पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था – News

पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था

पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था

पती जेल में था और पत्नी के साथ यह क्या हो रहा था

अध्याय 1: बारबंकी का वह सवेरा और नए रिश्ते का आशियाना

वर्ष 2003 की बात है। उत्तर प्रदेश के बारबंकी ज़िले का एक शांत और सीधा-साधा गाँव, जहाँ समय अपनी धीमी रफ़्तार से बहता था। इसी गाँव में गुलाबचंद नाम का एक बेहद भोला और नैक-दिल नवयुवक रहता था। गुलाबचंद की उम्र उस समय मात्र 19 वर्ष की थी। जीवन के प्रति उसकी आँखें सीधी, सादी और सीधे सपनों से भरी हुई थीं। उसकी दुनिया उसके परिवार, खेती-बाड़ी और अपनी साइकिल के इर्द-गिर्द सिमटी हुई थी।

इसी दौरान गुलाबचंद का विवाह पास के ही एक अन्य गाँव की रहने वाली रेशमा नाम की लड़की से तय हुआ। रेशमा की आयु उस समय लगभग 17 या 18 वर्ष रही होगी। रेशमा न केवल रूप-रंग में ढली हुई थी, बल्कि स्वभाव से अत्यंत शर्मीली और सीधे-सादे विचारों वाली कन्या थी। जब वैदिक रीति-रिवाजों और ढोल-नगाड़ों के साथ गुलाबचंद और रेशमा का विवाह संपन्न हुआ, तो गुलाबचंद के जीवन में जैसे नई उमंगों का सूर्योदय हो गया।

विवाह के पश्चात रेशमा अपने ससुराल आई। पूरे घर में चहल-पहल और उत्सव का माहौल था। गुलाबचंद की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न था। वह अपनी नवविवाहिता पत्नी की छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखता और उसके चेहरे की मुस्कान में अपनी खुशियाँ ढूँढता था। रेशमा भी अपने नए घर और पति के सहृदय व्यवहार से अभिभूत थी। दोनों के बीच एक अनकहा और पवित्र प्रेम अंकुरित हो चुका था।

परंतु यह खुशियाँ अभी अपने शुरुआती पड़ाव पर ही थीं कि मात्र सात दिन बीतने के बाद रेशमा के मायके से लोग उसे विदा कराने के लिए आ पहुँचे। ग्रामीण परंपराओं के अनुसार, शादी के प्रथम आगमन के बाद दुल्हन को कुछ समय के लिए अपने पिता के घर जाना होता था। भारी मन से रेशमा अपने मायके चली गई।

उसके जाते ही गुलाबचंद का मन वीरान हो गया। वह हवेली और घर के आँगन में रेशमा की मौजूदगी ढूँढता रहता। सात दिनों में जो अपनत्व का बंधन बना था, वह अब गुलाबचंद को एक-एक पल भारी लग रहा था।

उस दौर में आज की तरह हर हाथ में मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करते थे कि जब मन किया, बटन दबाया और बात कर ली। न ही तुरंत संदेश भेजने का कोई माध्यम था। रेशमा को दोबारा अपने ससुराल लौटने में अभी कम से कम दो से चार महीनों का लंबा समय लगना था। गुलाबचंद के लिए यह दो-चार महीने का समय किसी युग जैसा प्रतीत हो रहा था।

तीन-चार दिन तो गुलाबचंद ने किसी तरह सबर किया। वह दिन में काम करता, लेकिन रात के सन्नाटे में उसे केवल रेशमा का ही ध्यान आता। आख़िरकार एक दिन उसके सब्र का बाँध टूट गया।

अध्याय 2: सन्नाटे को चीरती साइकिल और 40 किलोमीटर का सफर

शाम के लगभग पाँच बज रहे थे। सूरज ढलने की तैयारी में था और आसमान पर लालिमा छाने लगी थी। गुलाबचंद ने अपनी पुरानी साइकिल निकाली, उसके पहियों में हवा जाँची और बिना किसी को बताए अपने ससुराल की ओर निकलने का निर्णय कर लिया। उसके गाँव से ससुराल की दूरी कोई दो-चार किलोमीटर नहीं, बल्कि पूरी 40 किलोमीटर थी।

साइकिल के पैडल मारते हुए गुलाबचंद की आँखों के सामने केवल रेशमा की सूरत घूम रही थी। 10-20 किलोमीटर का सफर तय करते-करते सूरज पूरी तरह ढल गया और चारों ओर गाढ़ा अँधेरा पसर गया। गाँव की वह कच्ची और पथरीली सड़कें, जहाँ न स्ट्रीट लाइटें थीं और न ही कोई सुव्यवस्थित साधन। सन्नाटे में केवल उसकी साइकिल की जंजीर की आवाज़ और उसकी तेज़ साँसों की धड़कन सुनाई दे रही थी।

रास्ते में कई तरह के भय और आशंकाएँ थीं, परंतु गुलाबचंद के दिल में केवल एक ही हसरत दीप्त हो रही थी—”बस किसी तरह वहाँ पहुँचना है, रेशमा का चेहरा देखना है।” उसके दिल में उमड़ते अरमानों के आगे 40 किलोमीटर का उबड़-खाबड़ रास्ता भी छोटा नज़र आ रहा था।

जैसे-तैसे रात के घने अँधेरों को चीरते हुए, थका-हारा गुलाबचंद रात के ठीक 10:00 बजे अपने ससुराल के दरवाज़े पर जा पहुँचा।

पूरा गाँव सो चुका था। सन्नाटा इतना गहरा था कि सूखे पत्तों के खड़कने की आवाज़ भी साफ सुनाई देती थी। रेशमा का घर एक साधारण सा एक-कमरे का मकान था। उसके सास-ससुर घर के बाहर बने छप्पर के नीचे सो रहे थे। गुलाबचंद ने बड़ी सावधानी से दबे पाँव जाकर उस कमरे का दरवाज़ा खटखटाया।

भीतर से दरवाज़ा खुला और सामने रेशमा खड़ी थी। रात के इस पहर अपने पति को यूँ सामने खड़ा देख रेशमा आश्चर्यचकित रह गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

उसने अचरज से पूछा, “आप… इस समय? कहाँ से आ रहे हैं इतनी रात को?”

