Part 5 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं – News

Part 5 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं

Part 5 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं

भाग पाँच

तीन और साल बीत गए।

कविता अब अट्ठाईस की हो चुकी थी। चेहरा और भी शांत हो गया था, जैसे अंदर की आग धीरे-धीरे राख में बदल गई हो। सिलाई का काम स्थिर था। कस्बे के लोग उसे मेहनती और कम बोलने वाली औरत मानते थे। उसकी पुरानी कहानी वहाँ तक नहीं पहुँची थी। वह यही चाहती थी।

जो छोटी लड़की उसके पास सिलाई सीखने आती थी, उसका नाम अंजलि था। अब वह पंद्रह साल की हो गई थी। माँ दिहाड़ी करती, पिता साल में दो-तीन बार आता और फिर चला जाता। घर वही अकेलापन लिए हुए था जो कभी कविता के घर में रहा था।

कविता अंजलि को देखकर हर बार चौंकती। वही उम्र, वही सवाल भरी आँखें, वही चुप्पी।

एक शाम अंजलि देर से आई। आँखें लाल थीं। कविता ने पूछा, “क्या हुआ?”

अंजलि ने सिर झुकाया। “घर में मामा रहने लगे हैं। पापा के आने का इंतजार करते-करते मम्मी अब उनसे बातें ज्यादा करने लगी हैं। रात को देर तक बैठते हैं।”

कविता के हाथ से सुई गिर गई।

उसने अंजलि का चेहरा उठाया। “तूने कुछ देखा?”

अंजलि ने धीरे से कहा, “अभी नहीं। लेकिन घर का माहौल बदल गया है। मम्मी मुझसे छुपाती हैं।”

कविता रात भर सो नहीं पाई। पुरानी दोपहर फिर आ गई—स्कूल बैग, खुला दरवाजा, वह दृश्य जो कभी मिटा नहीं। उसने तय किया कि इस बार वह चुप नहीं रहेगी।

अगले दिन वह अंजलि की माँ से मिली। औरत पहले तो झिझकी, फिर बोली, “आप समझिए, आदमी साल में एक बार आता है। घर खाली पड़ता है।”

कविता ने सीधा कहा, “खाली घर में गलत आदमी बिठाने से घर नहीं भरता। वह और खाली हो जाता है। मेरी माँ ने भी यही सोचा था। नतीजा आप जानना चाहें तो मैं बता सकती हूँ, लेकिन बेहतर है आप खुद संभल जाएँ।”

औरत नाराज होकर चली गई। कुछ दिन अंजलि नहीं आई। फिर एक दोपहर वह दौड़ी-दौड़ी आई। रो रही थी।

“दीदी, आज मैं जल्दी घर पहुँची… मैंने देख लिया।”

कविता का शरीर काँप गया। वही वाक्य, वही समय, वही सदमा। उसने अंजलि को पकड़ लिया।

“अब तू घर अकेली मत जाना। आज से तू यहीं रहेगी।”

उसने अंजलि की माँ को बुलाया। इस बार बात तीखी हुई। कविता ने साफ कहा, “अगर आपने उस आदमी को घर से नहीं निकाला, तो मैं पुलिस और पंचायत दोनों जगह ले जाऊँगी। इस बार कोई बच्ची चाकू नहीं उठाएगी। इस बार कोई बड़का रोकेगा।”

माँ डर गई। दो दिन बाद मामा घर छोड़कर चला गया। अंजलि वापस अपनी माँ के पास गई, लेकिन हर शाम कविता के पास आने लगी। कविता उसे पढ़ाई करवाती, सिलाई सिखाती और बार-बार वही बात दोहराती—

“घर में जो गलत हो, उसे छुपाना मत। चुप्पी सबसे बड़ा जहर है।”

अंजलि की माँ कुछ महीनों बाद कविता से मिलने आई। सिर झुकाए खड़ी रही।

“आपने जो कहा, वह सही था। मैं अकेली पड़ गई थी। धन्यवाद कि आपने मेरी बेटी को बचा लिया।”

कविता ने जवाब दिया, “मैंने आपकी बेटी नहीं बचाई। मैंने उस लड़की को बचाया जो कभी मैं हुआ करती थी। और जो मैं बचा नहीं पाई।”

उस रात कविता पहली बार महसूस कर पाई कि उसका दर्द व्यर्थ नहीं गया। वह किसी और घर में दोहरा नहीं पाया। यह छोटी सी जीत थी, लेकिन उसके लिए बहुत बड़ी थी।

समय चलता रहा।

कविता ने अंजलि की पढ़ाई का खर्च भी संभाला। लड़की बारहवीं पास कर कॉलेज गई। कविता उसके प्रमाण पत्र को देखकर मुस्कुराई। वह मुस्कान बहुत दिनों बाद आई थी।

एक दिन डाकिया एक पुराना लिफाफा लेकर आया। गाँव से था। अंदर एक छोटी सी पर्च थी—

“तुम्हारे पुराने घर की जगह अब पंचायत भवन बन गया है। लोग भूल गए हैं। तुम भी भूल जाओ।”

कविता ने पर्च रख दी दराज में। न जलाई, न फेंकी। बस रख दी। कुछ चीजें पूरी तरह मिटती नहीं, सिर्फ दब जाती हैं।

उसकी उम्र तीस के पार निकलने लगी। शरीर थकने लगा। आँखों की रोशनी कम होने लगी सिलाई के कारण। फिर भी वह काम छोड़ती नहीं थी। अंजलि अब कभी-कभी छुट्टियों में आती, कहती, “दीदी, आप अकेली क्यों रहती हो? शादी क्यों नहीं की?”

