भाई और बहन ने मिलकर अपने माता पिता को का#@ट दिया/पुलिस और लोगों के होश उड़ गए/ – News

भाई और बहन ने मिलकर अपने माता पिता को का#@ट दिया/पुलिस और लोगों के होश उड़ गए/

भाई और बहन ने मिलकर अपने माता पिता को का#@ट दिया/पुलिस और लोगों के होश उड़ गए/

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में बसा बालपुर गांव बाहर से देखने में जितना शांत और साधारण लगता था, उसके भीतर कुछ घरों में उतनी ही खौफनाक और घिनौनी कहानियां करवट ले रही थीं। इसी गांव के एक जर्जर से मकान में बसंत कुमार का परिवार रहता था। बसंत कुमार गांव के जमींदारों के खेतों में दिहाड़ी मजदूरी करता था, लेकिन उसकी मेहनत का एक भी पैसा उसके घर के राशन या बच्चों की पढ़ाई में नहीं लगता था। वह एक दर्जे का शराबी था। शराब की लत ने उसे इस कदर अंधा कर दिया था कि वह नशे के लिए घर के बर्तन तक बेच देता था। उसकी पत्नी कांता देवी एक बेहद खूबसूरत और जवान महिला थी। कांता जब भी घर से बाहर निकलती, गांव के मर्दों की हवस भरी नजरें उसका पीछा करती थीं। लेकिन कांता अपनी गरीबी और अपने शराबी पति की हरकतों से अंदर ही अंदर घुट रही थी।

इस परिवार में बसंत और कांता के दो बच्चे भी थे। बड़ा बेटा रुद्र, जो दसवीं कक्षा का छात्र था, और छोटी बेटी वर्षा, जो आठवीं में पढ़ती थी। शराबी पिता के बावजूद दोनों बच्चे पढ़ाई-लिखाई में बहुत होशियार थे। वे इस गरीबी के दलदल से बाहर निकलने का सपना देखते थे। लेकिन बसंत की लत की वजह से अब उसे मजदूरी मिलना भी बंद हो गई थी। वह दिन भर घर में पड़ा रहता या नशे में धुत होकर कांता से मारपीट करता। कांता अक्सर उसे चेतावनी देती कि अगर उसने शराब नहीं छोड़ी, तो एक दिन पूरे परिवार को हाथ में कटोरा लेकर भीख मांगनी पड़ेगी, लेकिन बसंत पर इन बातों का कोई असर नहीं होता था।

दिन बीतते गए और 2 जुलाई 2026 की वह सुबह आ गई, जिसने इस परिवार के पतन की नींव रख दी। सुबह के साढ़े सात बज रहे थे। रुद्र और वर्षा स्कूल जाने के लिए

तैयार थे। रुद्र ने झिझकते हुए अपने पिता से कहा कि आज स्कूल में फीस जमा करनी है और नई किताबें भी खरीदनी हैं। बसंत ने बड़ी बेरुखी से जवाब दिया कि उसके पास एक फूटी कौड़ी भी नहीं है। निराश होकर दोनों बच्चे अपनी मां कांता के पास गए। बच्चों के उतरे हुए चेहरे देखकर एक मां का दिल तड़प उठा। उसने बच्चों को दिलासा दिया कि वे स्कूल जाएं, वह आज किसी न किसी तरह पैसों का इंतजाम कर लेगी।

बच्चों के जाने के बाद कांता अपनी पड़ोसन अनीता के घर गई और बहुत मिन्नतें करके उससे तीन हजार रुपये कर्ज लिए। पैसे मिलते ही कांता शहर गई। उसने बच्चों के लिए नई किताबें, स्कूल ड्रेस और घर के लिए कुछ राशन खरीदा। भारी सामान लेकर जब वह वापस गांव के बस अड्डे पर पहुंची, तो वहां सन्नाटा पसरा था। गांव तक जाने के लिए कोई ऑटो रिक्शा नहीं था और गांव की दूरी करीब तीन किलोमीटर थी। थक-हारकर कांता ने पैदल ही गांव की तरफ चलना शुरू कर दिया।

