बूढ़ी महिला के घर पर लड़का रोज दूध लेने आता था फिर !
दूध की आड़ में छिपा राज: राजू और दुलारी आंटी की कहानी
अध्याय 1: मधुबनी गाँव और अकेली दुलारी
यह घटना सन 2015 की है, जो बिहार के एक बेहद शांत और सुंदर गाँव ‘मधुबनी’ में घटी थी। उस गाँव में दुलारी नाम की एक बहुत ही आकर्षक और सुंदर उम्रदराज़ महिला अपने घर पर बिल्कुल अकेली रहा करती थी। दुलारी के पति का निधन बहुत साल पहले हो चुका था और उसकी कोई सन्तान भी नहीं थी। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए उसने घर पर दो-चार गाय और भैंस पाल रखी थीं, जिनकी देखभाल और सेवा में वह अपना पूरा दिन बिताती थी।
पति के चले जाने के बाद दुलारी मन ही मन काफी अकेलापन महसूस करती थी और अंदर ही अंदर र/ं/ग/ी/न मिज़ाज की हो चुकी थी। भले ही वह उम्र में बड़ी थी, लेकिन देखने में आज भी काफी खूबसूरत और नौजवान लगती थी। गाँव के लोग जब भी उसे देखते, तो देखते ही रह जाते थे।
उसी गाँव में दुलारी के पड़ोस में राजू नाम का एक नौजवान लड़का अपने माता-पिता के साथ रहता था। राजू शहर के एक कॉलेज में पढ़ाई कर रहा था। पढ़ने-लिखने में वह ठीक-ठाक था। राजू को दूध बहुत पसंद था, इसलिए वह प्रतिदिन सुबह और शाम दुलारी के घर शुद्ध 1 लीटर दूध लेने आया करता था।
रोज़ के इस आने-जाने के सिलसिले के दौरान दुलारी और राजू के बीच एक अच्छी बातचीत और गहरा लगाव बन गया था। राजू भी दुलारी आंटी से बात करके बहुत खुश रहता था।
अध्याय 2: राजू की तंगी और निशा की माँग
राजू के जीवन में एक बड़ी परेशानी थी—उसके माता-पिता स्वभाव से काफी कंजूस थे। राजू को कॉलेज की पढ़ाई, जेब खर्च या अपने निजी कामों के लिए जब भी पैसों की ज़रूरत होती, उसके पिता उसे एक भी रुपया नहीं देते थे।
उसी कॉलेज में राजू की दोस्ती ‘निशा’ नाम की एक बेहद खूबसूरत लड़की से हो गई थी। निशा एक अमीर बाप की बेटी थी और काफी खर्चीली स्वभाव की थी। वह राजू को बहुत पसंद करती थी और उसके साथ अ/ं/त/र/ं/ग पल बिताकर अपने अ/र/म/ा/न पूरे करना चाहती थी।
एक दिन निशा ने राजू से कहा, “राजू, तुम कभी मुझे कहीं बाहर घुमाने नहीं ले जाते। यदि हमारे पास पैसे हों तो हम कहीं दूर लॉन्ग टूर पर जाएँ और साथ मिलकर अपनी सारी मु/रा/दें और अ/भ/ि/ल/ा/ष/ा/एं पूरी करें।”
राजू यह सुनकर बहुत शर्मिंदगी महसूस करता था क्योंकि उसकी जेब हमेशा खाली रहती थी।
फिर एक दिन निशा ने राजू से कहा, “कल मेरा जन्मदिन है। मैं चाहती हूँ कि हम दोनों शहर से दूर किसी अच्छी जगह जाकर सरप्राइज बर्थडे मनाएँ। इसलिए कल तुम अपने साथ कुछ पैसों का इंतज़ाम करके आना।”
कॉलेज से घर लौटने के बाद, शाम को राजू ने हिम्मत जुटाकर अपने पिता से 1000 रुपये माँगे। उसके पिता ने साफ़ मना करते हुए कहा, “तुम्हें 1000 रुपये का क्या करना है? पढ़ाई के अलावा फालतू खर्च के लिए मेरे पास एक फूटी कौड़ी नहीं है।” राजू ने अपनी माँ से भी पैसे माँगे, लेकिन माँ ने भी मना कर दिया। राजू बहुत दुखी और निराश हो गया।
अध्याय 3: ₹1000 की शर्त और मजबूरी का सौदा
अगली सुबह जब राजू दुलारी आंटी के घर दूध लेने पहुँचा, तो उसका चेहरा उदास था। दुलारी ने उससे पूछा, “राजू, क्या बात है? आज तुम इतने उदास क्यों हो?”
राजू ने झिझकते हुए कहा, “आंटी, मुझे आपसे एक मदद चाहिए। क्या आप मुझे 1000 रुपये उधार दे सकती हैं?”
