पत्नी ने अपने ही पति के साथ कर दिया कारनामा/वजह जानकार पुलिस के होश उड़ गए/ – News

पत्नी ने अपने ही पति के साथ कर दिया कारनामा/वजह जानकार पुलिस के होश उड़ गए/

पत्नी ने अपने ही पति के साथ कर दिया कारनामा/वजह जानकार पुलिस के होश उड़ गए/

पत्नी ने अपने ही पति के साथ कर दिया कारनामा/वजह जानकार पुलिस के होश उड़ गए/

अध्याय 1: एकमपुर की हरियाली और जगमोहन का समृद्ध संसार

उत्तर प्रदेश राज्य का गाजियाबाद जिला अपनी घनी आबादी, औद्योगिक प्रगति और शहरी गहमागहमी के लिए पूरे देश में जाना जाता है। परंतु इसी गाजियाबाद जिले की शहरी सीमाओं से थोड़ा दूर हटकर ग्रामीण अंचलों में शांति और खेत-खलिहानों की हरियाली बिखरी हुई है। इन्हीं ग्रामीण क्षेत्रों में एक प्रसिद्ध और शांत गांव पड़ता है, जिसका नाम है ‘एकमपुर’ (काजमपुर)।

एकमपुर गांव का माहौल आम भारतीय गांवों की तरह ही सहज, सरल और कृषि प्रधान है। भोर की पहली किरण के साथ ही यहां खेतों में हल चलते हैं, नलकूपों की गड़गड़ाहट गूंजती है और लहलहाती फसलें किसानों की कड़ी मेहनत की गवाही देती हैं। इसी एकमपुर गांव में जगमोहन सिंह नाम का एक प्रतिष्ठित किसान रहा करता था।

जगमोहन सिंह की उम्र लगभग चालीस के आसपास रही होगी। वह शारीरिक रूप से काफी हट्टा-कट्टा और रोबीले व्यक्तित्व का मालिक था। गांव में जगमोहन के पास कुल मिलाकर लगभग 18 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि थी। 18 एकड़ जमीन किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में एक बहुत बड़ी संपत्ति मानी जाती है। जगमोहन सिंह केवल जमीन का मालिक ही नहीं था, बल्कि वह खुद भी खेती-किसानी के काम में दिन-रात पसीना बहाता था। उसकी जमीनों पर गेहूं, धान, गन्ना और मौसमी सब्जियां लहलहाया करती थीं।

वर्षों की मेहनत, सही समय पर फसलों की बिक्री और कुशल वित्तीय प्रबंधन की वजह से जगमोहन सिंह ने अच्छा-खासा बैंक बैलेंस बना लिया था। गांव के लोग उसे एक सुखी, संपन्न और आर्थिक रूप से मजबूत व्यक्ति मानते थे। उसके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी। आधुनिक जीवनशैली की लगभग सभी सुख-सुविधाएं उसके विशाल मकान में मौजूद थीं।

जगमोहन सिंह के परिवार की बात करें तो उसके परिवार में उसकी धर्मपत्नी सीमा देवी थी। सीमा देवी देखने में साधारण लेकिन घरेलू मिजाज की महिला थी। जगमोहन और सीमा देवी की शादी को कई साल बीत चुके थे। बाहर से देखने पर उनका वैवाहिक जीवन बहुत ही शांत और सुखी नजर आता था, लेकिन घर की चारदीवारी के भीतर स्थितियां कुछ भिन्न थीं।

सीमा देवी का स्वभाव गांव की अन्य मेहनती महिलाओं से काफी अलग था। गांव की अधिकांश स्त्रियां जहां तड़के सुबह उठकर घर का सारा झाड़ू-पोछा, बर्तन-चौका, मवेशियों का चारा-पानी और रसोई का भारी-भरकम काम हंसते-हंसते कर लेती थीं, वहीं सीमा देवी इन सब कामों से दूर भागती थी। सीमा देवी के भीतर सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह एक आलसी और स्वभाव से कामचोर/ महिला थी। उसे न तो सही ढंग से स्वादिष्ट खाना पकाना आता था और न ही घर की साफ-सफाई तथा रख-रखाव में उसकी कोई खास रुचि रहती थी।

सीमा देवी का अधिकतर समय बिस्तर पर लेटे-लेटे या फिर पड़ोस की महिलाओं के साथ बैठकर फिजूल की बातें करने में बीतता था। जब भी जगमोहन शाम को खेत से थक-हारकर घर वापस लौटता, तो उसे घर में बिखरा हुआ सामान और अधपका भोजन ही मिलता। इस बात को लेकर दोनों के बीच अक्सर कहा-सुनी हो जाया करती थी।

सीमा देवी अपने पति जगमोहन से रोज-रोज एक ही रट लगाया करती थी—”देखिए जी, मुझसे घर का इतना सारा कामकाज नहीं संभलता। कपड़े धोते-धोते मेरी पीठ टूट जाती है, बर्तन मांजते-मांजते मेरे हाथ दुखने लगते हैं। आप इतने पैसे कमाते हैं, किस दिन के लिए यह धन जमा कर रखा है? हमारे घर में झाड़ू-पोछा और खाना बनाने के लिए कोई पक्की नौकरानी/ रख लीजिए।”

परंतु जगमोहन सिंह की सोच पुरानी परंपराओं से बंधी हुई थी। उसका स्पष्ट मानना था कि घर के कामकाज हमेशा घर की गृहलक्ष्मी को अपने हाथों से ही करने चाहिए। जगमोहन अपनी पत्नी को समझाते हुए कहता—”सीमा, हमारे पास भले ही कितना धन-दौलत क्यों न हो, लेकिन घर की मर्यादा और रसोई की शुचिता अपने ही हाथों से बनी रहती है। बाहरी नौकरानी/ को घर के भीतर हर समय रखना मुझे पसंद नहीं है। तुम थोड़ा-थोड़ा करके काम करने की आदत डालो, शरीर भी स्वस्थ रहेगा और घर का माहौल भी ठीक रहेगा।”

जगमोहन की इस सोच के कारण सीमा देवी के मन में अपने पति के प्रति चिढ़ और असंतोष पनपने लगा था। वह हर दिन किसी न किसी बात पर जगमोहन से उलझ पड़ती थी।

अध्याय 2: जगमोहन का भटकाव और सीमा की अंतिम चेतावनी

दूसरी तरफ, कहते हैं कि जब इंसान के पास आवश्यकता से अधिक पैसा आ जाता है और धर्म या संयम का अंकुश नहीं रहता, तो मन में कई तरह के विकार जन्म लेने लगते हैं। यही त्रासदी जगमोहन सिंह के साथ भी घटित होने लगी थी।

अधिक पैसा और संपत्ति इकट्ठा हो जाने के कारण जगमोहन के मन में वासना/ और अवांछित इच्छाएं सिर उठाने लगी थीं। धीरे-धीरे उसका ध्यान अपनी पत्नी और खेती-किसानी से हटकर गांव की अन्य महिलाओं की तरफ भटकने लगा। जगमोहन सिंह लंगोट/का/ढीला और नाड़े/का/ढीला इंसान बनने लगा था। उसकी नीयत में खोट आने लगा था और वह चरित्र/हीनता की राह पर कदम बढ़ा चुका था।

जगमोहन सिंह अब गांव की गैर/महिलाओं में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा था। जब भी वह गांव की गलियों या पनघट के आसपास से गुजरता, तो उसकी नजरें महिलाओं पर अनुचित तरीके से टिक जाती थीं। वह मन ही मन सोचने लगा था कि अब उसके पास पर्याप्त पैसा है, इसलिए उसे जीवन का आनंद लेना चाहिए और दूसरी महिलाओं के साथ अपना समय व्यतीत करना चाहिए।

यही जगमोहन की जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित होने वाली थी। उसकी यही हवस और चरित्र/हीनता आगे चलकर उसकी अपनी ही जान की सबसे बड़ी दुश्मन बनने वाली थी। अब तो स्थिति यह हो गई थी कि जगमोहन सिंह को जहां कहीं भी कोई पर/स्त्री या आकर्षक महिला दिखाई देती, वह उसी की ओर खिंचा चला जाता था और उसे पाने के अनैतिक सपने देखने लगता था।

इसी तरह दिन, हफ्ते और महीने गुजरते चले गए। आखिरकार समय का पहिया घूमते-घूमते एक ऐसी तारीख पर आकर ठहर गया, जिसने इस परिवार के विनाश की पटकथा लिख दी। वह तारीख थी 15 अक्टूबर 2025

15 अक्टूबर 2025 की सुबह लगभग 8:00 बजे का समय था। सूर्य की गुनगुनी धूप एकमपुर गांव पर बिखर चुकी थी। जगमोहन सिंह अपनी बैठक में बैठा चाय की चुस्कियां ले रहा था, तभी उसकी पत्नी सीमा देवी चेहरे पर भारी गुस्सा और नाराजगी लिए कमरे में दाखिल हुई।

सीमा देवी ने चाय की केतली पटकते हुए कड़े लहजे में कहा—”सुनो जगमोहन! आज मैं तुमसे आखिरी बार कह रही हूं। मुझसे अब घर का एक भी कामकाज नहीं होता है। न मुझसे कपड़े धोए जाते हैं, न झाड़ू लगाई जाती है और न ही सुबह-शाम चूल्हे के सामने जला जाता है। तुम आज के आज ही घर के लिए कोई अच्छी सी नौकरानी/ ढूंढ कर लाओ। अगर तुमने आज भी मेरी बात को टाल दिया और घर में कोई नौकरानी/ नहीं रखी, तो मैं अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर हमेशा-हमेशा के लिए अपने मायके/ चली जाऊंगी। फिर अकेले ही संभालना अपना यह 18 एकड़ का साम्राज्य!”