धूप तेज थी और कांता पसीने से तर-बतर सड़क पर चली जा रही थी। तभी पीछे से गांव के सरपंच देव सिंह की लग्जरी गाड़ी आई। देव सिंह एक रसूखदार लेकिन बेहद चरित्रहीन इंसान था। उसकी नजरें जैसे ही सड़क किनारे चलती कांता की खूबसूरती पर पड़ीं, उसकी नियत डोल गई। उसने तुरंत गाड़ी रोकी और कांता से पूछा कि वह इतनी धूप में पैदल क्यों जा रही है। कांता ने मजबूरी बताई तो देव सिंह ने उसे अपनी गाड़ी में बैठा लिया। गाड़ी के एसी की ठंडी हवा और सरपंच की चिकनी-चुपड़ी बातों ने कांता को थोड़ा राहत दी। सफर के दौरान देव सिंह ने कांता की मजबूरी को भांप लिया। जब कांता ने अपने पति के निकम्मेपन का रोना रोया, तो देव सिंह ने एक गहरी चाल चली। उसने कांता से कहा कि वह अपने पति को शाम को उसके घर भेज दे, वह उसे कोई अच्छा काम दे देगा। कांता खुशी-खुशी घर लौटी।

शाम को कांता के कहने पर बसंत देव सिंह के घर पहुंचा। देव सिंह ने उसे अपने खेतों में काम करने को कहा। बसंत ने तुरंत दस हजार रुपये एडवांस मांग लिए ताकि घर का खर्च चल सके। देव सिंह ने बिना कुछ सोचे उसे पैसे दे दिए। दस हजार रुपये हाथ में आते ही बसंत की नीयत फिर खराब हो गई। वह घर जाने के बजाय सीधा शराब के ठेके पर पहुंचा। वहां उसने जमकर शराब पी और नशे में धुत होकर ठेके के बाहर ही गिर पड़ा। रात के अंधेरे में गांव के ही कुछ लोगों ने उसकी जेब से पूरे दस हजार रुपये निकाल लिए। रात आठ बजे जब वह खाली हाथ और नशे में लड़खड़ाता हुआ घर पहुंचा, तो कांता की उम्मीदों का आखिरी तिनका भी टूट गया।

अगले दिन बसंत काम पर नहीं गया। शाम चार बजे सरपंच देव सिंह खुद बसंत के घर आ धमका। उस वक्त घर में बच्चे नहीं थे और बसंत शराब पीने गया हुआ था। कांता घर में अकेली थी। जब देव सिंह ने पैसों और काम की बात की, तो कांता ने बेबसी से कहा कि उसका पति कोई काम नहीं करेगा। देव सिंह को इसी मौके की तलाश थी। उसने कांता को अपनी तरफ घूरते हुए कहा कि अगर बसंत काम नहीं करेगा, तो कांता को उसके खेतों में काम करना पड़ेगा। इसके बाद उसने पांच सौ रुपये निकालकर कांता के हाथ पर रख दिए। गरीबी से मारी कांता ने पैसों का लालच देखकर हामी भर दी।

अगली सुबह कांता देव सिंह के खेतों में चारा काटने पहुंच गई। खेत में दूर-दूर तक कोई नहीं था। कुछ ही देर में देव सिंह भी वहां आ गया। उसने कांता के पास बैठकर मीठी बातें शुरू कीं और फिर सीधे मुद्दे पर आ गया। उसने कांता को अहसास दिलाया कि उसका पति न तो उसकी आर्थिक जरूरतें पूरी कर सकता है और न ही शारीरिक। कांता, जो गरीबी और अपने पति से पहले ही तंग आ चुकी थी, देव सिंह की बातों में आ गई। देव सिंह ने उसे पास के गन्ने के खेत में चलने को कहा और बदले में पैसे और सुख दोनों देने का वादा किया। कांता ने अपनी मर्यादा की दहलीज पार कर दी। उस दिन गन्ने के खेत में कांता ने चंद पैसों के लिए अपना जमीर बेच दिया।

यह सिलसिला शुरू ही हुआ था कि इसमें एक और किरदार जुड़ गया। देव सिंह का जवान बेटा अजय सिंह। अजय भी अपने पिता की तरह औरतों का शौकीन था। एक दिन जब देव सिंह खेत से गांव की तरफ गया, तो अजय खेत में आ पहुंचा। उसने कांता को देखा और उसकी नियत भी खराब हो गई। उसने कांता से बातों ही बातों में कहा कि उसे जब भी जरूरत हो, वह उससे मांग सकती है। कांता ने मजाक में कहा कि उसे सौ रुपये की जरूरत है। अजय ने बड़ी चालाकी से कहा कि सौ नहीं, वह दस हजार रुपये देगा, लेकिन आज रात उसे कांता के घर आना है। कांता पूरी तरह से अंधकार में डूब चुकी थी। उसने अजय को अपना नंबर दे दिया और रात को आने का न्योता भी दे दिया।

