पोती ने नाराज़ होकर किया अपराध, पुलिस प्रशासन भी रह गया स्तब्ध। – News

पोती ने नाराज़ होकर किया अपराध, पुलिस प्रशासन भी रह गया स्तब्ध।

पोती ने नाराज़ होकर किया अपराध, पुलिस प्रशासन भी रह गया स्तब्ध।

पोती ने नाराज़ होकर किया अपराध, पुलिस प्रशासन भी रह गया स्तब्ध।

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उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में एक परिवार पर छाया गया अंधेरा: देशराज की भ्रष्टता और उसके परिवार द्वारा बदला

नमस्कार दोस्तों, आज हम एक ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं जो न सिर्फ मेरठ के शिकारपुर गांव की है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के कई गांवों में फैली हुई सामाजिक बीमारी को उजागर करती है। यह कहानी है देशराज नाम के एक धनी और शक्तिशाली व्यक्ति की, जिसका जुल्म इतना भयानक था कि उसके बेटे की मौत के बाद उसकी बहू और पोती ने उसे भी मातम का शिकार बना दिया। यह घटना 10 अक्टूबर 2025 से शुरू हुई और अंत में 13 अक्टूबर 2025 तक पहुंची। आज हम इस पूरी घटना को विस्तार से बताएंगे, ताकि कोई भी इसे भूल न सके।

देशराज शिकारपुर गांव का सबसे धनी और रईस व्यक्ति था। उसके पास 28 एकड़ जमीन थी। गांव के सभी लोग उसकी इज्जत करते थे क्योंकि उसके पास पैसा और पावर दोनों थे। लेकिन देशराज का चरित्र नाड़े का ढीला था। वह गांव की भोलीभाली महिलाओं को खेत में बुलाता और उनके साथ गलत काम करता। कभी-कभी कुछ पैसे देकर मामले को रफादफा कर देता। यह उसका रोजाना का काम था। उसके बेटे सुशील की चार साल पहले कार दुर्घटना में मौत हो गई थी। अब घर में सिर्फ एक बहू कल्पना और एक पोती मनीषा रह गई थी।

कल्पना और मनीषा दोनों संस्कारी और मेहनती थे। मनीषा बारहवीं कक्षा में पढ़ती थी। उसकी इच्छा थी कि वह डॉक्टर बने। देशराज अपने परिवार के साथ शांति से रह रहा था। लेकिन 10 अक्टूबर 2025 की सुबह जैसे ही आती है, सब कुछ बदल जाता है। सुबह करीब आठ बजे मनीषा अपने दादा के पास जाती है और कहती है, “दादा जी, मुझे तीन दिनों के लिए स्कूल टूर पर जाना है। पिछले साल आपने मना कर दिया था, लेकिन इस बार जरूर जाना है।”

देशराज ने पहले तो मना कर दिया था। फिर उसने सोचा कि अगर उसकी पोती स्कूल चली गई, तो घर में कल्पना अकेली रह जाएगी। उसकी नियत खराब हो गई। उसने मनीषा को ₹4000 दिए और कहा, “मनीषा, तुम टूर पर जा सकती हो।” मनीषा खुश हो गई। उसने अपने सामान पैक किया और स्कूल की तरफ चली गई।

देशराज तुरंत अपने दोस्त सूरज भान के पास फोन किया। उसने कहा, “चलो खेत में बैठकर पार्टी करते हैं। पास के ठेके पर जाकर अच्छी शराब और सामान ले आओ।” सूरज भान भी आ गया। दोनों दोस्त खेत में बैठे शराब पीने लगे। जब उन्हें गहरा नशा हो गया तो सूरज भान ने कहा, “यार आज कोई महिला मिलनी चाहिए।” उसी समय खेत में एक किसान की पत्नी भारती आ गई थी। वह चारा काटने आई थी। सूरज भान ने कहा, “देखो, सौभाग्य की बात है।” भारती का चाल-चलन ठीक नहीं था, लेकिन दोनों ने उसे पैसे दिए और खेत के कमरे में ले गए। दोनों गलत काम करते रहे और तब तक जारी रखा जब तक उनकी मनोकामनाएं पूरी नहीं हुईं। फिर उन्होंने कुछ और पैसे दिए और भारती चली गई।

