PART 2 बूढ़ी महिला के घर पर लड़का रोज दूध लेने आता था फिर !
दूध की आड़ में छिपा राज: राजू और दुलारी आंटी की कहानी (भाग 2)
अध्याय 1: नई शुरुआत और निशा की दूरी
पिछली घटना के बाद राजू ने दुलारी आंटी के घर जाना पूरी तरह बंद कर दिया था। उसने अपना पूरा ध्यान कॉलेज की पढ़ाई में लगाने की कोशिश की। लेकिन कॉलेज पहुँचते ही उसका सामना निशा से हुआ। निशा अभी भी राजू के इस रवैये और पुरानी बातों से दुखी थी।
जब राजू ने निशा से बात करने की कोशिश की, तो निशा ने गँभीरता से कहा, “राजू, तुमने उस दिन मेरे प्यार और भरोसे का मज़ाक बनाया था। तुमने एक उम्रदराज़ महिला के साथ अपने अ/ं/त/र/ं/ग पलों को मुझसे बेहतर बताया था। अब मैं तुम पर कैसे भरोसा करूँ?”
राजू ने शर्मिंदा होकर कहा, “निशा, वह मेरी मजबूरी और बचपना था। 1000 रुपये का कर्ज चुकाने के चक्कर में मैं उस औरत के जाल में फँस गया था। मुझे माफ़ कर दो, अब मेरे और दुलारी के बीच कोई श/ा/र/ी/र/ि/क सबंध नहीं है।”
निशा ने राजू को सुधरने का एक आख़िरी मौक़ा तो दिया, लेकिन उसके मन में अभी भी शंका और डर बना हुआ था।
अध्याय 2: दुलारी की तन्हाई और नई साज़िश
दूसरी तरफ, दुलारी आंटी का अकेलापन फिर से बढ़ गया था। राजू के दूर चले जाने से उसकी रातें फिर से सूनी और व्याकुल होने लगी थीं। दुलारी का स्वभाव मन ही मन र/ं/ग/ी/न मिज़ाज का था, और वह अपनी दबी हुई इ/च्छ/ा/ओं को दबा नहीं पा रही थी।
गाँव के लोग जब भी दुलारी को देखते, वह मुस्कुराकर बात करती, लेकिन उसके दिल में राजू को वापस अपने करीब लाने की तड़प उठ रही थी। वह जानती थी कि राजू का परिवार पैसों के मामले में कंजूस है और राजू को जब भी पैसों की तंगी होगी, वह फिर से किसी न किसी के आगे हाथ फैलाएगा।
दुलारी ने राजू को फिर से अपने जाल में फँसाने के लिए एक नई योजना बनानी शुरू कर दी।
अध्याय 3: कॉलेज फ़ीस और पैसों का नया संकट
कुछ हफ्तों बाद, राजू के कॉलेज में एक विशेष प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट और शैक्षणिक टूर के लिए ₹5000 जमा करने का नोटिस आया। यदि पैसे जमा नहीं होते, तो राजू को परीक्षा में बैठने नहीं दिया जाता।
राजू घबराकर अपने घर पहुँचा। उसने अपने पिता से डरते-डरते ₹5000 माँगे। उसके पिता ने साफ़ शब्दों में डाँटते हुए कहा, “पाँच हज़ार रुपये! इतने पैसे मेरे पास नहीं हैं। पढ़ाई छोड़ दो और खेत के काम में हाथ बँटाओ!”