गुलाबचंद ने गहरी साँस लेते हुए मुस्कराकर कहा, “बस यह मत पूछो कि मैं कहाँ से और कैसे आ रहा हूँ। जहाँ से भी आ रहा हूँ, सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिए आया हूँ।”

रेशमा का हृदय भी इस निष्छल प्रेम को देखकर भर आया। भले ही वह संकोच में थी, परंतु भीतर ही भीतर वह भी गुलाबचंद की याद में व्याकुल थी। उसने तुरंत गुलाबचंद को कमरे के भीतर बैठाया, उसके पैर धुलवाए और पीने के लिए ठंडा पानी दिया।

उस रात दोनों ने एक-दूसरे के प्रति अपने समर्पण को व्यक्त किया और अपने दांपत्य जीवन के पवित्र दायित्वों का निर्वहन किया। सुबह होने तक दोनों के चेहरे पर एक तृप्ति और विश्राम था।

अध्याय 3: सवेरे का क्लेश और पड़ोसियों के ज़हरीले बोल

सुबह की पहली किरण के साथ ही जब सूरज की रोशनी बिखरी, तो सास-ससुर की नज़र बाहर खड़ी अनजान साइकिल पर पड़ी। उन्होंने उत्सुकता और अचरज से पूछा, “यह साइकिल किसकी खड़ी है बाहर?”

तभी रेशमा ने संकोच के साथ बाहर आकर बताया, “ये आपके दामाद जी रात को आए थे। बहुत थक गए थे, इसलिए अभी अंदर सो रहे हैं।”

माता-पिता के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने सोचा कि चलो, दामाद जी का अपनी पत्नी के प्रति इतना अटूट प्रेम है कि इतनी दूर रात में चले आए। बात सहज ही शांत हो गई।

धीरे-धीरे यह खबर आस-पड़ोस में भी फैल गई कि गुलाबचंद रात में ही अपनी साइकिल से अपनी पत्नी से मिलने आया है। परंतु, रेशमा के पड़ोस में रहने वाले कुछ लोग अत्यंत ईर्ष्यालु और कुटिल प्रवृत्ति के थे। उनके परिवार के साथ रेशमा के परिवार का किसी पुरानी बात को लेकर विवाद चला आ रहा था।

गुलाबचंद अभी थकावट के कारण कमरे में सो ही रहा था कि अचानक बाहर तेज़-तेज़ चिल्लाने और विवाद करने की आवाज़ें उसके कानों में पड़ने लगीं।

वह पड़ोसी दबंग स्वभाव के थे। वे रेशमा के सीधे-साधे सास-ससुर को घेरकर अत्यंत /अशोभनीय शब्द/ कह रहे थे। उनकी भाषा में ज़हर घुला हुआ था। वे केवल माता-पिता को ही नहीं, बल्कि रेशमा के चरित्र पर भी तरह-तरह की /मर्यादाहीन टिप्पणियाँ/ कर रहे थे।

एक पड़ोसी ने चिल्लाकर कहा, “अरे बाहर बुलाओ उस शहज़ादे को जो अंदर सो रहा है! आज हम उसकी भी आँखें खोल देते हैं। इस लड़की की सारी पोल-पट्टी उसके सामने खोलकर रख देंगे। यह कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं रहेगी और वह इसे आज ही छोड़कर चला जाएगा!”

कमरे के अंदर से यह सब सुनकर रेशमा का कलेजा काँप उठा। वह भागकर गई और उसने कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया ताकि बातें गुलाबचंद के कानों तक न पहुँचें। वह रोते-रोते उस कड़वे सत्य और विवाद को दबाने का प्रयास करने लगी।

परंतु गुलाबचंद की नींद खुल चुकी थी और बाहर से आ रही एक-एक ज़हरीली आवाज़ उसके कानों में शीशे की तरह पिघलकर उतर रही थी।

अध्याय 4: अतीत का वह काला सच

गुलाबचंद ने उठकर रेशमा का हाथ पकड़ा और उससे पूछा, “रेशमा, यह बाहर कौन लोग हैं? और यह सब क्या बकवास कर रहे हैं?”

रेशमा फूट-फूटकर रोने लगी। उसने काँपते हाथों से दरवाज़े की कुंडी थाम रखी थी। उसने कहा, “आप इनकी बातों पर ध्यान मत दीजिए। ये बहुत दुष्ट और खतरनाक लोग हैं। इन्होंने हमारा जीना हराम कर रखा है। आए दिन हमें कमज़ोर समझकर हमारे साथ /शारीरिक संघर्ष/ और गाली-गलौज करते हैं।”

लेकिन बाहर का माहौल और अधिक बिगड़ने लगा। वे दबंग लोग अब दरवाज़े तक चढ़ आए थे। गुलाबचंद के ससुर ने जब उन्हें रोकने का प्रयास किया, तो एक हट्टे-कट्टे युवक ने बूढ़े ससुर को उठाकर ज़मीन पर पटक दिया।

यह देखते ही गुलाबचंद से सहन नहीं हुआ। उसका खून खौल उठा। वह तुरंत दरवाज़ा खोलकर बाहर निकला और जो युवक उसके ससुर पर /अनाचार/ कर रहा था, उस पर सीधे टूट पड़ा।

गुलाबचंद ने उस युवक को धक्का देकर ससुर से अलग किया और गर्जते हुए कहा, “तेरी हिम्मत कैसे हुई बूढ़े आदमी पर हाथ उठाने की? तू क्या बकवास कर रहा था बाहर खड़ा होकर?”