जब सीमा देवी ने अपने पति को सीधे-सीधे मायके/ चले जाने की धमकी दे दी, तो जगमोहन थोड़ा चिंता में पड़ गया। यद्यपि दोनों के बीच रोज अनबन होती थी, लेकिन जगमोहन गांव में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा को लेकर सचेत था। अगर उसकी पत्नी उसे छोड़कर मायके/ चली जाती, तो पूरे गांव में उसकी थू-थू होती और लोग भांति-भांति की बातें बनाते।

जगमोहन ने मन ही मन सोचा—”अब पानी सिर से ऊपर गुजर चुका है। अगर इसे रोकना है तो किसी न किसी नौकरानी/ की व्यवस्था करनी ही पड़ेगी।”

जगमोहन सिंह अपनी चाय खत्म करके तुरंत अपने घर से बाहर निकल पड़ा। उसने मन में ठान लिया था कि आज वह गांव या आसपास की किसी बस्ती से अपने घर के कामकाज के लिए कोई अच्छी और भरोसेमंद नौकरानी/ तलाश करके ही दम लेगा।

सुबह के 9:00 बजे से लेकर दोपहर ढली और शाम घिर आई। जगमोहन गांव के एक कोने से दूसरे कोने तक घूमता रहा। उसने कई लोगों से पूछताछ की, कई गरीब परिवारों से संपर्क किया, लेकिन कोई भी महिला उसके घर में पूरे समय काम करने के लिए तैयार नहीं हुई। कोई मजदूरी बहुत ज्यादा मांग रही थी तो कोई दूसरे के घर का काम करने में संकोच कर रही थी।

शाम के लगभग 5:30 बजे थक-हारकर, धूल से सने कपड़ों के साथ जगमोहन वापस अपने घर लौटा। उसने आंगन में बैठी सीमा देवी से हताश होकर कहा—”सीमा, मैंने पूरा दिन एक कर दिया, लेकिन सुबह से शाम तक मुझे पूरे गांव में कोई भी ऐसी नौकरानी/ नहीं मिली जो हमारे घर का काम संभाल सके।”

यह बात सुनते ही सीमा देवी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। वह गुस्से में बड़बड़ाती हुई रसोई में चली गई और जोर-जोर से बर्तन पटकने लगी। जगमोहन भी मानसिक और शारीरिक रूप से थक चुका था। वह घर के मुख्य दालान में रखी चारपाई पर बैठ गया और अपनी किस्मत को कोसने लगा।

अध्याय 3: पड़ोसिन गायत्री देवी की लाचारी और जगमोहन का दांव

समय बीतता रहा और शाम के लगभग 6:00 बजे का वक्त हो गया। गांव में धीरे-धीरे अंधेरा पांव पसार रहा था। तभी जगमोहन के घर के मुख्य दरवाजे पर हल्की सी दस्तक हुई। जगमोहन ने देखा कि उसकी पड़ोस में रहने वाली औरत, जिसका नाम गायत्री देवी था, घर के भीतर दाखिल हो रही थी।

गायत्री देवी एकमपुर गांव की ही रहने वाली एक मध्यमवर्गीय महिला थी। उसका पति एक साधारण मजदूरी का काम करता था और उनका परिवार अक्सर आर्थिक तंगी से जूझता रहता था। गायत्री देवी देखने में काफी आकर्षक और सुडौल काया की मालिक थी।

गायत्री देवी के चेहरे पर घबराहट और परेशानी के साफ भाव तैर रहे थे। वह हांफती हुई जगमोहन के पास आई और हाथ जोड़कर रुंधे हुए गले से बोलने लगी—”जगमोहन भैया! मैं बहुत बड़ी मुसीबत में हूं। मेरे छोटे बेटे की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है, उसे तेज बुखार है और डॉक्टर ने तुरंत बड़े अस्पताल ले जाने के लिए कहा है। मेरे पास इलाज के लिए पैसे नहीं हैं। मुझे आपसे ₹6,000 की सख्त जरूरत है। आप मुझे ₹6,000 कर्ज/ के रूप में दे दीजिए, जैसे ही हमारे पास पैसे आएंगे, मैं पाई-पाई चुका दूंगी।”

जैसे ही जगमोहन सिंह ने गायत्री देवी की ये परेशान करने वाली बातें सुनीं और उसकी लाचारी को देखा, तो उसके शातिर और चरित्र/हीन दिमाग में तुरंत एक अनैतिक विचार कौंध गया। जगमोहन की बुरी नजर काफी समय से गायत्री देवी की सुंदरता पर थी। उसने सोचा कि यह तो ईश्वर ने स्वयं ही एक सुनहरा मौका उसकी झोली में डाल दिया है। क्यों न इस महिला की मजबूरी का फायदा उठाया जाए और इसे ही अपने घर में नौकरानी/ का काम दे दिया जाए? इससे घर का काम भी हो जाएगा और उसकी काली नीयत को भी खुराक मिलती रहेगी।

जगमोहन सिंह ने अपने चेहरे पर हमदर्दी का मुखौटा पहना और धीमी आवाज में गायत्री देवी से कहा—”देख गायत्री, ₹6,000 तो कोई बड़ी बात नहीं है। मैं तुझे अभी के अभी ₹6,000 दे सकता हूं और तेरे बेटे के इलाज में मदद कर सकता हूं। लेकिन… इसके बदले में तुझे मेरी एक शर्त माननी पड़ेगी।”

गायत्री देवी ने उम्मीद भरी नजरों से जगमोहन की ओर देखा और उतावली होकर बोली—”भैया, आप जो भी शर्त रखेंगे, मैं पूरी करने को तैयार हूं। बस आप मेरे बच्चे के इलाज के लिए पैसे दे दीजिए। बताइए, आपकी क्या शर्त है?”

जगमोहन सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा—”शर्त बहुत सीधी सी है। तुझे मेरे घर के कपड़े-बर्तन, झाड़ू-पोछा और खाना बनाने का सारा कामकाज संभालना होगा। तू हमारे घर की नौकरानी/ बनकर काम करेगी। इसके बदले मैं तुझे हर महीने पूरे ₹15,000 वेतन दूंगा।”

जैसे ही गायत्री देवी के कानों में ₹15,000 महीने की बात पड़ी, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। 2025 के दौर में भी एक गांव के भीतर केवल घर के छोटे-मोटे कामकाज के लिए ₹15,000 का महीना बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। गायत्री देवी स्वभाव से थोड़ी लालची/ किस्म की महिला भी थी। उसने मन ही मन हिसाब लगाया कि अगर उसे अपने ही पड़ोस में इतना आसान काम करके ₹15,000 मिल रहे हैं, तो उसे कहीं और भटकने की क्या जरूरत है? इससे उसके घर का खर्च भी आराम से चलेगा और बेटे का इलाज भी हो जाएगा।

गायत्री देवी के चेहरे पर अचानक से मुस्कान तैर गई। उसने तुरंत सहमति में सिर हिलाया और खुशी से झूमते हुए जगमोहन से कहा—”मालिक! मुझे आपकी यह शर्त पूरी तरह मंजूर है। मैं कल सुबह से ही आपके घर में काम करने के लिए तैयार हूं।”

जगमोहन सिंह अंदर ही अंदर बहुत खुश हुआ। वह तुरंत अपने कमरे के भीतर गया, अपनी तिजोरी खोली और कड़कड़ाते हुए ₹6,000 निकालकर गायत्री देवी की हथेली पर रख दिए।

गायत्री देवी पैसे लेकर धन्यवाद देती हुई अपने घर की तरफ लौट गई। इधर जब जगमोहन की पत्नी सीमा देवी को पता चला कि ₹15,000 में पड़ोस की गायत्री देवी उनके घर में नौकरानी/ बनने को तैयार हो गई है, तो वह भी बेहद खुश हो गई। सीमा देवी को लगा कि आखिरकार उसे घर के कष्टकारी कामों से मुक्ति मिल गई है।

