाएगा जहां से वापस लौटना आसान नहीं होगा।

दोस्तों, कई बार जिंदगी इंसान के सामने ऐसे फैसले खड़े कर देती है जहां एक तरफ उसकी अपनी जिंदगी होती है और दूसरी तरफ किसी दूसरे इंसान की जिंदगी बचाने का मौका। ऐसे समय में इंसान जो फैसला करता है वही उसकी असली पहचान बन जाता है। अरविंद उस रात अस्पताल के गलियारे में अकेला बैठा था। उसके सामने बार-बार राकेश का चेहरा आ रहा था। वह सोच रहा था, “अगर मैं अपनी तरफ से कुछ कर सकता हूं तो क्या मुझे करना चाहिए?” लेकिन उसके मन में डर भी था कि आखिर किडनी डोनेट करना कोई छोटी बात नहीं थी। वह डॉक्टर से बात करना चाहता था लेकिन उसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बात कैसे कहे। कुछ देर बाद वह उठकर अस्पताल के एक डॉक्टर के पास गया। उसने हिचकिचाते हुए पूछा, “डॉक्टर साहब, अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किडनी डोनेट करना चाहे तो क्या ऐसा हो सकता है?” डॉक्टर ने उसकी तरफ देखा और बोले, “आप किसके लिए पूछ रहे हैं?” अरविंद ने कहा, “राकेश जी के लिए।”

डॉक्टर कुछ पल शांत रहे। फिर बोले, “किसी जीवित व्यक्ति द्वारा किडनी डोनेट करने के लिए कई मेडिकल और कानूनी प्रक्रियां होती हैं। सबसे पहले जांच होगी कि डोनर मेडिकल रूप से उपयुक्त है या नहीं। उसके बाद जरूरी अनुमति और बाकी प्रक्रिया पूरी करनी होगी।” अरविंद ने पूछा, “अगर मैं स्वस्थ हुआ तो?” डॉक्टर बोले, “तब भी पहले सभी जांच जरूरी होंगी। यह फैसला बहुत सोच समझ कर लेना चाहिए।” अरविंद ने सिर हिलाया। बोला, “जी, डॉक्टर साहब।” उसके बाद वह वापस गलियारे में आ गया। उसके कदम भारी थे। वह कुछ देर तक दीवार से टिक कर खड़ा रहा। उसने अपनी आंखें बंद की। उसे अपनी छोटी बेटी याद आ गई। तीन साल की उसकी बेटी जब दौड़कर उसके पास आती थी तो वह उसे अपनी गोद में उठा लिया करता था। उसे अपनी पत्नी की आवाज याद आई। फिर हादसे का वह दिन याद आया जिसने उसकी पूरी दुनिया छीन ली थी। उसने आंखें खोलीं। उसके सामने सुमन बैठी थी। सुमन ने पूछा, “भैया, आप कहां चले गए थे?” अरविंद ने बात छिपाते हुए कहा, “कहीं नहीं। बस ऐसे ही डॉक्टर से बात कर रहा था।” सुमन बोली, “राकेश की हालत बहुत खराब है।” अरविंद ने कहा, “सब ठीक होगा।” सुमन बोली, “भैया, कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं उन्हें बचा पाऊं, बचा नहीं पाऊंगी।” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। बोला, “ऐसा मत सोचिए। जब तक इंसान कोशिश करता रहता है तब तक उम्मीद खत्म नहीं होती।”

उसी समय नर्स ने आकर कहा, “राकेश जी, आपको बुला रहे हैं।” सुमन तुरंत अंदर चली गई। अरविंद बाहर ही बैठा रहा। अंदर राकेश बहुत कमजोर हो चुके थे। उन्होंने सुमन को पास बुलाया और बोले, “सुमन, मुझे अरविंद से बात करनी है।” सुमन ने कहा, “उन्हें बुलाती हूं।” कुछ देर बाद अरविंद कमरे में आया। राकेश ने उसे देखकर कहा, “भाई, मेरे पास बैठो।” अरविंद उनके पास बैठ गया। राकेश ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोले, “तुमने हमारे लिए बहुत कुछ किया है।” अरविंद बोला, “भाई साहब, आप ऐसी बातें मत कीजिए।” राकेश बोले, “मैं जानता हूं मेरी हालत कैसी है।” अरविंद चुप रहा। राकेश ने कहा, “मेरी पत्नी और मेरा बच्चा दोनों मेरे लिए पूरी दुनिया है।” अरविंद ने धीरे से कहा, “आप ठीक हो जाएंगे।” राकेश हल्का सा मुस्कुराए। फिर बोले, “काश मुझे भी इस बात पर उतना ही भरोसा होता जितना तुम्हें है।”