वह युवक कुटिलता से हँसा। उसका नाम मंटू था। मंटू ने अपनी कमीज़ झाड़ते हुए बड़े अहंकार से कहा, “तुझे बड़ा ताव आ रहा है? तू तो बोलने लायक ही नहीं है! ज़रा अपनी इस सीधी-साधी बीवी से पूछ कि शादी से पहले मैंने इसके साथ क्या-क्या किया है! अगर तू सच जान जाएगा, तो इसे यहीं छोड़कर उल्टे पाँव यहाँ से भाग जाएगा।”

यह सुनते ही गुलाबचंद का आपा खो गया। उसने आगे बढ़कर मंटू का कॉलर दबोच लिया और दहाड़ा, “बता! क्या बकवास कर रहा है तू? सच-सच बता!”

मंटू के चेहरे पर एक नफ़रत भरी मुस्कान थी। उसने कहा, “वही, जो तू इसके साथ करता है! तेरे से पहले मैं इसके साथ यह सब कर चुका हूँ।”

गुलाबचंद ने बिना कुछ सोचे-समझे मंटू के मुँह पर मुक्का जड़ दिया। दोनों के बीच ज़बरदस्त हाथापाई होने लगी। तभी मंटू के पक्ष से कई अन्य लोग दौड़ते हुए आ पहुँचे और गुलाबचंद को घेर लिया।

इसी बीच मंटू का बाप, जिसका नाम दत्तू था, वह भी वहाँ आ पहुँचा। दत्तू ने आगे बढ़कर बड़े घमंड में गुलाबचंद की ओर उंगली उठाकर कहा, “हाँ-हाँ, सही कह रहा है मेरा बेटा! जब तेरी इससे शादी नहीं हुई थी, तब जो भी कुछ हुआ सो हुआ। लेकिन याद रख, अगर तूने ज़्यादा होशियारी दिखाई, तो अब जो भी करेंगे, तेरे सामने करेंगे और तू कुछ नहीं उखाड़ पाएगा!”

आस-पास के कुछ बुजुर्गों के बीच-बचाव करने के बाद किसी तरह वह झगड़ा शांत हुआ। वे लोग गाली-गलौज करते हुए अपने घर चले गए।

झगड़ा तो शांत हो गया, लेकिन गुलाबचंद के दिल और दिमाग में एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। उसके कानों में केवल दत्तू और मंटू के वे ज़हरीले वाक्य गूँज रहे थे। वह सुन्न होकर वहीं बैठ गया।

उसने रेशमा को पास बुलाया और उसकी आँखों में आँखें डालकर पूछा, “रेशमा, मुझे सच-सच बताओ। यह सब क्या है? वे लोग क्या कह रहे थे?”

रेशमा ज़मीन पर बैठकर रोने लगी। उसने कहा, “आप इन दुष्टों की बातों का यकीन मत कीजिए, लोग तो कुछ भी उल्टा-सीधा बोलते रहते हैं…”

लेकिन गुलाबचंद ने कहा, “मुझे आज सच जानना है।”

जब रेशमा कुछ न बोल सकी, तो उसके वृद्ध माता-पिता ने आगे आकर काँपते स्वर में सारा सत्य उगल दिया।

ससुर ने बिलखते हुए बताया कि दरअसल, गाँव के मुहाने पर उनकी एक कीमती ज़मीन का टुकड़ा था। मंटू और उसका पिता दत्तू उस ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा करना चाहते थे। चूँकि रेशमा का परिवार गरीब और कमज़ोर था, इसलिए वे आए दिन इन्हें डराते-धमकाते थे।

एक दिन जब रेशमा घर में अकेली थी और उसके माता-पिता खेत पर गए हुए थे, तो मंटू चुपके से घर में घुस आया। उसने रेशमा की लाचारी का फायदा उठाते हुए उसके साथ जबरन /मर्यादा का उल्लंघन/ और अत्यंत /अधर्म/ का कृत्य किया।

जब माता-पिता वापस आए, तो रेशमा रोती-बिलखती हालत में मिली। उसने सब कुछ अपने माता-पिता को बताया। बदहवास पिता थाने गए, गिड़गिड़ाए, लेकिन पुलिस प्रशासन ने दबंगों के दबाव में आकर कोई सुनवाई नहीं की।

धीरे-धीरे यह बात गाँव के कुछ दुष्ट लोगों तक फैल गई। अपनी बेटी की साख और सम्मान को बचाने के लिए, रेशमा के माता-पिता ने आनन-फानन में बिना किसी को कुछ बताए उसकी शादी गुलाबचंद से कर दी थी।

आज जब यह सारा काला सच गुलाबचंद के सामने आ गया, तो रेशमा ग्लानि और लज्जा से पानी-पानी हो गई। वह गुलाबचंद से आँखें नहीं मिला पा रही थी।

वह फूट-फूटकर रोते हुए बोली, “काश! मैं उसी दिन मर गई होती… तो आज आपको यह सब न सुनना पड़ता।”

अध्याय 5: आधी रात का प्रतिशोध और कानूनी हथकड़ी

शाम ढल चुकी थी। पूरे वातावरण में एक भारी और दर्दनाक सन्नाटा छाया हुआ था। गुलाबचंद ने उस रात न कुछ खाया, न पिया। वह गुमसुम एक कोने में बैठा रहा। उसके भीतर अपमान, क्रोध और प्रतिशोध की एक ऐसी ज्वाला धधक रही थी जो उसे अंदर ही अंदर जला रही थी।

उसके कानों में बार-बार दत्तू के वे शब्द गूँज रहे थे—“अब तो जो करेंगे तेरे सामने करेंगे, तू क्या कर लेगा?”