परंतु अनपढ़ और सीधी दिखने वाली सीमा देवी यह बिलकुल नहीं जानती थी कि आने वाले भविष्य में उसका पति जगमोहन इस नौकरानी/ गायत्री देवी के साथ क्या-क्या गुल खिलाने वाला है। सीमा देवी इस बात से पूरी तरह बेखबर थी कि इसी गायत्री देवी के आगमन के कारण उनके हंसते-खेलते घर में एक ऐसा भीषण और खौफनाक कांड/ होने वाला है, जो पूरे गाजियाबाद जिले को कपा कर रख देगा।

अध्याय 4: मायके/ का बुलावा और वासना/ का घिनौना खेल

अगले ही दिन से योजना के अनुसार गायत्री देवी ने जगमोहन के घर में कामकाज करना शुरू कर दिया। गायत्री देवी की दिनचर्या तय हो गई थी। वह रोज सुबह ठीक 8:00 बजे जगमोहन के घर आती थी। पूरे घर की साफ-सफाई करती, कपड़े धोती, दोपहर और शाम का खाना बनाती और घर के सारे कामकाज निपटाने के बाद शाम के लगभग 7:30 से 8:00 बजे के बीच अपने घर वापस लौट जाया करती थी।

शुरुआत के 10-12 दिनों तक सब कुछ सामान्य ढर्रे पर चलता रहा। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, जगमोहन सिंह की नीयत अपनी नौकरानी/ गायत्री देवी के प्रति और भी ज्यादा खराब होती चली गई। जब भी गायत्री देवी घर में पोछा लगाती या रसोई में खाना बनाती, जगमोहन की वासना/ से भरी नजरें उस पर ही टिकी रहती थीं। जगमोहन अब मन ही मन यह खौफनाक ताना-बाना बुनने लगा था कि उसे किसी भी कीमत पर अपनी इस खूबसूरत नौकरानी/ को हासिल/ करना है और उसके साथ शारी/रिक/संबंध बनाने हैं।

इसी घिनौनी सोच के बीच वक्त गुजरता गया और तारीख आ पहुंची 30 अक्टूबर 2025

30 अक्टूबर 2025 की सुबह लगभग 8:00 बजे का समय था। सीमा देवी अपनी रसोई में चाय बना रही थी, तभी उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी। फोन उसकी मां का था, जो पास के ही एक दूसरे गांव में अपने मायके/ में रहती थीं।

सीमा देवी ने फोन उठाया तो उसकी मां ने रोते हुए बताया कि उनकी तबीयत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई है, उन्हें तेज चक्कर आ रहे हैं और देखभाल के लिए सीमा की सख्त जरूरत है। मां ने सीमा से कहा कि वह तुरंत कुछ दिनों के लिए मायके/ आ जाए।

अपनी मां की बीमार होने की बात सुनते ही सीमा देवी घबरा गई। उसने फोन पर ही अपनी मां से कहा—”मां, तुम बिलकुल चिंता मत करो। मैं आज के आज ही, अभी थोड़ी देर में सामान पैक करके तुम्हारे पास आ रही हूं।”

फोन कटने के थोड़ी ही देर बाद जगमोहन खेतों का चक्कर काटकर घर वापस लौटा। सीमा देवी ने तुरंत अपने पति के पास जाकर कहा—”सुनो जी, अभी-अभी मेरी मां का फोन आया था। उनकी तबीयत बहुत ज्यादा बिगड़ गई है। मुझे आज ही अपने मायके/ जाना पड़ेगा। मैं वहां लगभग चार दिनों तक रुकूंगी और मां की देखभाल करूंगी।”

जैसे ही जगमोहन सिंह के कानों में यह बात पड़ी कि उसकी पत्नी सीमा देवी चार दिनों के लिए मायके/ जा रही है, उसके दिल में खुशी का ठिकाना न रहा। उसके दिमाग में तुरंत वासना/ की घंटी बज उठी। उसने अपने चेहरे की खुशी को छुपाते हुए झूठी हमदर्दी के साथ पत्नी से कहा—”अरे! सास जी की तबीयत खराब हो गई है? यह तो बहुत बुरा हुआ। तुम बिलकुल बिना किसी चिंता के चार दिनों के लिए मायके/ चली जाओ। वहां आराम से मां की सेवा करो, लेकिन अपना ख्याल भी रखना।”

बस, इतनी बातचीत के बाद सीमा देवी ने उतावली में अपने चार-पांच दिनों के कपड़े एक बैग में पैक किए और सुबह 10:00 बजे के आसपास अपने मायके/ के लिए रवाना हो गई। लगभग दो-तीन घंटे का सफर तय करने के बाद दोपहर तक सीमा देवी अपने मायके/ सकुशल पहुंच गई।

इधर, एकमपुर गांव में अपने विशाल मकान में अकेला बचा जगमोहन सिंह मन ही मन अपनी बुरी योजनाओं पर हंस रहा था। वह सोचने लगा—”वाह! किस्मत हो तो ऐसी। अब पूरे चार दिनों तक घर पूरी तरह से खाली है। पत्नी मायके/ में है और मैदान साफ है। इन चार दिनों के भीतर मुझे किसी भी तरह अपनी नौकरानी/ गायत्री देवी को अपनी बाहों में लेना है और उसके साथ अपना वक्त गुजारना है।”

30 अक्टूबर का पूरा दिन इसी उधेड़बुन में गुजर गया। अगला दिन यानी 31 अक्टूबर 2025 की सुबह आई।

सुबह के लगभग 8:30 बजे गायत्री देवी हमेशा की तरह जगमोहन के घर में काम करने के लिए दाखिल हुई। उसने देखा कि घर में सन्नाटा पसरा हुआ है और उसकी मालकिन सीमा देवी कहीं नजर नहीं आ रही हैं।

गायत्री देवी ने हैरान होकर पूछा—”मालिक! मालकिन जी कहीं दिखाई नहीं दे रही हैं? क्या वह कहीं बाहर गई हैं?”

जगमोहन सिंह ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—”हां गायत्री, उसकी मां की तबीयत खराब हो गई थी, इसलिए वह चार दिनों के लिए अपने मायके/ चली गई है। अब घर में सिर्फ मैं ही हूं।”

गायत्री देवी ने सहजता से कहा—”अच्छा-अच्छा। कोई बात नहीं मालिक, मैं आपके लिए बढ़िया नाश्ता और दोपहर का खाना बना देती हूं। फिर घर का सारा झाड़ू-पोछा निपटाकर अपने घर चली जाऊंगी।”

लेकिन जगमोहन सिंह के इरादे तो कुछ और ही थे। उसकी रगों में वासना/ का नशा दौड़ रहा था। उसने गायत्री से कहा—”तुम खाने की चिंता मत करो, पहले अंदर के कमरों का कामकाज निपटा लो।”

गायत्री देवी जैसे ही झाड़ू लेकर अंदर वाले बेडरूम की सफाई करने के लिए मुड़ी, जगमोहन जो कि लंगोट/का/ढीला और नाड़े/का/ढीला इंसान था, उसने दबे पांव जाकर अपने घर का मुख्य भारी दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और उसकी सांकल चढ़ा दी।

इसके बाद जगमोहन धीरे-धीरे चलकर बेडरूम में गायत्री देवी के बिल्कुल करीब पहुंच गया। जगमोहन की नीयत को भांपकर गायत्री देवी थोड़ा पीछे हटी और डरते हुए बोली—”मालिक! आप दरवाजा बंद करके यहां क्यों आ गए? यह आप क्या कर रहे हैं?”

जगमोहन सिंह ने बेशर्मी की सारी हदें पार करते हुए कहा—”देख गायत्री, मेरी पत्नी चार दिनों के लिए मायके/ गई हुई है। मैं बहुत अकेला महसूस कर रहा हूं। मैं तेरे साथ एकांत में वक्त गुजारना चाहता हूं। अगर तू मेरी बात मान लेगी और मेरे साथ शारी/रिक/संबंध बनाएगी, तो मैं तुझे इसके बदले में बहुत सारे पैसे दूंगा।”

गायत्री देवी कोई दूध की धुली हुई सीधी-सादी स्त्री नहीं थी। वह भी पैसों की बेहद भूखी और लालची/ मिजाज की महिला थी। जब उसने देखा कि मालिक खुद पैसों की पेशकश कर रहा है, तो उसकी नीयत भी डगमगा गई। उसने जगमोहन की आंखों में आंखें डालकर कहा—”देखिए मालिक, अगर ऐसी बात है तो फिर आपको इसके लिए मुझे अच्छे-खासे पैसे देने पड़ेंगे। मुफ्त में कुछ नहीं होगा।”

वासना/ में अंधे हो चुके जगमोहन सिंह ने तुरंत अपनी जेब से नोटों की एक गड्डी निकाली और उसमें से ₹3,000 निकालकर गायत्री देवी के हाथों में थमा दिए।

इतने सारे पैसे एक साथ देखकर लालची/ गायत्री देवी की आंखें चमक उठीं। उसने सोचा कि ऐसा अमीर और बेवकूफ मालिक बार-बार नहीं मिलता। इससे जितने पैसे ऐंठे जा सकें, ऐंठ लेने चाहिए।