अरविंद की आंखें नम हो गईं। राकेश ने पूछा, “क्या तुमने कभी सोचा है कि जिंदगी में किसी अनजान इंसान पर इतना भरोसा कैसे हो जाता है?” अरविंद ने कहा, “शायद इसलिए क्योंकि कभी-कभी इंसानियत पहचानने के लिए ज्यादा समय नहीं चाहिए।” राकेश ने उसका हाथ दबाया। बोला, “तुम बहुत अच्छे इंसान हो।” कुछ देर कमरे में खामोशी रही। फिर राकेश बोले, “अगर मुझे कुछ हो गया तो…” अरविंद ने तुरंत कहा, “भाई साहब, ऐसा मत बोलिए।” लेकिन राकेश ने उसकी बात रोक दी। वो बोले, “मेरी बात पूरी सुनो।” अरविंद चुप हो गया। राकेश बोले, “मेरे जाने के बाद सुमन और आरव अकेले पड़ जाएंगे।” अरविंद ने कहा, “उनका परिवार है, रिश्तेदार हैं।” राकेश ने धीमी आवाज में कहा, “रिश्तेदार सिर्फ नाम के होते हैं। भाई, मुसीबत के समय पता चलता है कि अपना कौन है।” अरविंद के पास कोई जवाब नहीं था। राकेश ने कहा, “मैंने तुम्हें इन कुछ दिनों में देखा है। तुमने बिना किसी स्वार्थ के हमारी मदद की। फिर उन्होंने सुमन की तरफ देखा और कहा, ‘मुझे भरोसा है कि अगर कभी जरूरत पड़ी तो तुम इन्हें अकेला नहीं छोड़ोगे।’” अरविंद ने सिर झुका लिया। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था।

राकेश की हालत अचानक बिगड़ने लगी। नर्स दौड़कर अंदर आई। डॉक्टरों ने अरविंद और सुमन को बाहर जाने के लिए कहा। काफी देर तक डॉक्टर इलाज करते रहे। इस बार राकेश की हालत पहले से ज्यादा गंभीर थी। सुमन रोते हुए भगवान से प्रार्थना कर रही थी। आरव अपनी मां से पूछ रहा था, “मम्मी, पापा को क्या हुआ?” सुमन उसे अपने सीने से लगाकर बोली, “कुछ नहीं बेटा, पापा ठीक हो जाएंगे।” लेकिन उसकी अपनी आवाज कांप रही थी। कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए। उन्होंने कहा, “अभी उनकी हालत स्थिर है लेकिन उन्हें ज्यादा समय तक इस स्थिति में रखना मुश्किल होगा।” सुमन ने पूछा, “डॉक्टर साहब, क्या कोई उम्मीद है?” डॉक्टर बोले, “उम्मीद हमेशा रहती है। लेकिन इलाज के लिए जरूरी प्रक्रिया जल्द करनी होगी।” अरविंद वहीं खड़ा था। उसने डॉक्टर की बात ध्यान से सुनी। फिर बोला, “डॉक्टर साहब, मेरी जांच कर लीजिए।” सुमन ने उसकी तरफ देखा और बोले, “क्या मतलब?” अरविंद ने कहा, “अगर मैं मेडिकल रूप से योग्य हुआ तो…” सुमन ने तुरंत उसकी बात रोक दी। बोली, “नहीं भैया।” अरविंद बोला, “आप मेरी बात सुनिए।” सुमन ने कहा, “आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे। आपने हमारे लिए पहले ही बहुत कुछ किया है।” अरविंद ने कहा, “मैंने अभी कुछ किया ही नहीं है। मैं सिर्फ जांच करवाना चाहता हूं।” सुमन रोते हुए बोली, “लेकिन यह आपकी जिंदगी का सवाल है।” अरविंद ने कहा, “और राकेश भाई की जिंदगी का भी तो सवाल है।” सुमन चुप हो गई। अरविंद ने आगे कहा, “मैं कोई जल्दबाजी नहीं कर रहा। डॉक्टर जो सही समझेंगे वही होगा। अगर जांच में मैं योग्य नहीं हुआ तो बात वहीं खत्म और अगर हुआ भी तो आगे का फैसला डॉक्टरों और जरूरी प्रक्रिया के अनुसार होगा।”

सुमन के पास कहने को कुछ नहीं था। उसने बस हाथ जोड़कर कहा, “भैया, मैं आपकी जिंदगी खतरे में नहीं डालना चाहती।” अरविंद बोला, “आप मेरी चिंता मत कीजिए।” अगले दिन अरविंद की मेडिकल जांच शुरू हुई। एक के बाद एक कई टेस्ट किए गए। ब्लड टेस्ट, स्कैन, किडनी की जांच और कई दूसरे जरूरी परीक्षण। अरविंद हर जांच के बाद बाहर बैठ जाता। उसके मन में एक ही सवाल था, “क्या मैं राकेश भाई की मदद कर पाऊंगा?” कई घंटे बाद डॉक्टर ने उसे अपने कमरे में बुलाया। डॉक्टर ने रिपोर्ट सामने रखी। अरविंद सामने बैठ गया। डॉक्टर कुछ देर रिपोर्ट देखते रहे। फिर उन्होंने कहा, “अरविंद जी, आपकी कुछ शुरुआती रिपोर्ट ठीक है लेकिन अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।” अरविंद ने पूछा, “मतलब?” डॉक्टर बोले, “हमें कुछ और जांच करनी होंगी। उसके बाद ही पता चलेगा कि आप डोनेट करने के उपयुक्त हैं या नहीं।” अरविंद ने सिर हिलाया। बोला, “आप जितनी जांच करनी है कर लीजिए।” डॉक्टर ने पूछा, “आपको पूरा भरोसा है कि आप यह फैसला अपनी इच्छा से ले रहे हैं?” अरविंद ने कहा, “जी।” वो बोले, “किसने आप पर दबाव तो नहीं डाला?” अरविंद बोला, “नहीं, कोई आर्थिक फायदा या दूसरी वजह।” डॉक्टर साहब, मैं सिर्फ उनकी जिंदगी बचाने की कोशिश करना चाहता हूं। डॉक्टर ने कहा, “ठीक है।”