शराब पीते-पीते शाम हो गई। देशराज को याद आया कि उसकी पोती मनीषा घर पर नहीं है और बहू कल्पना अकेली है। उसने सूरज भान से कहा, “अब मुझे गांव में जाना पड़ेगा।” दोनों मोटरसाइकिल लेकर खेत से गांव पहुंचे। सूरज भान अपने घर चला गया और देशराज घर के दरवाजे पर खटखटाया। कल्पना ने दरवाजा खोला। देशराज ने अपनी बहू को लालच दिया कि वह सोने की अंगूठी खरीदने शहर जा रहा है। कल्पना ने मना कर दिया लेकिन देशराज ने दोनों अंगूठियां खरीदकर लाया और कहा, “कल्पना, ये तुम्हारे लिए हैं। अब थोड़ा समय गुजारो।”

कल्पना चौंक गई। उसने मना कर दिया। देशराज ने घर का दरवाजा बंद किया, उसके मुंह पर हाथ रखा और उसे कमरे में घसीटकर ले गया। वहां उसे बांध दिया और गलत काम शुरू कर दिया। कल्पना रो रही थी लेकिन देशराज मानने को तैयार नहीं था। उसकी बुद्धि अचेत हो चुकी थी। जब उसकी इच्छाएं पूरी हुईं तो उसने कल्पना को धमकी दी, “अगर तुमने यह बात अपनी बेटी या किसी को बताया तो मैं तुम्हें घर से बाहर निकाल दूंगा।” कल्पना डर गई।

देशराज ने कल्पना को तीन रात तक यही हालत झेलना पड़ा। तीन दिन गुजर गए। 13 अक्टूबर 2025 की सुबह मनीषा टूर से घर वापस आई। वह देखती है कि दादा घर पर नहीं है। मां कल्पना को परेशान और उदास देखकर पूछती है, “मां, तुम इतनी उदास क्यों हो?” कल्पना ने नाटक किया और कहा, “बेटी, तुम दूर चली गई थीं, इसलिए मैं परेशान हूं।” मनीषा को लगता था कि उसकी मां बस टूर की बात भूल गई। लेकिन यह सबसे बड़ी गलती थी।

दिन गुजरते गए। 17 अक्टूबर 2025 की सुबह देशराज मनीषा को स्कूल नहीं जाने, शहर ले जाने को कहा। मनीषा खुश हो गई। वह अपने दादा की मोटरसाइकिल पर बैठ गई। बीच रास्ते में देशराज ने अजीब हरकतें शुरू कर दीं। मनीषा समझ नहीं पाई। शहर पहुंचकर दोनों ने महंगा स्मार्टफोन खरीदा। फिर खाने का इंतजाम किया। शाम को देशराज ने कहा, “मनीषा, चलो खेतों में चलते हैं।” वह मनीषा को खेत के कमरे में बैठने को कहा और खुद शराब पीने गया।

नशे में देशराज ने मनीषा के मुंह पर हाथ रख दिया। उसे कमरे में बंद कर दिया और गलत काम शुरू कर दिया। मनीषा रो रही थी लेकिन देशराज मानने को तैयार नहीं था। जब काम पूरा हुआ तो वह शराब पीकर लेट गया। मनीषा गांव पहुंचकर मां के पास रोने लगी। पूरी कहानी सुनाकर मनीषा और कल्पना का पागलपन हो गया। दोनों ने हथियार ढूंढे – मनीषा ने कुल्हाड़ी और कल्पना ने धारदार चाकू।

मां-बेटी ने घर का दरवाजा बंद किया और खेत की तरफ चल पड़ती हैं। किसानों से पूछा तो उन्होंने कहा, “हमारे खेत में पेड़ काटने में फायदा है।” दोनों खेत पहुंचीं। देशराज चारपाई पर शराब के नशे में लेटा था। मनीषा ने पलक झपकने का मौका नहीं दिया। उसने कुल्हाड़ी से दादा की गर्दन पर कई बार वार किया और देशराज की गर्दन धड़ से अलग हो गई। कल्पना ने चाकू से 101 बार वार किया। जब मौत हो गई तो मां-बेटी पुलिस स्टेशन पहुंच गईं और खुद को सरेंडर कर दिया।

एसपी ओमकार सिंह ने दोनों की पूरी कहानी सुनकर हैरान रह गए। लेकिन जज साहब को बाद में यह फैसला करना था कि इन दोनों को क्या सजा मिलेगी। यह सच्ची घटना थी लेकिन आज भी सवाल उठता है कि ऐसे घातक परिवार में कौन से कानून सख्त हो सकते हैं। क्या केवल मां-बेटी की सजा काफी है? या देशराज जैसे लोगों को पहले ही रोक लिया जाना चाहिए था?

दोस्तों, यह कहानी हमें सिखाती है कि रिश्तों में लालच और शक्ति का दुरुपयोग कितना भयानक हो सकता है। लेकिन बदले की भावना भी सही नहीं। आइए हम सब मिलकर ऐसे परिवारों की रक्षा करें। जय हिंद।

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Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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