दुलारी ने उत्सुक होकर पूछा, “अरे राजू, तुम्हें अचानक 1000 रुपये की क्या ज़रूरत पड़ गई?”
राजू ने मासूमियत से अपनी पूरी परेशानी बता दी कि उसकी कॉलेज फ्रेंड निशा का जन्मदिन है और वह उसे दूर घुमाने ले जाना चाहता है, लेकिन घरवालों ने पैसे देने से मना कर दिया।
दुलारी चतुर महिला थी। वह तुरंत समझ गई कि मामला क्या है। उसने मन ही मन सोचा कि राजू भी एक नौजवान लड़का है जिसके मन में अ/र/म/ा/न हैं। दुलारी का अपना मन भी अकेलेपन के कारण भ/ट/क/ता रहता था और वह भी किसी के साथ अ/ं/त/र/ं/ग सबंध बनाने के लिए व्याकुल रहती थी।
दुलारी ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है राजू, मैं तुम्हें 1000 रुपये दे दूँगी। लेकिन तुम मेरा यह उधार कैसे चुकाओगे?”
राजू ने कहा, “आंटी, मैं तो अभी पढ़ाई करता हूँ, कमाता नहीं हूँ। आप जो भी घर का काम बताएंगी, मैं वो काम करके आपके 1000 रुपये का हिसाब चुकता कर दूँगा।”
दुलारी ने राजू को 1000 रुपये दे दिए। राजू बहुत खुश हुआ, दूध का बर्तन लेकर घर गया और तैयार होकर निशा के साथ जन्मदिन मनाने निकल गया। दोनों ने दूर जाकर केक काटा, खाना खाया और एक-दूसरे के करीब आकर अपने अ/र/म/ा/न पूरे किए। शाम को राजू घर लौट आया।
अध्याय 4: रात की पहली मुलाक़ात और रहस्यमयी खेल
अगले दिन सुबह जब राजू दूध लेने दुलारी आंटी के पास गया, तो दुलारी ने धीमी आवाज़ में कहा, “राजू, आज रात को सब सो जाएँ तो तुम चुपके से मेरे घर आ जाना।”
राजू ने हैरान होकर पूछा, “आंटी, रात में क्या काम है? जो काम है दिन में बता दीजिए।”
दुलारी ने कहा, “तुम्हें अपने 1000 रुपये का हिसाब चुकता करना है या नहीं? अगर उधार चुकाना है तो जैसा कहती हूँ वैसा करो।”
राजू के पास कोई रास्ता नहीं था, उसने हाँ भर दी। रात को जब उसके माता-पिता सो गए, तो राजू चुपचाप दुलारी के घर पहुँच गया। दुलारी उसे अपने कमरे में ले गई और अपनी दबी हुई इ/च्छ/ा/ओं को ज़ाहिर करते हुए उसके साथ श/ा/र/ी/र/ि/क सबंध बनाने की बात कही।
राजू पहले तो झिझका और मना करने लगा, “आंटी, आप उम्र में मुझसे बहुत बड़ी हैं, यह कैसे हो सकता है?”
दुलारी ने कहा, “अगर तुम्हें यह मंज़ूर नहीं तो अभी के अभी मेरे 1000 रुपये लौटा दो।”
अपनी मजबूरी देखते हुए राजू तैयार हो गया। उस रात दुलारी आंटी और राजू के बीच अ/ं/त/र/ं/ग सबंध बने। दुलारी के ग/ु/प्/त अ/ं/ग काफी गी/ले होने के कारण राजू को थोड़ी असुविधा भी हुई, जिस पर दुलारी ने उसे संभलकर रहने को कहा ताकि उसके ब/स्/त/र (कपड़े) खराब न हों और घर पर किसी को शक न हो।
उस रात के बाद, राजू जब घर लौटा तो वह दुलारी के साथ बिताए पलों की तुलना अपनी कॉलेज फ्रेंड निशा से करने लगा। उसे लगा कि दुलारी आंटी के साथ उसे ज्यादा संतुष्टिदायक अनुभव मिला।
अध्याय 5: राज़ का पर्दाफ़ाश और निशा का शक
धीरे-धीरे यह सिलसिला शुरू हो गया। दुलारी आंटी हर दूसरे-तीसरे दिन राजू को रात में बुलाती और दोनों एक-दूसरे के साथ अ/ं/त/र/ं/ग होकर अपने अ/र/म/ा/न पूरे करते। देखते ही देखते 3-4 महीने बीत गए। राजू अब निशा से दूरी बनाने लगा और दुलारी आंटी के करीब रहने लगा।