उधर सुमन अस्पताल के बाहर बैठी सब सुन रही थी। उसकी आंखों में आंसू थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि अरविंद जैसा अनजान इंसान उनके लिए इतना बड़ा कदम उठाने को क्यों तैयार है। वो अरविंद के पास गई और बोली, “भैया…” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। सुमन ने कहा, “मैं आपका यह एहसान जिंदगी भर नहीं भूलूंगी।” अरविंद बोला, “इसे एहसान मत कहिए।” वो बोली, “तो क्या कहूं?” अरविंद कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “इंसानियत।” सुमन रोने लगी। तभी अस्पताल के कमरे से नर्स बाहर आई। उसने कहा, “राकेश जी होश में आ गए हैं। वह सुमन जी और अरविंद जी दोनों को बुला रहे हैं।” दोनों तुरंत अंदर गए। राकेश ने दोनों को पास बुलाया। उनकी आवाज बहुत धीमी थी। उन्होंने पहले सुमन का हाथ पकड़ा फिर अरविंद का हाथ अपने हाथ में लिया और अचानक बोले, “अगर मैं नहीं बचा…” सुमन रोने लगी। राकेश ने कहा, “तो मेरी एक आखिरी इच्छा है।” अरविंद ने उनकी तरफ देखा। राकेश ने सुमन की ओर देखा। फिर अरविंद की आंखों में देखते हुए बोले, “मेरे जाने के बाद क्या तुम मेरी पत्नी और मेरे बेटे का साथ दोगे?”

अरविंद जैसे पत्थर का हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या जवाब दें। सुमन भी अपने पति की तरफ देखकर रो रही थी। लेकिन राकेश की अगली बात ने दोनों को और भी ज्यादा चौंका दिया। उन्होंने कहा, “मैं चाहता हूं कि मेरे जाने के बाद तुम इन्हें अपना परिवार समझकर इनका साथ निभाओ।” कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया। अरविंद की आंखों के सामने अपनी बेटी का चेहरा घूम गया। सुमन अपने पति का हाथ पकड़ कर रो रही थी और राकेश अपनी आखिरी इच्छा के साथ दोनों की तरफ देख रहे थे। किसी को नहीं पता था कि अगले कुछ घंटों में क्या होने वाला है। लेकिन इतना तय था कि अब उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रहने वाली थी।

दोस्तों, कभी-कभी इंसान की जिंदगी में ऐसा पल आता है जब उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ होता है लेकिन शब्द एक भी नहीं निकलते। उस समय अरविंद की हालत भी कुछ ऐसी ही थी। राकेश ने अपनी पत्नी सुमन और बेटे आरव की तरफ देखते हुए जो बात कही थी उसने अरविंद को अंदर तक हिला दिया था कि “मेरे जाने के बाद मेरी पत्नी और मेरे बेटे का साथ देना।” अरविंद राकेश की तरफ देखता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे। सुमन की आंखों से आंसू लगातार बह रहे थे। वह अपने पति से बोली, “आप ऐसी बातें क्यों कर रहे हैं। आप कहीं नहीं जा रहे।” राकेश ने कमजोर आवाज में कहा, “सुमन, मैं जानता हूं कि तुम मुझे हिम्मत देने के लिए ऐसा कह रही हो। लेकिन मुझे अपनी हालत का एहसास है।” सुमन ने उनका हाथ पकड़ लिया। बोली, “आपको कुछ नहीं होगा।” राकेश ने आरव की तरफ देखा। आरव अपने पिता के पास आकर खड़ा हो गया। बोला, “पापा, आप घर कब चलोगे?” राकेश की आंखें भर आईं। उन्होंने बच्चे के सिर पर हाथ रखा और कहा, “बहुत जल्दी बेटा।” आरव बोला, “मम्मी कहती हैं आप ठीक हो जाओगे।” राकेश ने मुस्कुराने की कोशिश की और बोला, “हां बेटा, मम्मी सही कहती हैं लेकिन उनकी आंखें कुछ और ही कह रही थी।” अरविंद उस दृश्य को देखकर बाहर चला गया। वह अस्पताल की सीढ़ियों पर बैठ गया। उसने सिर अपने हाथों में रख लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। एक तरफ राकेश की आखिरी इच्छा थी, दूसरी तरफ सुमन और आरव का भविष्य और तीसरी तरफ उसकी अपनी जिंदगी थी जो पहले ही एक हादसे में बिखर चुकी थी।