उसी शाम कांता गांव के मेडिकल स्टोर पर गई। वहां शंकर नाम के लड़के से उसने बहुत कड़े असर वाली नींद की गोलियां खरीदीं। रात को कांता ने खाने में वह नींद की दवा मिला दी। खाना खाकर रुद्र, वर्षा और शराबी बसंत गहरी नींद में बेसुध हो गए। रात के साढ़े दस बजे अजय सिंह कांता के घर पहुंचा। बंद दरवाजों के पीछे कांता ने एक ही दिन में पिता के बाद उसके बेटे के साथ भी अपने जिस्म का सौदा कर लिया।

कांता के इस घिनौने खेल की भनक अभी तक परिवार को नहीं लगी थी। लेकिन 20 जुलाई की शाम एक ऐसा वाकया हुआ जिसने बच्चों के बालमन पर गहरा आघात किया। देव सिंह ने शराब के नशे में कांता को फोन किया और कहा कि वह अभी उससे मिलने आ रहा है। कांता ने बच्चों को पैसे देकर घर से बाहर खेलने भेज दिया। देव सिंह घर आया और दोनों बेडरूम में चले गए। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। बसंत अपने दोनों बच्चों को लेकर अचानक घर लौट आया।

दरवाजा खटखटाने के काफी देर बाद जब कांता ने दरवाजा खोला, तो बसंत और बच्चे सीधे अंदर आ गए। बसंत ने बेडरूम में देव सिंह सरपंच को आपत्तिजनक हालत में देख लिया। रुद्र और वर्षा भी वहां खड़े थे। किसी भी आम पति का खून यह देखकर खौल उठता, लेकिन बसंत का जमीर शराब ने मार दिया था। उसने गुस्सा करने के बजाय देव सिंह से कहा, “सरपंच साहब, आज तो आप हमारे घर आए हैं, कहिए मैं आपकी क्या सेवा करूं।” देव सिंह ने बेशर्मी से कहा कि उसकी पत्नी ने बहुत सेवा कर दी है। इसके बाद बसंत ने पैसों की मांग की। देव सिंह ने कुछ पैसे बसंत के मुंह पर मारे और चला गया। बसंत पैसे लेकर शराब पीने निकल गया। कोने में खड़े रुद्र और वर्षा ने यह सब अपनी आंखों से देखा। उनके लिए यह मंजर किसी सदमे से कम नहीं था कि उनकी मां अपना जिस्म बेच रही है और पिता उसकी कीमत वसूल रहा है। कांता ने बच्चों को यह कहकर झूठ बोला कि सरपंच उसे मजदूरी के पैसे देने आया था, लेकिन बच्चों की आंखों से पर्दा उठ चुका था।

कहानी का सबसे खौफनाक मोड़ 10 अगस्त 2026 को आया। शाम के छह बज रहे थे। बसंत शराब पीने गया था और बच्चे भी बाहर थे। अजय सिंह का फोन आया और वह तुरंत कांता के घर आ गया। दोनों बेडरूम में चले गए, लेकिन जल्दबाजी में घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद करना भूल गए।

कुछ ही देर बाद रुद्र और वर्षा घर लौट आए। उन्होंने देखा कि मां के कमरे का दरवाजा बंद है। रुद्र ने जब जोर से दरवाजा खटखटाया तो कांता के होश उड़ गए। उसने घबराहट में दरवाजा खोला। सामने रुद्र और वर्षा खड़े थे और बिस्तर पर अजय सिंह था। अपनी मां को इस हालत में देखकर रुद्र का खून खौल उठा। उसने अजय सिंह को भद्दी गालियां दीं। इस पर अजय सिंह को गुस्सा आ गया। उसने रुद्र के गाल पर दो-तीन जोरदार थप्पड़ जड़ दिए।

थप्पड़ मारने के बाद अजय सिंह ने एक ऐसा जहर उगला जिसने बच्चों की दुनिया हमेशा के लिए तबाह कर दी। अजय ने चिल्लाते हुए कहा, “तेरी मां पैसे लेकर मेरे साथ सोती है! और सिर्फ मेरे साथ नहीं, मेरे बाप के साथ भी सोती है! और तेरा वो भिखारी बाप, वो सब जानता है। वो हम दोनों से अपनी बीवी की कीमत वसूलता है।” यह कड़वा सच सुनकर रुद्र और वर्षा सुन्न रह गए। उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। अजय सिंह वहां से धमकियां देते हुए निकल गया, लेकिन पीछे छोड़ गया दो बच्चों के टूटे हुए दिल और उबलता हुआ गुस्सा।

