Part 2 पति प्रदेश में नौकरी करता था और पत्नी घर पर बेटी के साथ रहती थी / ये कहानी बिहार की हैं
भाग दो
तीन दिन बाद पति रामेश गुजरात से घर पहुंचा।
वह सीधे उस कमरे में गया जहाँ पुलिस ने सील लगा रखी थी। बिस्तर पर खून के धब्बे अभी भी सूखे पड़े थे। उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ एक सवाल पूछा—
“कविता कहाँ है?”
पुलिस ने बताया कि लड़की नाबालिग है, इसलिए उसे किशोर सुधार गृह में रखा गया है। रामेश वहाँ गया। कविता ने पिता को देखते ही सिर झुका लिया। उसने कुछ नहीं बोला। रामेश भी कुछ नहीं पूछा। वह बस बैठ गया और देर तक चुप रहा।

मुकेश भाग चुका था।
गाँव वाले कह रहे थे कि वह घटना वाली रात ही खेतों की ओर चला गया। पुलिस ने उसके खिलाफ वारंट जारी कर दिया। कुछ लोग कहते थे कि वह नेपाल की तरफ चला गया, कुछ कहते थे कि वह अब किसी दूसरे राज्य में मजदूरी कर रहा है। सच आज तक किसी को पता नहीं चला।
चार महीने बाद प्रयागराज के किशोर न्याय बोर्ड में मामला चला।
कविता तेरह साल की थी। अदालत में पत्रकार नहीं आए। सिर्फ परिवार, सरकारी वकील, एक महिला न्यायाधीश और एक मनोवैज्ञानिक मौजूद थे।
कविता ने साफ-साफ कहा—
“मैं माँ को मारना नहीं चाहती थी। मैं सिर्फ यह चाहती थी कि वह रुक जाए। वह रुक नहीं रही थी।”
न्यायाधीश ने पूछा, “तुमने चाकू क्यों उठाया?”
कविता ने जवाब दिया, “क्योंकि उस दिन दोपहर को मैंने जो देखा, उसके बाद मैं कुछ और सोच नहीं पा रही थी। माँ ने कहा था किसी को मत बताना। मैंने किसी को नहीं बताया। लेकिन अंदर से सब कुछ टूट गया था।”
रामेश ने गवाही दी।
उसने कहा, “मैं बाहर कमाता था। घर भेजता था। मुझे लगता था मेरी पत्नी और मेरा भाई घर संभाल रहे हैं। मैं गलत था। मैं घर में नहीं था, इसलिए मुझे कुछ पता नहीं चला।”
मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट में लिखा गया कि कविता में गहरी सदमा और विश्वास टूटने का असर है। वह अपराध की पूरी समझ रखती है, लेकिन उस समय नियंत्रण खो चुकी थी।
फैसला आया।
कविता को तीन साल के लिए किशोर सुधार गृह में रखा गया। रिहाई के बाद निगरानी में रहना होगा। पढ़ाई जारी रखने की अनुमति दी गई।
सुधार गृह में कविता ने आठवीं के बाद की पढ़ाई पूरी की। उसने कम बातें कीं। सिर्फ किताबें पढ़ती रही। माँ की वह बात याद रहती थी—
“पढ़ाई कभी मत छोड़ना।”
तीन साल बाद जब वह बाहर आई, गाँव बदल चुका था। घर बेच दिया गया था। रामेश अब अकेला रहता था, किसी छोटे शहर में मजदूरी करता था। वह कभी-कभी कविता से मिलने आता, लेकिन दोनों के बीच बातें कम होती थीं।
गाँव के बुजुर्ग अब भी वही बात दोहराते—
“बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं।
बड़े अगर मर्यादा तोड़ दें, तो छोटा मन उसे बर्दाश्त नहीं कर पाता।”
मुकेश कभी नहीं लौटा।
मनीषा की कब्र पर अब कोई फूल नहीं चढ़ाता।
और कविता… वह जिंदा है, लेकिन उस घर वाली कविता अब नहीं रही।
कुछ गलतियाँ सिर्फ एक जिंदगी नहीं लेतीं।
वे कई पीढ़ियों का भरोसा तोड़ देती हैं।
समाप्त।
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