कुछ देर बाद सुमन बाहर आई। वह अरविंद के पास बैठ गई। बोली, “भैया…” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। सुमन बोली, “मेरे पति ने जो कहा उसके लिए मैं आपसे कोई उम्मीद नहीं रखती।” अरविंद चुप रहा। सुमन ने कहा, “वह अपनी बीमारी की वजह से डर गए हैं। उन्हें लगता है कि उनके बाद हम बिल्कुल अकेले हो जाएंगे।” अरविंद ने धीरे से कहा, “लेकिन उन्होंने गलत नहीं सोचा।” सुमन ने उसकी तरफ देखा और बोली, “क्या मतलब?” अरविंद बोला, “आपके पति आपको और आरव को बहुत प्यार करते हैं। इसीलिए वह चाहते हैं कि उनके बाद भी कोई आपका सहारा बने।” सुमन रोते हुए बोली, “लेकिन मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती।” अरविंद ने कहा, “आप बोझ नहीं हैं।” कुछ देर दोनों चुप बैठे रहें। फिर अरविंद बोला, “आप अभी सिर्फ अपने पति के इलाज पर ध्यान दीजिए। बाकी सब बाद में देखेंगे।” सुमन ने सिर हिला दिया।

अगले कुछ दिन अस्पताल में ही गुजरने लगे। अरविंद रोज अस्पताल आता, कभी दवा लाता, कभी डॉक्टर से बात करता, कभी आरव को बाहर ले जाकर खाना खिलाता। सुमन के पास पैसे कम पड़ने लगे तो अरविंद ने अपनी बचत से कुछ पैसे निकालकर उसके हाथ में रख दिए। सुमन ने तुरंत मना कर दिया। बोली, “भैया, यह मैं नहीं ले सकती।” अरविंद बोला, “इसे उधार समझ लीजिए। जब राकेश भाई ठीक होकर घर आएंगे तो लौटा दीजिएगा।” सुमन ने पैसे ले लिए। उसे क्या पता था कि अरविंद ने अपनी बेटी के लिए वर्षों से बचा कर रखे पैसे भी इसी मदद में लगा दिए थे। एक शाम डॉक्टर ने अरविंद को बुलाया और कहा, “अरविंद जी, आपकी रिपोर्ट का एक हिस्सा आ गया है।” अरविंद ध्यान से बैठ डॉक्टर की बात सुनने लगा। डॉक्टर बोले, “आपकी मेडिकल जांच के कुछ परिणाम अनुकूल हैं लेकिन अंतिम निर्णय से पहले और परीक्षण जरूरी है।” अरविंद ने पूछा, “अगर सब ठीक रहा तो…” डॉक्टर ने कहा, “तब आगे की प्रक्रिया पर विचार किया जा सकता है।” लेकिन आपको यह समझना होगा कि किसी भी मेडिकल प्रक्रिया में जोखिम हो सकता है। फैसला पूरी जानकारी है और उचित सहमति के बाद ही होगा। अरविंद ने कहा, “मैं समझ गया।”

उसी समय सुमन वहां पहुंच गई। उसने डॉक्टर से पूछा, “क्या हुआ?” डॉक्टर ने कहा, “अरविंद जी की जांच चल रही है।” सुमन ने अरविंद की तरफ देखा और बोली, “आप अभी भी यह सब कर रहे हैं।” अरविंद बोला, “मैंने कहा था ना, पहले जांच होने दीजिए।” सुमन ने कहा, “लेकिन अगर कुछ गलत हो गया तो…” अरविंद ने मुस्कुराकर कहा, “तो डॉक्टर जो सही होगा वही करेंगे। आप चिंता मत कीजिए।” सुमन कुछ नहीं बोली लेकिन उसके मन में अरविंद के लिए सम्मान और बढ़ गया। उसी रात राकेश की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर और नर्स तुरंत कमरे में पहुंचे। सुमन बाहर खड़ी रो रही थी। आरव उसकी गोद में था। अरविंद ने बच्चे को अपने पास लिया। बोला, “बेटा, रोना नहीं।” आरव बोला, “अंकल, पापा मुझे छोड़कर तो नहीं जाएंगे।” अरविंद के पास कोई जवाब नहीं था। उसने बच्चे को सीने से लगा लिया। बोला, “तुम्हारे पापा बहुत बहादुर हैं।” आरव बोला, “लेकिन वह बहुत बीमार हैं।” अरविंद ने कहा, “हां लेकिन हम सब मिलकर उन्हें ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं।”

करीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। उन्होंने कहा, “अभी उनकी हालत संभल गई है।” सुमन ने राहत की सांस ली। लेकिन डॉक्टर ने आगे कहा, “लेकिन जल्द ही अंतिम निर्णय लेना होगा।” उस रात अरविंद ने अस्पताल की कैंटीन के बाहर बैठकर बहुत देर तक सोचा। उसने अपने मोबाइल में अपनी बेटी की पुरानी तस्वीर खोली। तस्वीर देखते ही उसकी आंखों में आंसू आ गए। वो धीरे से बोला, “बेटी, अगर आज तुम होती तो शायद तुम्हें देखकर मैं डर जाता।” फिर उसने आंखें बंद कर ली। कुछ देर बाद उसने मोबाइल बंद कर दिया और मन ही मन एक फैसला किया कि अगर मेरी वजह से किसी बच्चे का पिता बच सकता है तो मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा।