निशा को राजू के इस बदले हुए व्यवहार पर शक हुआ। उसने राजू का पीछा करना शुरू किया। एक रात निशा ने राजू को चुपके से दुलारी आंटी के घर में घुसते देख लिया। खिड़की और दरवाज़े से जब निशा ने दोनों को एक साथ अ/ं/त/र/ं/ग स्थिति में देखा, तो वह दंग रह गई।
निशा दरवाज़े के पास खड़ी हो गई और राजू के सामने आ गई। उसने राजू से कहा, “राजू, तुम यह क्या कर रहे हो? दुलारी आंटी उम्रदराज़ हैं, अगर तुम रोज़-रोज़ इस चक्कर में रहोगे तो तुम शारीरिक रूप से बहुत कमज़ोर और बीमार पड़ जाओगे।”
राजू ने निशा से कहा, “मुझे दुलारी आंटी के साथ समय बिताना पसंद है, तुम मुझे मत सिखाओ। जब मैं तुम्हारे साथ था तो मुझे उतना अच्छा नहीं लगा, दुलारी आंटी तुमसे बेहतर हैं।”
निशा समझ गई कि राजू अब उसकी बात नहीं सुनेगा, और वह निराश होकर लौट गई।
अध्याय 6: कमज़ोरी, बीमारी और माँ का शक
इसी तरह राजू लगातार दुलारी आंटी से मिलता रहा। लेकिन कुछ ही हफ्तों बाद, अत्यधिक शारीरिक थकावट के कारण राजू सचमुच बहुत बीमार और कमज़ोर हो गया। उसके शरीर में ताकत नहीं बची।
घबराकर उसके माता-पिता उसे तुरंत हॉस्पिटल ले गए। डॉक्टरों ने चेकअप करके बताया कि राजू के शरीर में अत्यधिक कमज़ोरी आ चुकी है।
माता-पिता परेशान हो गए। वे सोचने लगे कि घर में दूध-दही की कोई कमी नहीं है, फिर राजू इतना कमज़ोर कैसे हो गया?
एक दिन जब राजू ठीक होकर घर आया, तो उसकी माँ कपड़े धो रही थी। माँ ने राजू के ब/स्/त/र पर अजीब से दा/ग देखे। माँ का शक गहरा गया क्योंकि वह पहले भी एक रात राजू को चुपके से घर से बाहर जाते देख चुकी थी।
माँ ने राजू को अकेले में पकड़ा और सख्त लहजे में पूछा, “राजू, सच-सच बता! तू रात को दुलारी के घर क्यों जाता है? और तेरे ब/स्/त/र पर यह सब क्या है?”
अध्याय 7: सच का खुलासा और जीवन का सबक
राजू डर गया। उसे लगा कि अब झूठ बोलना बेकार है। उसने रोते हुए अपनी माँ को पूरी बात सच-सच बता दी। उसने बताया कि कैसे उसने निशा के जन्मदिन के लिए 1000 रुपये उधार लिए थे और उस कर्ज को चुकाने के नाम पर दुलारी आंटी रोज़ रात को उसे बुलाकर श/ा/र/ी/र/ि/क सबंध बनाती थी।
यह सुनते ही माँ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने तुरंत राजू के पिता को सारी बात बताई। पिता गुस्से से लाल-पीले हो गए।
अगले ही पल, राजू के पिता और माँ राजू को साथ लेकर दुलारी के घर पहुँचे। पिता ने दुलारी के मुँह पर 1000 रुपये फेंकते हुए कहा, “दुलारी! यह लो अपने 1000 रुपये! आज के बाद अगर तुमने मेरे बेटे पर बुरी नज़र डाली या उसे अपने घर बुलाया, तो अंजाम बहुत बुरा होगा। तुम एक बच्चे की मजबूरी का गलत फ़ायदा उठा रही थी!”
दुलारी डर के मारे काँपने लगी। उसे गाँव में अपनी बदनामी और सामाजिक बहिष्कार का डर सताने लगा। उसने हाथ जोड़कर माफ़ी माँगी, “मुझे माफ़ कर दीजिए। गाँव वालों को यह बात मत बताइएगा, वरना मेरी बहुत बदनामी होगी। मैं कसम खाती हूँ कि आज के बाद कभी राजू को नहीं बुलाऊँगी।”
राजू के माता-पिता ने चेतावनी दी और वहाँ से दूध लेना हमेशा के लिए बंद कर दिया।
उस दिन के बाद दुलारी आंटी पूरी तरह सुधर गई और राजू ने भी अपनी गलतियों से बड़ा सबक लिया। उसने दुलारी और ऐसी गलत आदतों से हमेशा के लिए दूरी बना ली और अपनी पढ़ाई पर ध्यान देने लगा। इस तरह राजू का उस मुसीबत से पीछा छूटा।