PART 5 बूढ़ी महिला के घर पर लड़का रोज दूध लेने आता था फिर !
दूध की आड़ में छिपा राज: राजू और दुलारी आंटी की कहानी (भाग 5)
अध्याय 1: जेल की सलाखों के पीछे नया षड्यंत्र
10 साल की कड़ी सजा काट रही दुलारी आंटी का मन जेल में भी शांत नहीं था। उसके दिल में राजू और निशा के प्रति बदले की आग धधक रही थी। दुलारी जानती थी कि वह कानून के सामने सीधी लड़ाई नहीं जीत सकती, इसलिए उसने जेल के अंदर से ही एक नया और खतरनाक ताना-बाना बुनना शुरू किया।
जेल के अंदर उसकी मुलाकात ‘माया’ नाम की एक शातिर महिला अपराधी से हुई, जिसका बाहर साइबर क्राइम और ह/फ्/ता वसूली का बड़ा सिंडिकेट चलता था। दुलारी ने माया को राजू और निशा के ‘युवा मार्गदर्शन केंद्र’ के बारे में बताया और उन्हें बर्बाद करने के बदले अपनी गुप्त बेनामी संपत्ति का बड़ा हिस्सा देने का वादा किया।
अध्याय 2: समय का चक्र और सुखी परिवार
कई साल बीत गए। राजू और निशा का एनजीओ अब पूरे प्रदेश में एक बड़ा नाम बन चुका था। सैकड़ों बेकसूर छात्र-छात्राएँ उनके केंद्र से मदद पाकर आत्मनिर्भर बन रहे थे। राजू और निशा का एक छोटा और खुशहाल परिवार भी था, जहाँ वे अपने बच्चों और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ शांतिपूर्ण जीवन जी रहे थे।
लेकिन उन्हें इस बात का तनिक भी अहसास नहीं था कि सलाखों के पीछे बैठा दुलारी का पुराना साया एक बार फिर उनके हंसते-खेलते जीवन पर मंडराने वाला था।
अध्याय 3: पैरोल और नया शातिर मोहरा ‘समीर’
खराब सेहत और कानूनी दांव-पेचों का सहारा लेकर दुलारी को कुछ महीनों की सशर्त पैरोल (जमानत) मिल गई। बाहर आते ही उसने राजू और निशा से सीधा मुकाबला करने के बजाय एक नए और नौजवान लड़के ‘समीर’ को अपना मोहरा बनाया।
समीर देखने में बेहद मासूम, पढ़ा-लिखा और चाल-ढाल में सीधा लगता था, लेकिन अंदर से वह पैसों के लालच में अंधा हो चुका था।
दुलारी ने समीर को राजू और निशा के ‘युवा मार्गदर्शन केंद्र’ में एक बेसहारा और पीड़ित छात्र बनकर भेजा। समीर ने अपनी मीठी बातों और दुखी कहानी से राजू और निशा का भरोसा जीत लिया और एनजीओ में वॉलिंटियर के रूप में काम करना शुरू कर दिया।
अध्याय 4: एनजीओ के अंदर गुप्त जाल
समीर का काम एनजीओ में आने वाले नए और सीधे-सादे छात्रों से दोस्ती करना था। वह राजू और निशा की गैर-मौजूदगी में एनजीओ के डिजिटल डेटाबेस से छात्रों की निजी जानकारियाँ और फोन नंबर चुराता था।
समीर उन छात्रों को गुप्त रूप से पार्टी या फर्जी पार्ट-टाइम जॉब के बहाने दुलारी के नए सेफ़-हाउस पर बुलाता। वहाँ दुलारी और उसके गुर्गे छात्रों को न/श/ी/ल/ा पदार्थ मिलाकर पिला देते और उनके अ/ं/त/र/ं/ग वीडियो और फोटो ले लेते थे।