अगले दिन उसकी बाकी जांच शुरू हुई। इस बार जांच लंबी थी। कई घंटे बीत गए। दोपहर तक अरविंद अस्पताल में ही रहा। शाम को डॉक्टर ने उसे अपने कमरे में बुलाया। डॉक्टर के चेहरे पर गंभीरता थी। अरविंद ने पूछा, “क्या हुआ डॉक्टर साहब?” डॉक्टर ने रिपोर्ट उसकी तरफ बढ़ाई और बोले, “आपकी जांचों के आधार पर आगे की प्रक्रिया संभव हो सकती है। लेकिन अभी भी कुछ महत्वपूर्ण बातें स्पष्ट करनी होंगी।” अरविंद ने पूछा, “क्या?” “मैं राकेश जी की मदद कर सकता हूं।” डॉक्टर ने कहा, “संभावना है लेकिन अंतिम निर्णय पूरी मेडिकल जांच और निर्धारित प्रक्रिया के बाद ही होगा।” अरविंद ने गहरी सांस ली और बोला, “ठीक है।” वह कमरे से बाहर निकला। सुमन वहीं उसका इंतजार कर रही थी। उसने पूछा, “क्या कहा?” डॉक्टर ने? अरविंद कुछ पल चुप रहा। फिर बोला, “उन्होंने कहा है कि अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगा।” सुमन ने कहा, “मैं भगवान से प्रार्थना करूंगी कि आपको कभी कोई परेशानी ना हो।” अरविंद ने कहा, “आप बस राकेश भाई के लिए प्रार्थना कीजिए।”

उसी समय नर्स दौड़ती हुई आई। बोली, “सुमन जी…” सुमन घबरा गई। बोली, “क्या हुआ?” नर्स ने कहा, “राकेश जी को होश आया है। वह आप दोनों को बुला रहे हैं।” दोनों तुरंत कमरे में पहुंचे। राकेश बहुत कमजोर थे। उन्होंने सुमन का हाथ पकड़ा। फिर अरविंद की तरफ देखा। बोले, “भाई अरविंद, उनके पास बैठो।” अरविंद उनके पास बैठ गया। राकेश ने धीमी आवाज में कहा, “तुमने मेरे लिए इतना कुछ किया है। मैं तुम्हारा यह एहसान कभी नहीं चुका सकता।” अरविंद ने कहा, “आप बस ठीक हो जाइए। यही मेरे लिए काफी है।” राकेश ने सिर हिलाया। बोला, “शायद मैं ठीक ना हो पाऊंगा।” सुमन रोने लगी। राकेश ने उसकी तरफ देखकर कहा, “सुमन, मेरी एक बात मानोगी?” सुमन ने कहा, “आप जो कहेंगे मानूंगी।” राकेश बोले, “मेरे जाने के बाद खुद को खत्म मत कर लेना। आरव के लिए जीना।” सुमन फूट-फूट कर रोने लगी। राकेश ने फिर अरविंद की तरफ देखा। बोले, “और भाई, अगर तुमसे हो सके तो इन्हें अकेला मत छोड़ना।” अरविंद ने उनका हाथ पकड़ लिया। बोला, “मैं वादा करता हूं कि इन्हें कभी मुसीबत में अकेला नहीं छोडूंगा।” राकेश की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “बस यही सुनना चाहता था।”

उसी समय डॉक्टर अंदर आए। उन्होंने कहा, “अब इन्हें आराम करने दीजिए।” सुमन और अरविंद कमरे से बाहर आ गए। लेकिन दोनों को क्या पता था कि कुछ ही देर बाद अस्पताल में एक ऐसी खबर आने वाली है जो सबकी जिंदगी बदल देगी। रात करीब दो बजे अचानक अस्पताल की इमरजेंसी में हलचल मच गई। नर्स दौड़ती हुई राकेश के कमरे की तरफ गई। मॉनिटर की आवाज तेज हो गई। सुमन घबरा कर उठी। बोली, “डॉक्टर साहब…” डॉक्टर अंदर पहुंचे। अरविंद भी पीछे-पीछे कमरे में गया। राकेश की हालत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ चुकी थी। डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया। सुमन रोते हुए भगवान का नाम लेने लगी। आरव अपनी मां से लिपट गया। करीब बीस मिनट तक डॉक्टर कोशिश करते रहे। फिर डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर गंभीरता थी। उन्होंने कहा, “हमने पूरी कोशिश की लेकिन…” सुमन के पैरों तले जमीन खिसक गई। बोली, “नहीं डॉक्टर साहब…” डॉक्टर ने उसे झुका लिया। बोले, “राकेश इस दुनिया में नहीं रहे।”

