देवर से बोली शादी के बाद वाला सीखोगे।
देवर से बोली शादी के बाद वाला सीखोगे
भाग 1: श्रावस्ती की एक धुंधली भोर और एक अधूरा आंगन
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले का वह छोटा सा गांव भोर की हल्की धुंध में लिपटा हुआ था। खेतों से उठती हल्की ओस और मिट्ठी की सोंधी सुगंध पूरे वातावरण में रची-बसी थी। गांव के कोने में बसा हुआ एक पुराना मगर पक्का मकान, जिसके आंगन में हमेशा एक शांति छाई रहती थी। यह घर था रामदीन जी का। रामदीन जी स्वभाव से शांत और मेहनती किसान थे। उनके दो बेटे थे—बड़ा बेटा अभिषेक और छोटा बेटा विवेक।
अभिषेक की शादी को लगभग तीन साल बीत चुके थे। उसकी पत्नी का नाम मोनिका था। मोनिका एक सुंदर, समझदार और गृहकार्य में निपुण स्त्री थी। हालांकि, शादी के तीन लंबे साल बीत जाने के बाद भी इस आंगन में किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। गांव-देहात में तीन साल का समय बहुत बड़ा माना जाता है। आस-पड़ोस की औरतें जब भी आतीं, तो घूम-फिरकर बात इसी मुद्दे पर आ टिकती। रामदीन जी और उनकी पत्नी (मोनिका की सास) भी आए दिन उदास नजर आते थे। वे अक्सर अपनी बहू से कहते, “बहू, अब हमारी उम्र ढल रही है। हमारी आंखें मूंदने से पहले घर में एक पोता या पोती खिलाने का सुख दे दो।”
लेकिन इस खालीपन के पीछे की असली सच्चाई केवल मोनिका जानती थी। दुनिया की नजरों में तो कमी बहू में खोजी जाती है, पर सच यह था कि अभिषेक में कुछ डॉक्टरी और /शा/री/रि/क/ समस्याएं थीं। अभिषेक शहर में एक निजी कंपनी में नौकरी करता था। वह छह महीने में एकाध बार ही गांव आता था और वह भी महज 10-15 दिनों की छुट्टी लेकर। उन थोड़े दिनों में भी उनके बीच वह सहजता और आत्मीयता नहीं बन पाती थी, जो एक पूर्ण वैवाहिक जीवन के लिए आवश्यक होती है। अभिषेक इस बात को लेकर हमेशा ग्लानि से भरा रहता था, पर समाज के डर से उसने यह बात किसी को नहीं बताई थी। मोनिका भी पति के सम्मान की रक्षा के लिए चुप्पी साधे सब सहती आ रही थी।
घर में छोटा बेटा विवेक था, जो शहर के एक स्थानीय कॉलेज से 12वीं कक्षा की पढ़ाई कर रहा था। विवेक सीधा-साधा, दुबला-पतला मगर देखने में सुंदर नवयुवक था। पढ़ाई के साथ-साथ वह घर के छोटे-मोटे कामों में अपने पिता का हाथ बंटा दिया करता था।
भाग 2: सर्दी की वो सुबह और एक अप्रत्याशित दृश्य
दिसंबर की कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। भोर के लगभग पाँच बज रहे थे और बाहर घना कोहरा छाया हुआ था। खेत में पानी लगाने की बारी रामदीन जी के परिवार की थी। रामदीन जी ने बाहर बरामदे में आकर आवाज लगाई, “विवेक! ओ विवेक! उठो बेटा, खेत में पानी चालू करना है। मशीन चालू करने का समय हो गया है।”
