Part 3 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं
भाग तीन
सुधार गृह से छूटने के बाद कविता सत्रह साल की हो चुकी थी।
उसका चेहरा पहले जैसा नहीं रहा था। आँखों में वह चमक नहीं थी जो कभी आठवीं कक्षा में पढ़ते समय हुआ करती थी। बाल छोटे कटवा लिए थे। बातें कम करती थी। सिर्फ जरूरत पड़ने पर बोलती थी।
रामेश ने उसे एक छोटे से कमरे में रखा जो शहर के किनारे एक सस्ते मोहल्ले में था। वह खुद सुबह से रात तक ईंट-भट्ठा और मजदूरी करता। शाम को थका हुआ आता, खाना खाता और सो जाता। दोनों के बीच बातचीत बहुत कम होती।
एक शाम कविता ने पूछा, “पापा, चाचा का पता चला?”
रामेश ने सिर हिलाया। “पुलिस कहती है वह अब किसी और नाम से रहता होगा। पकड़ना मुश्किल है।”
कविता चुप हो गई। वह जानती थी मुकेश जिंदा है। और जब तक वह जिंदा है, यह कहानी पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
गाँव वाले अब उस परिवार का नाम लेना पसंद नहीं करते थे। जो घर कभी साधारण लेकिन सम्मानित माना जाता था, उसे लोग “वह घर” कहकर टाल देते। मनीषा की मौत को लेकर तरह-तरह की बातें चलती रहीं। कोई कहता कविता पागल हो गई थी, कोई कहता माँ ने बहुत बड़ा पाप किया था, कोई कहता पिता की गैरहाजिरी ने सब बर्बाद किया।
सच यह था कि हर बात में थोड़ा-थोड़ा हिस्सा था।
दो साल और बीत गए। कविता ने इंटर की परीक्षा दी। नंबर औसत आए। वह कॉलेज नहीं गई। उसने एक छोटी सी सिलाई की दुकान में काम करना शुरू कर दिया। दिन भर कपड़े सिलती, शाम को कमरे में आती और खिड़की के पास बैठी रहती।

एक दिन उसी दुकान पर एक औरत आई। वह गाँव की थी। उसने कविता को पहचान लिया।
“तू वही है न?” औरत ने धीरे से पूछा।
कविता ने सुई रोकी। “जी।”
औरत ने चारों तरफ देखा फिर कहा, “तेरे चाचा मुकेश को किसी ने देखा है। बनारस के पास एक ईंट भट्ठे पर। वह दाढ़ी बढ़ाए हुए है, नाम भी बदल लिया है। लेकिन चलने-फिरने का ढंग वही है।”
कविता का हाथ कांप गया। उसने कुछ नहीं कहा। औरत चली गई।
उस रात कविता सो नहीं पाई।
अगले दिन उसने पिता से कहा, “पापा, मुझे बनारस जाना है।”
रामेश समझ गया। उसने मना नहीं किया। बस इतना कहा, “अगर तू गई और कुछ हो गया, तो मैं अकेला रह जाऊँगा।”
कविता ने जवाब दिया, “मैं कुछ नहीं करूँगी। मैं सिर्फ देखना चाहती हूँ कि वह जिंदा है या नहीं।”
तीन दिन बाद कविता बनारस पहुँची। भट्ठा दूर गाँव में था। धूल, धुआँ और मजदूरों की भीड़। उसने दूर से देखा। एक आदमी ईंटें ढो रहा था। कद वही था, कंधे झुके हुए थे, लेकिन चाल पहचानी जा सकती थी।
मुकेश था।
कविता पास नहीं गई। वह एक पेड़ के पीछे खड़ी रही। मुकेश ने उस तरफ देखा भी नहीं। वह बस काम कर रहा था, जैसे कोई साधारण मजदूर। जैसे उसने कभी किसी की जिंदगी बर्बाद नहीं की हो।
कविता वहीं खड़ी रही लगभग एक घंटा। फिर लौट आई।
वापस शहर आकर उसने पिता से कहा, “वह जिंदा है। और वह सामान्य जीवन जी रहा है।”
रामेश ने लंबी साँस ली। “पुलिस को बता दूँ?”