इसके बाद जगमोहन सिंह गायत्री देवी का हाथ पकड़कर उसे अपने बेडरूम के भीतर ले गया। वहां उन दोनों की आपसी रजामंदी से अनैतिक और अवैध/संबंध कायम होने लगे। वे दोनों अपनी वासना/ की भूख मिटाने के लिए इस गलत/काम में तब तक लिप्त रहे, जब तक कि दोनों का मन शांत नहीं हो गया।

जब यह घिनौना कृत्य समाप्त हुआ, तो जगमोहन ने खुश होकर गायत्री देवी को कुछ और नोट इनाम के तौर पर दे दिए। गायत्री देवी उन पैसों को अपनी चोली में छिपाकर बेहद खुश हुई। उसने शाम के 7:30 बजे तक घर का सारा काम खत्म किया और रात होने से पहले हंसती-मुस्कुराती अपने घर लौट गई।

अध्याय 5: मदिरा/पान की महफिल और दोस्त की हवस

उसी रात, जब गायत्री देवी अपने घर चली गई, तो जगमोहन सिंह अपने खाली मकान में अकेला बैठा हुआ था। वासना/ की पूर्ति के बाद अब उसे शराब की तलब महसूस होने लगी। अकेलेपन को दूर करने के लिए उसे अपने जिगरी दोस्त प्रेम सिंह की याद आई।

प्रेम सिंह भी एकमपुर गांव का ही रहने वाला एक शराबी/ और अय्याश मिजाज का व्यक्ति था। जगमोहन ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और प्रेम सिंह को फोन मिलाया।

फोन उठते ही जगमोहन ने कहा—”अरे प्रेम! कहां है भाई? आज मेरी पत्नी मायके/ गई हुई है और घर पूरी तरह खाली है। चल, आज तेरी बैठक (बैठक/अड्डा) में बैठकर बढ़िया मदिरा/पान करते हैं और महफिल जमाते हैं।”

प्रेम सिंह ने खुशी-खुशी सहमति दी—”आ जा भाई जगमोहन! तेरी ही कमी थी।”

जगमोहन तुरंत अपने घर से निकला और कुछ ही दूरी पर स्थित प्रेम सिंह की निजी बैठक में पहुंच गया। प्रेम सिंह वहां पहले से ही उसका इंतजार कर रहा था। दोनों दोस्त आमने-सामने बैठ गए।

थोड़ी देर बातचीत करने के बाद जब उन्होंने मदिरा/ की बोतल उठाई, तो देखा कि बोतल में बहुत कम मदिरा/ बची थी। प्रेम सिंह ने तुरंत अपनी बैठक के बाहर आवाज लगाई—”ओ पवन! जरा इधर आ!”

पवन, प्रेम सिंह का एक नौकर था जो उसकी बैठक की देखभाल करता था। पवन दौड़ता हुआ अंदर आया। प्रेम सिंह ने जेब से ₹1,000 का नोट निकालते हुए पवन को दिया और कहा—”जा पवन, दौड़कर पास वाले ठेके/ से मदिरा/ की नई बोतल और साथ में कुछ बढ़िया भुजिया, नमकीन और खाने-पीने का सामान लेकर आ।”

पवन पैसे लेकर तुरंत गांव के बाहरी हिस्से में स्थित मदिरा/ के ठेके/ पर गया। वहां से उसने मदिरा/ की एक ब्रांडेड बोतल खरीदी, पास की दुकान से खाने-पीने का चखना खरीदा और वापस आकर अपने मालिक प्रेम सिंह और जगमोहन के सामने रख दिया।

अब दोनों दोस्तों ने ग्लास में मदिरा/ उड़ेलना शुरू किया। मदिरा/ के कड़वे घूंट जैसे-जैसे उनके गलों से नीचे उतर रहे थे, उनके सिर पर नशा/ हावी होने लगा था। जब दोनों पूरी तरह से मदिरा/ के तीव्र नशे/ में धुत हो गए, तो जगमोहन सिंह अपनी डींगें हांकने से खुद को रोक नहीं पाया।

जगमोहन ने मदिरा/ का ग्लास लहराते हुए शेखी बघारी—”अरे प्रेम! तू क्या जाने जिंदगी का असली मज़ा! तुझे पता है, हमारे घर में जो काम करने नौकरानी/ आती है, गायत्री देवी… भाई साहब, क्या गजब की औरत है! एकदम सुंदर और कातिलाना! आज मेरी पत्नी मायके/ क्या गई, मैंने तो आज उस गायत्री देवी के साथ रंगरेलियां मनाईं! क्या गजब का वक्त गुजारा है मैंने उसके साथ!”

मदिरा/ के नशे/ में डूब चुके प्रेम सिंह के कान जगमोहन की यह बात सुनते ही खड़े हो गए। प्रेम सिंह की अपनी नीयत भी खराब होने लगी। उसने अपनी जीभ लपलपाते हुए कहा—”अरे वाह जगमोहन! तू तो बड़ा छुपा रुस्तम निकला यार! ऐसी खूबसूरत नौकरानी/ की जरूरत तो मुझे भी है। भाई, मेरी भी सेटिंग करवा दे उसके साथ!”

जगमोहन ने हंसते हुए कहा—”देख प्रेम, मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। अगर तुझे उसके साथ वक्त गुजारना है, तो तुझे अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी और अच्छे-खासे पैसे देने पड़ेंगे।”

प्रेम सिंह ने तुरंत टेबल पर हाथ मारते हुए कहा—”अरे पैसों की तू चिंता मत कर मेरे भाई! तू कहे तो मैं अभी हजारों रुपये उड़ा दूं। बस तू उस गायत्री देवी को आज रात ही अपनी इस बैठक में बुला ले। हम दोनों मिलकर मजा करेंगे।”

जगमोहन ने सिर हिलाते हुए मना किया—”नहीं प्रेम, आज रात वह तेरी इस बैठक में नहीं आएगी। यहां गांव के लड़कों का आना-जाना रहता है, बात फैल जाएगी। मेरी बात सुन, मेरे घर में मेरी पत्नी नहीं है, मेरा पूरा घर खाली पड़ा है। हम दोनों अभी मेरे घर चलते हैं। मैं फोन करके गायत्री को अपने घर बुला लेता हूं। जब वह वहां आ जाएगी, तो हम दोनों आराम से उसके साथ रात बिताएंगे।”

प्रेम सिंह उछल पड़ा—”अरे वाह जगमोहन! यह हुई न दिग्गजों वाली बात! चल फिर देर किस बात की!”

दोनों शराबी/ दोस्त रात के लगभग 8:45 बजे अपनी जगह से उठे। जगमोहन ने तुरंत अपना मोबाइल निकाला और अपनी नौकरानी/ गायत्री देवी का नंबर डायल किया।

दूसरी तरफ गायत्री देवी ने फोन उठाया। जगमोहन ने मदिरा/ की भारी आवाज में कहा—”हेलो गायत्री! सुन, आज रात तू तुरंत मेरे घर आ जा। मैं तेरे साथ रात भर वक्त गुजारना चाहता हूं।”

लेकिन गायत्री देवी ने झिझकते हुए मना कर दिया—”नहीं मालिक! रात के समय मेरा आपके घर आना ठीक नहीं है। आस-पड़ोस के लोग देख लेंगे तो बवाल हो जाएगा। मैं कल सुबह आऊंगी।”

जगमोहन ने तुरंत पैसों का पासा फेंका—”गायत्री, नखरे मत कर! अगर तू अभी रात को आती है, तो मैं तुझे ₹5,000 नहीं, बल्कि पूरे ₹10,000 दूंगा! सोच ले, सिर्फ एक रात के ₹10,000!”

जैसे ही गायत्री देवी के कानों में ‘दस हजार रुपये’ का शब्द गूंजा, उसका सारा नैतिक आचरण और डर कपूर की तरह उड़ गया। ₹10,000 का बड़ा लालच/ उसकी आंखों पर छा गया।

गायत्री देवी ने तुरंत अपनी राय बदलते हुए कहा—”ठीक है मालिक! आप पैसों का इंतजाम रखिए। मैं रात के ठीक 10:00 बजे आपके घर के पिछले दरवाजे पर पहुंच जाऊंगी।”

यह सुनकर जगमोहन और प्रेम सिंह की बांछें खिल गईं। दोनों दोस्तों ने खुशी में एक-एक ग्लास मदिरा/ और ढाली और रात 9:00 बजे तक मदिरा/पान करते रहे। इसके बाद जगमोहन अपने दोस्त प्रेम सिंह को साथ लेकर अपने खाली घर पर आ गया।

अध्याय 6: घिनौना सौदा और 4 रातों का पाप

रात के लगभग 9:30 बज चुके थे। जगमोहन और प्रेम सिंह कमरे में बैठकर गायत्री देवी का इंतजार कर रहे थे। जगमोहन ने एक बार फिर गायत्री को फोन करके जल्दी आने को कहा।

उधर गायत्री देवी ने अपने घर में अपने पति और बच्चों के सो जाने का इंतजार किया। जैसे ही रात के 9:45 बजे उसके घर में सन्नाटा छाया, वह दबे पांव उठी, ओढ़नी से अपना मुंह ढका और अंधेरी गलियों से होती हुई जगमोहन के घर की तरफ निकल पड़ी।

रात के ठीक 10:00 बजे जगमोहन के घर के मुख्य दरवाजे पर हल्की सी खटखटाने की आवाज हुई। जगमोहन जो दरवाजे के पास ही खड़ा था, उसने मुस्कुराते हुए तुरंत दरवाजा खोला और गायत्री देवी को अंदर खींचकर दरवाजा बंद कर लिया।

लेकिन जैसे ही गायत्री देवी ने कमरे के भीतर कदम रखा, उसके होश उड़ गए! उसने देखा कि कमरे में जगमोहन के साथ उसका दोस्त प्रेम सिंह भी मदिरा/ का ग्लास हाथ में लिए बैठा हुआ था और उसे गंदी नजरों से घूर रहा था।

गायत्री देवी घबराकर पीछे हटने लगी और बोली—”मालिक! यह क्या धोखाधड़ी है? आपने तो कहा था कि आप अकेले हैं। यह आपका दोस्त प्रेम सिंह यहां क्या कर रहा है? मैं वापस जा रही हूं!”