रात के लगभग दो बज रहे थे। चारों तरफ गहरा अँधेरा था। पूरा गाँव गहरी नींद में सो रहा था।

गुलाबचंद धीरे से उठा। उसने देखा कि रेशमा और उसके माता-पिता थकावट और दुख के मारे सो चुके हैं। उसने कोने में रखी अपने ससुर की तेज़ धार वाली कुल्हाड़ी उठाई। उसकी आँखों में अब कोई डर नहीं था, केवल प्रतिशोध का अंधियारा था।

वह दबे पाँव बगल वाले मकान में घुसा, जहाँ दत्तू और मंटू सो रहे थे। गुलाबचंद ने बिना कोई अवसर दिए, सीधे कुल्हाड़ी से वार करके उन दोनों की /जीवनलीला समाप्त/ कर दी। एक ही झटके में उसने अपनी पत्नी के अपमान और अपने स्वाभिमान पर लगे दाग का बदला ले लिया।

घटना को अंजाम देने के बाद, वह कुल्हाड़ी वहीं फेंककर रात के अँधेरे में ही गाँव से फरार हो गया।

सुबह होते ही पूरे गाँव में तहलका मच गया। दो-दो लोगों का खून से लथपथ शव देखकर हाहाकार मच गया। पुलिस तुरंत हरकत में आई। मामला अत्यंत गंभीर था। पुलिस ने घेराबंदी की और कुछ ही घंटों के भीतर गुलाबचंद को आंवलिया के जंगलों के पास से हिरासत में ले लिया।

थाने लाकर जब पुलिस ने उससे कड़ाई से पूछताछ की, तो सीधे-साधे गुलाबचंद ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपना अपराध स्वीकार कर लिया। उसने साफ़ कहा:

“हाँ, मैंने ही उन दोनों का /प्राण हरण/ किया है। मुझे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है।”

पुलिस अधिकारी ने पूछा, “तूने मंटू को मारा समझ आता है, लेकिन उसके बूढ़े बाप को क्यों मारा?”

गुलाबचंद ने अपनी आँखें तरेरते हुए कहा, “क्योंकि उसका बाप कह रहा था कि ‘अब जो करेंगे तेरे सामने करेंगे, तू कुछ नहीं कर पाएगा।’ वह अपने अपराधी बेटे को सुधारने के बजाय उसका समर्थन कर रहा था और मेरी आँखों के सामने मेरी मर्यादा को ललकार रहा था। इसलिए मैंने उसे भी नहीं छोड़ा।”

जब यह मामला मीडिया और उच्च अधिकारियों तक पहुँचा, तो इस बात का भी खुलासा हुआ कि कुछ समय पूर्व रेशमा और उसके परिवार ने मंटू के खिलाफ थाने में शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन तत्कालीन पुलिस अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की थी।

शासन ने कड़ा रुख अपनाते हुए लापरवाही बरतने वाले तीन-चार पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड (निलंबित) कर दिया। परंतु जो होना था, वह तो हो चुका था।

अध्याय 6: 20 साल का कारावास और नैनी सेंट्रल जेल की दीवारें

मामला अदालत में चला। लोअर कोर्ट (निचली अदालत) ने साक्ष्यों और गुलाबचंद के बयान के आधार पर उसे हत्या का दोषी पाया और 20 साल के कठोर कारावास की सजा सुना दी।

गुलाबचंद के परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वे बड़े वकील कर सकें। फिर भी किसी तरह हाईकोर्ट में अपील दायर की गई, लेकिन हाईकोर्ट ने भी अपराध की गंभीरता को देखते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

इसके पश्चात, गुलाबचंद को इलाहाबाद (जो अब प्रयागराज के नाम से जाना जाता है) की विख्यात ‘नैनी सेंट्रल जेल’ में स्थानांतरित कर दिया गया। 19 साल का वह नवयुवक, जिसकी अभी-अभी शादी हुई थी, अब 20 सालों के लिए जेल की ऊँची और ठंडी सलाखों के पीछे कैद हो चुका था।

दूसरी ओर, गाँव में रेशमा और उसके परिवार का जीना दूभर हो गया था। दो-दो मौतों के बाद गाँव में माहौल अत्यंत तनावपूर्ण था। विरोधी पक्ष से जान का खतरा लगातार बना हुआ था। रेशमा अब किसी के सामने मुँह दिखाने लायक नहीं समझी जा रही थी। समाज के ताने और धमकियाँ असहनीय हो चुकी थीं।

परिणामस्वरूप, रेशमा के माता-पिता अपना घर-बार छोड़कर रेशमा को लेकर उसके मामा के गाँव चले गए। कुछ महीनों बाद, उन्होंने गाँव वाली अपनी थोड़ी-बहुत ज़मीन को औने-पौने दामों में बेच दिया ताकि वकील का खर्चा और जीवन यापन हो सके।

समय बीतता गया। चार महीने, छह महीने, फिर एक साल बीत गया।

रेशमा के रिश्तेदारों और मामा ने उसके माता-पिता पर दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा, “गुलाबचंद तो अब 20 साल से पहले जेल से बाहर आने वाला नहीं है। रेशमा की उम्र अभी ही क्या है? मात्र 15 दिनों का तो रिश्ता था उनका। इतनी सी बात के लिए यह लड़की अपनी पूरी ज़िंदगी क्यों बर्बाद करे? इसकी दूसरी शादी करवा दो।”

