PART 2 19 सितंबर को बूढी महिला के साथ
19 सितंबर (भाग-2): जानकी का संघर्ष, गाँव का घ/मा/सा/न और नया मोड़
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आप सभी लोगों का इस कहानी के दूसरे भाग में। जैसा कि आपने पिछले भाग में देखा कि किस तरह उस जलनखोर बूढ़े ने पूरे गाँव में जानकी की ब/द/ना/मी कर दी थी और रात में घटे उस म/ा/म/ले और क/ा/ं/ड को आग की तरह फैला दिया था।
आज के इस भाग में हम जानेंगे कि इस घटना के बाद जानकी के जीवन में क्या तूफान आया, गाँव के लोगों का क्या रुख रहा और दिलीप व उसके दोस्त के साथ आगे क्या हुआ…
गाँव का बहिष्कार और जानकी का अपमान
सुबह होते ही जब गाँव की औरतें और पुरुष कुएँ और चौपाल पर इकट्ठा हुए, तो हर तरफ केवल जानकी के ही चर्चे थे। जो लोग कल तक जानकी के सीधेपन की तारीफ करते थे, वे भी आज उस पर उँगलियाँ उठा रहे थे।
गाँव के लोगों ने जानकी से पूरी तरह बातचीत बंद कर दी। जब भी जानकी अपनी बकरियों और भेड़ों को लेकर बाहर निकलती, गाँव के नौजवान उस पर छींटाकशी करते और फ/ब्ति/याँ कसते।
जानकी का बाहर निकलना और जीना दूभर हो चुका था। वह अपने घर के दो छोटे कमरों में बंद होकर रात-दिन रोती रहती। उसके मन में रह-रहकर यही विचार आता कि उसने एक पल की व्याकुलता में अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल कर दी। लोक-लाज और ब/द/ना/मी के डर से उसका खाना-पीना छूट गया।
दिलीप और उसके दोस्त की स्थिति
उधर बगल के गाँव में जब यह खबर पहुँची कि जानकी के घर रात में हंगामा हुआ है, तो दिलीप के पैर तले ज़मीन खिसक गई। उसे इस बात का बहुत गहरा पछतावा हो रहा था कि उसकी वजह से जानकी की आ/ब/रू और इ/ज्ज़/त नीलाम हो गई।
दिलीप के पिता को जब इस बात की भनक लगी कि उनका बेटा रात में दोस्त की बाइक लेकर उस गाँव गया था, तो उन्होंने दिलीप को बहुत डांटा। दिलीप के दोस्त के मन में भी खौफ बैठ गया था। वह डर रहा था कि कहीं पुलिस या पंचायत का म/ा/म/ला न बन जाए।
दिलीप ने अपने दोस्त से कहा, “गलती हमारी भी थी, हमने आ/वे/ग और ह/व/स में आकर सब कुछ गँवा दिया। अब हमें जानकी आंटी की मदद करनी चाहिए, वरना वह घुटन में कोई ग/ल/त कदम उठा लेंगी।”
पड़ोसी बूढ़े की घिनौनी चाल और ब्लै/क/मे/लिं/ग
गाँव में माहौल गर्म था, लेकिन उस पड़ोसी बूढ़े की नी/य/त अब भी साफ नहीं हुई थी। जब उसने देखा कि पूरे गाँव ने जानकी को अकेला छोड़ दिया है और वह असहाय हो चुकी है, तो उसने इस स्थिति का फायदा उठाने की सोची।
एक शाम, जब सन्नाटा छा गया, तो वह बूढ़ा चुपके से जानकी के घर के दरवाजे पर पहुँचा और दरवाजा खटखटाया।
जब जानकी ने सहमी हुई आँखों से दरवाजा खोला, तो बूढ़े ने जहरीली मुस्कान के साथ कहा, “क्यों जानकी! अब समझ में आया? तुमने मुझे डांटकर भगाया था और उन लड़कों को घर बुलाकर अ/त/रं/ग क/ा/ं/ड किया। अब पूरा गाँव तुम पर थूक रहा है।”
जानकी ने रोते हुए कहा, “तुम जो चाहते थे, वही हुआ ना? अब यहाँ से चले जाओ, मुझे अपने हाल पर छोड़ दो।”
बूढ़े ने अपनी असली औकात दिखाते हुए कहा, “अभी भी मौका है जानकी। अगर तुम मेरे साथ ग/ल/त स/ं/बं/ध बनाने के लिए तैयार हो जाओ और मेरी म/न/शा पूरी करो, तो मैं पूरे गाँव में कह दूंगा कि मैंने झूठ बोला था। मैं तुम्हारी इ/ज्ज़/त बचा लूंगा, वरना तुम्हें गाँव छोड़ना पड़ेगा।”
यह सुनकर जानकी के अंदर छिपी स्वाभिमानी औरत जाग उठी। उसने बूढ़े को जोर से धक्का दिया और चिल्लाकर कहा, “दफा हो जाओ यहाँ से! मैं घिनौने तरीके से जीने से बेहतर मरना पसंद करूंगी।”
गाँव की पंचायत और ऐतिहासिक फैसला
अगले दिन उस बूढ़े ने गाँव के मुखिया (सरपंच) के पास जाकर जानकी के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी कि जानकी गाँव का माहौल खराब कर रही है और उसे गाँव से बाहर निकाला जाना चाहिए।
सरपंच ने गाँव की पंचायत बुलाई। चौपाल पर पूरा गाँव इकट्ठा हुआ। जानकी को भी वहाँ बुलाया गया। जानकी सिर झुकाए खामोश खड़ी थी।
तभी सरपंच ने पूछा, “जानकी, क्या पड़ोसी रामदीन (बूढ़ा) जो कह रहा है, वह सच है? क्या तुमने रात के अंधेरे में नौजवान लड़कों को घर बुलाकर ग/ल/त काम किया था?”