उस दिन रुद्र और वर्षा ने अपनी मां से एक शब्द नहीं कहा। रात हुई। कांता ने खाना बनाया। बच्चों ने खामोशी से खाना खाया और अपने कमरे में चले गए। कांता अपने कमरे में सो गई और रात दस बजे शराबी बसंत भी लड़खड़ाता हुआ आया और सो गया।

रात के सन्नाटे में रुद्र ने अपनी बहन वर्षा की तरफ देखा। उसकी आंखों में आंसू सूख चुके थे और उनकी जगह एक खौफनाक इरादे ने ले ली थी। रुद्र ने भारी आवाज में कहा, “वर्षा, हमारे माता-पिता दोनों गंदे और लालची हो चुके हैं। मां पैसे के लिए अपना जिस्म बेचती है और पिता इस धंधे से शराब पीता है। आज ये सब हो रहा है, कल को ये पैसों के लिए तेरे साथ भी कोई गलत काम करवा सकते हैं। इनका जिंदा रहना अब ठीक नहीं है।” वर्षा भी अपने भाई की बातों से सहमत थी। बच्चों के मन में पनपी नफरत ने अब हत्यारे का रूप ले लिया था।

रुद्र चुपचाप उठा। उसने घर के आंगन से एक भारी कुल्हाड़ी उठाई और वर्षा के हाथ में रसोई का एक बड़ा चाकू थमा दिया। दोनों भाई-बहन मौत के दूत बनकर अपने ही माता-पिता के कमरों की तरफ बढ़े।

रुद्र दबे पांव अपने पिता बसंत के कमरे में गया। बसंत नशे में बेसुध पड़ा खर्राटे ले रहा था। रुद्र ने हवा में कुल्हाड़ी उठाई और अपनी पूरी ताकत से अपने पिता की गर्दन पर दे मारी। एक ही वार में बसंत की गर्दन कट गई। उसे चीखने तक का मौका नहीं मिला। उसी वक्त, दूसरे कमरे में वर्षा ने अपनी मां कांता के सीने और गले पर चाकू से कई वार किए। चंद मिनटों के भीतर, उस घर में खून की नदियां बह रही थीं। जिन हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, वे आज अपने ही जन्मदाताओं के खून से सने हुए थे।

इस खौफनाक दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद, दोनों बच्चे बिल्कुल शांत थे। उनके चेहरों पर न कोई खौफ था, न कोई पछतावा। वे दोनों सीधे अपने पड़ोस में रहने वाले अनिल कुमार के घर पहुंचे। रात के अंधेरे में खून से सने बच्चों को देखकर अनिल कुमार की रूह कांप गई।

रुद्र ने बेहद ठंडी आवाज में कहा, “चाचा, हमने अपने मां-बाप को मार डाला है। वो दोनों गलत रास्ते पर चले गए थे और हमें भी बर्बाद कर देते। आप पुलिस को फोन कर दीजिए।”

अनिल कुमार के हाथ-पैर फूल गए। उसने कांपते हाथों से तुरंत पुलिस को सूचना दी। एक घंटे के भीतर पुलिस के सायरन से पूरा बालपुर गांव गूंज उठा। पुलिस ने घर का दरवाजा खोला तो अंदर का मंजर देखकर बड़े-बड़े पुलिसवालों की भी आंखें फटी रह गईं। बसंत और कांता की लाशें खून के तालाब में पड़ी थीं।

पुलिस ने तुरंत दोनों लाशों को कब्जे में लिया और रुद्र तथा वर्षा को गिरफ्तार कर लिया। थाने ले जाकर जब दोनों बच्चों से पूछताछ की गई, तो उन्होंने बिना किसी झिझक के पूरी कहानी सुना दी। उन्होंने बताया कि कैसे सरपंच और उसके बेटे ने उनकी मां का फायदा उठाया और कैसे उनके पिता ने चंद रुपयों के लिए अपनी इज्जत बेच दी। बच्चों का बयान सुनकर पुलिस अधिकारी भी सन्न रह गए।

कानून की नजर में रुद्र और वर्षा अब हत्यारे बन चुके थे। पुलिस ने उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी। अब यह अदालत को तय करना था कि उन हालातों के शिकार इन बच्चों को क्या सजा दी जाए। लेकिन इस घटना ने समाज के मुंह पर एक करारा तमाचा जड़ दिया। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और माता-पिता ही अपने बच्चों के लिए नर्क के दरवाजे खोल दें, तो फिर उन बच्चों से किस इंसानियत की उम्मीद की जा सकती है? लालच, शराब और वासना ने सिर्फ दो लोगों की जान नहीं ली, बल्कि दो होनहार बच्चों का पूरा भविष्य हमेशा के लिए सलाखों के पीछे दफन कर दिया।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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