जगमोहन ने तुरंत उसका रास्ता रोका और बेशर्मी से हंसते हुए कहा—”अरे गायत्री, घबराती क्यों है? प्रेम सिंह मेरा जिगरी यार है। आज इसके साथ भी तुझे थोड़ा सा वक्त गुजारना पड़ेगा। यह भी तुझे बहुत पसंद करता है।”

गायत्री देवी ने कड़ा विरोध करते हुए कहा—”नहीं! मैंने सिर्फ आपके लिए हां कही थी। मैं किसी दूसरे मर्द के साथ यह सब नहीं कर सकती। मुझे जाने दीजिए!”

तभी प्रेम सिंह अपनी जेब से कड़कड़ाते हुए नोटों का बंडल निकालते हुए आगे बढ़ा और बोला—”देख गायत्री, नखरे मत दिखा। जगमोहन जो पैसे दे रहा है, मैं उससे अलग तुझे पूरे ₹10,000 नकद दूंगा। बता, एक रात में इतने पैसे तुझे कहां मिलेंगे?”

एक बार फिर, पैसों के चमकते ढेर के सामने गायत्री देवी का ईमान डगमगा गया। अत्यधिक पैसों के लालच/ में आकर उसने अपना विरोध बंद कर दिया।

इसके बाद जगमोहन सिंह ने घर का मुख्य दरवाजा मजबूती से बंद कर दिया। वे दोनों हैवान उस औरत को लेकर अंदर वाले कमरे में चले गए। उस रात उन दोनों पुरुषों और उस लालची/ महिला की आपसी रजामंदी से वासना/ का वह घिनौना खेल शुरू हुआ, जिसने इंसानियत को शर्मसार कर दिया। वे तीनों रात भर इस गलत/काम/ में लिप्त रहे।

जब सुबह की भोर फटने वाली थी और तीनों की वासना/ की भूख शांत हो गई, तो जगमोहन और प्रेम सिंह ने तय शर्त के मुताबिक गायत्री देवी को ढेर सारे पैसे थमा दिए। इतने सारे पैसे पाकर गायत्री देवी अपने सारे रोष और शर्म को भूल गई और बेहद खुश होती हुई अपने घर की ओर निकल गई।

जाते-जाते जगमोहन सिंह ने प्रेम सिंह की पीठ थपथपाते हुए कहा—”देख प्रेम, मेरी पत्नी अगले चार दिनों तक वापस नहीं आने वाली है। यानी हमारे पास अभी तीन रातें और बाकी हैं! हम तीनों रातें ऐसे ही मौज उड़ाएंगे।”

प्रेम सिंह ने मदिरा/ का ग्लास हवा में लहराते हुए कहा—”वाह मेरे यार! यह चार रातें तो हमारी जिंदगी की सबसे बेहतरीन रातें साबित होंगी।”

इसके बाद वही हुआ जिसकी आशंका थी। लगातार चार रातों तक यह घिनौना कृत्य जारी रहा। रोज रात 10:00 बजे गायत्री देवी चुपके से जगमोहन के घर आती, जगमोहन और प्रेम सिंह उसके साथ शारी/रिक/संबंध बनाते, उसे मोटी रकम देते और सुबह होने से पहले वह अपने घर लौट जाती।

अध्याय 7: पड़ोसी दिव्या की जासूसी और सीमा का आगमन

कहते हैं कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी छुपाकर भरा जाए, एक न एक दिन वह छलक ही जाता है। जगमोहन के घर में रोज रात को जो अनैतिक खेल चल रहा था, उस पर किसी न किसी की नजर पड़ ही गई।

जगमोहन के ठीक पड़ोस में एक महिला रहती थी, जिसका नाम दिव्या था। दिव्या एक बेहद चतुर, चालाक और उत्सुक स्वभाव की औरत थी। उसे दूसरों के घरों में क्या चल रहा है, यह जानने की बड़ी तीव्र उत्कंठा रहती थी।

दिव्या ने लगातार दो रातों से देखा था कि रात के 10:00 बजे जब पूरा गांव सो जाता था, तब उनकी नौकरानी/ गायत्री देवी चुपके से मुंह ढककर जगमोहन के घर में दाखिल होती थी और उसके थोड़ी देर बाद प्रेम सिंह भी वहां पहुंचता था। फिर सुबह होने से पहले गायत्री देवी वहां से निकलती थी।

दिव्या को माजरा समझते देर न लगी। उसने एक रात अपनी छत पर चढ़कर जगमोहन के खिड़की के झरोखे से झांककर देख लिया कि अंदर क्या चल रहा था। दिव्या को यह कड़वी सच्चाई पूरी तरह पता चल चुकी थी कि जगमोहन और उसका दोस्त प्रेम सिंह उनकी नौकरानी/ गायत्री देवी के साथ अवैध/संबंध बना रहे हैं।

दिव्या ने मन ही मन सोचा—”वाह जगमोहन सिंह! बाहर से तो बड़ा भगत बनता है और अंदर यह नीच काम कर रहा है। तेरी पत्नी सीमा को आने दे, उसे तेरे इस काले कारनामे की खबर न दी तो मेरा नाम भी दिव्या नहीं!”

चार दिनों का समय बीत गया। 4 नवंबर 2025 की शाम के लगभग 5:00 बजे जगमोहन की पत्नी सीमा देवी अपने मायके/ से अपनी मां की देखभाल करके वापस अपने घर लौट आई। वह काफी थकी हुई थी।

जैसे ही सीमा देवी घर पहुंची और उसने अपना बैग रखा, पड़ोसिन दिव्या को इस बात की भनक लग गई। दिव्या ने बिना एक पल गंवाए तुरंत सीमा देवी के घर का रुख किया।

सीमा ने दिव्या को देखते ही कहा—”अरे दिव्या बहन! आओ-आओ, बैठो। कैसी हो?”

दिव्या ने बिना कोई औपचारिकता किए, गंभीर चेहरा बनाकर कहा—”सीमा! मैं तो ठीक हूं, लेकिन तेरा घर पूरी तरह बर्बाद हो चुका है! तू तो बेफिक्र होकर अपने मायके/ में बैठी थी, लेकिन तेरी पीठ के पीछे तेरे इस घर में ऐसा घिनौना और गलत/काम हुआ है कि अगर तू सुन लेगी तो तेरे पैरों तले जमीन खिसक जाएगी!”

सीमा देवी ने हैरान होकर पूछा—”क्या बात कर रही हो दिव्या बहन? साफ-साफ बताओ क्या हुआ है?”

दिव्या ने सीमा के करीब आकर फुसफुसाते हुए कहा—”सीमा, तेरा पति जगमोहन और उसका दोस्त प्रेम सिंह… ये दोनों तेरी अनुपस्थिति में रोज रात को तेरी उसी नौकरानी/ गायत्री देवी को घर बुलाते थे और उसके साथ अवैध/रिश्ते बनाते थे! तेरी नौकरानी/ कोई शरीफ औरत नहीं है, वह तेरे पति के पैसों पर ऐश कर रही है!”

परंतु, सीमा देवी अपनी पड़ोसिन दिव्या के इस चौंकाने वाले खुलासे पर विश्वास नहीं कर सकी। सीमा को लगा कि दिव्या शायद उसके सुखी परिवार से जलती है और उनके घर में कलह करवाना चाहती है।

सीमा देवी ने दिव्या को डांटते हुए कहा—”जाओ दिव्या बहन, मुझे अपनी मनगढ़ंत कहानियां मत सुनाओ। तुम तो बस हमारे हंसते-खेलते घर में आग लगाना चाहती हो! मेरे पति भले ही थोड़े सख्त मिजाज के हैं, लेकिन वे ऐसे चरित्र/हीन नहीं हो सकते। मैं तुम्हारी किसी बात पर यकीन नहीं करती!”