रेशमा ने साफ इंकार कर दिया। वह रोती और कहती, “जिस इंसान ने मेरी आबरू और मेरे परिवार के सम्मान के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी दाँव पर लगा दी, जो मेरी वजह से जेल की सलाखों के पीछे सड़ रहा है, मैं उसे धोखा देकर दूसरी शादी कर लूँ? यह मुझसे जीते-जी नहीं होगा।”

लेकिन घर वालों का अत्याचार और दबाव बढ़ता ही गया। वे उसके साथ /मानसिक व शारीरिक कष्ट/ देने वाली हरकतें करने लगे। उसे मारा-पीटा जाने लगा।

तंग आकर रेशमा ने एक दिन रोते हुए कहा, “ठीक है, जैसा आप लोग कहते हैं मैं करूँगी। लेकिन मेरी एक शर्त है—मुझे केवल एक बार मेरे पति से मिलवा दो। मैं उनसे मिलकर खुद बात करना चाहती हूँ।”

अध्याय 7: नैनी जेल में अंतिम मुलाकात और वकील की कुदृष्टि

परिवार ने उनके केस की पैरवी कर रहे वकील साहब से बात की। चूँकि रेशमा के माता-पिता अनपढ़ थे और उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं का ज्ञान नहीं था, इसलिए वकील साहब ने कहा कि वे खुद रेशमा को अपने साथ इलाहाबाद नैनी जेल ले जाएँगे।

रेशमा को लेकर वकील साहब नैनी सेंट्रल जेल पहुँचे। पर्ची कटवाई गई।

जब जेल के अंदर सलाखों के पीछे बंद गुलाबचंद को सूचना मिली कि उससे मिलने उसकी पत्नी रेशमा आई है, तो उसकी आँखों में आँसू छलक आए।

जब दोनों एक-दूसरे के सामने आए, तो बीच में लगी लोहे की जाली के आर-पार दोनों फूट-फूटकर रो पड़े।

रेशमा ने रोते हुए कहा, “आपने मेरी वजह से अपना जीवन क्यों तबाह कर लिया? आज आप मेरी वजह से यहाँ बंद हैं। और वहाँ मेरे घर वाले मुझ पर दूसरी शादी करने का दबाव बना रहे हैं। मुझे रोज़ मारा-पीटा जाता है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं अपनी जान दे दूँगी।”

गुलाबचंद ने जाली के बीच से अपने हाथ आगे बढाए और बेहद कातर स्वर में कहा, “रेशमा! मेरी बात सुनो। भले ही तुम अपने परिवार के दबाव में आकर कहीं भी शादी कर लो, लेकिन अपनी जान देने की बात कभी मत सोचना। मैं जेल में सिर्फ इस उम्मीद पर ज़िंदा रहूँगा कि 20 साल बाद जब बाहर आऊँगा, तो तुम्हें एक बार देख सकूँगा। अगर तुम ही नहीं रहोगी, तो मैं किसके लिए बाहर आऊँगा?”

मुलाकात की समय-सीमा समाप्त हुई। भारी मन से दोनों एक-दूसरे से विदा हुए।

लेकिन दुर्दशा का अंत अभी नहीं हुआ था। जब रेशमा वकील साहब के साथ ट्रेन से वापस लौट रही थी, तो उस वकील की नीयत में खोट आ गया। उसने रेशमा की बेबसी का फ़ायदा उठाने की सोची।

वकील ने रेशमा से कहा, “देखो रेशमा, तुम्हारा पति तो अब 20 साल तक बाहर आने से रहा। तुम्हारी ज़िंदगी भी अकेली है। मैं तुम्हारा सारा कानूनी खर्चा उठाऊँगा और तुम्हें पैसे भी दूँगा। बदले में तुम्हें मेरी शर्तें माननी होंगी… तुम समझ रही हो न मैं क्या कह रहा हूँ?”

रेशमा वकील की /अनैतिक मंशा/ को तुरंत ताड़ गई। उसने दृढ़ता से कहा, “वकील साहब! अपनी ज़बान संभालिए। मैं मेहनत-मज़दूरी करके पेट पाल लूँगी, भीख माँग लूँगी, लेकिन कभी ऐसा अधर्म नहीं करूँगी।”

वकील चिढ़ गया और धमकाते हुए बोला, “तुम मानोगी नहीं तो अंजाम बुरा होगा। मेरे हाथ में केस है, मैं चाहूँ तो तुम्हारे पति की सजा 20 साल से बढ़ाकर 40 साल करवा सकता हूँ। सोच लो!”

रेशमा अंदर तक टूट गई। एक तरफ समाज का अत्याचार, दूसरी तरफ घर वालों का दबाव और अब रक्षक बना वकील ही भक्षक बन रहा था। वह अपने मामा के घर लौटी, लेकिन उसका मन पूरी तरह विरक्त हो चुका था। अब न वह पति से मिल सकती थी, न ही शांति से जी सकती थी।

एक दिन आधी रात को, रेशमा बिना किसी को बताए, चुपचाप घर छोड़कर कहीं अनजानी दिशा में निकल गई।

अध्याय 8: बहन का अटूक स्नेह और समय का चक्र

इधर नैनी सेंट्रल जेल में बंद गुलाबचंद की दुनिया पूरी तरह से वीरान हो चुकी थी। उससे मिलने अब कोई नहीं आता था। न उसके भाई, न रिश्तेदार।