सुमन जोर से रो पड़ी। आरव को समझ ही नहीं आया कि आखिर उसके पिता कहां चले गए। अरविंद वहीं खड़ा रह गया। उसकी आंखों में भी आंसू थे। उसे लगा जैसे उसने कुछ ही दिनों में एक भाई पाया था और उसी भाई को खो दिया। लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी क्योंकि राकेश की आखिरी इच्छा अब अरविंद और सुमन के सामने थी। अंतिम संस्कार के बाद जब घर में सन्नाटा छाया तब सुमन ने अरविंद से कहा, “मेरे पति जाते-जाते जो जिम्मेदारी आपको देकर गए हैं, मैं उसे आपकी मजबूरी नहीं बनाऊंगी।” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। सुमन बोली, “अगर आप चाहे तो अपनी जिंदगी में वापस चले जाइए। मैं अपने बेटे के साथ जैसे भी होगा संभाल लूंगी।” अरविंद कुछ देर चुप रहा। फिर उसने आरव की तरफ देखा। बच्चा अपने पिता की तस्वीर पकड़े बैठा था। उसके बाद अरविंद ने बहुत धीमी आवाज में कहा, “मैंने अपनी पत्नी और बेटी को खोया है। मैं जानता हूं कि किसी अपने को खोने के बाद घर कितना खाली हो जाता है।” सुमन उसकी तरफ देखने लगी। अरविंद बोला, “मैं आपको कोई झूठा वादा नहीं करूंगा। लेकिन एक बात जरूर कहूंगा।” वो आरव के पास जाकर बैठ गया। बोला, “जब तक मुझे जरूरत होगी मैं इस बच्चे का साथ नहीं छोडूंगा।” सुमन की आंसू आंखों में आंसू आ गए। लेकिन उसे नहीं पता था कि आने वाले दिनों में समाज उनके इस रिश्ते को किस नजर से देखेगा। लोग क्या कहेंगे? क्या एक अकेली महिला और एक अकेला पुरुष बिना किसी रिश्ते के एक दूसरे के परिवार का सहारा बन सकते हैं?

दोस्तों, किसी अपने को खोने के बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रहती। घर वही होता है, कमरे वही होते हैं, सामान वही होता है। लेकिन उस घर में रहने वाले इंसान के दिल में एक ऐसी खाली जगह बन जाती है जिसे भरना आसान नहीं होता। राकेश के जाने के बाद सुमन के घर का माहौल भी बिल्कुल बदल गया था। जिस कमरे में कुछ दिन पहले राकेश की आवाज सुनाई देती थी, अब वहां सिर्फ खामोशी थी। बिस्तर के पास रखी उनकी दवाइयां अब भी वहीं थीं। टेबल पर उनका चश्मा रखा था और दीवार पर उनकी मुस्कुराती हुई तस्वीर टंगी थी। सुमन जब भी उस तस्वीर को देखती उसकी आंखों में आंसू आ जाते। आरव तो अभी इतना छोटा था कि उसे पूरी तरह समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके पिता अब कभी वापस क्यों नहीं आएंगे। वो रोज अपनी मां से पूछता, “मम्मी, पापा कब आए घर आएंगे?” सुमन के पास उस सवाल का कोई जवाब नहीं था। वह बच्चे को अपने सीने से लगा लेती और कहती, “पापा हमेशा हमारे साथ हैं बेटा।” लेकिन यह कहते हुए उसका अपना दिल टूट जाता। अरविंद भी रोज उनके घर नहीं आता था। वह समझता था कि सुमन को अपने दुख से बाहर निकलने के लिए थोड़ा समय चाहिए। लेकिन वह आरव का हाल जरूर पूछता। एक दिन उसने फोन किया। बोला, “मैडम, आरव कैसा है?” सुमन बोली, “चुप रहता है। पहले बहुत बातें करता था अब किसी से बात नहीं करता।” अरविंद ने कहा, “मैं शाम को आता हूं।” शाम को अरविंद वहां पहुंचा। उसके हाथ में एक छोटी सी किताब थी। आरव कमरे में बैठा अपने पिता की तस्वीर देख रहा था।

अरविंद उसके पास जाकर बैठ गया। बोला, “बेटा, क्या कर रहे हो?” आरव बोला, “पापा को देख रहा हूं।” अरविंद ने कहा, “पापा तुम्हें बहुत प्यार करते थे ना.” आरव ने सिर हिलाया बोला, “हां।” अरविंद बोला, “तो फिर पापा चाहते होंगे कि उनका बेटा हमेशा रोता रहे।” आरव ने कुछ नहीं कहा। अरविंद ने किताब उसके हाथ में देते हुए कहा, “पापा चाहते होंगे कि तुम खूब पढ़ो। बड़े होकर बहुत अच्छे इंसान बनो।” आरव ने किताब खोल ली। उस दिन काफी समय बाद उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई। सुमन दूर खड़ी यह सब देख रही थी। उसकी आंखों में आंसू थे। लेकिन इस बार उन आंसुओं में सिर्फ दुख नहीं था। उसे महसूस हो रहा था कि राकेश ने जिस इंसान पर भरोसा किया था, वह भरोसा गलत नहीं था। दिन बीतते गए, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होने वाली थी। एक दिन मोहल्ले की दो महिलाएं सुमन के घर आईं। उन्होंने सुमन से कहा, “बहन, हम तुम्हारी परेशानी समझते हैं लेकिन लोग तरह-तरह की बातें कर रहे हैं।” सुमन चुप रही। दूसरी महिला बोली, “वह अरविंद रोज-रोज यहां आता है। आखिर लोग तो सवाल करेंगे ही।” सुमन ने शांत आवाज में कहा, “वह मेरे पति का दोस्त था और मेरे बेटे की मदद करता है।” महिला बोली, “लोग रिश्ते नहीं देखते। बस बातें बनाते हैं।” सुमन को यह बात बहुत बुरी लगी। उसने कहा, “मेरे पति के मरने के बाद मेरे घर में कौन आएगा? कौन मेरे बच्चे की मदद करेगा? यह फैसला लोग नहीं करेंगे.”