दिव्या ने अपना सिर पीटा और जाते-जाते बोली—”ठीक है सीमा, मत कर मेरी बात पर यकीन! जब तेरा पति उस औरत के चक्कर में पड़कर तुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर देगा, तब तुझे मेरी बात याद आएगी!”

अध्याय 8: रंगे हाथों पकड़ना और पति का भयानक रूप

यद्यपि सीमा देवी ने दिव्या की बातों को मुंह पर नकार दिया था, लेकिन महिला का मन बहुत शक्की होता है। दिव्या के जाने के बाद उसके दिए गए शक के बीज सीमा देवी के दिमाग में अंकुरित होने लगे थे।

सीमा देवी मन ही मन सोचने लगी—”क्या दिव्या सच कह रही थी? क्या सचमुच जगमोहन उस गायत्री के साथ गलत/काम कर रहा है? मुझे आज रात ही इस बात की सच्चाई पता करनी होगी।”

रात के लगभग 8:30 बजे जगमोहन सिंह खेत से होकर घर वापस लौटा। वह हमेशा की तरह सामान्य व्यवहार कर रहा था। सीमा देवी ने चुपचाप उसे खाना परोसा। जगमोहन ने खाना खाया और थकावट का बहाना बनाकर बेडरूम में जाकर लेट गया। सीमा देवी ने भी खाना खाया और उसके बगल में जाकर सोने का नाटक करने लगी।

समय बीतता गया। रात के ठीक 10:00 बजे का समय हुआ।

जगमोहन सिंह को लगा कि उसकी पत्नी सीमा देवी गहरी नींद में सो चुकी है। वह दबे पांव बिस्तर से उठा, अपनी चप्पलें हाथ में लीं और बिना कोई आहट किए कमरे से बाहर निकलकर घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया।

लेकिन जैसे ही जगमोहन उठा था, सीमा देवी की आंखें तुरंत खुल गई थीं। उसने अंधेरे में देखा कि उसका पति चुपके से घर से बाहर जा रहा है। सीमा का कलेजा धक-धक करने लगा। उसने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू कसकर बांधा और बिना चप्पल पहने, दबे पांव अपने पति के पीछे-पीछे निकल पड़ी।

अंधेरी रात में जगमोहन तेजी से कदम बढ़ाता हुआ गांव की गलियों से गुजर रहा था और पीछे-पीछे कुछ दूरी बनाकर सीमा देवी उसकी परछाई की तरह चल रही थी।

लगभग पांच मिनट चलने के बाद जगमोहन अपनी नौकरानी/ गायत्री देवी के घर के दरवाजे पर जाकर रुका। उसने दरवाजे पर एक विशेष कोड की तरह तीन बार दस्तक दी। तुरंत दरवाजा खुला और अंदर से गायत्री देवी ने मुस्कुराते हुए जगमोहन का हाथ पकड़ा और उसे अपने घर के भीतर खींच लिया।

पीछे झाड़ियों में छिपी सीमा देवी ने यह पूरा नजारा अपनी नंगी आंखों से देख लिया! उसके होश उड़ गए! उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। दिव्या की कही एक-एक बात पत्थर की लकीर साबित हो चुकी थी।

सीमा देवी का खून खौल उठा। उसका दिल कर रहा था कि वह अभी अंदर जाकर दोनों को रंगे हाथों पकड़े और पूरे गांव को इकट्ठा कर ले। लेकिन फिर उसके भीतर की पारंपरिक औरत ने उसे रोक लिया। उसने सोचा—”अगर अभी हंगामा करूंगी तो मेरे पति की पूरे गांव में थू-थू होगी और बात संभलने की बजाय पूरी तरह बिगड़ जाएगी।”

सीमा देवी रोती-बिलखती हुई चुपचाप उल्टे पांव अपने घर वापस आ गई और बिस्तर पर बैठकर अपने पति के लौटने का इंतजार करने लगी।

लगभग एक घंटे के बाद, रात के 11:15 बजे जगमोहन अपना अनैतिक काम खत्म करके वापस अपने घर पहुंचा। जैसे ही उसने कमरे में कदम रखा, सामने सीमा देवी को आंखें लाल किए, रोते हुए बैठा पाया।

सीमा देवी ने चिल्लाते हुए पूछा—”आप इस वक्त उस नीच नौकरानी/ गायत्री के घर क्या करने गए थे? क्या दिव्या सही कह रही थी? आप अपनी ही नौकरानी/ के साथ मुंह काला कर रहे हैं?”

जगमोहन सिंह जरा सा भी शर्मिंदा नहीं हुआ। मदिरा/ और वासना/ के नशे/ में चूर होकर उसने सीमा देवी को धक्का दिया और दहाड़ते हुए बोला—”हां! गया था मैं उसके पास! और सुन ले सीमा, तुझे मेरे काम में दखलंदाजी करने की कोई जरूरत नहीं है! मैं उस औरत को कभी नहीं छोड़ने वाला। अगर तुझे मेरे साथ रहना है तो चुपचाप पड़ी रह, वरना मैं तुझे तलाक देकर घर से निकाल दूंगा और उसी गायत्री से शादी करके इस घर में ले आऊंगा!”

पति के मुंह से यह खौफनाक धमकी सुनकर सीमा देवी के सामने काठ मार गया। वह पूरी रात फूट-फूटकर रोती रही।

अगली सुबह जब नौकरानी/ गायत्री देवी हमेशा की तरह सुबह 8:00 बजे सीमा के घर काम करने आई, तो सीमा देवी का गुस्सा फूट पड़ा। सीमा ने गायत्री के बाल पकड़कर उसे दरवाजे से बाहर धकेला और चिल्लाकर बोली—”तू चरित्र/हीन औरत! आज के बाद मेरे घर में कदम मत रखना! निकल जा यहां से!”

गायत्री देवी बिना कुछ बोले, अपना मुंह छिपाकर वहां से भाग गई।

लेकिन जब शाम के समय जगमोहन घर लौटा और उसे पता चला कि सीमा ने गायत्री को काम से निकाल दिया है, तो जगमोहन पागल कुत्तों की तरह भड़क उठा। उसने सीमा देवी को बेरहमी से पीटा और धमकी दी—”तूने उसे काम से निकाला न? अब देख, अब मैं रोज रात को उसके घर जाऊंगा और उसके ऊपर अपनी जान छिड़कूंगा! अगर तूने मुझे रोकने की कोशिश की, तो मैं तुझे जान/से/मार/ दूंगा!”

अध्याय 9: अंधविश्वास/ और घोड़े/का/पेशाब का नुस्खा

जगमोहन की इस खुली धमकी के बाद सीमा देवी पूरी तरह से टूट चुकी थी। उसे अपना भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा था। वह समझ नहीं पा रही थी कि अपने पति को उस औरत के चंगुल से कैसे छुड़ाए।

अत्यंत परेशान होकर सीमा देवी ने फिर से अपनी पड़ोसिन दिव्या को अपने घर बुलाया। सीमा ने रोते हुए दिव्या के पैर पकड़ लिए और कहा—”दिव्या बहन, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई जो मैंने तुम्हारी बात पर यकीन नहीं किया। मेरा पति पूरी तरह से उस गायत्री के वश में हो चुका है। वह मुझे मारता-पीटता है और उसे घर लाने की धमकी देता है। तुम ही कोई रास्ता बताओ, मैं अपने पति को उस औरत के चक्रव्यूह से कैसे निकालूं?”

दिव्या एक बेहद चालाक और अंधविश्वासी/ किस्म की महिला थी। वह तांत्रिक विद्याओं, टोटकों और जादू-टोने/ में बहुत विश्वास रखती थी। सीमा देवी भी अनपढ़ होने के कारण अंधविश्वास/ के जाल में आसानी से फंस जाती थी।

दिव्या ने थोड़ा गंभीर नाटक करते हुए कहा—”देख सीमा, तेरे पति पर उस गायत्री ने कोई बहुत बड़ा वशीकरण जादू-टोना/ करवा दिया है। ऐसे सीधी उंगली से घी नहीं निकलेगा। लेकिन तू चिंता मत कर, मेरे पास इसका एक अचूक और रामबाण इलाज है।”

सीमा देवी ने उतावलेपन से पूछा—”कैसा इलाज दिव्या बहन? तुम जो कहोगी मैं वही करूंगी!”

दिव्या ने सीमा के कान के पास आकर कहा—”तुझे अपने पति को पूरे एक महीने तक लगातार घोड़े/का/पेशाब (अशुद्ध/द्रव्य) पिलाना पड़ेगा! अगर तू रोज चुपके से किसी न किसी चीज में मिलाकर उसे घोड़े/का/पेशाब पिला देगी, तो उस औरत का सारा जादू-टोना/ कट जाएगा और तेरा पति तेरी मुट्ठी में आ जाएगा।”

अपने पति को वापस पाने के लिए अंधी हो चुकी सीमा देवी किसी भी हद तक जाने को तैयार थी। उसने बिना सोचे-समझे दिव्या से कहा—”दिव्या बहन, तुम किसी भी तरह मेरे लिए इस घोड़े/का/पेशाब का इंतजाम कर दो। इसके लिए मैं तुम्हें जितने पैसे मांगोगी उतने दूंगी!”

