Part 4 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं – News

Part 4 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं

Part 4 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं

भाग चार

पाँच और साल बीत गए।

कविता अब बाईस साल की हो चुकी थी। चेहरा पतला हो गया था, आँखों के नीचे हल्की कालिमा रहती। सिलाई का काम अब एक छोटे से कमरे से बढ़कर दो मशीनों तक पहुँच चुका था। एक लड़की उसने सहायक रख ली थी। पिता रामेश अब बिस्तर पर ज्यादा समय बिताते। कमर की चोट ने उन्हें लगभग चलने-फिरने से रोक दिया था।

एक सर्दी की सुबह रामेश ने कविता का हाथ पकड़ा।

“बेटी, मैं ज्यादा दिन नहीं रहूँगा। तू अकेली पड़ जाएगी।”

कविता ने जवाब दिया, “पापा, आप चुप रहिए। मैं हूँ न।”

लेकिन दोनों जानते थे कि सच यही है।

तीन महीने बाद रामेश चल बसे। मौत शांत थी। सुबह सोए और उठे नहीं। कविता ने अंतिम संस्कार खुद संभाला। गाँव से कोई नहीं आया। शहर के दो-तीन पड़ोसी आए, फिर चले गए।

अब कविता सच में अकेली थी।

उसने पिता की तस्वीर कमरे में लगाई। हर सुबह दीया जलाती। काम और ज्यादा करने लगी ताकि खालीपन महसूस न हो। लेकिन रातें लंबी पड़तीं। नींद कम आती। कभी-कभी वह वही दोपहर याद कर लेती जब स्कूल से जल्दी लौटी थी। माँ की आवाज, मुकेश का चेहरा, चाकू—सब एक साथ आ जाता।

इसी दौरान एक पत्र आया।

लिफाफा सादा था, पता अधूरा। अंदर कागज पर सिर्फ दो पंक्तियाँ लिखी थीं—

“मैं जिंदा हूँ। तुझे कुछ कहना है। अगर मिलना हो तो वाराणसी घाट पर अगले मंगलवार शाम को आ जाना।”

नाम नहीं था। लेकिन कविता समझ गई। मुकेश था।

उसने पत्र फाड़कर फेंक दिया। दो दिन तक मन नहीं माना। तीसरे दिन वह सोचने लगी—अगर वह कुछ कहना चाहता है, तो शायद आखिरी सच्चाई जाननी चाहिए। माँ क्यों उस रास्ते पर गई, चाचा ने कितना मजबूर किया या कितना खुद चाहा—यह सब अधूरा रह गया था।

मंगलवार शाम वह वाराणसी पहुँची।

घाट पर भीड़ थी। दीये जल रहे थे, घंटियाँ बज रही थीं। उसने दूर खड़े होकर देखा। एक आदमी पीले कुर्ते में बैठा था। दाढ़ी सफेद पड़ने लगी थी, कमर झुक गई थी। मुकेश था, लेकिन पहले जैसा नहीं।

कविता पास गई। बैठ गई। दोनों देर तक चुप रहे।

मुकेश ने पहले कहा, “मैं भागता रहा। जेल के बाद भी भागता रहा। लेकिन अब भाग नहीं सकता। बीमार हूँ।”

कविता ने पूछा, “माँ को आपने मजबूर किया था?”

मुकेश ने सिर झुकाया। “शुरू में नहीं। फिर हाँ। वह अकेली थी, मैं कमजोर था। हम दोनों ने घर का विश्वास तोड़ा। तूने जो देखा, वह सच था। मैं झूठ नहीं बोलूँगा अब।”

कविता की आवाज काँपी। “तो आप क्यों नहीं रुके?”

“क्योंकि एक बार गलत रास्ता पकड़ लेने के बाद आदमी रुक नहीं पाता। डर लगता है पकड़े जाने का, और लालच भी लगता है छिपे रहने का।”

कविता उठी। “मैं आपको माफ नहीं करती। लेकिन अब और कुछ नहीं चाहती। आप अपनी बीमारी में मरिए या जिएं, मुझे फर्क नहीं पड़ता।”

वह चल दी। मुकेश पीछे से बोला, “तेरी माँ ने मरने से पहले तेरा नाम लिया था। उसने कहा था कविता को मत सताना।”

कविता रुकी नहीं।

वापस शहर आकर उसने और सख्ती से काम में डूब गई। लेकिन मन शांत नहीं हुआ। मुकेश की बात रात-दिन घूमती रही। माँ ने आखिरी में उसका नाम लिया था—यह सोचकर गुस्सा और दर्द दोनों बढ़ गए।

कुछ महीने बाद खबर आई कि मुकेश की मौत हो गई। तपेदिक से। किसी धर्मशाला में अकेला मरा। कोई दावेदार नहीं आया। पुलिस ने कविता को सूचना दी क्योंकि पुराने कागजों में नाम था। कविता गई नहीं। उसने कहा, “जो मर गया, वह मर गया।”

अब परिवार में कोई नहीं बचा था।

कविता ने फैसला किया कि वह शहर छोड़कर थोड़ा दूर एक छोटे कस्बे में जाएगी। वहाँ कोई उसकी पुरानी कहानी नहीं जानता। उसने सामान बाँधा, मशीनें बेचीं, नया कमरा लिया। नया नाम नहीं रखा, लेकिन लोगों से कम बातें कीं।

वहाँ उसने फिर सिलाई शुरू की। धीरे-धीरे काम बना। एक विधवा औरत पड़ोस में रहती थी, उसने कविता से दोस्ती कर ली। एक दिन उसने पूछा, “बेटी, तेरे माँ-बाप कहाँ हैं?”