केवल उसकी एक बड़ी बहन थी, जिसका नाम शारदा था। शारदा शादीशुदा थी और अपने ससुराल में रहती थी। शारदा का अपने भाई के प्रति प्रेम अटूट था।

हालाँकि शारदा का पति (गुलाबचंद का जीजा) उसे जेल जाने से रोकता था। वह ताने मारते हुए कहता, “तेरा भाई हत्यारा है! तू उससे मिलने जाएगी तो समाज में हमारी थू-थू होगी। तू भी उससे वही सब सीखकर आएगी।”

परंतु शारदा अपने पति के तानों और तिरस्कार को सहकर भी, साल-दो साल में किसी तरह पैसे बचाकर इलाहाबाद अपने भाई से मिलने नैनी जेल ज़रूर जाती थी। वह उसके लिए सूखी मिठाई और कपड़े ले जाती। वही एक एकमात्र तिनका थी जो गुलाबचंद को बाहरी दुनिया से जोड़े हुए थी।

समय अपनी गति से सरकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीतते चले गए। 2003 से 2004, 2010, 2015 और देखते ही देखते वर्ष 2024 आ पहुँचा।

पूरे 20 साल बीत चुके थे!

वह 19 साल का युवा गुलाबचंद अब 39-40 वर्ष का एक प्रौढ़ व्यक्ति बन चुका था। उसके बालों में सफेदी आ चुकी थी, चेहरे पर झुर्रियाँ और आँखों में दो दशकों का गहरा सन्नाटा उतर आया था।

अध्याय 9: रिहाई की वह रात और बदला हुआ ज़माना

वर्ष 2024 का वह दिन आ ही गया, जब गुलाबचंद की सजा पूरी हुई और उसकी रिहाई का आदेश जारी हुआ।

गाँव में किसी को नहीं पता था कि वह किस दिन छूट रहा है। भाइयों ने तो मान लिया था कि वह उनके लिए मर चुका है। केवल उसकी बहन शारदा को कानूनी कागज़ात के माध्यम से पता था कि आज उसके भाई की रिहाई होने वाली है।

शाम ढलने को थी, जब नैनी सेंट्रल जेल का भारी लोहे का फाटक खुला। गुलाबचंद अपने हाथ में एक छोटा सा झोला लिए बाहर निकला।

सामने गेट पर उसकी बहन शारदा खड़ी इंतज़ार कर रही थी। 20 साल बाद अपने भाई को आज़ाद पंछी की तरह बाहर आते देख शारदा की आँखों से अश्रुधार बह निकली। दोनों भाई-बहन एक-दूसरे के गले लगकर बिलख-बिलखकर रोने लगे।

शारदा अपने साथ अपने भाई के लिए एक नया कीपैड मोबाइल फ़ोन खरीदकर लाई थी।

जमाना 20 सालों में पूरी तरह बदल चुका था। सड़कें, गाड़ियाँ, लोगों के रहन-सहन का तरीका—सब कुछ बदल गया था।

गुलाबचंद ने भरे गले से पूछा, “बहन, अब मैं कहाँ जाऊँगा? माँ-बाप अब रहे नहीं। भाइयों ने कभी जेल में मेरी शक्ल तक नहीं देखी। मेरा अब इस दुनिया में कौन है?”

शारदा ने रोते हुए उसके हाथ थामे और कहा, “भैया! पूरी दुनिया तुझे छोड़ दे, लेकिन तेरी यह बहन तुझे कभी नहीं छोड़ेगी। तू मेरे साथ मेरे घर चल।”

गुलाबचंद ने झिझकते हुए पूछा, “और रेशमा? रेशमा कहाँ है बहन? क्या तूने कभी उसकी कोई खबर ली?”

शारदा ने उदास होकर सिर झुका लिया और बोली, “भैया, दो-चार साल पहले जब मुझे उसके घर वाले मिले थे, तो उन्होंने बताया था कि रेशमा किसी के साथ भाग गई या कहीं चली गई। उसका कुछ पता नहीं चला। उन्होंने उसके बारे में बात करना भी बंद कर दिया था। अब वहाँ कुछ नहीं बचा है भैया, तू मेरे घर चल।”

गुलाबचंद ने कहा, “लेकिन जीजा जी? वे मुझे स्वीकार करेंगे? मैं तेरे घर जाकर तेरा गृहस्थ जीवन खराब नहीं करना चाहता।”

शारदा ने दृढ़ता से कहा, “अगर वे तुझे घर से निकालेंगे, तो मैं भी तेरे साथ घर छोड़ दूँगी। लेकिन आज तू मेरे ही घर चलेगा।”

शारदा उसे अपने घर ले आई। परंतु वही हुआ जिसका डर था।

शारदा का पति गुलाबचंद को देखकर आग-बबूला हो गया। उसके बच्चे अब बड़े और जवान हो चुके थे। जीजा ने घर में क्लेश शुरू कर दिया और चिल्लाकर कहा, “इस हत्यारे को यहाँ क्यों ले आई? यह मेरे बच्चों को बिगाड़ देगा! कल को यहाँ भी किसी का खून कर देगा तो हम सब जेल जाएँगे!”