दोनों महिलाएं चुप हो गईं। सुमन ने पहली बार अपने लिए आवाज उठाई थी। उसे अब समझ आ रहा था कि जिंदगी में सबसे मुश्किल काम दुख सहना नहीं बल्कि लोगों की बातों के बीच सही रास्ते पर बने रहना है। कुछ दिनों बाद अरविंद खुद सुमन के पास आया। उसने कहा, “मैडम, अगर मेरी वजह से आपको कोई परेशानी हो रही है तो मैं यहां आना कम कर दूंगा।” सुमन ने कहा, “आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?” अरविंद बोला, “लोग बातें कर रहे हैं। मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से आरव पर कोई असर पड़े।” सुमन कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “भैया, लोगों की बातें आज हैं कल नहीं होंगी। लेकिन मुश्किल समय में जिसने हमारा साथ दिया उसे सिर्फ लोगों के डर से दूर करना सही नहीं होगा।” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। सुमन बोली, “आपने मेरे पति की आखिरी इच्छा का सम्मान किया है। मेरे लिए इतना ही काफी है।” अरविंद ने सिर झुका लिया। लेकिन उसके मन में एक बात अब भी थी। उसने कहा, “मैंने आपसे एक बात कही थी।” वह बोली, “क्या?” अरविंद बोला, “मैं आरव का साथ नहीं छोडूंगा। लेकिन मैं नहीं चाहता कि आप मुझे किसी रिश्ते या जिम्मेदारी में सिर्फ इसलिए बांधे क्योंकि राकेश भाई ने जाते समय ऐसा कहा था।” सुमन ने कहा, “मैं भी आपको मजबूर नहीं करूंगी।” दोनों के बीच एक समझदारी पैदा हो चुकी थी। वह रिश्ता किसी नाम का मोहताज नहीं था।

कुछ महीने बीत गए। अरविंद ने अपनी चाय की दुकान और बेहतर कर ली। उसने दुकान के पास बच्चों के लिए कुछ बिस्किट और छोटी-छोटी चीजें रखना शुरू कर दिया। कभी-कभी आरव वहां चला जाता। अरविंद उसे पढ़ाता। धीरे-धीरे आरव के चेहरे की उदासी कम होने लगी। एक दिन आरव ने अरविंद से पूछा, “अंकल, आप मेरे पापा जैसे हो।” अरविंद की आंखें भर आईं। उसने कहा, “नहीं बेटा, तुम्हारे पापा की जगह कोई नहीं ले सकता।” आरव बोला, “लेकिन आप मेरा ध्यान रखते हो।” अरविंद मुस्कुरा कर बोला, “क्योंकि तुम बहुत अच्छे बच्चे हो।” आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, “तो आप मेरे साथ रहोगे।” अरविंद कुछ बोल नहीं पाया। उसने बच्चे को गले लगा लिया। उधर सुमन दूर खड़ी यह दृश्य देख रही थी। उसे महसूस हुआ कि शायद उसके बेटे को पिता की जगह किसी दूसरे इंसान की जरूरत नहीं थी। उसे सिर्फ एक ऐसा इंसान चाहिए था जो उसके साथ खड़ा रहे और अरविंद वही कर रहा था।

समय के साथ सुमन ने भी खुद को संभालना शुरू किया। उसने घर से ही सिलाई का काम शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसके पास काम आने लगा। अरविंद ने कहा, “मैडम, आप चाह तो मैं दुकान के सामने आपके लिए एक छोटी सी जगह बनवा दूंगा। आप वहां सिलाई का सामान रख सकती हैं।” सुमन ने कहा, “नहीं भैया, मैं अपना काम खुद खड़ा करना चाहती हूं।” अरविंद मुस्कुराया और बोला, “यही तो अच्छी बात है।” सुमन ने मेहनत की। कुछ महीनों में उसकी आमदनी ठीक होने लगी। अब वह किसी पर निर्भर नहीं थी। आरव स्कूल जाने लगा। अरविंद कभी-कभी उसे स्कूल छोड़ देता। कभी फीस जमा करने में मदद करता। लेकिन सुमन हमेशा कोशिश करती कि वह अपने पैरों पर खड़ी हो। एक दिन सुमन ने अरविंद से कहा, “आपने मेरी जिंदगी में बहुत मदद की है। लेकिन अब मैं चाहती हूं कि आप भी अपनी जिंदगी के बारे में सोचें।” अरविंद ने पूछा, “क्या मतलब?” सुमन बोली, “आप हमेशा दूसरों के लिए सोचते हैं। अपनी जिंदगी के बारे में भी सोचिए।” अरविंद चुप रहा। सुमन बोली, “आपने अपनी पत्नी और बेटी को खोया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आपकी जिंदगी भी वहीं खत्म हो गई।” अरविंद ने उसकी तरफ देखा। उसे राकेश की कही बात याद आ गई कि जिंदगी किसी के जाने से खत्म नहीं होती। उस दिन पहली बार अरविंद ने महसूस किया कि शायद राकेश की आखिरी इच्छा सिर्फ सुमन और आरव की जिम्मेदारी अरविंद को सौंपना नहीं थी। शायद वह चाहता था कि तीन टूटे हुए इंसान एक दूसरे का सहारा बनकर फिर से जिंदगी जीना सीखें।