कविता हँसकर टाल देती। “मेरी शादी हो चुकी है—अपने गुनाह और अपनी सजा से। अब दूसरा घर नहीं बसाना।”

अंजलि समझ गई। और नहीं पूछा।

एक सर्दी में कविता बीमार पड़ी। बुखार लंबा चला। अंजलि आकर रहने लगी। रात को दवा देती, माथा ठंडा करती। एक रात कविता ने अंजलि का हाथ पकड़ा।

“अगर मैं चली गई, तो तू डरना मत। तू सही रास्ते पर है। बस घर के बड़े लोगों की गलती अपने सिर मत लेना। और किसी मासूम को उस दोपहर में मत छोड़ना जो मैंने काटी थी।”

अंजलि रोने लगी। “दीदी, आप जाओगी नहीं।”

कविता मुस्कुराई। “सब जाते हैं। फर्क सिर्फ यह है कि जाते-जाते कोई बोझ छोड़ जाता है या कोई सबक।”

बुखार उतर गया। कविता बच गई। लेकिन उस बीमारी के बाद वह और धीमी हो गई। काम कम करने लगी। शाम को दरवाजे पर बैठकर कस्बे को देखती रहती। बच्चों के खेलने की आवाज आती तो कभी-कभी आँखें भर आतीं।

उसने एक छोटी सी कॉपी निकालकर लिखना शुरू किया। कोई कहानी नहीं, सिर्फ सच्चे वाक्य—

घर तब तक घर रहता है जब तक उसके अंदर ईमानदारी हो।
अकेलापन इंसान को कमजोर बनाता है, लेकिन कमजोरी को सही ठहराने का अधिकार नहीं देता।
बच्चा जो देखता है, वही बन जाता है—या तो पीड़ित, या फिर एक दिन खुद दोषी।
माफ करना आसान है, भूलना असंभव।

कॉपी पूरी होने के बाद उसने वह अंजलि को दे दी।

“इसे रखना। जरूरत पड़े तो पढ़ना। मेरी जिंदगी की कीमत यही है।”

अंजलि ने कॉपी ली और सीने से लगा ली।

सालों बाद जब अंजलि खुद माँ बनी, उसने अपनी बेटी को वही बात सिखाई जो कविता ने उसे सिखाई थी। और जब कोई पूछता कि तुम्हारी दीदी कौन थी, तो वह कहती—

“एक औरत थी जिसने अपनी जिंदगी तोड़कर कई और जिंदगियाँ बचाईं।
उसका घर नहीं रहा, लेकिन उसका सबक रह गया।”

कविता अब बूढ़ी होने लगी थी। बाल सफेद पड़ गए थे। हाथ काँपने लगे थे। फिर भी वह कभी-कभी मशीन पर बैठ जाती और कोई छोटा कपड़ा सी लेती। जैसे आदत अब भी जिंदा हो।

एक शाम वह अपने कमरे में बैठी थी। बाहर सूरज डूब रहा था। उसने माँ का चेहरा याद किया—गुस्से वाला नहीं, बल्कि वह चेहरा जो कभी कहता था पढ़ाई मत छोड़ना। फिर पिता का थका हुआ चेहरा याद आया। फिर वह दोपहर। फिर अंजलि की बची हुई मुस्कान।

सब एक साथ था। दर्द भी, राहत भी।

उसने धीरे से कहा, जैसे कोई सुन रहा हो—

“माँ, मैंने तुम्हें माफ नहीं किया।
लेकिन मैंने तुम्हारी गलती दोहराने नहीं दी किसी और के घर में।
इतना काफी है मेरे लिए।”

बाहर हवा चली। दीया की लौ काँपी और फिर स्थिर हो गई।

कविता की कहानी अब किसी अखबार में नहीं थी, किसी अदालत में नहीं थी। वह सिर्फ उन घरों में जिंदा थी जहाँ माँ-बाप अभी भी दूर रहते हैं और बच्चे अभी भी चुपचाप सब देख रहे होते हैं।

जो बच गया, वह सबक था।
जो चला गया, वह परिवार था।
और जो हमेशा रहा, वह एक लड़की का अधूरा बचपन था—जो कभी पूरा नहीं हुआ, लेकिन दूसरों का बचपन पूरा होने में लग गया।

समाप्त।

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Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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