माँ ने भी बेबसी जताई। राजू निराश होकर गाँव के पुराने पीपल के पेड़ के पास बैठकर रोने लगा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने करियर को कैसे बचाए।
उसी रास्ते से दुलारी आंटी गुज़र रही थी। उसने राजू को उदास देखा और चुपके से एक छोटे बच्चे के हाथ राजू को एक चिट्ठी भिजवाई।
अध्याय 4: चिट्ठी का जाल और आधी रात का बुलावा
राजू ने चिट्ठी खोली, जिसमें लिखा था: “राजू, मुझे पता है तुम्हें पैसों की सख्त ज़रूरत है। 5000 रुपये मेरे पास रखे हैं। तुम्हें कोई ब्याज नहीं देना होगा और न ही पैसे वापस करने की जल्दी है। बस आज रात 12 बजे मेरे घर आ जाना, हम बैठकर बात कर लेंगे।”
राजू का मन धर्मसंकट में फँस गया। एक तरफ उसके माता-पिता की दी हुई चेतावनी और सेहत का डर था, तो दूसरी तरफ उसकी पढ़ाई और करियर का सवाल था।
राजू ने सोचा कि वह सिर्फ़ पैसे लेने जाएगा और दुलारी से कोई श/ा/र/ी/र/ि/क संबंध नहीं बनाएगा। पैसों की मजबूरी ने उसे एक बार फिर उसी अंधेरी गली की तरफ मोड़ दिया।
रात को 12 बजे, जब पूरा गाँव सो रहा था, राजू दबे पाँव दुलारी के घर के पिछले दरवाज़े पर पहुँचा।
अध्याय 5: पुरानी हसरत और मजबूरी का दूसरा सौदा
दुलारी ने दरवाज़ा खोला और राजू को तुरंत कमरे के अंदर खींच लिया। कमरे में हल्की रोशनी थी और दुलारी काफी सजी-धजी बैठी थी।
राजू ने सीधे मुद्दे पर आते हुए कहा, “आंटी, मुझे बस पैसे चाहिए। मैं यहाँ कोई गलत काम करने नहीं आया हूँ।”
दुलारी ने चालाकी से मुस्कुराते हुए कहा, “अरे राजू, इतने दिन बाद आए हो और आते ही पैसों की बात? पैसों की चिंता मत करो, यह लो ₹5000।” उसने नोटों की गड्डी मेज़ पर रख दी।
फिर दुलारी राजू के करीब आई और उसके ब/स्/त/र को छूते हुए बोली, “लेकिन राजू, बदले में मुझे भी तो कुछ चाहिए। इतने महीनों से मैं अकेली तड़प रही हूँ। आज रात तुम्हें मेरे अ/र/म/ा/न पूरे करने होंगे।”
राजू ने पीछे हटते हुए मना किया, लेकिन दुलारी ने धमकी दी, “अगर तुम मना करोगे तो मैं अभी चिल्लाकर पूरे गाँव को इकट्ठा कर लूँगी कि तुम चोरी करने मेरे घर में घुसे हो!”
फँस जाने के डर से राजू टूट गया। उस रात फिर से दुलारी और राजू के बीच अ/ं/त/र/ं/ग सबंध बने। दुलारी की का/म/ु/क इच्छाएँ शांत हुईं, लेकिन राजू अंदर से खुद को अपराधी महसूस कर रहा था।
अध्याय 6: निशा की सतर्कता और रंगे हाथों पकड़ना
राजू को लगा कि यह बात गुप्त रहेगी, लेकिन इस बार निशा उस पर लगातार नज़र रख रही थी। निशा को राजू के अचानक शांत हो जाने और पैसों का इंतज़ाम हो जाने पर शक हुआ था।
अगली बार जब दुलारी ने राजू को फिर से बुलाया, तो निशा छुपकर दुलारी के घर के बाहर आ पहुँची। निशा ने अपने मोबाइल में खिड़की के रास्ते से दुलारी और राजू की बातचीत का ऑडियो और वीडियो रिकॉर्ड कर लिया, जिसमें दुलारी राजू को पैसों का लालच देकर श/ा/र/ी/र/ि/क सबंध बनाने पर मजबूर कर रही थी।
रिकॉर्डिंग करने के बाद निशा ने सीधे राजू के माता-पिता और गाँव के सरपंच को रात में ही दुलारी के घर के बाहर बुला लिया।
अध्याय 7: पंचायत का फ़ैसला और जीवन का अंतिम सबक
गाँव के सरपंच और माता-पिता के दरवाज़ा खटखटाने पर दुलारी और राजू हड़बड़ा गए। दुलारी ने खुद को बचाने के लिए रोने का नाटक किया और कहा, “सरपंच जी! यह लड़का ज़बरदस्ती मेरे घर में घुस आया!”
लेकिन तभी निशा आगे आई और उसने सरपंच के सामने वह मोबाइल रिकॉर्डिंग चला दी। रिकॉर्डिंग में दुलारी का घिनौना चेहरा और राजू को ब्लैकमेल करने का सच पूरे गाँव के सामने आ गया।
गाँव वालों ने दुलारी को कड़ी फटकार लगाई और उस पर भारी जुर्माना ठोका। सामाजिक बहिष्कार के डर से दुलारी ने पूरे गाँव के सामने माफ़ी माँगी और गाँव छोड़कर शहर जाने का फ़ैसला किया।
राजू के पिता को भी अपनी कंजूसी का अहसास हुआ कि कैसे पैसों की तंगी ने उनके बेटे को गलत रास्ते पर धकेल दिया था। राजू ने रोते हुए अपने माता-पिता और निशा से माफ़ी माँगी और कसम खाई कि वह कभी भी पैसों या शॉर्टकट के चक्कर में अपनी मर्यादा नहीं लाँघेगा।
निशा की समझदारी से राजू एक बड़े दलदल से बाहर निकल पाया, और राजू ने अपनी पढ़ाई पूरी करके एक नया और सच्चा जीवन शुरू किया।