इसके बाद उन बेकसूर छात्रों से कहा जाता कि यदि वे पुलिस में गए या राजू-निशा को बताया, तो उनके वीडियो वायरल कर दिए जाएँगे। साथ ही समीर छात्रों को यह कहकर डराता कि यह सब राजू और निशा के इशारे पर हो रहा है, ताकि एनजीओ का नाम पूरी तरह बदनाम हो जाए।
अध्याय 5: निशा का शक और डिजिटल सुराग
एक दिन एनजीओ की एक छात्रा ‘नेहा’ गुमसुम और डरी हुई हालत में रो रही थी। निशा ने जब नेहा को अकेले में ले जाकर प्यार से पूछा, तो नेहा ने सहमते हुए कहा, “मैडम, मुझे किसी अनजान नंबर से ब्/लै/क/मे/ल किया जा रहा है और कहा जा रहा है कि यदि मैंने पैसे नहीं दिए, तो मेरी अ/ं/त/र/ं/ग तस्वीरें इंटरनेट पर डाल दी जाएँगी। उस मैसेज में आपके एनजीओ का भी नाम लिया गया है।”
निशा को तुरंत दाल में कुछ काला लगा। उसने एनजीओ के साइबर सिक्योरिटी सिस्टम की जाँच की और पाया कि देर रात किसी ने ऑफिस के कंप्यूटर से छात्रों का डेटा डाउनलोड किया था।
सीसीटीवी फुटेज खंगालने पर निशा और राजू ने देखा कि समीर आधी रात को कंप्यूटर से डेटा कॉपी कर रहा था। राजू और निशा समझ गए कि उनके अपने ही घर में सांप छिपा हुआ था।
अध्याय 6: काउंटर स्टिंग ऑपरेशन और दुलारी का पर्दाफ़ाश
राजू और निशा ने समीर को भनक लगे बिना साइबर सेल के सीनियर अधिकारियों से संपर्क किया। पुलिस ने समीर के फोन को सर्विलांस पर डाल दिया।
अगली शाम जब समीर चोरी-छिपे डेटा लेकर दुलारी के नए ठिकाने पर पहुँचा, तो साइबर पुलिस की एक विशेष टीम, राजू और निशा के साथ उसका पीछा करती हुई वहाँ पहुँच गई।
कमरे के अंदर दुलारी बैठकर समीर से कह रही थी, “इस बार राजू और निशा का एनजीओ पूरी तरह नीलाम हो जाएगा! वे जेल जाएँगे और मेरा बदला पूरा होगा!” दुलारी ने समीर को इनाम के तौर पर भारी रकम दी और उस पर दबाव बनाने लगी।
उसी पल पुलिस ने दरवाज़ा तोड़कर अंदर धावा बोल दिया। दुलारी, समीर और उनके अन्य साथियों को रंगे हाथों धर दबोचा गया।
अध्याय 7: अंतिम न्याय और स्थायी मुक्ति
पुलिस ने मौके से समीर का लैपटॉप, दुलारी का मोबाइल और ब्लैकमेलिंग के दर्जनों डिजिटल रिकॉर्ड ज़ब्त कर लिए। पैरोल के नियमों का उल्लंघन करने और नए संगीन अपराध रचने के कारण अदालत ने दुलारी की पैरोल तुरंत रद्द कर दी।
अदालत ने दुलारी आंटी को बिना किसी पैरोल के आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई और उसके सहयोगी समीर व माया को 14 साल की सख्त सजा दी।
अदालत ने राजू और निशा के एनजीओ की ईमानदारी और समाज सेवा की सराहना की। इस अंतिम कानूनी जीत के साथ दुलारी आंटी का खौफ और साया राजू-निशा के जीवन से हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया।
कहानी से अंतिम संदेश: बुराई चाहे कितनी भी चालाक क्यों न हो और नए रूप बदलकर आए, सत्य, विवेक और कानून की ताकत के आगे उसे हमेशा घुटने टेकने ही पड़ते हैं।