दिव्या पैसों की लालची/ थी ही। उसने गांव के बाहरी इलाके में तबेला चलाने वाले एक व्यक्ति से साठ-गांठ की और वहां से दो कांच की बड़ी बोतलों में घोड़े/का/पेशाब भरकर ले आई।

दिव्या ने वे दोनों बोतलें सीमा देवी को थमाते हुए कहा—”ले सीमा, यह बहुत मुश्किल से मिला है। अब रोज सुबह-शाम खाने में, दाल में, चाय में या मदिरा/ में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा करके अपने पति को यह पिलाती रह। एक महीने में असर देखना!”

इसके बाद सीमा देवी का घिनौना टोटका शुरू हुआ। रोज सुबह जब वह जगमोहन के लिए चाय या पानी लाती, तो उसमें चुपके से घोड़े/का/पेशाब मिला देती। रात को जब जगमोहन मदिरा/ पीता, तो सीमा मदिरा/ के गिलास में भी घोड़े/का/पेशाब मिला देती थी।

एक पूरा महीना बीत गया। सीमा देवी रोज अपने पति को घोड़े/का/पेशाब पिलाती रही, लेकिन इस घिनौने और अमानवीय टोटके का जगमोहन पर रत्ती भर भी असर नहीं हुआ!

जगमोहन का वही ढर्रा जारी रहा। वह रोज रात के ठीक 10:00 बजे अपने घर से निकलता, अपनी पूर्व नौकरानी/ गायत्री देवी के घर जाता, उसके साथ वक्त गुजारता, उसे पैसे देता और रात को वापस घर आता। सीमा देवी का अंधविश्वास/ पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था।

अध्याय 10: जायदाद खोने का डर और ₹2 लाख की सुपारी

समय का पहिया घूमता रहा और तारीख आ पहुंची 4 दिसंबर 2025

4 दिसंबर 2025 की सुबह लगभग 9:30 बजे का समय था। सीमा देवी मानसिक रूप से पूरी तरह से हताश और हिंसक सोच से भर चुकी थी। उसने तुरंत अपनी पड़ोसिन दिव्या को फोन करके अपने घर बुलाया।

दिव्या के आते ही सीमा देवी गुस्से में चिल्लाई—”दिव्या! तेरा वह घोड़े/का/पेशाब वाला टोटका पूरी तरह से बकवास निकला! मैंने एक महीने तक अपने पति को वह गंदा पानी पिलाया, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा! वह आज भी रोज रात को उसी गायत्री के घर जाता है और उस पर पैसे पानी की तरह बहाता है।”

दिव्या ने अपनी नाकामी छुपाने के लिए एक और भयानक पासा फेंका। दिव्या ने चेहरा बिगाड़कर कहा—”अरे सीमा, तुझे पता नहीं है! उस गायत्री का जादू बहुत कड़ा है। और सुन, मुझे गांव से खबर मिली है कि तेरा पति जगमोहन अपनी पूरी 18 एकड़ जमीन और यह विशाल मकान उस गायत्री देवी के नाम वसीयत करने जा रहा है! अगर उसने ऐसा कर दिया, तो तू तो रास्ते पर भीख मांगेगी!”

’18 एकड़ जमीन और मकान गायत्री के नाम करने’ की बात सुनते ही सीमा देवी के पैरों तले से मानो धरती खिसक गई! उसके भीतर का डर अब खौफनाक नफरत में बदल चुका था।

सीमा देवी की आंखों में खून उतर आया। उसने दांत भींचते हुए कहा—”नहीं! मैं उस कुतिया को अपनी 18 एकड़ जमीन कभी नहीं हथियाने दूंगी! इससे पहले कि जगमोहन मेरी संपत्ति उस औरत को दे, मैं जगमोहन का ही किस्सा खत्म कर दूंगी!”

दिव्या ने सीमा के चेहरे के हिंसक भाव देखे तो समझ गई कि शिकार पूरी तरह जाल में फंस चुका है।

सीमा देवी ने दिव्या के हाथ पकड़ लिए और कहा—”दिव्या, अब बस एक ही उपाय बाकी है। मैं अपने पति को हमेशा-हमेशा के लिए ठिकाने/लगाना चाहती हूं! उसकी हत्या/ करना चाहती हूं! इस काम में तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। अगर तुम जगमोहन को ठिकाने/लगाने में मेरा साथ दोगी, तो मैं तुम्हें नकद ₹2 लाख (₹2,000,000) दूंगी!”

₹2 लाख की भारी रकम सुनते ही दिव्या की नीयत पूरी तरह से डगमगा गई। एक निर्दोष की हत्या/ के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए वह तुरंत तैयार हो गई।

दिव्या ने सीमा की आंखों में देखते हुए कहा—”ठीक है सीमा, मुझे ₹2 लाख मंजूर हैं। आज रात ही हम इस जगमोहन का काम तमाम कर देंगे!”

अध्याय 11: खौफनाक कत्ल/ और आंगन में कसी का खेल

षड्यंत्र पूरी तरह रचा जा चुका था। मौत का जाल बिछ चुका था।

4 दिसंबर 2025 की रात के लगभग 9:00 बजे जगमोहन सिंह अत्यधिक मदिरा/ के नशे/ में धुत होकर अपने घर पहुंचा। अत्यधिक मदिरा/पान के कारण उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। वह सीधे अपने बेडरूम में गया और बिना कपड़े बदले, औंधे मुंह बिस्तर पर गिरकर सो गया। मदिरा/ के तीव्र नशे/ के कारण वह गहरी, बेसुध नींद में सो चुका था।

सीमा देवी ने देखा कि उसका पति पूरी तरह बेसुध है। उसने तुरंत दिव्या को फोन करके इशारा कर दिया—”शिकार बेसुध हो चुका है, तुरंत आ जाओ।”

रात के लगभग 9:30 बजे दिव्या अपने घर के पिछले रास्ते से होती हुई, हाथ में एक तेज धारदार/हथियार (दांव/कुल्हाड़ी) छिपाकर सीमा देवी के घर में दाखिल हुई।

दोनों खूंखार महिलाएं दबे पांव उस कमरे में दाखिल हुईं जहां जगमोहन बेसुध पड़ा खर्राटे मार रहा था।

सबसे पहले सीमा देवी ने अपने पति की छाती पर चढ़कर बैठ गई और अपने दोनों हाथों से जगमोहन का गला/दबाकर/ उसकी सांसें रोकने लगी। जगमोहन ने छटपटाने की कोशिश की, लेकिन मदिरा/ के नशे/ के कारण उसके शरीर में ताकत नहीं बची थी। उसी समय दिव्या ने जगमोहन के दोनों पैरों को कसकर पकड़ लिया और धारदार/हथियार से उसके गले पर वार कर दिया!

कुछ ही मिनटों की तड़प के बाद जगमोहन सिंह का शरीर शांत हो गया। उसकी जीवन लीला समाप्त हो चुकी थी।

कत्ल/ करने के बाद दोनों महिलाओं पर हैवानियत सवार थी। उन्हें डर था कि अगर साबुत लाश को बाहर ले जाएंगी तो पकड़ी जाएंगी। इसलिए सीमा देवी और दिव्या ने मिलकर उस धारदार/हथियार से जगमोहन की लाश/के/टुकड़े-टुकड़े/ कर दिए!

उन्होंने लाश के कटे हुए अंगों को प्लास्टिक की बड़ी-बड़ी बोरी/ में ठूंस-ठूंस कर भर दिया और बोरी का मुंह सुतली से कसकर बांध दिया।

रात के लगभग 11:00 बज चुके थे। घर के कमरे में चारों तरफ खून/ बिखरा हुआ था।

दिव्या ने हांफते हुए पूछा—”सीमा, अब इस बोरियों में बंद लाश/ को कहां फेंकने चलेंगे? बाहर ले जाना खतरनाक है।”

सीमा देवी ने ठंडे स्वर में कहा—”कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है। हमारे घर के बड़े आंगन में कच्ची मिट्टी है। हम इसे अपने घर के आंगन में ही गड्ढा खोदकर दफ़न/ कर देंगे। किसी को कानों-कान खबर नहीं होगी।”

दोनों महिलाएं घर के स्टोर रूम से कसी (फावड़ा) और कुदाल लेकर आंगन में आ गईं। रात के सन्नाटे में, हल्की रोशनी के बीच सीमा देवी और दिव्या दोनों कसी से जमीन खोदने लगीं। रात 11:00 से 11:30 बजे के बीच उन दोनों ने मिलकर आंगन में लगभग चार फीट गहरा गड्ढा खोद डाला।