विवेक अपनी खाट पर भारी कंबल ओढ़कर सोया हुआ था। ठंड इतनी ज्यादा थी कि उसकी नींद खुल ही नहीं रही थी। रामदीन जी की लगातार आवाजें सुनकर मोनिका, जो रसोई में चाय बनाने की तैयारी कर रही थी, बाहर निकली। उसने सोचा कि पिताजी बार-बार पुकार रहे हैं, क्यों न वह खुद जाकर विवेक को जगा दे।
मोनिका विवेक के कमरे में पहुंची। विवेक खाट पर एक भारी रजाई-कंबल लपेटे बेखबर सोया हुआ था। मोनिका ने पास जाकर धीरे से कहा, “विवेक उठो, बाबूजी बाहर से बुला रहे हैं। खेत में पानी लगाने जाना है।”
विवेक ने कुनमुनाते हुए कंबल और कस लिया। जब वह दो-तीन बार बुलाने पर भी नहीं उठा, तो मोनिका ने थोड़ा झुकाव बनाकर अचानक से उसका कंबल ऊपर से खींच दिया।
कंबल हटते ही जो दृश्य मोनिका के सामने आया, उसने उसे स्तब्ध कर दिया। विवेक केवल अपने संक्षिप्त वस्त्रों (कच्छा-बनियान) में सो रहा था। सुबह की स्वाभाविक प्रक्रिया और युवावस्था के सहज प्रभाव के कारण उसका शरीर एक विशेष प्रकार की /उ/त्ते/ज/ना/ और उभार से भरा हुआ था।
मोनिका की नजरें उस अप्रत्याशित दृश्य पर टिक गईं। उसने जीवन में पहली बार किसी पुरुष के शरीर में ऐसा सुगठित और पूर्ण रूप से /उ/त्ते/जि/त/ निखार देखा था। अपने पति अभिषेक के साथ बिताए गए नीरस और निष्प्राण पलों की तुलना अचानक ही उसके मन में विवेक के इस युवा रूप से होने लगी। मोनिका के भीतर दबी हुई स्त्री-सुलभ इच्छाएं और /का/मु/क/ भावनाएं अचानक जाग उठीं। उसका हृदय जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसने जल्दी से खुद को संभाला और विवेक के कंधे को हिलाते हुए कहा, “उठो विवेक… बाबूजी डांटेंगे।” विवेक ने हड़बड़ाकर आंखें खोलीं, सामने भाभी को खड़ा देखकर उसने तुरंत कंबल वापस खींच लिया और लजाते हुए उठ बैठा।
लेकिन उस एक भोर ने मोनिका के दिल और दिमाग में एक गहरा हलचल पैदा कर दिया था।
भाग 3: मन का भटकाव और बदलती निगाहें
उस दिन के बाद से मोनिका की निगाहें विवेक के प्रति पूरी तरह बदल गईं। जो देवर उसके लिए अब तक एक छोटे बच्चे या अनुज समान था, अब उसकी आंखों में एक पुरुष के रूप में उभरने लगा था। मोनिका का मन लगातार भटकने लगा। घर के रोजमर्रा के कामों को करते हुए भी उसका ध्यान विवेक के आसपास ही टिका रहता।
वह विवेक का विशेष ध्यान रखने लगी। उसके समय पर खाने-पीने का इंतजाम करना, उसके कपड़े साफ करना, और छोटी-छोटी बातों पर उससे बातें करने के मौके तलाशना उसकी दिनचर्या बन गई।
विवेक एक सीधा-साधा छात्र था। उसे अपनी भाभी के इस बदलते व्यवहार का कारण समझ में नहीं आ रहा था। वह तो बस यही सोचता था कि भाभी उसका ख्याल एक बड़े भाई की पत्नी के नाते रख रही हैं।
एक दिन दोपहर के समय, घर के बड़े लोग किसी रिश्तेदार के यहाँ शादी की बात करने गए हुए थे। घर पर सिर्फ मोनिका और विवेक थे। विवेक स्कूल से लौटकर आया था और अपने कमरे में किताबें व्यवस्थित कर रहा था। मोनिका उसके लिए गरम-गरम नाश्ता और चाय लेकर कमरे में पहुंची