इससे पहले कि जानकी कुछ बोल पाती, भीड़ में से मोटरसाइकिल की आवाज़ आई। दिलीप और उसका दोस्त सीधे पंचायत के बीचों-बीच आकर खड़े हो गए।
दिलीप ने हाथ जोड़कर सरपंच और गाँव वालों से कहा, “सरपंच साहब! जानकी आंटी निर्दोष हैं। असली कुसूरवार मैं और मेरा दोस्त हैं।”
दिलीप की बात सुनकर पूरे गाँव में सन्नाटा छा गया। दिलीप ने निडर होकर कहा, “उस रात जानकी आंटी अकेलेपन और मानसिक तनाव में थीं। हमने उनकी स्थिति का फायदा उठाया। लेकिन इस गाँव के लोग यह नहीं देख रहे हैं कि असली गुनेहगार तो आपके सामने बैठा यह रामदीन बूढ़ा है!”
इसके बाद दिलीप ने अपने मोबाइल से एक ऑडियो रिकॉर्डिंग बजाई। यह वही रिकॉर्डिंग थी जो जानकी ने कल शाम अपने नए फोन में चुपके से कर ली थी, जब वह बूढ़ा उसे ब्लै/क/मे/ल करने और अ/त/रं/ग म/ा/म/ले की आड़ में द/बा/व बनाने आया था।
ध्वनि (Audio) में बूढ़े की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी कि कैसे वह जानकी को ब्लै/क/मे/ल कर रहा था और रा/ज़ छुपाने के बदले खुद जि/स्म/ा/नी स/ं/बं/ध बनाने की मांग कर रहा था।
सत्य की जीत और अंत
रिकॉर्डिंग सुनते ही पूरे गाँव के लोग भड़क गए। जो लोग अब तक जानकी को गलत समझ रहे थे, उनका गुस्सा उस दगाबाज़ और ठरकी बूढ़े पर फूट पड़ा।
गाँव की औरतों ने उस बूढ़े को खरी-खोटी सुनाई और सरपंच ने तुरंत फैसला सुनाया:
- पड़ोसी रामदीन बूढ़े को पूरे गाँव के सामने माफी मांगनी होगी और उस पर जुर्माना लगाया जाएगा।
- दिलीप और उसके दोस्त को अपनी नादानी और अनैतिक क/ा/ं/ड के लिए जानकी और पंचायत से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी।
दिलीप ने जानकी के पैर छूकर रोते हुए माफी मांगी और कहा, “आंटी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं अपनी गलती का प्रायश्चित करना चाहता हूँ।”
जानकी ने भी अपनी भूल स्वीकार की और भरी पंचायत में कहा कि इंसानी कमजोरी और अकेलेपन के कारण उससे यह पाप और भूल हुई, जिसके लिए वह भगवान से क्षमा मांगती है।
इस घटना के बाद जानकी ने अपनी बाकी बची भेड़ों और बकरियों को बेच दिया और अपने जीवन को नए सिरे से जीने का संकल्प लिया। उसने गाँव के छोटे बच्चों को अपने घर पर पढ़ाना शुरू कर दिया ताकि उसका अकेलापन भी दूर हो सके और वह सम्मान का जीवन जी सके।
अस्वीकरण (Disclaimer): इस काल्पनिक कहानी का उद्देश्य समाज में फैली बुराइयों, अकेलेपन के खतरों और ब्लै/क/मे/लिं/ग जैसी घटनाओं के प्रति लोगों को जागरूक करना है। इसका किसी की व्यक्तिगत भावना को ठेस पहुँचाने का कोई इरादा नहीं है।
जय हिंद, वंदे मातरम!