कविता ने साफ कहा, “नहीं रहे।”

औरत ने और नहीं पूछा।

साल बीतते गए। कविता की उम्र पच्चीस हो गई। लोग शादी की बात करते। कोई रिश्ता आता तो वह टाल देती। एक बार एक लड़के का परिवार आया। लड़का साधारण नौकरी करता था। कविता ने मिलने के बाद कहा, “मेरी जिंदगी में बहुत बोझ है। आप किसी और को देखिए।”

लड़के ने पूछा, “क्या बोझ?”

कविता चुप रही। बता नहीं सकी। कुछ कहानियाँ इतनी भारी होती हैं कि उन्हें नए घर में नहीं ले जाया जा सकता।

एक रात वह अकेली बैठी थी। बाहर बारिश हो रही थी। उसने कागज निकाला और लिखने लगी। जो बात कभी किसी से नहीं कही, वह कागज पर उतरने लगी—

“मैंने माँ को खोया, पापा को खोया, घर को खोया।
मैंने गुस्से में एक कदम उठाया जो वापस नहीं लिया जा सकता।
अब मैं जी रही हूँ, लेकिन जीना और साँस लेना दो अलग चीजें हैं।”

लिखाकर उसने कागज जला दिया। राख खिड़की से फेंक दी।

अगले साल उसी कस्बे में एक छोटी सी लड़की उसके पास सिलाई सीखने आने लगी। गरीब घर की थी, माँ काम करती थी, पिता बाहर रहते थे। कविता उस लड़की को देखते ही सिहर जाती। वही उम्र, वही अकेली माँ वाला घर।

एक दिन लड़की ने कहा, “दीदी, मम्मी रात को अक्सर रोती हैं। पापा साल में एक बार आते हैं।”

कविता का दिल बैठ गया। उसने लड़की का हाथ पकड़ा।

“तू पढ़ाई मत छोड़ना। घर में जो भी हो, तू अपनी राह मत खोना। और अगर कभी घर में कुछ गलत लगे, तो चुप मत रहना। किसी भरोसे वाले से कह देना।”

लड़की समझी या नहीं, पता नहीं। लेकिन कविता उस दिन देर तक रोई। पहली बार इतने सालों बाद खुलकर रोई। वह समझ गई थी कि उसका दर्द अब सिर्फ उसका नहीं रहा। वह एक चेतावनी बन चुका था—उन घरों के लिए जहाँ पिता दूर हों, माँ अकेली हो और घर के अंदर की मर्यादा कमजोर पड़ने लगे।

कस्बे में धीरे-धीरे लोग कविता को “सिलाई वाली दीदी” कहने लगे। उसकी कहानी वहाँ तक नहीं पहुँची। वह यही चाहती थी।

एक शाम वह नदी किनारे बैठी। पानी बह रहा था, जैसे समय बहता है—रुकता नहीं, माफ नहीं करता, बस आगे बढ़ जाता है।

उसने सोचा—

माँ अकेलेपन में डूबी।
चाचा लालच और कमजोरी में डूबा।
पिता दूरी में डूबा।
और वह खुद गुस्से में डूबी।

अब कोई नहीं बचा था डूबने के लिए। सिर्फ वह बची थी—किनारे पर खड़ी, भीगी हुई, लेकिन अभी भी साँस लेती हुई।

उसने फैसला किया कि वह और पीछे नहीं मुड़ेगी। न गाँव जाएगी, न पुरानी कब्रों पर दीया जलाएगी, न मुकेश का नाम लेगी। जो बीत गया, उसे बीत जाने देगी।

लेकिन एक बात वह कभी नहीं भूलेगी।

जब घर के बड़े लोग अपनी जिम्मेदारी छोड़ देते हैं, तो सबसे भारी कीमत सबसे छोटी इंसान चुकाती है। कभी चाकू उठाकर, कभी उम्र भर अकेली रहकर, कभी हर रात वही दोपहर दोहराकर।

कविता उठकर चली गई। पीछे नदी बहती रही।

उसकी जिंदगी अब कोई बड़ी कहानी नहीं थी। वह सिर्फ एक औरत थी जो कपड़े सीलती थी, एक लड़की को सीख देती थी और रात को सोने से पहले माँ की एक पुरानी बात याद कर लेती थी—

“बेटी, पढ़ाई कभी मत छोड़ना।”

बाकी सब खत्म हो चुका था।
जो बचा था, वह सिर्फ जीना था।
और जीना कभी-कभी सजा से भी भारी पड़ता है।

समाप्त।
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Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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