कुछ समय बाद सुमन ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अरविंद से कहा, “अगर आप चाहे तो हम दोनों मिलकर आरव की जिंदगी संभाल सकते हैं।” अरविंद ने पूछा, “आपको यकीन है?” सुमन बोली, “हां।” लेकिन एक बात साफ है। यह फैसला किसी दबाव में नहीं होगा। ना आपके ऊपर मेरे पति की आखिरी इच्छा का दबाव होगा और ना समाज का। अरविंद कुछ देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “मैंने जिंदगी में बहुत कुछ खोया है। लेकिन आप लोगों से मिलने के बाद मुझे फिर से लगा कि शायद इंसान की जिंदगी में परिवार सिर्फ खून के रिश्तों से नहीं बनता। कभी-कभी भरोसा, सम्मान और साथ भी परिवार बना देते हैं.” सुमन की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कोई बड़ा वादा नहीं किया। बस यह तय किया कि वे एक दूसरे का सम्मान करते हुए आरव का भविष्य बेहतर बनाने की कोशिश करेंगे।

समय बीतता गया। आरव बड़ा होने लगा। सुमन की सिलाई का काम चल निकला। अरविंद की चाय की दुकान भी अच्छी चलने लगी। दोनों ने मिलकर आरव की पढ़ाई पर ध्यान दिया। एक दिन आरव स्कूल से दौड़ता हुआ घर आया। उसके हाथ में एक कागज था। वह चिल्लाया और बोला, “मम्मी, अंकल, देखो!” सुमन ने पूछा, “क्या हुआ?” आरव ने कागज आगे किया और कहा, “इस स्कूल में मेरी पहली पोजीशन आई है।” सुमन की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। अरविंद ने उसे गले लगा लिया। बोला, “शाबाश बेटा।” आरव बोला, “मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा।” सुमन ने पूछा, “क्यों?” आरव ने कहा, “क्योंकि जब पापा बीमार थे तो डॉक्टर उन्हें बचा नहीं पाए। मैं बड़ा होकर ऐसा डॉक्टर बनूंगा जो लोगों की जान बचाएगा.” अरविंद और सुमन एक दूसरे की तरफ देखने लगे। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्हें लगा जैसे राकेश की अधूरी उम्मीद आज फिर से जिंदा हो गई हो।

कई साल बाद आरव सच में डॉक्टर बन गया। जिस बच्चे ने अपने पिता को अस्पताल के बिस्तर पर खोया था। उसी बच्चे ने आगे चलकर जरूरतमंद मरीजों की मदद करने का फैसला किया और अरविंद उसने अपनी चाय की दुकान को एक छोटे से भोजनालय में बदल दिया। वह हर दिन कुछ गरीब लोगों को मुफ्त खाना खिलाता था। एक दिन एक ग्राहक ने उससे पूछा, “तुम ऐसा क्यों करते हो?” अरविंद मुस्कुरा कर बोला, “क्योंकि कभी एक अनजान महिला रात में मेरी दुकान पर मदद मांगने आई। अगर उस रात मैं उसकी मदद नहीं करता तो शायद मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा रिश्ता मुझे कभी नहीं मिलता.” सुमन पास ही खड़ी थी। उसने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराकर अरविंद की तरफ देखा और दीवार पर राकेश की तस्वीर टंगी हुई थी। उस तस्वीर के नीचे एक छोटी सी लाइन लिखी थी।

“इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी अच्छी सोच और उसके किए हुए अच्छे काम हमेशा जिंदा रहते हैं.” दोस्तों, इस कहानी से हमें यही सीख मिलती है कि किसी इंसान की जिंदगी में मदद करने के लिए हमेशा पैसा जरूरी नहीं होता। कभी किसी को एक कप चाय चाहिए होती है। कभी किसी को एक फोन करने के लिए मोबाइल चाहिए होता है। कभी किसी को रात में घर पहुंचाने के लिए थोड़ी मदद चाहिए होती है। और कभी-कभी किसी टूटे हुए इंसान को सिर्फ यह सुनने की जरूरत थी “तुम अकेले नहीं हो।” अरविंद ने उस रात सुमन की मदद इसलिए नहीं की थी कि उसे बदले में कुछ चाहिए था। उसने सिर्फ इंसानियत के नाते हाथ बढ़ाया था। और शायद यही वजह थी कि जिंदगी ने बाद में उसे एक ऐसा परिवार दिया जिसकी उसे कभी उम्मीद नहीं थी।

रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते। कुछ रिश्ते भरोसे से बनते हैं। कुछ सम्मान से, कुछ मुश्किल वक्त में साथ खड़े रहने से और कुछ रिश्ते इंसानियत से। इसीलिए दोस्तों, अगर जिंदगी में कभी आपको किसी जरूरतमंद की मदद करने का मौका मिले तो अपनी क्षमता के अनुसार जरूर मदद कीजिए। क्योंकि आपको नहीं पता कि आपकी छोटी सी मदद किसी की पूरी जिंदगी बदल सकती है। तो दोस्तों, अरविंद ने कैसा किया? यह आप जो है कमेंट में जरूर बताइएगा। मिलते हैं अगली वीडियो में। तब तक के लिए अपना ख्याल रखिए।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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