कविता ने सिर हिलाया। “नहीं। अब कोई फायदा नहीं। माँ वापस नहीं आएगी। मेरी उम्र के तीन साल वापस नहीं आएंगे। और गाँव वाले हमें माफ नहीं करेंगे।”
लेकिन अंदर से कविता शांत नहीं थी।
कुछ महीनों बाद एक और घटना हुई। रामेश काम से लौटते समय सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने कहा कमर की हड्डी टूट गई है, अब वह पहले जैसा काम नहीं कर सकेगा।
कविता के सिर पर पूरा बोझ आ गया। सिलाई का काम बढ़ाने पड़े, रात को ट्यूशन पढ़ाने लगी छोटे बच्चों को। पैसे पूरे नहीं पड़ते थे। कर्ज चढ़ने लगा।
इसी दौरान गाँव से खबर आई कि मुकेश पकड़ा गया है।
किसी पुराने पहचान वाले ने पुलिस को सूचना दे दी थी। मुकेश को प्रयागराज लाया गया। उस पर अब दो मामले थे—एक पुराना वारंट और दूसरा परिवार के अंदर अनैतिक संबंध का आरोप, हालांकि वह साबित करना मुश्किल था क्योंकि मनीषा जीवित नहीं थी।
अदालत में मुकेश ने सब कुछ नकार दिया।
उसने कहा, “भाभी ने खुद मुझे फँसाया। मैं मजबूर था। कविता ने जो देखा, वह उसने गलत समझा।”
कविता को गवाही देने बुलाया गया।
वह अदालत में खड़ी हुई। मुकेश उसकी तरफ देख रहा था। कविता ने उसकी आँखों में देखा और कहा—
“आपने घर का भरोसा तोड़ा। माँ ने भी तोड़ा। मैंने गुस्से में जो किया, उसका हिसाब मैंने दे दिया। अब आप अपना हिसाब दीजिए।”
न्यायाधीश ने मुकेश को दो साल की सजा सुनाई। नैतिक आधार पर ज्यादा लंबी सजा नहीं हो सकी क्योंकि सबूत सीमित थे। लेकिन गाँव में उसका नाम हमेशा के लिए खत्म हो गया।
जब मुकेश जेल गया, कविता को कोई राहत नहीं मिली।
वह समझ गई थी कि सजा से कुछ वापस नहीं आता।
रामेश अब चलने-फिरने लायक नहीं रहा। कविता उसे अस्पताल ले जाती, दवाई देती, खाना बनाती। एक रात रामेश ने कहा, “मैं तुझे माफ कर चुका हूँ। लेकिन मैं खुद को माफ नहीं कर पाया। अगर मैं घर रहता, तो शायद यह सब नहीं होता।”
कविता ने पिता का हाथ पकड़ा। पहली बार आँखों में आँसू आए।
“पापा, आप बाहर कमा रहे थे ताकि हम जी सकें। गलती आपकी नहीं थी। गलती उन लोगों की थी जो घर में रहकर मर्यादा नहीं रख सके।”
उस रात दोनों देर तक चुप रहे।
अगले साल कविता ने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और सिलाई के साथ रेडीमेड कपड़ों का काम शुरू किया। धीरे-धीरे ग्राहक बढ़े। लोग उसकी कहानी जानते थे, कुछ दया से आते, कुछ डर से दूर रहते। लेकिन काम चल निकला।
एक दिन गाँव की वही औरत फिर आई। उसने कहा, “तेरी माँ की कब्र पर अब घास उग आई है। कोई नहीं जाता।”
कविता कुछ दिन बाद गाँव गई। पहली बार घटना के इतने साल बाद।
घर अब खंडहर हो चुका था। दीवारें गिर रही थीं। उसने माँ की कब्र पर एक छोटा सा दीया जलाया। कुछ नहीं बोली। बस खड़ी रही।
वापस जाते समय उसने सोचा—
माँ ने एक गलत फैसला लिया था अकेलेपन में।
चाचा ने कमजोरी दिखाई थी।
पिता दूर थे।
और वह खुद गुस्से में एक कदम आगे बढ़ गई थी।
अब कोई भी उस दिन को बदल नहीं सकता था।
कविता शहर लौटी। उसने फैसला किया कि वह अपनी जिंदगी को और नहीं तोड़ेगी। पढ़ाई पूरी नहीं कर सकी, लेकिन काम से अपना और पिता का पेट पालेगी। शादी के बारे में नहीं सोचेगी, कम से कम अभी नहीं। लोग पूछते तो कह देती, “अभी समय नहीं है।”
गाँव के बुजुर्ग अब नई बात कहते—
“एक घर तब नहीं टूटता जब दीवार गिरे।
घर तब टूटता है जब अंदर का विश्वास गिर जाए।
और जब विश्वास गिर जाए, तो बच्चे सबसे पहले दफन हो जाते हैं—चाहे वे जिंदा ही क्यों न रहें।”
कविता अब उन बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती जो गरीब परिवारों से आते। उन्हें बार-बार एक ही बात कहती—
“घर में जो देखोगे, वही बनोगे।
बड़े सही रहें, तो छोटे बच जाते हैं।”
रामेश अब ज्यादा बोल नहीं पाता। वह खिड़की के पास बैठा रहता और बेटी को काम करते देखता। कभी-कभी मुस्कुरा देता।
मुकेश जेल की सजा काटने के बाद गायब हो गया। कोई नहीं जानता वह कहाँ गया।
मनीषा की कहानी गाँव में धीरे-धीरे किंवदंती बन गई। लोग उसे उदाहरण की तरह सुनाते—कैसा अकेलापन इंसान को गलत रास्ते पर ले जाता है, और कैसे एक गलत रास्ता कई जिंदगियों को हमेशा के लिए बदल देता है।
कविता जिंदा रही।
लेकिन उस घर वाली छोटी लड़की, जो स्कूल से जल्दी लौटकर माँ का सहारा ढूँढती थी, वह उस दोपहर हमेशा के लिए मर गई थी।
अब जो बची थी, वह सिर्फ एक औरत थी—जो हर रोज सुबह उठती, काम करती, पिता की देखभाल करती और रात को सोने से पहले एक ही बात अपने मन में दोहराती—
“पढ़ाई मत छोड़ना।”
माँ की आखिरी अच्छी बात यही थी।
बाकी सब खत्म हो चुका था।
समाप्त।
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