गुलाबचंद से यह सब सहन नहीं हुआ। वह समझ गया कि उसके यहाँ रहने से उसकी बहन का बसा-बसाया घर उजड़ जाएगा।

अगली ही सुबह उसने अपनी बहन से कहा, “बहन, मुझे जाने दे। मैं जहाँ भी रहूँगा, तुझे इस फ़ोन से संपर्क करता रहूँगा। तूने मेरे लिए बहुत दुख सहे हैं, अब मैं तेरी ज़िंदगी और खराब नहीं करूँगा।”

बहन की आँखों में आँसू थे, लेकिन लाचारी के आगे वह भी मौन रह गई।

अध्याय 10: रेशमा की तलाश और मंदिर का वह वृद्ध संत

बहन का घर छोड़ने के बाद, 20 साल बाद रिहा हुआ गुलाबचंद सीधे रेशमा के माता-पिता के गाँव पहुँचा।

उसके मन में एक ही धुन सवार थी—”मुझे अपनी रेशमा को ढूँढना है।”

जब वह रेशमा के माता-पिता के सामने पहुँचा, तो वे उसे देखकर स्तब्ध रह गए।

गुलाबचंद ने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, “मुझे बस इतना बता दीजिए कि मेरी पत्नी रेशमा कहाँ है? मैं सिर्फ एक बार दूर से उसे देखना चाहता हूँ। वह किस हाल में है?”

रेशमा के माता-पिता ने रोते हुए कहा, “गुलाबचंद बेटा! भगवान की कसम, हमें नहीं पता कि रेशमा कहाँ है। तुम्हारे जेल जाने के बाद वह एक दिन अचानक घर छोड़कर कहीं चली गई। हमने बहुत ढूँढा, लेकिन उसका कोई सुराग नहीं मिला।”

आस-पास के पुराने पड़ोसियों ने भी आकर गुलाबचंद को बताया, “हाँ बेटा, ये लोग झूठ नहीं बोल रहे हैं। तुम्हारे जाने के बाद रेशमा बहुत रोती थी। गाँव के बाहर जो पुराना मंदिर है, वह अक्सर वहाँ जाकर घंटों बैठी रहती थी। फिर एक दिन वह अचानक गायब हो गई।”

गुलाबचंद तुरंत गाँव के बाहर बने उस पुराने मंदिर की ओर भागा।

मंदिर के प्रांगण में एक अत्यंत वृद्ध महात्मा जी बैठे हुए थे। उनकी दाढ़ी सफेद हो चुकी थी और चेहरे पर गहरी ज्ञान की रेखाएँ थीं।

गुलाबचंद ने जाकर महात्मा जी के चरण स्पर्श किए और रोते हुए अपनी पूरी व्यथा कह सुनाई कि वह 20 साल जेल काटकर आया है और अपनी पत्नी को ढूँढ रहा है।

वृद्ध महात्मा जी ने अपनी आँखें खोलीं और ध्यान से गुलाबचंद का चेहरा देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई।

उन्होंने कहा, “अरे बेटा! आ जाओ… शायद मैं आज तक ज़िंदा ही इसीलिए था ताकि तुम्हें यह बात बता सकूं। ईश्वर की लीला भी अपरंपार है!”

गुलाबचंद ने उत्सुकता से पूछा, “बाबा! क्या आप रेशमा के बारे में कुछ जानते हैं?”

महात्मा जी ने बताया, “हाँ बेटा! आज से लगभग 18-19 साल पहले, यहाँ अयोध्या से एक महिला संत आया करती थीं। वे बहुत पहुँची हुई साध्वी थीं। वह कन्या (रेशमा) अत्यंत दुखी थी और अपनी जीवन लीला समाप्त करना चाहती थी। वह यहाँ आकर उन महिला संत के सामने अपना दुखड़ा रोती थी। उन महिला संत ने उसे समझाया कि ‘बेटी, आत्महत्या पाप है, जीवन अनमोल है।’ फिर वह महिला संत उस कन्या को अपने साथ हमेशा के लिए अयोध्या ले गईं।”

महात्मा जी ने आगे कहा, “मैंने यह बात आज तक किसी को नहीं बताई थी क्योंकि उन माता जी ने मना किया था। लेकिन अब वे दोनों ज़िंदा हैं या नहीं, यह मुझे नहीं पता। उन्हें गए हुए 18-19 साल हो चुके हैं। उसके बाद वे महिला संत फिर कभी इस मंदिर में नहीं आईं।”

गुलाबचंद ने काँपते हुए कहा, “बाबा! मुझे उस जगह का पता बता दीजिए! मैं अयोध्या जाऊँगा।”

महात्मा जी ने कहा, “बेटा, मुझे कोई लिखित पता तो याद नहीं है, लेकिन मैं उस आश्रम में एक बार गया हूँ। अयोध्या में सरयू तट के पास बहुत सारे मंदिर और आश्रम हैं।”

गुलाबचंद ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, “बाबा! मुझ अभागे पर दया कीजिए। आप एक बार मेरे साथ अयोध्या चल चलिए।”

वृद्ध साधु का हृदय पिघल गया। वे तैयार हो गए।

अध्याय 11: अयोध्या धाम की पावन धरा और वह कुटिया

गुलाबचंद उस वृद्ध साधु को साथ लेकर बारबंकी से लगभग 100 किलोमीटर दूर प्रभु श्री राम की नगरी अयोध्या आ पहुँचा।

अयोध्या की पावन माटी में प्रवेश करते ही वातावरण में राम नाम की ध्वनि गूँज रही थी। चारों ओर मंदिर, आश्रम और सरयू नदी का तट था। लेकिन इतने बड़े धार्मिक नगर में एक गुमशुदा स्त्री को ढूँढना राई के दाने को समुद्र में ढूँढने जैसा था।

महात्मा जी की स्मृति के सहारे, वे दोनों एक आश्रम से दूसरे आश्रम भटकने लगे। सुबह से दोपहर हो गई। गुलाबचंद का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

चलते-चलते वे सरयू तट के समीप स्थित एक शांत आश्रम के प्रांगण में पहुँचे। वहाँ कई साधु-संत और महिला-पुरुष भगवा वस्त्र धारण किए अपने-अपने कार्यों में लीन थे।