अध्याय 12: शराबी पड़ोसन संजय की नजर और पुलिस का छापा

लेकिन कहते हैं कि ईश्वर के न्याय की लाठी में आवाज नहीं होती, परंतु उसका प्रहार अचूक होता है।

जगमोहन के घर के ठीक सामने एक दो मंजिला मकान था, जिसमें संजय कुमार नाम का व्यक्ति रहता था। संजय कुमार भी मदिरा/ पीने का बेहद शौकीन था और उसे रात में अनिद्रा (नींद न आने) की बीमारी थी। वह अक्सर रात भर अपनी दूसरी मंजिल की बालकनी में टहलता रहता था।

4 दिसंबर की उस खौफनाक रात को लगभग 11:30 बजे संजय कुमार मदिरा/ का गिलास हाथ में लिए अपनी बालकनी में टहल रहा था। तभी उसकी नजर सामने जगमोहन के घर के खुले आंगन पर पड़ी।

संजय कुमार ने देखा कि आंगन में धुंधली रोशनी में दो औरतें कसी से तेजी से गड्ढा खोद रही हैं और उनके पास दो बड़ी-बड़ी खून/ से सनी बोरियां रखी हुई हैं।

संजय कुमार का माथा तुरंत ठनका। उसने अपनी आंखें मलीं और ध्यान से देखा। उसे समझते देर न लगी कि वे दोनों औरतें उसकी परिचित सीमा देवी और दिव्या थीं।

संजय कुमार तुरंत बालकनी से नीचे उतरा और दबे पांव जगमोहन के आंगन के पास दीवार के पीछे आकर खड़ा हो गया। उसने देखा कि वे दोनों औरतें उस गड्ढे के भीतर उन भारी बोरियों को घसीटकर डाल रही थीं।

संजय कुमार से रहा नहीं गया। वह दीवार कूदकर आंगन में आ गया और जोर से चिल्लाया—”ओ सीमा! ओ दिव्या! यह तुम दोनों रात के 11:30 बजे क्या दफ़न/ कर रही हो? इन बोरियों में क्या है?”

अचानक संजय की कड़कदार आवाज सुनकर सीमा देवी और दिव्या के हाथ से कसी छूट गई! उनके चेहरे का रंग फख्त हो गया। डर के मारे वे दोनों कसी और लाश/ को वहीं छोड़कर अपने-अपने घरों की तरफ भाग खड़ी हुईं।

लेकिन संजय कुमार ने शोर मचाना शुरू कर दिया—”बचाओ! बचाओ! देखो जगमोहन के घर में क्या हो रहा है! सब लोग बाहर आओ!”

संजय का शोर सुनकर आसपास के दर्जनों ग्रामीण हाथों में लाठियां और टॉर्च लेकर मौके पर जमा हो गए। ग्रामीणों ने जब आंगन में बने ताजा गड्ढे और खून/ से सनी बोरियों को देखा, तो उनका कलेजा कांप गया।

गांव के प्रधान ने तुरंत आगे बढ़कर एक बोरी का सुतली वाला धागा खोला। जैसे ही बोरी का मुंह खुला, उसके भीतर से जगमोहन सिंह का कटा हुआ सिर और हाथ बाहर आ गिरे!

यह खौफनाक दृश्य देखकर पूरे गांव में चीख-पुकार मच गई।

गांव के सरपंच ने बिना एक पल गंवाए रात के लगभग 12:00 बजे नजदीकी पुलिस स्टेशन (थाने) में फोन कॉल कर दिया और घटना की सूचना दी।

सूचना मिलते ही गाजियाबाद पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। महज आधे-पौने घंटे के भीतर पुलिस की तीन गाड़ियां सायरन बजाती हुई एकमपुर गांव में जगमोहन के घर के बाहर आ पहुंचीं।

पुलिस स्टेशन के थाना प्रभारी और महिला पुलिस दरोगा ने तुरंत क्राइम सीन को सील कर दिया। प्रत्यक्षदर्शी पड़ोसी संजय कुमार ने पुलिस को अपना बयान देते हुए बताया—”साहब! मैंने अपनी आंखों से सीमा देवी और दिव्या को इस गड्ढे को खोदते और इस बोरी को दफ़न/ करते हुए देखा है!”

पुलिस बल तुरंत सीमा देवी के घर में घुसा। वहां कमरे में चारों तरफ खून/ के धब्बे बिखरे हुए थे। पुलिस ने मौके से ही सीमा देवी और पास के घर में छिपी बैठी उसकी पड़ोसिन दिव्या दोनों को गिरफ्तार/ कर लिया।

अध्याय 13: हवालात की पिटाई और अंतिम निष्कर्ष

पुलिस गिरफ्तार/ की गई दोनों महिलाओं—सीमा देवी और दिव्या को गाजियाबाद के महिला पुलिस थाने ले आई।

शुरुआत में सीमा देवी पुलिस को गुमराह करने की कोशिश कर रही थी और रो-रोकर नाटक कर रही थी कि उसे कुछ नहीं पता। लेकिन जब महिला पुलिस दरोगा ने अपना कड़ा रुख अपनाया और थोड़ी सी पिटाई/ की, तो दोनों महिलाओं का सारा अकड़ और झूठ ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

महिला दरोगा के दो चांटे पड़ते ही दिव्या रोते हुए बोलने लगी—”साहब! मुझे माफ कर दो! मुझे तो सीमा ने ₹2 लाख का लालच/ दिया था, इसलिए मैंने जगमोहन को मारने में इसका साथ दिया!”

इसके बाद दरोगा ने जब सीमा देवी से सख्ती से पूछताछ की—”तुमने अपने ही सुहाग, अपने पति जगमोहन की इतनी बेरहमी से हत्या/ क्यों की?”

तो सीमा देवी ने फूट-फूटकर रोते हुए अपने जुर्म/ का पूरा कच्चा चिट्ठा खोल दिया।

सीमा देवी ने पुलिस के सामने इकबालिया बयान देते हुए कहा—”दरोगा साहब! मेरा पति जगमोहन एक चरित्र/हीन इंसान बन चुका था। वह हमारी ही नौकरानी/ गायत्री देवी के चक्कर में पूरी तरह अंधा हो चुका था। वह रोज रात को उसके घर जाता था, उस पर हजारों रुपये लुटाता था। जब मैंने विरोध किया तो उसने मुझे जान/से/मार/ने की धमकी दी और कहा कि वह अपनी 18 एकड़ जमीन उस नौकरानी/ के नाम करके मुझे घर से निकाल देगा। मैं अपनी संपत्ति और अपना घर बचाने के लिए मजबूर हो गई थी। इसीलिए मैंने दिव्या के साथ मिलकर अपने पति को ठिकाने/लगा दिया।”

पुलिस ने सीमा देवी और दिव्या के बयान दर्ज किए, हत्या/ में इस्तेमाल किया गया धारदार/हथियार, कसी, खून/ से सने कपड़े और घोड़े/का/पेशाब की बोतलें सबूत के तौर पर जब्त कर लीं।

पुलिस ने दोनों आरोपी महिलाओं के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संगीन धाराओं के तहत हत्या/, आपराधिक षड्यंत्र और साक्ष्य मिटाने का मामला दर्ज करके अदालत में चार्जशीट दायर कर दी है।

वर्तमान में सीमा देवी और उसकी पड़ोसिन दिव्या दोनों गाजियाबाद की जिला जेल की अंधेरी सलाखों के पीछे अपनी करनी की सजा भुगत रही हैं। अब यह बात भविष्य के गर्भ में छिपी है कि माननीय जज साहब इन दोनों कातिल महिलाओं को फांसी की सजा सुनाते हैं या उम्रकैद की।

निष्कर्ष और नैतिक संदेश:

गाजियाबाद के एकमपुर गांव की यह खौफनाक और दिल दहला देने वाली सच्ची घटना समाज को कई गहरे सबक देती है:

  1. चरित्र और संयम: जगमोहन के पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी, लेकिन चरित्र/हीनता और वासना/ के भटकाव ने उसे मौत के मुंह में ढकेल दिया। पर/स्त्री गमन और अनैतिक संबंध हमेशा विनाश का कारण बनते हैं।
  2. अंधविश्वास का जाल: सीमा देवी ने अपने पति को सुधारने के लिए अंधविश्वास/ और घोड़े/का/पेशाब जैसे घिनौने टोटकों का सहारा लिया, जिससे स्थिति सुधरने की बजाय और भयावह होती चली गई।
  3. क्रोध और अपराध: पति की गलतियों का जवाब हत्या/ जैसा खौफनाक अपराध करके देना सीमा देवी की सबसे बड़ी भूल थी। उसने कानून को हाथ में लिया और अपनी बची-कुची जिंदगी भी जेल की सलाखों के पीछे तबाही के हवाले कर दी।

दोस्तों, इस पूरे घटनाक्रम के दौरान पत्नी सीमा देवी और पड़ोसिन दिव्या ने जो अपने पति जगमोहन के साथ किया, क्या वह सही था या गलत? आपकी नजर में असली गुनहगार कौन है? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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