आश्रम के एक कोने में मिट्टी का चूल्हा जल रहा था। वहाँ एक मध्यम आयु की महिला, जो सिर पर भगवा गमछा बाँधे और साध्वी के सादे वस्त्र पहने हुए थी, आश्रम के संतों के लिए बड़े से पतीले में चाय बना रही थी।

वृद्ध महात्मा जी ने उस ओर इशारा किया।

गुलाबचंद दबे पाँव, काँपते हुए कदमों से उस चूल्हे के पास पहुँचा और उस महिला के ठीक सामने जाकर खड़ा हो गया।

जैसे ही उस महिला ने चाय का पोना हटाकर ऊपर देखा, उसकी नज़र सीधे गुलाबचंद पर पड़ी।

समय जैसे वहीं ठहर गया। 20 सालों की दूरी, चेहरे की झुर्रियाँ और ढलती उम्र भी उन दो प्रेमियों की पहचान को मिटा नहीं सकी थी।

वह महिला कोई और नहीं, बल्कि रेशमा ही थी!

अध्याय 12: सरयू तट पर पुनर्मिलन और नया सवेरा

रेशमा के हाथ से चाय की केतली छूटते-छूटते बची। उसने फटी आँखों से गुलाबचंद को देखा और फिर दहाड़े मार-मारकर रोने लगी।

वह दौड़कर आई और सीधे गुलाबचंद के पैरों में गिर पड़ी। उसने गुलाबचंद के चरणों को अपने आँसुओं से भिगो दिया।

रेशमा बिलखते हुए बोली, “हे मेरे प्रभु! आप आ गए! मुझे पूरा विश्वास था कि मेरे राम जी एक न एक दिन आपको मेरे पास ज़रूर भेजेंगे!”

गुलाबचंद की आँखों से भी अश्रुओं की धारा बह निकली। उसने रेशमा को बाहों से पकड़कर उठाया। रेशमा पूरी तरह से एक साध्वी का जीवन जी रही थी। उसने अपना समस्त जीवन प्रभु भक्ति और आश्रम की सेवा में समर्पित कर दिया था।

गुलाबचंद ने रुँधे हुए गले से पूछा, “रेशमा! तुम मुझे छोड़कर यहाँ क्यों चली आईं? क्या तुम एक बार भी मुझसे मिलने जेल नहीं आ सकती थीं? क्या मैं इतना बुरा था?”

रेशमा ने रोते हुए अपने हाथ जोड़े और उस दिन की पूरी दास्तान कह सुनाई। उसने बताया कि कैसे जेल से लौटते समय उस नीच वकील ने उसके साथ /अनैतिक माँग/ रखी थी, कैसे उसके घर वाले और समाज के लोग उसकी आबरू पर /कुदृष्टि/ डालते थे।

रेशमा ने बताया, “मैं कहाँ जाती? मैं जहाँ भी कदम रखती, लोग मुझे वासना की नज़र से देखते थे। हर कोई मेरी लाचारी का फायदा उठाना चाहता था। तब उन पूजनीय माता जी ने (जो महिला संत थीं) मुझे सहारा दिया। वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, उनका देहांत हो चुका है। मैं उन माता जी का उपकार कभी नहीं भूल सकती, जिन्होंने मुझे आत्महत्या करने से बचाया और मुझे एक नया जीवन दिया। तब से मैं यहीं रहकर आपका इंतज़ार कर रही थी।”

दोनों का यह दर्दनाक और निष्छल पुनर्मिलन देखकर वहाँ मौजूद सभी संतों और वृद्ध महात्मा जी की आँखें नम हो गईं।

अध्याय 13: उपसंहार (वर्तमान समय – 2026)

यह घटना फरवरी 2024 की है, जब दोनों का पुनर्मिलन हुआ था।

आज जब यह कहानी दर्ज की जा रही है, तो मार्च 2026 का समय चल रहा है।

इन बीते ढाई सालों में, गुलाबचंद और रेशमा ने अब अयोध्या धाम में ही अपनी एक छोटी सी दुनिया बसा ली है। वे दोनों किसी पर बोझ नहीं हैं। वे अयोध्या के एक मंदिर के बाहर पूजा की सामग्री और प्रसाद बेचने की एक छोटी सी दुकान चलाते हैं।

जो जीवन उनके जवानी के दिनों में बिखर गया था, अब ढलती उम्र में वे दोनों एक-दूसरे का सहारा बनकर अत्यंत शांति और भक्तिभाव के साथ व्यतीत कर रहे हैं।

कानून और समाज के दृष्टिकोण से देखें तो जिस अपराध के लिए लोअर कोर्ट ने गुलाबचंद को 20 वर्ष की सजा सुनाई थी, वह कानून के पन्नों पर भले ही उचित हो, परंतु एक आम इंसान के दृष्टिकोण से विचार करें तो एक नवयुवक ने अपनी पत्नी के स्वाभिमान और सम्मान की रक्षा के लिए आवेश में आकर कदम उठाया था। यदि न्याय प्रणाली उसकी परिस्थितियों को देखते हुए उसकी सजा 10 वर्ष कर देती, तो शायद उनकी ज़िंदगी के कई मूल्यवान वर्ष बच जाते।

परंतु कानून अपने नियमों से चलता है।

आज सबसे बड़ी संतोष की बात यह है कि 20 साल के लंबे और कठिन संघर्ष के बाद, अधर्म और अन्याय की आँधियों को पार करके, गुलाबचंद और रेशमा एक-दूसरे के साथ हैं और प्रभु श्री राम की नगरी में सुखद जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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